Quotes New

Audio

Forum

Read

Contests


Write

Sign in
Wohoo!,
Dear user,
ललिता मैडम डॉट कॉम
ललिता मैडम डॉट कॉम
★★★★★

© Suraj Prakash

Inspirational Others

81 Minutes   7.9K    20


Content Ranking

 

तो ये चैप्‍टर भी खत्‍म हुआ। उदास ज़िंदगी का एक और उदास चैप्‍टर। एक ही बरस का चौथा हादसा। एक के बाद एक। अभी तो पहले वाले हादसों से भी नहीं उबर पायी थी कि ये एक और। ऊपर वाले ने भी न जाने कितनी तकलीफ़ें लिखी हैं मेरे हिस्‍से में। सिलसिला खत्‍म ही नहीं होता। इस बार तो सब कुछ तहस-नहस हो गया। दो महीने और चार दिन में ही। क्‍या-क्‍या तो ख्वाब दिखा डाले थे कम्‍बख्‍त लेडी ने और मैं ही जनम जात की मूरख ठहरी कि उसके दिखाये सारे ख्वाबों पर खुली आंखों यकीन करके अपना सबकुछ छोड़-छाड़कर चली आयी। एकदम सड़क पर आ जाने वाली हालत।

मैं पागल और मूरख ही नहीं,अव्वलदर्जे की गधी भी हूं कि आगा-पीछा देखे बिना ललिता मैडम की बातों पर यकीन करके न केवल लगी-लगायी शानदार नौकरी छोड़ आयी बल्‍कि इंग्‍लैंड की ऐशो-आराम की ज़िंदगी को भी लात मार आयी। सिर धुनने के अलावा अब कर ही क्‍या सकती हूं।नहीं जानती,कल क्‍या होगा। 34 बरस की उम्र में बेरोज़गार। बेसहारा। यहां किसी को जानती नहीं। जिनको जानती थी उन्‍हीं के कारण मेरी ये हालत हुई है।

घंटे भर की कहा-सुनी और एक दूसरे को धोखे में रखने के आरोपों के खुले सेशन के बाद मैंने मैडमको अपना आखिरी फैसला सुना दिया है। पहलीबार मुझे हार्श होना पड़ा है। कब से तो घुट रही थी। आज मौका मिल ही गया तो फट पड़ी – सब खत्‍म हो गया मैडम। लग रहा है कि हम दोनों ही एक-दूसरे के लिए नहीं बने हैं।हम दोनों ही गलती पर थे कि हमने एक-दूसरे को चुना और दोनों ही एक-दूसरे से इतनी ज्‍यादा उम्‍मीदें लगा बैठे। अब मैडम मुझे कोई वजह समझ में नहीं आती कि मैं इस जॉब में बनी रहूं और खुद भी तकलीफ़ में रहूं आपको भी तकलीफ़ में रखूं। सच तो ये है मैडम और आप भी इस बात से इनकार नहीं करेंगी कि न तो अब आप मुझसे खुश हैं और न ही मैं ही खुशी जैसी कोई चीज़ महसूस कर पा रही हूं। अब चूंकि मेरे ही पास चॉइस है कि जॉब छोड़ कर जाऊं तो मैडम जा रही हूं। कोई गिला शिकवा नहीं। आपने मेरे लिए इतना किया उसके लिए थैंक्‍स मैडम। सच में मेरे लिए आपकी तरफ से कोई कमी नहीं रही शायद मैं ही आपकी उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी। थैंक्‍स अगेन मैडम। इससे पहले कि मेरा गला भर आये या और बोलना मुश्‍किल हो जाये,या इससे पहले कि ललिता मैडम कोई कड़वी बात कह कर मेरा मूड और चौपट करें, या अपनी बॉडी लैंग्‍वेज से मुझे इग्‍नोर करना शुरू करें, या कोई और तीखी बात कह के मुझे भी और ज़हर उगलने पर मजबूर करें, मैं उनके चैम्‍बर से बाहर निकल कर अपनी सीट पर वापिस आ गयी हूं।

