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"चाय,सुमित्रा और आत्मविश्वास - एक लघुकथा "
"चाय,सुमित्रा और आत्मविश्वास - एक लघुकथा "
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© Dogendra Thakur

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सुबह के पांच बजे रहे होगे शायद, या उससे भी कम, मुर्गा बांग दे पाता इससे पहले घर में किसी की चहलकदमी शुरू हो गयी, फिर से रोज़ की तरह|मैं डब्बे में दुबकी अपनी बारी के इंतज़ार में थी, खोलता पानी हमेशा कुछ देर के लिए शांत हो जाता जब-जब मैं उसे रंगीन बनाती थी| चाहे ये मेरे साथ रोज़ होता हो,  पर हर रोज़,ख़ुशी होती थी, मुझ पर दुनिया को जगाने की जिम्मेदारी जो है| खैर रोज की तरह डब्बा खुला, बुढ़ापे से लबरेज़, जिम्मेदार उंगलियों ने मुझे कुछ देर सहलाकर झोक दिया पानी में|

“सुमित्रा”, इनकी उम्र तो नहीं मालुम, पर अपने पुरखो से इनकी कहानी सुनती आई हूँ|उम्रदराज़ है जरा, सालो से मुझे और पूरे घर को जगाने की जिम्मेदारी इनकी ही थी | वैसे अब घर मैं कोई है नहीं इनके और मेरे सिवा| पति स्वर्ग सिधार गए और बच्चे परदेश, बीते पांच सालो से “काली चाय” पीती देख रही हूँ इन्हें | रोज़ सुबह-शाम मुझे पानी मे अपना रंग छोडती, ध्यान से देखती रहती वो, जैसे अपनी जिंदगी मुझे में देखती हो, जीवन में घुलकर खूब रंग और खुशबू फैलाई थी उम्र भर उन्होंने भी, अपने परिवार के लिए|

वो बारामदा अब काफी सूना था, जहाँ वो और उनकी खुशबु, उनके पति, मेरे साथ हर रोज़ सुरज को निकलते और ढलते देखा करते थे| यकीन मानिए वो मिठास मुझे कभी भी शक्कर नहीं दे सकती थी, जो उन दोनों के साथ ने दी थी| सबको नींद से जागते-जागते अब “मैं” और “सुमित्रा”, सुबह शाम तन्हाई में बैठे, वो ही रूहानी यादे ताज़ा करते रहते थे| रसोई भी काफी उदास सी लगती थी अब, पर अब भी वहां दीवार से लगे पाटे में बैठकर, सुमित्रा” उसे समझाती रहती, और वो समझ भी जाती, शायद दोनों एक दुसरे का दर्द बडी ही अच्छी तरह समझते थे, वाकई एक औरत का दर्द एक औरत ही समझ सकती है|

जब चाय बन चुकी, तो “सुमित्रा” चाय के साथ ख़त पढने लगी|ये मेरे लिए भी अजीब था, पिछले ५ सालो में तीसरी मर्तबा ऐसा हुआ की उनके सुपुत्र को उनकी याद आई, अब माँ नजरंदाज करने वाली चीज भी तो नहीं है| चाय के कप जमीन पर रखकर, वो ख़त को जोर से पढने लगी, पिछले सालो में पहली बार ख़ुशी से, लिखा था:-
“माँ, मेरी तरक्की हो चुकी है, काफी मौके आने वाले है आगे, तुम्हे देखे भी अरसा हो गया, अब आ जाओ, मन नहीं लगता अब बच्चो का भी उनकी दादी के बिना| मैं, तुम्हे फ्लाइट की टिकट्स भेज दूंगा, तुम वो मिलते ही जल्द से जल्द, आ जाओ”

ख़त, पढ़ते ही, सुमित्रा मुस्काई, और अपनी पुरानी पेटी में पुराने खतो के साथ, नए ख़त को भी रख दिया| मुस्कुरायी इसलिए की शायद बेटे का इतना पूछ लेना ही उसके लिए काफी था| मानो कह रही हो की, अब कहीं जाना मुमकिन नहीं| पुराने ख़त, पुरानी यादे, बेटे की तरक्की में उसकी तसल्ली, और उबलती चाय, जो अपनी खुशबू और रंग छोड़ चुकी है पूरा, ठीक उसकी तरह, काफी है बाकी बची जिंदगी काटने के लिए|

उस सुबह सुमित्रा और मैं भावनाओं के इस उफान बहुत देर तक में उबलते, शांत होते रहे| मानो आगे आने वाली तन्हाई को सुमित्रा के आत्म-संतोष का साथ मिल गया था,  बस वो मुझे अपना रंग छोड़ते हुए देखती रही, काफी देर तक, फिर कुछ चीनी और दूध भी मिला दिया, अब मेरा स्याह्पन कुछ सफ़ेद हो चला है, सूरज निकालने को है और सुमित्रा और मैं अपनी बातो व्यस्त है|

बंधन-जीवन-दर्शन

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