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बेनाम
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© Shishira Pathak

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हर रोज़ की तरह आज भी प्रशांत बाबू अपने दफ्तर से लौटने थे,  लेकिन प्रशांत बाबू के लिए उस वक़्त गैस स्टोव की आवाज ही एकमात्र ध्वनि का स्रोत होती थी। समोसे तैयार होने के बाद वे 2 समोसे खरीद कर वहीं पर बड़े चाव से उनका सेवन करते,  जो अपने आप में बड़ी निराली चीज़ थी,  निराली इसलिए क्योंकि वे चाय की चुस्की और समोसे के निवाले को एक साथ लिया करते थे,  पहले समोसे का निवाला और फिर साथ ही साथ मीठी चाय की चुस्की। कुल्हड़ वाली चाय को ही लेना पर्यावरण के प्रति उनकी सजगता को दर्शाता था। शहर में शाम के वक़्त लाखों की भीड़ के बीच वो कंधे पर अपना चमड़े से निर्मित बैग टाँगे हुए बस स्टैंड की ओर निकल पड़ते थे,  रास्ते में कोई-न-कोई जान पहचान वाला मिल ही जाता था और क्रिकेट या राजनीति की बात छिड़ जाती थी। हम भारतवासियों को अपना समय बिताना हो तो क्रिकेट या राजनीति ही दो ऐसे विषय हैं जो टाइम पास की कसौटी पर खरे उतरते हैं,  और हमें इन विषयों पर हमें तर्क-वितर्क या टिप्पणियाँ करना बड़ा आनंददायी भी लगता है। बस स्टैंड तक पहुंचने में 15 मिनट लग जाते थे और फिर प्रशांत बाबू वहाँ एक सीट पर बैठ कर सवेरे के अखबार को निकाल जो बची-खुची सुर्खियाँ रह जाती थीं उन पर भी अपनी पैनी नज़र दौड़ा लिया करते थे। प्रशांत बाबू दूरभाष विभाग में लिपिक के तौर पर कार्यरत थे। उन्हें अभी काम करते हुए 7-8 महीने ही गुज़रे थे। उनकी शादी नहीं हुई थी इसलिए वो शहर में एक कमरा किराए पर ले कर रह रहे थे। वो अपना खाना-पीना खुद ही तैयार करते थे। उनके जीने की शैली बहुत ही सरल थी जो की उन्होंने अपने पिता से सीखी थी। उनके पिता स्वतंत्रता सेनानी रह चुके थे और कई बार स्वतंत्रता आंदोलनों में भाग लेने पर अंग्रेजी सरकार ने उन्हें जेल भी भेजा था। इसलिए प्रशांत बाबू भी बहुत ही ईमानदार,  कर्मठ और संस्कारवान व्यक्ति थे। उनके पहनावे में उनकी सरलता झलकती थी। वह कुर्ता पाजामा और ऊपर से एक खाकी रंग की बंडी,  कलाई पर अपने बाबूजी की दी हुई एच.एम.टी  की घड़ी जो की यदा-कदा ही बैटरी बदलने को कहती थी,  आँखों पर काले रंग का मोटा सा चश्मा,  और काले रंग की मोटी-मजबूत,  टिकाऊ रबर की चप्पल। हर रोज़ की तरह आज भी वह स्टैंड पर अख़बार ही पढ़ रहे थे की उनकी नज़र एक भिखारी पर पड़ी जो वहाँ उपस्थित लोगों से भिक्षा याचना कर रहा था। उसके हाथों को देख कर लग रहा था कि वो कुष्ठ रोग से पीड़ित हो। वह भिखारी स्टैंड पर खड़े या बैठे सभी लोगों के सामने जाता और मुस्कुरा कर रह-रह कर बोलता, " ऐ मालिक,  2 रुपया दे दे,  आज कुछ नहीं खाया हूँ, ”  लेकिन स्टैंड पर सभी लोग यह बोल कर की,  "पैसे नहीं हैं" उसे भगा देते। थोड़ी देर बाद वो भिखारी प्रशांत बाबू के सामने भी आया और भिक्षा याचना करते हुए मुस्कुरा कर वही वाक्य उसने फिर से दोहराये,  पर, उसकी करुण याचना प्रशांत बाबू के कानों में नहीं गयी,  वह उसे देख कर स्तब्ध रह गए थे। एकदम काला रंग,  पट्टी बंधी उँगलियाँ जिन पर मक्खियां भिनभिना रहीं थीं,  ललाट पर एक घाव जिस से मवाद रिस रहा था ,  गंदे धूल से लट-पट बाल जो मानवीय शरीर के तेल और धुल से कठोर हो चुके थे,  सफ़ेद हो चुकी पसीने से सनी मटमैली ढाढ़ी,  गले पर मानवीय मृत चमड़ी,  धूल ,  चेहरे पर झुर्रियां जो की गन्दगी और पसीने के कारण अमानवीय प्रतीत हो रही थीं,  टूटे हुए पीले हो चुके बेतरतीब दाँत,  होंठों पर जमी हुई पपड़ी,  आँखों में आंसू के साथ मिला हुआ आँखों का मैल जो की आँख के किनारे से ढलक रहा था,  पसीने से भीगा हुआ दुर्गन्ध देता शरीर,  एक कटी हुई टांग जिस पर पट्टी बंधी थी,  धड़ पर एक काली-पीली सी पूरे बांह की बीना बटन वाली शर्ट जो फट चुकी थी, और नीचे एक सफ़ेद रंग की जो मिट्टी के रंग की हो चली थी, जहाँ-तहाँ से फटी और घिसी-पीटी कहने को पैंट। वह भिखारी  कुछ देर वहीं पर खड़ा रहा पर कुछ पैसे नहीं मिलने के चलते वह से भी आगे निकल गया, लेकिन फिर अचानक से उसने अपन सिर घुमाया और प्रशांत बाबू की ओर देख कर अपना सिर हिलाता हुआ प्रशांत बाबू को देख मुस्कुराने लगा। यह देख प्रशांत बाबू थोड़े डर गए और विचलित भी हो गए। तभी उनकी बस आ गयी, और सभी यात्रियों के साथ वो भी बस पर चढ़ गये। बस अपने गंतव्य स्थान को निकल गयी पर अभी भी प्रशांत बाबू बस की खिड़की से झाँक कर उस भिखारी को देख रहे थे और वह भिखारी भी उन्हें देख सिर हिलाता हुआ मुस्कुरा रहा था।