आखिर मुक्‍ति मिली मुझे। एट लास्‍ट, फ्रीडम। हँसी आती है। मिली भी तो किस कीमत पर। अपनी पूरी ज़िंदगी में मैं कभी इतना कड़वा नहीं बोली। इतनी हार्श नहीं हुई। वो भी अपनी बॉस के साथ।और न ही मेरे साथ ही कभी कोई इस तरह से पेश आया था। यहां तो एम्‍पलायर और इम्‍पलाई, दोनों ने ही अपनी-अपनी कमान के सारे तीर चला दिये। दोनों ने ही अपने आपको खाली कर दिया। ललिता मैडम ने जो कहना था, कहा और मैंने सुना। मैंने जो कहना था, कहा और ललिता मैडम ने सुना।दोनों ही कह-सुन कर खाली हो गये। बेशक कहने-सुनने के बाद हमारे बीच सबकुछ खत्‍म हो गया। अब शायद ही हम एक-दूसरे का चेहरा देखना चाहें।

मेज पर रेड बुल का कैन रखा है। खोल कर पीती हूं। अपने आपको कमज़ोर होने से रोकती हूं। भरी पड़ी हूं लेकिन रोना नहीं है। नो .. नो .. नो . जूही.. अपने आपको समझाती हूं। रोना नहीं है। किसी कीमत पर नहीं। किसी को नहीं बताना है कि मेरे साथ अभी-अभी क्‍या हो कर गुज़रा है। किसी को पता न चले। वाशरूम जा कर फ्रेश होती हूं। चेहराठीक करती हूं कि कहीं मेरा चेहरा मेरे खराब मूड की चुगली न खाये।

वापिस आ कर अपना सामान संभालती हूं। दराजों में कुछ भी नहीं है। पिछले हफ्ते से ही माहौल ऐसा बनने लगा था और लगने लगा था कि अब और नहीं निभ पायेगी।कोई भी शाम मेरे काम की आखिरी शाम हो सकती है, ये साफ लगने लगा था। मैंने अपने आपको हर तरीके से तैयार करना शुरू कर दिया था और अपनी पर्सनल चीज़ें संभालनी शुरू दी थीं। वह शाम आज आखिर आ ही गयी। मेज पर कुछ खूबसूरत चीज़ें हैं जो मैडम के साथ दुबई में खरीदी थीं। दरअसल मैडम ने ही खरीदी थीं।हम तीनोंके लिए। चांदी का सेट - कार्ड होल्डर, पेपर कटर, पैन होल्डर,कैंची,डिजिटल क्‍लाक विद मोबाइल चार्जर,शानदार फोटो फ्रेम और क्रॉस का पैन सेट। ये सारी चीज़ें शायद ही कभी काम में आयी हों। तब भी बेकार थीं, अब भी सब बेकार हैं मेरे लिए। वैसे भी सीट पर टिक कर बैठ कर काम करने के मौके ही कितने आये होंगे। सब कुछ मेज पर वैसा ही रहने देती हूं। पीसी पर एक बार फिर चेक कर लेती हूं कि कहीं कोई पर्सनल फोटो या फाइल डीलीट होने से बाकी न रह गयी हो। पीसी का पर्सनल पासवर्ड हटाती हूं। आखिरी बार पीसी बंद करती हूं।

घड़ी देखती हूं। सात चालीस। इतने खराब मूड में भी चेहरे पर हँसी आ ही जाती है। ये घड़ी भी मैडम की दी हुई है। लंदन में पहली मुलाकात पर दी थी उन्‍होंने। चूंकि इस घड़ी का मेरी नौकरी से कोई लेना देना नहीं है और ये बात भी है कि मैं भी पहली बार जब उनसे मिलने गयी थी तो महंगी शैम्‍पेन की बॉटल ले कर गयी थी। तो इस घड़ी के लिए उनका कोई अहसान नहीं। घड़ी मेरी है।हिसाब बराबर।

मैडम के चैम्‍बर का दरवाजा बंद है। हिकारत से आखिरी बार उस तरफ देखती हूं। शिट। अब ये दरवाजा मेरे लिए हमेशा के लिए बंद हो गया। एक तरह से मैंने खुद ही बंद कर दिया। दुनिया के सो कॉल्‍ड बेहतरीन ऐशो-आराम की तरफ खुलने वाला आलीशान दरवाजा। माय फुट। ये दरवाजा मेरे लिए न ही खुला होता तो अच्‍छा था। सड़क पर तो न आती।

