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© Atul Kumar Yadav

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            अगर आज सबकी ज़िंदगी पर एक बार नज़र डाले तो लगता है कि ज़िंदगी "प्रधानमंत्री के काफिले" की तरह हो गयी है| सुबह जगने से लेकर रात्रि सोने तक दुनिया भर का भागना-दौड़ना और हासिल कुछ भी न होना लगा रहता है| तमाम दिक्कतों को देखते हुए कहीं ना कहीं मन भी "मनमोहन" हो जाता है| आजकल तो महंगाई और बरसात दोनों ही अमित शाह के जुमले" की तरह दस्तक दे रहीं है| ज़िंदगी के बवाल तो लगते हैं सचमुच "दिल्ली के केजरी-वबाल" हो गये| सुबह से लेकर रात तक ज़िंदगी अपनी कश्मकश में उलझी रहती है, जिसको समझना और पार पाना दोनों मुश्किल सा हो जाता है|
            अभी कल दिल्ली में बस अड्डे पर खड़ा था.. बस का इंतजार कर रहा था, बारिश ही इतनी तेज हो गयी थी कि यातायात व्यस्थ| धीरे धीरे गाड़ियाँ आगे बढ़ रही थी, मुझे भी थोड़ा जल्दी निकलना था| थोड़ी देर इंतजार के बाद एक बस आकर रूकी| मैं बस के अन्दर दाखिल हुआ, बस वैसे भी खचाखच भरी थी पर समय से पहुँचने के लिए बस में चढ़ना पड़ा| मेरे साथ-साथ और भी लोग बस में दाखिल हो गये| जैसे-तैसे तो करके बस में दाखिल हो गया पर सबसे बडी समस्या थी अब टिकट लेना की, टिकट लेने की लोगों के अन्दर बस में भी इतनी जल्दी लगी थी कि मानों बस के अन्दर में भी कोई और बस पकड़नी थी| मुझे टोल ही लेना था अत: मैं शान्त परिचालक के पास खड़ा होकर फ्लाई-वे पर बस के चलने का इंतजार करने लगा|
            बस धीरे धीरे आगे बढ़ती रही, मैं कभी बस में बैठे लोगों को देखता तो कभी परिचालक के टिकट की लेन-देन प्रक्रिया को| अचानक मेरा ध्यान परिचालक के लेन-देन पर गहरा हो गया, मैं अपनी तेज नज़रो से उसे देखने लगा| परिचालक अपने एक हाथ में टिकट और रूपयों की नोट अंगुलियों में फसाये हुये बैठा था जबकि दूसरे हाथ से टिकट को फाड़-फाड़ दे रहा था| जिस हाथ में टिकट और रुपयों की नोट नज़र आ रही थी| उसी हाथ में एक छोटी सी थैली भी लटकी हुयी नज़र आ रही थी जो सिक्कों से भरी प्रतीत हो रही थी|
              सिक्कों से भरी थैली रखने के बावजूद परिचालक महोदय यात्रियों के टिकट लेन देन की प्रक्रिया के दौरान ये कहते हुये नहीं थक रहे थे कि सिक्के नहीं है| लोग बिना किसी टिप्पणी के आगे बढ़ जाते थे| बहुत देर तक ये सब देखने के बाद मुझसे रहा नहीं गया और मैनें भी सिक्के रहने के बावजूद दस की नोट पकड़ा दिया और अपनी धीमी आवाज में बोला: अंकल! एक टोल..| परिचालक ने नोट पकड़ी और अपने पास रखी "चार की टिकट" फाड़ी साथ में पॉच रुपये की नोट टिकट के नीचे चिपकाये धीरे से पकड़ा दिये| जैस ही वोे पकड़ाये मैनें आवाज लगायी, अंकल! ये तो नौ ही मुझे वापस किये... जबकि मैं तो आपको दस दिया था..| जवाब आया "चेंज नहीं है|" मै बोला - "ठीक है फिर आप मेरे दस दीजिए मैं आपको चेंज देता हूँ..|" वो मेरे दिये हुये दस की नोट पकड़ा दिये मैं उनकी दी हुयी पॉच की नोट तुरन्त वापस करने के बाद पॉकेट से "तीन रुपये निकाला" और देने लगा | परिचालक महोदय यह देख झल्ला गये.., "बोले ये क्या है...?? टोल चार की है और तू मुझे तीन क्युँ दे रहा??" जवाब में बोला : अंकल! चेंज इससे ज्यादा मेरे पास भी नहीं है| अब परिचालक महोदय की तेज आवाज मुझ पर रौब दिखाने जैसी प्रतीत हुयी| पर बिना विचलित हुये मैं भी अपनी थोड़ी तेज आवाज में बोलने लगा| पूरी बस का ध्यान अब हम दोनों की तरफ था...| हम दोनों फिर भी अपने-अपने में लगे रहे| कुछ लोग शान्त खड़े थे और अब कुछ शान्त कराने में लग गये|
           अन्त में परिचालक महोदय को हारकर अपनी लटकी हुयी थैली में हाथ डालना पड़ा, चिल्लरों को बाहर निकालकर एक रुपये का सिक्का देना ही पड़ा| चिल्लरों की संख्या देख और लोग भी अपने एक-एक दो-दो रुपयों की गुहार लगाने लगे| परिचालक महोदय अब गुस्से से मुझे कभी-कभी देखते हुए कुछ को उनके एक-एक दो-दो वापस करने लगे| अन्त में कुछ से रुपये वापसी में मुकर गये|
            अन्तत: बस फ्लाई-वे पर आ चुकी थी, अपनी पूरी रफ्तार से सरपट दौड़ रही थी| परिचालक महोदय हमें अभी भी देख रहे थे| रूक रूक कर कुछ बोलते भी रहे| मैं सब कुछ अनसुना कर दिया| कुछ यात्री तारिफ भी कर रहे थे, तो कुछ सिक्के लेकर बस में चढ़ने का प्रण कर रहे थे| खैर जो भी हो, आपके साथ कभी ऐसा न हो इसके लिए आपसे आशा रहेगी की आप कुछ सिक्के लेकर आगे से बस में चढ़ेगें| यहाँ बात महज एक रुपये की थी, पर उस एक रुपये की किमत उस बच्चे से पुछियेगा जो कल इसी एक रुपये की वजह से न रोटी खा सका था न पानी पी सका था और अगले दिन सड़क के फुटपाथ पर हमेशा हमेशा के लिए सोया मिला था|
         

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