बस कुछ देर में अपने गंतव्य तक पहुँच गयी थी। प्रशांत बाबू बस से उतार गये और अपने किराये के कमरे की ओर अपने कदम बढ़ाने लगे। प्रशांत बाबू अपने कमरे की ओर बढ़ते हुए काफ़ी चिंतित थे, वह मन ही मन खुद से सवाल कर रहे थे कि कोई इतने कष्ट में कैसे मुस्कुरा सकता है, जिसका पूरा शरीर दुर्गन्ध कर रहा हो, जहाँ-तहाँ घाव हों, मुखमंडल पर उसके मुस्कुराहट कैसे आ सकती है,  कोई भी उसे भीख देने को तैयार नहीं हो रहा था, फिर भी उसमें जीने की इतनी चाहत कैसे थी?  ये सवाल प्रशांत बाबू के मन को टटोल रहे थे। वैसे तो वे रोज़ाना किराने की दुकान से एक पैकेट दूध खरीद कर अपने कमरे की ओर जाते थे पर आज वे किसी और ही चिन्तन में थे। रह-रह कर उस भिखारी का चेहरा उनके सामने आ जाता था। थोड़ी देर बाद वे अपने कमरे तक पहुँच गये, और आदतन हाथ मुंह धोये, कपड़े बदले और कुर्सी पर बैठ गए, वे एकदम चुप थे और कमरा एकदम शांत था। वे यही बातें सोच रहे थे की आखिर ऐसी क्या बात है जो उस भिखारी को ज़िंदा रखे हुई थी, इस कष्ट में भी वह दिन भर एक लाठी के सहारे भिक्षाटन करता रहता है। वे यह भी सोच रहे थे की वह भिखारी क्या खाता होगा, कितना खता होगा, कहाँ रहता होगा, अपना जीवन कैसे चलाता होगा। क्या उसकी देख-रेख करने वाला कोई नहीं इस संसार में, अभी तक जिस से भी उसने भिक्षा याचना की होगी, क्या किसी ने भी उसके घावों पर दवा नहीं लगाई? क्या उसे पीड़ा का अनुभव नहीं होता, या फिर वो पीड़ा,  कष्ट,  बीमारी,  स्नेह आदि, जो की जन सामान्य और यहां तक की पशुओं  के लिए भी हज़ारों  साल आपस में प्रतिस्पर्धा का विषय और कारण बने रहे हैं,  इन चीज़ों से ऊपर उठ चुका है? और अगर हाँ तो आखिर क्यों?  इस तरह के सवाल प्रशांत बाबू के मन में घूम रहे थे,  धीरे-धीरे घड़ी की सुई 12 पहुँच गयी और कुछ देर बाद प्रशांत बाबू कुर्सी पर बैठे-बैठे ही सो गए।

सुबह हो गयी थी। प्रशान्त बाबू के कमरे के पास एक बड़ा सा उढ़ल का पेड़ था जिसपर कुछ सुन्दर लाल फूल खिले हुए थे। सवेरे-सवेरे चिड़ियाँ उस पेड़ पर आ कर चहचहातीं और चींटियों की दावत उड़ातीं थीं। उढ़ल के पेड़ के नीचे छोटा सा ज़मीन का टुकड़ा था जो की सीमेंट-बालू और रोड बनाने की प्रक्रिया से बाचा रह गया था। उस छोटे से भाग पर कुछ घास भी उगी हुई थीं, घास पर सुबह की ओस की बूँद और कुछ कीट-पतंगे घूम रहे थे। साथ ही साथ कभी- कभी वहां केंचुए भी निकल आते थे। इन सब जीव-जंतुओं की बहुतायत होने की वजह से वहां हर सुबह गौरैयों का तथा मैनाओं का जमावड़ा लगा रहता था और सारे मिल कर खूब कलरव करते थे। बगल में ही आम का एक विशाल पेड़ था। हवा के तेज़ बह रही थी ,  और हवा के आम के पत्तों के बीच से हो कर गुजरने से सरसराहट की आवाज़ हो रही थी। पक्षियों का कलरव और पेड़ की सरसराहट की आवाज़ का मिश्रण बड़ा ही मधुर था और वातावरण में दूर तक गूँज रहा था। थोड़ी देर बाद इन सब पक्षियों के चहचहाने से प्रशांत बाबू उठ गए। यह हर रोज़ का नियम था, प्रशांत बाबू को उठाने के लिए सुबह-सुबह चिड़ियाँ आ ही जाया करती थीं। प्रशांत बाबू ने बिछौने  से उठकर अपने कमरे का पर्दा हटाया और सूरज की रौशनी ने कमरे को जगमगा दिया। सुबह के कार्यक्रम को निपटाने के बाद वे अपने दफ़्तर को निकल लिए। अपने कमरे से निकल कर प्रशांत बाबू बस स्टैंड की और बढ़े पर अभी भी उनका मन अशांत ही था। चलते-चलते वह बस स्टैंड पर पहुँच गये, पर कुछ सोच रहे थे। थोड़ी देर बाद बस आयी और वे बस में बैठ गये। बस कंडक्टर आया तो प्रशांत बाबू ने 10 रुपये के बजाए 500 रुपये निकाल कर दे दिए। कंडक्टर ने 10 रुपये का टिकट बनाया और पैसे काट कर बैलेंस लौटाने के लिए अपनी बैग को टटोला लेकिन उसे खुल्ले रुपयों के नोट नहीं मिले,  खुल्ले लौटाने के लिए उसने बाकी के यात्रियों से अनुरोध किया कि शायद कोई 500 रुपये के नोट के खुल्ले कर दे, लेकिन सुबह का वक़्त होने के कारण किसी ने उसकी मदद नहीं की। हार कर कंडक्टर ने प्रशांत बाबू को 500 का नोट लौटा दिया। इतना सब हो रहा था लेकिन प्रशांत बाबू किसी और दुनिया में खोए हुए थे। उनके दिमाग से उस भिखारी का ख्याल जा ही नहीं रहा था। कण्डक्टर ने उन्हें हिलाते हुए कहा, " अरे भैया 500 का खुल्ला नहीं है, 10 रुपये अगर हैं तो दे दो"। प्रशांत बाबू बस कंडक्टर की ओर देख