सो, गुड बॉय मेरीफ्रेंड, फिलास्‍फर एंड गाइड। आजतक मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी में इतने कम्‍प्‍लीकेटेड कैरेक्‍टर वाली कोई लेडी नहीं देखी।कुछ महीने पहले यही मैडम फेसबुक पर मेरी सबसे अच्‍छी और मेरी हिम्‍मत बढ़ाने वाली दोस्‍त थी, मेरी सबसे अच्‍छी सखी और गाइड थी, और दो महीने पहले मेरी शानदार लेकिन स्‍ट्रिक्‍ट बॉस बनी और आज मेरी सबसे बड़ी दुश्मन। मुझे दो महीने चार दिन में ही सड़क पर लाने वाली बिच। अब सबकुछ खत्‍म हो चुका है इसलिए न तो फिर से उनका चेहरा देखने की ज़रूरत है और न ही अपना चेहरा दिखाने की। बाय बाय हो चुकी।कहीं पढ़ा था कि दोस्‍त तो आपका बॉस हो सकता है लेकिन बॉस आपका दोस्‍त नहीं हो सकता। जब तक दोस्‍त थीं, बेहतरीन दोस्‍त रहीं लेकिन बॉस बनते ही दोस्‍ती के मायने ही बदल गये।

अपना पर्स उठाती हूं और आस-पास देखती हूं। कुछेक लोग अभी भी अपने-अपने क्‍यूबिकल में पीसी स्‍क्रीन पर नज़रें गड़ाये काम कर रहे हैं। ललिता मैडम जब तक अपने चैम्‍बर में हैं, सब यूं ही बैठे रहेंगे और काम करते रहेंगे। स्‍मिता अपने क्‍यूबिकल में है। किसी से फोन पर बात कर रही है। जाते समय उससे भी बाय कहने की इच्‍छा ही नहीं रही। किसी से भी नहीं। अच्‍छा है मेरे सैंडिल आवाज़ नहीं करते। चुपचाप ऑफिस से बाहर आ जाती हूं। सामने ही ललिता मैडम का बॉडी गार्ड खड़ा नज़र आता है। शायद संतराम है। बेचारा। हमेशा काम पर होता है फिर भी उसके जिम्मे कोई काम नहीं। आठ घंटे की ड्यूटी खड़े-खड़े सिर्फ इसलिये बजाना कि ललिता मैडम सेफ रहें। कोई उन पर हमला न कर दे। उन्‍हें कुछ हो न जाये। डैम इट। क्‍या होना है इस खूसट मैडम को। किसी से कोई खतरा नहीं उन्‍हें। बल्‍कि खतरा तो उनसे है मेरे जैसी लड़कियों को जो उनके जाल में चिड़िया की तरह आ फंसती है।पता नहीं मेरे बाद किसका नम्‍बर लगे।

ख्याल आता है कि संत राम अकेला ही तो नहीं है जो उनकी सेवा में इस तरह खड़ा है। कई टीमें हैं। एक तरह से ठीक भी है। कितने ही हैं जो उनके भरोसे पल रहे हैं। ठीक-ठाक रोज़गार तो पाये हुए हैं। तीन बॉडी गार्ड ललिता मैडम के। चौबीसों घंटे। चार गाड़ियों के चार ड्राइवर। ऑफिस का पर्सनल स्‍टाफ अलग। हर घर का अलग स्‍टाफ। ललिता मैडम किसी भी घर में रहें, सारे घर साफ-सुथरे और अपटू डेट होने चाहिये। स्‍टाफ कहीं कम कहीं ज्‍यादा। एक उधर लंदन में बैठा है। शोफर कम हाउस कीपर। वरिंदर सिंह। सारी सुविधाओं के साथ।एक तरह से मर्सीडीज और लंदन के फ्लैट का मालिक। ललिता मैडम लंदन में पूरे बरस में एक बार चार दिन के लिये जायें या दो बार आठ दिन के लिए, उसकी हजारों पाउंड की सेलरी खरी। बाकी वक्‍त अपना काम धंधा संभालता होगा। फ्लैट है ही उसके पास। उसका कुछ भी करे।

