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सीढ़िया
सीढ़िया
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© हनुमंत किशोर

Inspirational Others

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सीढियां अपने एकांत में उपेक्षित और उब से भरी हैं ।

अपने चेहरे की झुर्रियों को टटोलती हर क़दम की आहट पर वे सजग हो जाती हैं । उन्हें इंतज़ार रहता है कि अब भी कोई उनसे होकर ऊपर जायेगा। उनके खातिर शुक्रगुज़ार होगा और उन्हें फिर से अपने ख़ास होने का अहसास होगा वैसे ही जैसे लिफ्ट के आने से पहले हुआ करता था । लेकिन निगोड़ी लिफ्ट ने एक झटके में उन्हें बूढ़ा बासी और बेकार कर दिया। अब तो किन्ही खास मौकों पर स्वीपर ही उन पर झाड़ू लगाने भर आता है । उनके ऊपर के फ्यूज बल्ब बदले दीये जाते हैं । वरना वे धूल सजे अंधेरे में सिर्फ साँस लेते रहती हैं । वे बिल्डिंग के बूढ़ो को देखती है तो उन्हें अपनी हैसियत और हालात का अंदाज़ होता है और वे लम्बी लम्बी सांस छोड़ने लगती हैं ।

लिफ्ट के शुरू होने पर उन्हें अपने अपने भरोसेमंद होने और कभी कोई तकनीकी खराबी ना होने का गुमान था और वे सोचती थीं कि देर सबेर लोग उनकी तरफ लौट आएंगे । लेकिन वक्त ने उनके भरोसे को तोड़ दिया । फ्लैट नम्बर ३१७ के मिस्टर शर्मा भी जो घुटनों की वर्जिश और सेहत की फिक्र के लिए सीढ़ियों से चढ़ने उतरने की मुफ्त सलाह बांटते फिरते है, खुद कभी उनकी तरफ नही देखते । कोई गर उन्हें लिफ्ट का इस्तेमाल करते देख लेता है तो मुस्कुराहट ओढ़ कर पहले से तैयार सफाई देने लगते है, "कि वो क्या है ..ज़रा जल्दी निकलना था ..लेकिन देर हो गयी ।"

उब में इधर उधर देखते सीढ़ियों की नज़र उस चेतावनी बोर्ड ठिठक जाती है जिसमे लिखा है "आग लगने की दशा में लिफ्ट का नही सीढ़ियों का इस्तेमाल करें" हालांकि सीढियां हमेशा ये दुआ करती हैं कि बिल्डिंग में कभी आग ना लगे ।

लघु-कथा सीढ़िया बुजुर्ग लिफ्ट बल्ब आग दुआ

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