रहे थे लेकिन उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा था। तभी कंडक्टर की ओर किसी ने 10 रुपये के दो करारे नोट दिए और कहा, "ये लो भाई 10 रुपये मेरे और प्रशांत भाई के, और जल्दी से टिकट बना कर दो"। प्रशांत बाबू ने घूम कर देखा तो उनके सहकर्मी निमेष जी मुस्कुराते हुए, बाएं कंधे पर पिट्ठू लटकाये और बायीं हाथ से बस का रॉड पकड़े हुए दायीं हाथ से कंडक्टर को पैसे दे रहे थे। अपने सहकर्मी को देख कर प्रशांत बाबू के चेहरे पर हल्की सी मुस्कराहट आ गई,  उन्होंने कहा, "यार तुमने पैसे क्यों दे दिए, मैंने तो दिए ही थे, कंडक्टर टिकट बना ही तो रहा था"। निमेष जी ने हँसते हुए कहा, "भाई प्रशांत मैं इस बस में काफी देर से तुम्हें देख रहा हूँ, परिचालक को तुमने टिकट के पैसे तो दिए पर सवेरे-सवेरे आखिर बेचारा परिचालक 500 रुपये का खुल्ला कहाँ से लाये"। प्रशांत बाबू ने अचंभित होते हुए पूछा, "कौन से 500 रुपये!!? लेकिन किराया तो 10 रुपये है, मैं हर रोज़ इतने में ही सफर करता हूँ, और तुम किस 500 रुपये की बात कर रहे हो?" निमेष जी ने उत्तर दिया, "बंधु ज़रा अपना बटुआ चेक करना तो"। प्रशांत बाबू बोले, "इसमें बटुआ क्या चेक करना?" निमेष जी ने कहा,  भाई देखो, तुमने शायद गलती से परिचालक को 500 का नोट दे दिया है जिसका खुल्ला करने में परिचालक महोदय असफल हैं, परिचालक महोदय ने तुम्हें अपनी व्यथा बताई पर तुम तो आज किसी और दुनिया में हो और मूक दर्शक भांति चुपचाप बैठे हुए हो,  तुमने परिचालक की बात भी नहीं सुनी इसलिए मैंने बस का किराया दे दिया"। प्रशान्त बाबू बोले, " मतलब की तुम्हारे मुताबिक ये 500 का नोट मेरा है?" निमेष जी ने जोर देते हुए कहा, "जी हाँ और अगर विश्वास नहीं होता है तो एक बार तसल्ली कर ही लो यार, बटुआ भी तुम्हारा है,  नोट भी और जेब भी"। प्रशांत बाबू ने कहा, "इसमें कौन सी बड़ी बात है, ये लो"। प्रशांत बाबू ने अपना बटुआ चेक किया लेकिन उसमें 500 का नोट नहीं था। प्रशांत बाबू घबरा गए, और निमेष जी की ओर चिंतित मुद्रा में देखने लगे और बोले, "यहीं तो होना चाहिए, कल ही तो रखा था,  कहाँ जा सकता है"। निमेष जी ने कंडक्टर के पास से 500 का नोट लिया और बोले,  "ये लो बंधु,  ये है तुम्हारा नोट,  ध्यान से रुपये निकाला करो, वो तो परिचालक महोदय ईमानदार प्रतीत होते हैं, नहीं तो नोट वापिस नहीं मिलता"। इसपर कंडक्टर ने पूछा,  "सर जी,  ये परिचालक किसे बोल रहे हैं,  और ये होता क्या है? निमेष जी कुछ सेकंड तक कण्डक्टर की ओर देखते रहे,  और कंडक्टर मुंह बाए उनकी ओर देख रहा था। इन क्षणों के बीच ड्राइवर बस के सात सुर वाले हॉर्न को बजाता हुआ बस को भगा रहा था। निमेष जी ने चिढ़ कर उत्तर दिया, "अरे महाशय परिचालक यानि कंडक्टर"। बस में यात्री ये सब देख रहे थे। कंडक्टर ने फिर कहा, "ओ.... अच्छा,  परिचालक यानी कंडक्टर !!!,  पीछे के बैठे कुछ स्कूल जा रहे बच्चों ने ज़ोर से कहा, हाँ.. कंडक्टर हा... हा... हा ...।  यात्रीगण मध्यम भाव में हंस पड़े और प्रशांत बाबू भी,  उन्होंने  निमेष जी से सवाल किया, "ये सब तो ठीक है लेकिन  क्या ये 500 का नोट मेरा ही है?" निमेष जी,  कंडक्टर और अगल-बगल के कुछ लोग जी हां..... बोलते हुए हंस पड़े। प्रशांत बाबू भी अब थोड़े शांत हो गए थे, और नोट को बटुए में रख लिया, और 10 का नोट निकाल कर निमेष जी को देने लगे, इसपर निमेष जी ने कहा, "अरे भाई, इसे रखो अपने पास, इतना ही हिसाब-किताब रखना ह तो शाम को समोसे खिला देना, हे...हे...हे...।

 निमेष जी और प्रशांत बाबू टिकट लेने के बाद आपस में बातें करने लगे। प्रशांत बाबू तो सीट पर बैठे हुए थे लेकिन निमेष जी को खड़ा ही रहना पड़ा। प्रशांत बाबू ने निमेष जी का पिट्ठू अपनी गोद में रख लिया और निमेष जी आराम से बिना बोझ के सफर का आनंद लेने लगे। चूंकि बस चार्टर्ड थी इसलिए बस में भीड़ नहीं थी, लेकिन सारी सीटें पहले से ही ले ली गईं थीं। 