याद आता है,मैडम ने कई बेहद महंगी लिपस्‍टिक दिलवायी थीं दुबई में। कुछ तो मेरे बैग में ही रखी होंगी। बैग खंगाल कर देखती हूं। मिल जाती हैं। दो लिपस्‍टिक निकाल कर संतराम को देती हूं। हमेशा मुझसे बहुत इ़ज्‍़ज़तसे पेश आता है। कहती हूं - मेरी तरफ से अपनी वाइफ को दे देना। उसे विश्वास नहीं हो रहा कि उसे कोई कुछ दे सकता है या उससे बात ही कर सकता है। शायद ही किसी को यहां इसका नाम ही पता हो। इसकी बीवी बेचारी को कभी पता नहीं चलेगा कि वह पांच सात सौ की साड़ी पहने पच्चीसतीस डॉलर यानी दो हज़ार रुपये की लिपस्‍टिक लगा कर घर से बाहर जा रही है। इसे भी कहां पता चलेगा कि बीवी को इतनी महंगी लिपस्‍टिक दे रहा है। संत राम शानदार सैल्‍यूट मारता है। पूछता है- क्‍या मेम साहब, जा रही हैं। हमेशा के लिए। अभी दो महीने पहले ही तो आप आयी थीं मैडम। अब मैं उस बेचारे को क्‍या बताऊं कि मैं क्‍यों जा रही हूं। सिर हिलाती हूं और उसे एक ऑटो रुकवाने के लिए कहती हूं। कल तक तो ललिता मैडम की कार होती थी और आगे ड्राइवर के साथ यही बॉडी गार्ड होता था।

ऑटो वाला पूछता है – कहां जाना है। सोचती हूं, इतनी जल्दी घर जा कर भी क्‍या करूंगी। खाना खाने के लिए फिर बाहर आना ही पड़ेगा। कम्‍बख्‍त मैडम ने मेरी सारी आदतें बिगाड़ कर रख दी हैं। इन दो महीनों में शायद ही कभी अकेले और इतनी जल्दी घर आयी होऊं। अकेले खाना खाने का तो सवाल ही नहीं होता। तय करती हूं। आज की शाम भी वैसी ही होनी चाहिये जैसी रोज़ होती है। बेशक अकेले और अपने पैसों से। पाँच-सात हज़ार लगेंगे लेकिन ये अहसास रहेगा कि आज इंडिया में पहली बार अपने पैसों से अपनी शाम गुज़ार रही हूं और अपनी मर्जी का पी रही हूं। खा भी अपनी पसंद का रही हूं। भाड़ में जाये ललिता मैडम की कंपनी। ऑटो वाले से कहती हूं – विमान नगर चलो। वेस्‍टिन होटल।

Ø   

क्‍यू बार का स्‍टाफ अब पहचानने लगा है। ललिता मैडम यहां अपने दोस्‍तों के साथ आने वाली बड़ी पार्टी मानी जाती हैं। कभी भी उनकी टेबुल का बिल डेढ़ दो लाख से कम नहीं होता।शाम गुज़ारने का ये उनका पसंदीदा जाइंट है। ललिता मैडम की शाम अगर कहीं और नहीं बीत रही होती तो यहीं बीतती है। फार्मल या इन्‍फार्मल ग्रुप के साथ।उनका और उनके दोस्‍तों का यहां खास ख्याल रखा जाता है। उनकी पसंद-नापसंद सब जानते हैं। मैं पाँच-सात बार उनके साथ आयी हूं तो मेरा चेहरा अब अनजाना नहीं रहा है। बार में घुसते ही पहला सवाल – वेलकम मैडम। अलोन टूडे।

जानती थी पहला सवाल यही उछल कर मुझ तक आयेगा – मेरी मेज पर जो भी आयेगा, यही सवाल पूछेगा। बार मैनेजर को ही बताती हूं – नहीं,मैडम आज शहर में नहीं हैं। इन फैक्‍ट, आज मैं अपनी शाम अपने तरीके ये यहां गुज़ारना चाहती हूं। अपने तरीके से।  प्‍लीज देखें कि कोई मुझे बिना वजह डिस्‍टर्ब न करे।

-    ओह श्‍योर। डोंट वरी प्‍लीज। आपको कोई डिस्‍टर्ब नहीं करेगा।

अब मैं हूं और मेरी तनहाई है। आज मुझे खुद से बातें करनी है। ढेर सारी। सेल्‍फ एनालिसिल करना है कि कहां गलती हो गयी मुझसे। अभी दिमाग में सारी चीज़ें फ्रेश हैं और याद भी हैं। आज मेरा अपना दिन है। कल की सोचने के लिए भी और कुछ तय करने के लिए भी। लंदन वापिस जाने का तो सवाल ही नहीं उठता। कुछ न कुछ तो करना ही होगा। जो भी करना है,यहींइंडिया में ही करना है। कम्‍बख्‍त ने इतना भी टाइम नहीं दिया कि दो चार जगह अपनी पसंद के जॉब के लिए एप्‍लाई ही कर पाती। कल से एक नयी शुरुआत। हमममम।

आसपास देखती हूं। अक्‍सरनज़र आने वाले चेहरों में से कोई नज़र नहीं आ रहा। अच्‍छा है। शायद मैं काफी जल्‍दी आ गयी हूं। अभी साढ़े आठ भी नहीं बजे। मैडम के साथ इतनी जल्‍दी कभी नहीं आयी।

आज यहां अकेले आना कितना अच्‍छा लग रहा है कि मुझे किसी की, किसी भी चीज़ की सच्‍ची या झूठी तारीफ नहीं करनी है। नमुझे ललिता मैडम के सात लाख के नये नेकलेस की, न तीस हज़ार की बेहूदा ड्रेस की, न तीन हज़ार की लिपस्‍टिक की, न दुबई से खरीदे डेढ़ लाख के पर्स की, न चार लाख की घड़ी की एक बार फिर सेतारीफ करनी है।न बेकार में हँसना है, न हर बात पर यू आर राइट मैम ही कहना है। वॉव, ग्रेट, फेबुलस,ललिता मैडम यू आर जीनियस कुछ भी नहीं कहना है। न उनके घटिया जोक्‍स पर हँसनाहै, न उनकी सो कॉल्‍ड सफलताओं के किस्‍से याद करके हा हा हू हू करना है। आज मुझे अपने खाने पीने का खुद ही पेमेंट करना है तो मैं ही आज की महारानीहूं।

ओह शिट.... मैं भी क्‍या-क्‍या सोचे जा रही हूं। जिस माहौल से निकल कर मुक्‍ति पायी है, उसी के बारे में सोच-सोच कर क्‍यों परेशान हो रही हूं। आज तो मेरी आज़ादी का दिन है। दो महीने में ये मेरी पहली अकेली शाम है।आज तो जश्न की शाम होनी चाहिये।आज मैं अपनी पसंदीदा कार्नर वाली छोटी-सी राउंड टेबल पर बैठती हूं। हमेशा ललिता मैडम और गैंग के साथ होनेके कारण यहां परकभी नहीं बैठ पायी थी। हमेशा हसरत से इस टेबल पर बैठे किसी न किसी जोड़े को देखा करती थी। सिर्फ दो लोगों के लायक छोटी-सी गोल मेज। जैसे एक्‍सक्‍लूसिव आइलैंड हो। इंटीमेसी को पर्सोनीफाई करती हुई। आज अकेले ही सही। हँसती हूं - अपनी खुद की कंपनी भी इतनी बुरी तो नहीं। आज आ ही गयी इस टेबल पर। अपने लिए रेड वाइन का ऑर्डरदेती हूं।

सेटल होते ही पहला काम ये करती हूं कि सबसे पहले मोबाइल से ललिता मैडम के नम्‍बर, मैसेजेस, फोटो वगैरह डिलिट करती हूं। सब जगह से। इसके बाद ललिता मैडम की दुनिया से जुड़े सभी नम्‍बर डिलिटकरती हूं।सब जगह से मैडम का नाम पता हटा देने के बाद कितना हलका लग रहा है। ओह गॉड, थैंक्‍स। व्‍हाट ए प्‍लीजेंट ईवनिंग।आज की शाम मेरे मन की शाम। कितना हलका महसूस कर रही हूं। इंडिया में आज़ादी की मेरी पहली शाम।