2-4 व्यक्ति बस में खड़े थे उनमें से एक निमेष जी भी थे। प्रशान्त बाबू ने अपने मित्र को कुछ देर अपनी सीट पर बैठने का आमंत्रण भी दिया पर निमेष जी ने हँसी मज़ाक में टाल दिया। दोनों के बीच ऑफिस की बातें,  और हंसी-मजाक होने लगी। बातों-बातों में समय कब बीत गया पता ही नहीं चला। बस रुक गयी और यात्रीगण बस से उतर गये। निमेष जी और प्रशांत बाबू की दोस्ती देखते ही बनती थी। दोनों कोई हंसी- मजाक,  क्रिकेट और राजनीति की बातें करते हुए अपने दफ्तर की ओर बढ़ रहे थे। प्रशांत बाबू के अंतर्मन से उस भिखारी की छवि लगभग जा चुकी थी। वे अपने अंदाज में आ गए थे,  दफ्तर जाने से पहले वे नुक्कड़ पर रुक एक कुल्हड़ गरमागरम चाय अवश्य पिया करते थे। आज चूँकि निमेष जी भी साथ थे तो उन्होंने ही आज एकसाथ चाय पी कर दफतर की दहलीज को पार करने का प्रस्ताव रखा। निमेष जी जा कर समोसे खरीदने लगे पर प्रशांत बाबू ने उन्हें रोक दिया और कहा,  "अरे बंधु थोड़ा सब्र करो,  गर्म तले हुए समोसे निकलने ही वाले है, इन ठण्डे पड़े हुए गर्माहट विहीन समोसे की तुरंत के तले हुए गर्म समोसों के आगे क्या औकात है। तनिक रुको गर्म समोसे अभी थोड़ी ही देर में प्रकट होने वाले हैं उनके साथ मीठी दूध वाली चाय का मजा ही कुछ और होता है भाई। देखो शायद तुम्हें ये नहीं मालूम की चाय और समोसों का मजा कैसे लिया जाता है, लगता है कि तुम्हें ये विद्या बताने की ज़रूरत है"। निमेष जी बोले, " ये कौन सी विद्या है, ज़रा मैं भी तो जानूँ"। प्रशांत जी ने मुस्कुरा कर कहा, " इस विद्या को सीखने के लिए चाय और समोसे का खर्च आपको की वहन करना होगा, इसे आप गुरु दक्षिणा समझ के दे दें"। निमेष जी ने हाथ जोड़ते हुए कहा, "जो आज्ञा गुरुदेव, मैं सुबह के नाश्ते का खर्च तो वहन कर ही लूंगा, साथ ही साथ आज शाम को आपकी सिखाई हुई रहस्यमयी और गूढ़ विद्या को आजमाने के लिए शाम के नाश्ते का खर्च भी मैं ही वहन करने को तैयार हूँ"। इन दोनों की बाते आस-पास के लोग सुन रहे थे। जैसे ही हलवाई ने गर्म समोसों को निकाला निमेष जी ने बिजली की गति से उन्हें खरीदा और पत्तल में रख लेते आये, इधर प्रशांत बाबू ने जल्दी से गर्म चाय से भरे दो कुल्हड़ लिए। निमेष जी बोले, "गुरुदेव शिक्षा ग्रहण करने के लिए मैं तत्पर हूँ और आप जैसे अनुभवी रवैये से नयी खाद्य विद्या सीखने के लिए अत्यधिक उत्सुकता का अनुभव कर रहा हूँ।” प्रशांत जी के मुखमंडल पर एक आध्यात्मिक तेज खिल उठा,  और वे बोले,  "तुम्हारी सारी व्याकुलता और उत्सुकता का इलाज इस समोसे में है,  देखो इस गर्म भांप निकलते हुए समोसे को,  इसके अंदर आलू और मसालों का मिश्रण है,  जो की हमारी जीभ को आनंद देने के लिए हलवाई महोदय ने तैयार किया है,  एक निवाला ऊपर की नोक से लो और थोड़ा सा 4-5 सेकंड के लिए चबाओ फिर दूसरे हाथ में पकड़े हुए चाय के कुल्हड़ से मीठे अमृत रूपी चाय की एक चुस्की लो, फिर जो समोसे का और चाय के स्वाद का आनंद तुम्हें मिलेगा उसे शब्दों में लिखा नहीं जा सकता है"। इतना बोल कर दोनों ने समोसे का एक निवाला लिया और चाय की चुस्की ली,  उन्हें देखने वाले अगल-बगल के लोगों ने भी वैसा ही किया,  और चाय की चुस्की लेने की सुर्रर्रर्रर... सुर्रर्रर्र की आवाज 10-15 जगहों से 1 या 2 सेकंड के विराम के बाद आने लगी। इधर इन दोनों के देख हलवाई ने भी समोसे और चाय की चुस्की ले ही ली। इन्हें देख निमेष जी और प्रशान्त बाबू हंस पड़े और इन दोनों को हँसता देख समोसे और कुल्हड़ को पकड़े बाकी के लोग और हलवाई महोदय की भी हंसी रुक नहीं पायी।

माहौल में हंसी की आवाज़ अभी तैर ही रही थी की प्रशांत बाबू ने पलट कर देखा और उनकी नज़र उसी भिखारी पर पड़ गयी। वह भिखारी  समोसे वाले से समोसे की भीख मांग रहा था। एक लाठी के सहारे खड़े हो कर विचित्र मुद्रा में अपने सर को हिलाते हुए, चेहरे पर मुस्कुराहट लाने की कोशिश करते हुए कभी अपने पेट को छूता तो कभी निवाला लेने की मुद्रा में अपनी उँगलियों को समेट कर अपने मुँह के पास लाता। ऐसा वह बार-बार दोहरा रहा था। उसे भूख लगी थी, पर हलवाई उसे दुत्कार रहा था और डाट कर भगा रहा था। समोसों को तलता देख और जानलेवा भूख के मारे उसने निकाले हुए समोसों में से एक समोसा उठा लिया और खाने लगा। समोसा गर्म था और उसका मुँह जल गया और उसने खाये हुए निवाले को थूक दिया , शायद वह खाने के तरीके भी भूल चुका था। इतना देख हलवाई ने उसे ज़ोर से धक्का दिया जिस से उसके हाथ से समोसा गिर कर दूर चला गया और वह खुद भी गिर पड़ा। हलवाई  ने गालियाँ बकी और उसके पेट पर ज़ोर से दो लात मार दिए। ऐसा घटित हुआ ही था कि प्रशांत बाबू उठे और तमतमाते हुए हलवाई के पास गए और जेब से जो भी नोट निकला वो हलवाई के मुँह पर दे मारा,  और गुस्से में आ कर वे बोले, " तुम आदमी हो या जानवर, एक लाचार भिखारी को मार रहे हो, एक समोसा ले ही लिया तो क्या हुआ, ये लो, जितना खा सके ये खिला दो इसे, समझे"। हलवाई भी आवेश में था, उसने भी कह दिया, " इंसान