Ø   

वट्सअप मैसेज कीबीप बजी है। देखती हूं। वागीशका मैसेज है- हाय डूड। वेयर आर यू। नो न्‍यूज सिंस एजेस। साथ में एक उदास चेहरे की इमेज। मुस्‍कुराती हूं। इसे भी आज और अभी ही याद करना था। बेचारा। दो महीने से पुणे में हूं और आज तक हम मिल नहीं पाये हैं। हो ही नहीं पाया। कितनी बार बुलाना चाहा उसने। लेकिन मैडम के चक्‍कर में कभी इतना टाइम ही नहीं मिल पाया कि अपनी पर्सनललाइफ मेनटेन कर पाऊं।जब अपने लोग याद आते थे तो टाइम नहीं होता था और जब टाइम होता था तो कम्‍बख्‍त, कोईयाद ही नहीं आता था। वागीश भी तभी फेसबुक फ्रेंड बना था जब मैं गहरे डिप्रेशन से गुज़र रही थी। वह जब भी चैट पर मिलता, अपनी तरफ से यही कोशिश करता कि कम से कम मेरा मूड उतनी देर तो ठीक रहे। अक्‍सर उससे चैट हो जाती। अच्‍छा लगता उससे बात करना। यहां आने के बाद तो वो भी बंद थी।

जब उसे पता चला था कि मैं जॉब के लिए पुणे आरहीहूं तो कितना खुश हुआ था कि अब हम फेसबुक के वर्चुअल स्‍क्रीन से निकल कर आमने-सामने मिल सकेंगे। कभी नहीं हुआ। यहां आने से पहले वह पुणे का मैडम के अलावा मेरा अकेला फेसबुक फ्रेंड था और उसी ने मुलाकात नहीं हो पायी। बस उसे वट्सअप के जरिये अपना लोकल नम्‍बर ही दे पायी थी और उसी के जरिये ही कभी कुछ कह सुन लिया।यही होता रहा था। कभी बात करने का मौका ही नहीं मिला था। उसे मैसेज करने के बजाये फोन करती हूं।

-    कहां हो?

- कोरेगांव पार्क में। ऑफिस ने निकल ही रहा था कि तुम्‍हें टैक्‍स्‍ट किया कि जिंदा हो या नहीं। और दुनिया का आठवां वंडर कि तुम फोन ही कर रही हो। माने अभी जिंदा हो। कहां हो?

-    वेस्‍टिन में क्‍यू बार में कितनी देर में पहुंच सकते हो? बाइक है ना तुम्‍हारे पास तो?

- हां बाइक ही है। क्‍यू में बर्थडे पार्टी दे रही हो क्‍या?लेकिन तुम तो पीसियन हो। आज बर्थडे पार्टी कैसे?

- शटअप। अपना मरना मना रही हूं। आई एम क्रांइग एंड नीड एसॉलिड शोल्‍डर। अपने मजबूत कंधे लेते आओ। ब्‍लडी। बास्‍टर्ड। हरी अप।

-         यू आर जीनियस। रोने के लिए भी क्‍यू बार। दस मिनट में आ रहा हूं।

एक तरह से ठीक ही हुआ कि वागीश से आज बात हो गयी। पहली ही मुलाकात होगी। कब से टल रही थी। किसी के सामने तो खुद को हलका करना आसान होता है। अकेले बैठी रहती तो न जाने कब तक पीती रहती और खुद को कोसती रहती। कंपनी होगी तो लिमिट भी रहेगी और शेयरिंग भी होगी। यहां कई बरसों से हैतो शायद जॉब में भी मदद कर सके। अच्‍छा या बुरा जो भी हुआ, कम से कम किराये का फ्लैट तो है मेरे पास। तीन महीने का किराया भी एडवांस दे रखा है तो कम से कम दो तीन महीने रहने की चिंता तो नहीं करनी पड़ेगी।जॉब के लिए अब कहीं तो टिकना ही होगा। पुणे में ही टिकने के बारे में सोचा जा सकता है। एक्‍शन पैक्‍ड सिटी। फुल ऑफ यंग ब्‍लड। वागीश खुद मैसेज न करता तो मुझे इस हाल में उसकी याद भी न आती।बेशक दो चार दिन में उसके नम्‍बर पर निगाह पड़ती ही।

Ø   

वागीश को देखते ही पहचान लिया है मैंने। स्‍मार्ट। इम्‍प्रेसिव। कम से कम 6 फुट की हाइट तो होनी ही चाहिये। उसने भी मुझे पहचान लिया है और हाथ हिलाते हुए मेरी तरफ बढ़ा है। हमने एक-दूसरे को हलके से हग किया है। अफसोस हो रहा है कि पुणे में इतने अरसे से रहते हुए इतने स्‍मार्ट बंदे से क्‍यों नहीं मिली। खूब निभेगी इसके साथ।

-    अब बताओ, किसका मरना मना रही हो और वो भी यहां?रैड वाइन। वॉव।

-    ये बताओ क्‍या लोगे?

-    चलेगी वाइन भी। कोई परहेज नहीं है वाइन से भी।

इससे पहले कि वेटर हम तक पहुंचे मैंने इशारे से बता दिया है वागीश के लिए भी वाइन लाने के लिए।

- अब बताओ क्‍या किस्‍सा हो गया कि मेरा मैसेज मिलते ही मुझे बुलवा लिया है। सब खैरियत तो है ना? तुम तोललिता मैडमकी कंपनी में हो ना?

-    हां वहीं थी।

-    थी का मतलब?

- सुनो वागीश, मेरे साथ बहुत बड़ा हादसा हो गया है। हादसा कहूं या धोखा। आइ डोंट नो वट हैज हेपेंड बट आज मैंने वहां से रिजाइन कर दिया है। अभी एक घंटा पहले।दो महीने में ही। ऑफिस से निकलते समय कुछ सूझा ही नहीं कि क्‍या करूं और कहां जाऊं। कुछ समझ में नहीं आया तो यहीं चली आयी। मैडमके साथ अक्‍सर यहीं आती थी। सोचा, यहां एक शाम अपने नाम सही। तुम्‍हारा मैसेज आया तो लगा अकेले कुढ़ते रहने से तो अच्‍छा ही होगा कि तुमसे कुछ बातें करके अपने आपको हलका करूं। भरी पड़ी हूं मैं। थैंक्‍स वागीश फॉर कमिंग हेयर। रीयली। मैं दो महीने से यहां हूं और आज पहली बार मिल रहे हैं।

- डोंट वरी जूही, बी कांफीडेंट। ये सब चलता रहता है। इंडिया मेंये तुम्‍हारा पहला जॉब तो हो सकता है,आखिरी जॉब नहीं था। इससे बेहतर जॉब्‍स तुम्‍हारी राह देख रहे हैं।मुझसे शेयर कर सकती हो। बेशक हम पहली बार आमने-सामने मिल रहे हैं लेकिन फेसबुक पर तो कई महीने से एक दूसरे को जानते ही हैं। बहुत कुछ शेयर भी करते रहे हैं। वैसे मैं पहले ही हैरान हो रहा था कि लंदन में स्‍कॉटिश बैंक का इतना अच्‍छा जॉब छोड़ कर ललिता मैडमकी कंपनी में आने की ज़रूरत क्‍यों पड़ गयी थी तुम्‍हें। कभी बात ही नहीं हो पायी। पूछ ही नहीं पाया। आज पता चल रहा है कि वो जॉब भी गया। 

- हां,वागीश। मैं जब तक तुम्‍हें शुरू से सारी बातें न बताऊं, मैं ये जस्‍टीफाई नहीं कर पाऊंगी कि यहां क्‍यों आयी थी और आज यहां से भी जाने की ज़रूरत क्‍यों पड़ गयी है।

-श्‍योर।

- सुनो वागीश। मेरे साथ एक दिक्कत है कि मैं बहुत देर तक उदास या खराब मूड में नहीं रह सकती।आइ हैव ओनली वन एच इन माय लाइफ। एंड दैट इज हेवेन। नॉट द हैल। ओके। अब आगे सुनो। मेरे जैसी कोई ईडियट देखी होगी जिसका दो घंटे पहले जॉब छूटा हो और वो क्‍यू बार में बैठी रेड वाइन पी रही हो। तुम्‍हारे आने से मेरा शाम का, जॉबलेस होने का हैंगओवर जा चुका। इंडिया आने के बाद तुमसे पहली मुलाकात हो रही है तो सेलेब्रेशन तो बनता है! चीयर्स। मैंने अपना गिलास उठाया है। वह मेरी बकबक सुन कर हैरान है लेकिन चीयर्स के लिए अपना गिलास उठाया है उसने।