हूँ तभी मैंने ऐसा किया, अगर हर रोज़ मैं एक-एक पकवान बाँटता रहूं तो एक दिन मेरी भी हालात इस लंगड़े भिखारी जैसी हो जायेगी"। प्रशांत जी और भड़क उठे और लाल-पीले होते हुए हलवाई की ओर दौड़ पड़े, लेकिन निमेष जी ने उन्हें रोक लिया और मामले को तुरंत रफा-दफा किया। अपने मित्र को उन्होंने शांत किया और प्रशान्त बाबू के आवेग में आ कर दिए हुए पैसे उन्हें वापिस लौटा दिए। निमेष जी ने पूछा, "इतने गुस्से में मैंने आजतक तुम्हें नहीं देखा, क्या बात हो गयी?" प्रशांत बाबू ने कोई उत्तर नहीं दिया, वे उस भिखारी को देख रहे थे, भिखारी को ज़ोर की चोट लगी थी, जिसका प्रमाण उसके पेट से निकली उलटी थी, वह अपने पेट को पकड़ा हुआ ज़मीन पर पड़ा हुआ रो रहा था। कुछ क्षणों के बाद वह अपनी लाठी के सहारे उठा और बाकी के बचे हुए मिट्टी से सने समोसे के आलू को उठा कर खाने लगा और रोते हुए वहां से चला गया।

निमेष जी ने अपनी घड़ी देखी और बोले, " चलो अब दफ्तर चलते हैं, साहब के आने का समय हो चला है, कहीं देर हो गयी तो डांट खानी पड़ेगी। वायदे के अनुसार निमेश जी ने नाश्ते का खर्च दे दिया। दोनों मित्र सीढ़ियां चढ़ते हुए अपने दफ्तर जा रहे थे, निमेष जी हंसी मजाक करने को कोशिश करते पर प्रशान्त बाबू बड़े ही गंभीर मुद्रा में हाँ...हाँ.. कर बात टाल देते। दिन भर का काम रोज की तरह चल रहा था। धीरे-धीरे वक़्त अपनी चाल चलता हुआ आगे बढ़ रहा था और देखते ही देखते शाम हो गयी। उधर वह भिखारी हमेशा की तरह भीख मांगता हुआ बस स्टैंड पर घूम रहा था लेकिन हमेशा की तरह कोई उसे भीख नहीं दे रहा था। तभी कुछ शरारती बच्चे जो उसे पगला-पगला बुला कर छेड़ा करते थे वे आज भी उसे छेड़ रहे थे। वह भिखारी उनसे दूर भागने की कोशिश करता पर बेचारा लंगड़ा भिखारी भाग नहीं पाता। थोड़ी देर बाद वे लड़के उसे छोड़ कर चले गए। वह भिखारी थक गया था और बस स्टैंड के पास नीचे बैठ गया,  उस दिन धूप बहुत कड़ी  थी। थोड़ी देर में उसे नींद भी आ गयी। अचानक एक शरारती लड़का आया और उसने उस भिखारी को उठाया और एक लड्डू दिखाया। लालच में आ कर भिखारी ने उससे लड्डू लिया और खा लिया। थोड़ी दे बाद उसी लड़के ने थोड़ी दूर खड़े हो कर भिखारी को एक और लड्डू दिखाया। लालच और भूख के मारे भिखारी खड़ा हो गया और उस लड़के के पास जा कर उस से लड्डू ले लिया और खाने लगा। तभी एक और लड़का सड़क के उस पार अपने हाथों में लड्डुओं का पूरा डिब्बा लिए भिखारी को चिढ़ाते हुए खाने लगा। भिखारी यह देख प्रफुल्लित हो उठा,  उसके आँखों से आँसू निकल पड़े। वह अपने पास खड़े लड़के के सिर पर हाथ फेरते हुए अपने हाथ आशीर्वाद की मुद्रा में उठा कर कुछ बोलने की कोशिश करने लगा पर उसके कंठ से कोई शब्द न निकले। अपने हाथ में रखे लड्डू का एक निवाला ले कर वह सड़क पर खड़े उस लड़के की ओर चल पड़ा। लड्डू को कहते हुए इस आशा में की लड्डू का पूरा डब्बा मिलेगा वह ख़ुशी के मारे रोते हुए, आसमान में ऊपर देखते हुए भगवान को ढूंढते गले से कुछ बोलने का प्रयत्न करते हुए सड़क पार करने लगा। सड़क पर दनदनाती गाड़ियों से बचते-बचाते,  बस और वाहनों के ड्राइवरों से गालियां सुनते हुए वह अपने सर को ऊपर -नीचे की मुद्रा में हिलाते हुए लगभग उस पार पहुँच ही गया था कि अचानक उसने ऊपर सूरज की ओर देखा और उसकी आँखें चौंधिया गयी,  भीड़ के बीच एक ज़ोर से ब्रेक मारने की आवाज़ आयी और सारी गाड़ियां रुक गयीं। वाहनों के हॉर्न का खूब शोर होने लगा। ट्रैफिक हवलदार  भीड़ हटाने के लिए आया और सीटी बजाता हुआ अचानक से रुक गया। वह बस भिखारी को रौंदते हुए तेज़ी से निकल गयी थी। वह डिब्बे वाला लड़का भाग चुका था। बस भिखारी का मृत शरीर वहां पड़ा था, जिस से लोग अपनी गाड़ियां को किनारे कर के निकाल रहे थे।

शाम के 6 बज गये थे और प्रशांत बाबू अपने दफ्तर से निकल चुके थे। नीचे वह नुक्कड़ पर चाय पी रहे थे। तभी एक ब्रेक मारने की ज़ोर की आवाज आई। सारे लोग भाग कर रोड की तरफ गए। सड़क के उस पार एक हादसा हुआ था। कुछ लोग वहां खड़े थे तो कुछ अपने फ़ोन पर हंस-हंस कर बात करते हुए बिना कोई ध्यान दिए चलते जा रहे थे। प्रशान्त बाबू भी वहां पर पहुंचे। एक मृत शरीर ज़मीन पर खून से लथपथ पड़ा हुआ था। प्रशान्त बाबू  की आँखें फटी रह गईं। उन्होंने जो देखा वह कभी भूलने लायक दृश्य नहीं था। सड़क पर बिखरे मवाद के साथ रक्त, दूर सड़क पर पड़ी हुई लाठी, आँख से निकले हुए आँसू,  खुला हुआ मुंह जिसमें चबाये हुए लड्डू का अंश था, हाथ में खाये हुए पीले लड्डू के बचे कुचे टुकड़े और रौंदा हुआ शरीर। सभी लोग चले गए पर प्रशान्त बाबू वहीं खड़े रहे। दूर से हलवाई ये सब देख रहा था। वह प्रशांत बाबू के पास आया और बोला, " पागल कहते थे सब इसे,  अच्छा हुआ ऊपर वाले ने इसे अपने पास बुला लिया, काफी तकलीफ में था बेचारा। दो साल पहले की बात है, सरकारी अस्पताल की गाड़ी आयी थी और इसे यहां फेक कर चली गयी थी। लोग कहते हैं कि इसके बेटे ने इसके इलाज की पूरी रकम नहीं दी थी,  और शहर छोड़ कर भाग गया था, उसके बाद अस्पताल वालों ने इसे सड़क पर मरने को छोड़ दिया। कटी टांग पर तब से पट्टी लगी हुई थी और आज भी बंधी हुई है, यह टांग कैसे कटी किसी को नहीं पता। पहले तो थोड़ी बातें करता था पर एक दिन अचानक चुप हो गया, शायद पागल हो गया था। बहुत बुरा हुआ। इस बात का की हम कलयुग में जी रहे हैं इन्हीं चीज़ों से पता चलता है, भगवान इसकी आत्मा को शान्ति दे"। प्रशान्त बाबू कुछ दूर जा कर बैठे रहे, सड़क पर लगे लाइट पोस्ट की रौशनी में भिखारी का मृत शरीर पड़ा हुआ था, उसके हाथों में जो लड्डू के टुकड़े बचे हुए थे उसे गिलहरियां आ कर खा रहीं थीं। रात के 9 बजे पुलिस म्युनिसपेल्टी की एम्बुलेंस ले कर आई और लाश को उठा कर ले गयी। प्रशान्त बाबू वही पर कुछ देर और बैठे रहे। आधे घण्टे बाद प्रशान्त बाबू ने श्मशान जाने का निश्चय किया। उन्होंने बस पकड़ी और 20 मिनिट के बाद श्मशान पहुँच गये। वहाँ बहुत सी लाशें जल रहीं थी। लाश जलाने वाले से उन्होंने पूछा, "अभी कुछ देर पहले पुलिस एक लाश ले कर आई थी वह कहाँ जल रही है? शमशान पर उपस्थित उस आदमी ने कहा,  "वो लाश!!!,  अरे साहब ऐसा लगता है कि उसके किस्मत में तो आग भी नहीं है,  ज़रूर बहुत पापी जीवन रहा होगा उसका, तभी मरने के बाद पुलिस ने उसे लावारिस की तरह यह छोड़ दिया। सवेरे तक तो कुत्ते हड्डियाँ तक नोच खाएंगे उसकी हे....हे....हे"। ढेर सारी जलती हुई लाशें,  पूरे वातावरण में जलती हुई चमड़ी की दुर्गन्ध,  दाह संस्कार के वक़्त किये जाते हुए मंत्रोचारण,  मृत के परिवार जनों का विलाप और इस बीच उस आदमी को हँसता देख प्रशान्त बाबू स्तब्ध रह गए। उन्होंने उस आदमी से पुछा की वह लाश कहाँ रखी है, इशारे में उस आदमी ने उस लाश का स्थान बताया। दुखी मन के साथ प्रशांत बाबू उस लाश के पास गए, उस भिखारी का पूरा शरीर अकड़ चुका था। वह भिखारी की लाश के पास खड़े हो गए, तभी पीछे से एक आदमी आया, और पान को चबाते हुए बोला, "क्या साब, इतना लेट आते हो, थोड़ी देर और होती तो बदबू भी आने लगती, 3000 रुपये दो अभी ख़ाक किये देता हूँ, एकदम हल्का रेट बता रहा हूँ, इस से कम में तो कुत्ते ही खाएंगे इसे"। प्रशान्त बाबू ने बोला, "क्या बकते हो, थोड़ा तो लिहाज करो"। इसपर उस आदमी ने कहा, "बकता नहीं हूँ साहब,  वो देखो, गंगा नदी किनारे, वह जो कुत्तों का झुण्ड दिख रहा है न वे वहाँ  लावारिस लाशों की दावत उड़ा रहे हैं,  ये जो पापी लोग होते हैं न साब, उनके शरीर को आग भी नहीं खाती है,  हाँ पर इस दुनिया से जाते हुए कुत्तों का पेट भर कर एक पुण्य का काम जरूर के देते हैं ये करमजले,  हे...हे...हे...",   इतना बोल कर उसने बगल में पान थूक दिया। प्रशांत बाबू ने उसे और जलती हुई चिंताओं की ओर देखा, और कहा, " थोड़ी देर में आता हूँ"। वे एटीएम पर गये और पैसे निकाल कर उस आदमी को दे दिए। जैसा उसने बोला था, वैसे ही उसने लाश को अग्नि के हवाले कर दिया। भिखारी का शरीर धूं-धूं कर जलने लगा। आग की लपटें ऊँची उठने लगीं और धुआँ भी निकलने लगा। यह देख प्रशान्त बाबू के सामने भिखारी की हंसती हुई वही छवि आ गयी जो उन्होंने बस से देखी थी। उन्हें अब समझ आ रहा था कि भिखारी उन्हें देख कर क्यों हँस रहा था, शायद प्रशान्त बाबू ही उसका दाह संस्कार करेंगे यह बात वह किसी तरह जान चुका था। धीरे-धीरे चिता की आग तेज हो गयी और मानव का शरीर शांत हो कर अपनी अनेक दुर्गतियों में से अन्तिम गति को प्राप्त होता रहा।

इधर भिखारी का शरीर जल रहा था और उधर प्रशान्त बाबू यह सोच रहे थे की यह कौन था। कुछ देर तक चिंतन करने के बाद प्रशान्त बाबू शमशान के पंजीयन कार्यालय और गये। वहाँ जा कर उन्होंने वैन पर उपस्थित कर्मी से पुछा, " कुछ समय पहले पुलिस यहां एक भिखारी की लाश लायी थी उसका पंजीयन हुआ है क्या? कार्यालय के कर्मी ने अपना चश्मा ठीक करते हुए प्रशान्त बाबू को देखा और कहा, "आप कौन हैं, और यह जानकारी क्यों मांग रहे हैं? जलने वाला तो जल रहा है। दिखने में तो पुलिस नहीं लगते हैं आप, और अगर पुलिस हैं तो उनके पास पहले से ही पूरी जानकारी उपलब्ध है"। प्रशांत बाबू बोले, "इसका मतलब की पुलिस को ये पता है कि वह भिखारी कौन है?" वह कर्मी फिर बोला, "हाँ बिलकुल पता है, वैसे ये नहीं बताया आपने की आप हैं कौन और ये क्यों जानना चाहते हैं? प्रशांत बाबू ने बोला की, " मैं एक समाज सेवक हूँ और लावारिस लाशों का दाह संस्कार करता हूँ, इसलिए नाम जानना ज़रूरी है"। ठीक है अभी बताता हूँ तनिक सब्र करो, ऐसा बोल कर वह कर्मी अन्दर के कमरे से एक मोटा सा पोथा ले कर आया, कुछ पन्ने पलटे और बोला, " नाम नहीं बात सकता क्योंकि यहां नाम लिखा ही नहीं है,  लेकिन हाँ, .... घर का पता बता सकता हूँ"। प्रशान्त बाबू तुरंत बोल उठे, " तो फिर देर किस बात की,  कृपया आप जल्दी से मुझे पता बताएं"। कर्मी थोड़ा मुस्कुराते हुए, और अपने चश्मे के देखते हुए बोला, "वो सब तो ठीक है पर...मगर...आप कुछ हरियाली दिखा दे तो...., आप मेरी बात तो समझ ही रहे होंगे,  क्यों भाई साहब,  हे...हे....हे"। प्रशान्त बाबू समझ गए और अपने जेब से 100 रुपये निकल कर दे दिए। वह कर्मी बोला, "अरे साहब इतने में तो सिर्फ पोथे के पन्ने ही पलट पाऊँगा, कुछ और दे दें तो बात बन जायेगी, महंगाई का ज़माना है"। प्रशान्त बाबू समझ गए थे को ये एकदम ही निर्लज्ज आदमी है, उस से अनुरोध करना अपना समय बर्बाद करने के बराबर है। प्रशान्त बाबू ने 200 रुपये और निकले और दे दिए और खा,  "लीजिये इतने में तो आपका काम हो जाना चाहिए,  अभी मेरे पास इनके अलावा कुछ नहीं है"। उस कर्मी ने हँसते-हँसते पैसे ले लिए और बोला,  "आप  देखने में तो शरीफ आदमी लगते हैं , इसलिए चलिये हम भी थोड़ी बहुत शराफत दिखा ही दे, कोई और होता तो 500 के नीचे काम नई बनता, हाँ तो नोट करें इनका पता"। प्रशान्त बाबू ने तुरंत अपना कलाम निकाला और अपनी हथेली पर पता नोट कर लिया। पता था, "आनंद श्री, धनिया टोली, शिवपुर "। सुबह के 3 बज रहे थे और प्रशान्त बाबू थक भी गये थे इसलिए उन्होंने सवेरे उस पते पर जाने का निश्चय किया और पास में एक मंदिर के प्रांगण में  बैठ कर सो गए। 

कुछ ही देर में सुबह हो गयी, श्मशान में थोड़ी हलचल भी बढ़ गयी थी। रविवार का दिन था। सूरज की रौशनी धीरे-धीरे बढ़ने लगी तभी वहाँ किसी मृत के परिजनों के रोने की आवाज से प्रशांत बाबू उठ गये। आँख खुली तो सामने किसी का दाह संस्कार हो रहा था, उसे देखते ही उनके सामने भिखारी का चेहरा आ गया , प्रशान्त बाबू ने मुड़ कर देखा तो भिखारी का शरीर ख़ाक हो चुका था, और अग्नि देने वाले कर्मी ने उन्हें अस्थियां बटोर कर उनकी तरफ आ रहा था और उनके पास आ कर बोला, "क्या हालत है आजकल के रिश्तों का, अस्थियां भी अब हम ही बटोरेंगे क्या, भाई साहब याद रखो की ये वही इंसान की अस्थियाँ हैं जिसने तुम्हारे बचपन में तुम्हारी गंदगी साफ की हैं और आज तुम अस्थियां चुन ने से कतरा रहे हो, ये लो पकड़ो ये अस्थियां, मैंने चुन कर इस मिट्टी के बर्तन में रख दीं हैं"। प्रशान्त बाबू ने अस्थियां मंदिर में एक किनारे रख दीं, वैसे भी लाल कपड़े से बंधे मिट्टी के बर्तन जिसमें अस्थियां हो उसे कोई छूता तक नहीं है। जीते जी तो कोई किसी की मदद नहीं करता मरने के बाद कोई क्या करेगा। प्रशांत बाबू ने जल्दी से जा कर प्रशासन द्वारा बनाये गए स्नान घर में अपना हाथ मुंह धोया। वे अपना हाथ धो रहे थे की उन्हें अपनी हथेली पे लिखा पता दिख गया। उन्होंने सोच की उस पते पर शायद भिखारी को जानने वाला कोई मिल जाये। वे तुरंत अपना काम समाप्त कर उस पते की और चल पड़े। श्मशान से बहार निकलने पर कुछ रिक्शा वाले खड़े मिले,  प्रशान्त बाबू ने उनमें से एक को बुलाया और हथेली पे लिखा पता बताया। रिक्शा वाले अपने हाथ के  इशारे से उन्हें दिशा दिखाई,  प्रशान्त बाबू ने उस से पुछा,  "कितना भाड़ा लोगे? रिक्शा वाले ने कहा,  "30 रुपये लगेंगे"। प्रशान्त बाबू ने हाथ से चलने का इशारा किया और रिक्शा पर बैठ गए। रिक्शा वाले ने भी अपनी लुंगी में से खैनी की डिबिया निकाली और खैनी बना कर ताल ठोकने के बाद खैनी को अपने होंठ के नीचे दब लिया और रिक्शा धीमी गति से चल पड़ा। अगल-बगल से मोटर गाड़ियां भी निकलती जा रहीं थीं। रिक्शा वाला अनोखी मुद्रा में रिक्शा चला रहा था। वह पहले से ही अपनी सीट पर थोड़ा टेढ़ा बैठा था और कभी बायीं ओर उठता तो कभी दायीं ओर। नारंगी रंग की बनियान और नीली लुंगी जिसमें कुछ छेद हो चले थे उसने पहन रखी थी। प्रशांत बाबू ने उस से पूछा, "अरे तुम सीधा क्यों नहीं बैठ रहे हो? टेढ़ा बैठोगे तो कैसे रिक्शा चलाओगे?। रिक्शा वाले ने जवाब दिया, "कहाँ टेढ़ा बैठे हैं, हमारा गाड़ी का अगला भाग टेढ़ा है ही तो क्या करे"। प्रशान्त बाबू ने ध्यान से देखा तो उसकी सीट बायीं ओर मुड़ी हुई थी और आगे का पहिया और हैंडल दायीं ओर मुड़ी थी,  इस विचित्र मुद्रा में वह अपनी दाएं कंधे तो थोड़ा ऊपर की ओर उठा कर रिक्शा चला रहा था। देखते ही देखते समय बीत गया और प्रशांत बाबू पते पर पहुँच गये। रिक्शे वाले को उन्होंने 30 रुपये दिए और चलता किया। सामने लिखा था आनंद श्री, प्रशान्त बाबू ने उसे घूर कर देखा, बड़ा ही सुन्दर छोटा सा घर था वो। फूल-पत्तियों से भरा पूरा, छोटे से आंगन में कलरव करते पक्षी, गेट पर गिरे हुए मधुमालती के फूल और उसे साफ़ करती हुई एक बाई। प्रशान्त बाबू ने उस बाई से पूछा की ये सुन्दर सा छोटा घर किसका है, तो उसने इशारा करते हुए घर की बाहरी दीवार पर लिखे हुए नाम को दिखाया। "अवनीश गुप्ता, प्रधानाचार्य शासकीय विद्यालय नीमगंज सेवानिवृत्त"। यह पढ़ते ही प्रशान्त बाबू के मन में एक छवि सी आयी, थोड़ा ध्यान लगाने पर वह छवि साफ़ हो गयी जो की उनके बचपन के स्कूल के प्रधानाचार्य की थी, लेकिन तब भी वे अपने प्रधानाचार्य से भिखारी का सम्बन्ध नहीं समझ पाए। उन्होंने उस बाई से कुछ सवाल करने की कोशिश की पर वह मुंह मोड़ कर अंदर चली गयी। सड़क के उस पार एक पान की दुकान थी वहां से एक आदमी पान खा कर आनंद श्री के अंदर चला गया। प्रशान्त बाबू ने जा कर पान की दुकान पर पूछा, " भाई, ये जो अभी-अभी पान खा कर सामने के घर में गया है वो कौन है? पान वाले ने पहले पान की एक पिचकारी निकाली और बोला, "नया किरायेदार है साहब"। प्रशान्त बाबू बोले, " तो इसके असली मालिक किधर हैं? दुकान वाले ने उनकी ओर देखते हुए कहा, "लगता है कि आप इस मोहल्ले में नए हैं, आपको नहीं पता क्या, की इसके मालिक तो प्रिंसिपल साहब थे, उनका बेटा और उसका परिवार रहते थे यहां, लेकिन एक दिन प्रिंसिपल साहब के साथ सड़क हादसा हो गया, सर पे चोट लगी, और एक पैर भी ख़राब हो गया, उनके इलाज के लिए बेटे ने अपने पिता को अस्पताल में भर्ती किया लेकिन अचानक एक दिन इस घर को बेच कर कहीं चला गया। तब से न तो उसका पता है और न ही प्रिंसिपल साहब का, बस कुछ बचा है तो उनका दीवार पर लिखा हुआ नाम। बहुत प्रेम से प्रिंसिपल साहब और उनकी मालकिन ने इस घर को बनाया था। पूरे मोहल्ले में कहीं फूल हों या न हों इनके घर में जरूर होते थे। सुख समृद्धि और शांति बस्ती थी यहाँ पर फिर एक दिन मालकिन को ऊपरवाले ने बुला लिया, और प्रिंसिपल साहब अकेले रह गए। वहीं से इस घर की और प्रिंसिपल साहब की दुर्गति शुरू हो गयी। लेकिन आप क्यों पूछ रहे है ये सब? आप हैं कौन साहब?" प्रशान्त बाबू चुप हो गए, वह उस समोसे वाले हलवाई की कही गयी बातों को इस पान वाले की बातों से जोड़ कर सोचने लगे,  प्रशान्त बाबू घर को देख रहे थे और मन ही मन उस भिखारी के हँस कर अपने सिर को हिलाते हुए दृश्य को भी याद कर रहे थे। उन्हें पूरी कहानी समझ आ गयी थी। पान वाले को मुस्कुरा कर उन्होंने कहा, " भाई मैं एक समाज सेवक हूँ और प्रिंसिपल साहब का शिष्य हूँ,  उन्हीं की सिखायी गयी चीज़ें मेरी प्रेरणा का स्रोत हैं, चलता हूँ"। प्रशान्त बाबू श्मशान गये और उस भिखारी की अस्थियों का एक पंडित के अनुसार विधिवत प्रवाह किया। प्रवाह करते वक़्त स्कूल की घंटी के बजने की आवाज़ आ रही थी। प्रशान्त बाबू को उनके बचपन की पाठशाला याद आ गयी और साथ ही साथ अपने प्रधानाचार्य की भी। अपने गुरु को याद करते हुए उन्होंने उस भिखारी यानि प्रधानाचार्य को प्रणाम किया और भगवान से उनके आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना भी की। प्रशान्त बाबू  ने निश्चय किया कि ऐसे कई बेनाम लोग रोज़ ही मर जाते हैं जिनका उनके अंतिम क्षणों में भी कोई कल्याण नहीं करना चाहता इसलिए वे शनिवार और रविवार को श्मशान घाट आ कर लावारिस लाशों का दाह संस्कार करेंगे। वे कुछ देर तक नदी के बीच नाव पर बैठ कर स्कूल के बच्चों के खेलने की आवाज़ को सुनते रहे और मुस्कुरा कर आसमान की ओर देखने लगे।                                                            

मानवीय मूल्यों के पतन पर कटाक्ष

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