कहती हूं मैं - तुम्‍हें यहां आने के पीछे की सारी बातें बताती हूं। तुम सुनो और मुझे बताओ, गाइड करो कि मैं कहां गलत थी और मुझे आगे क्‍या करना चाहिये। एंड सेकेंड पॉइंट- मुझे इंडिया आये दो महीने हो गये हैं और मैंने एक बार भी ढाबे का खाना नहीं खाया है। मैडमके साथ सब जगह हाइ फाइ खाना खाते-खाते मैं जैसे घर के खाने का या असली टेस्‍टी खाने का स्‍वाद ही भूल गयी हूं। लंदन में भी खुद का बनाया खाती थी। इंडिया में असली इंडियन टेस्‍ट तो किसी ढाबे में ही मिलेगा ना। हम वाइन पीने के बाद किसी ढाबे में खाना खायेंगे, सड़क के किनारे कुल्‍फी या आइसक्रीम खायेंगे और उसके बाद तुम मुझे मेरे घर पर छोड़ोगे। बाइक पर बैठे मुझे सदियां बीत गयीं। बाइक ड्राइव बाइ नाइट का मज़ा लेंगे। आइ जस्‍ट मिस इट। चलेगा ना?

-डन।

- तो सुनो जूही की कहानी जूही की जबानी। शिट, मेरी लाइफ भी क्‍या है। कुछ मज़ेदार है नहीं साला शेयर करने के लिए। ओह .. ये नहीं कि फेसबुक से निकल कर पहली बार एक स्‍मार्ट बंदा मिल रहा है उसे इंग्‍लैंडअपने के कुछ अनुभवसुनायें, कुछ उसकी सुनें और हम ले बैठे अपना रोना। एनीवेज, देखो अभी जून चल रहा है और ये मेरे साथ इस बरस का चौथा हादसा है। सात जनवरी को मेरा तलाक हुआ।

- वेट वेट, सॉरी टू इंटरप्‍ट, लेकिन तुम्‍हारे प्रोफाइल में तो विडो लिखा हुआ है। आइ मीन..!!!!

- विडो न लिखूं तो क्‍या लिखूं?मुझे ताव आ गया है- तुम बताओ ऐसे आदमी के होने का कोई मतलब है जो इंग्‍लैंड का एमबीए हो, शादी से पहले से यानी सात बरस से लंदन में रह रहा हो, जिसने आज तक लंदन में रहते हुए भी हफ्ता भर भी टिक कर कोई जॉब न किया हो, जो शादी के पहले दिन से ही और एक बच्‍चे का बाप बन जाने के बाद भी अपनी इन्‍वेस्‍टमेंट बैंकर बीवी की सेलरी पर पल रहा हो, बेबी सिटिंग कर रहा हो और दुनिया की हर ऐश के लिए बीवी से पाउंड मांग रहा हो?ही इज पैरासाइट। कैन यू बिलीव, मैंने उसे पाँच बरस तक पाला है। लिटरली। सिर्फ उसके मुंह में रोटी का निवाला नहीं दिया, बाकी सबकुछ किया है उसके लिए.. शिट। मुझे गुस्सा आ गया है। ऐसे नालायक आदमी की वाइफ होने से तो विडो होना बेहतर। मेरी शादी में कोई रोमांस या खुशी नहीं थी। शुरू से ही नहीं। पता नहीं, पापा ने क्‍या देख कर उस ईडियट के साथ मेरी शादी तय की थी। पाँच बरस की शादी ने मुझे एक दिन की खुशी भी नहीं दी थी।

-हमममम!!

- पिछले बरस अजित की हरकतों और निट्ठलेपन से तंग आ कर मैंने तलाक के लिए केस फाइल किया। वो तो मुझे भी इस बात के लिए जान से मारने को तैयार बैठा था कि कहीं मैं अपना जॉब न छोड़ दूं। तलाक की खबर भी उसे वकील के जरिये मिली सो ज्‍यादा शोर नहीं मचा पाया।उसे मेरे इतने बोल्‍ड कदम की उम्‍मीद नहीं थी। लेकिनमेरी किस्‍मत खराब थी कि मेरा ये केस मुझ पर ही उलटा पड़ गया। उसने कोर्ट को बता दिया कि उसके पास कोई जॉब नहीं है। न इंग्‍लैंड में न बैक इंडिया में। कोर्ट के फैसले के हिसाब से मुझे सो कॉल्‍ड बेरोज़गार पति और उससे पैदा हुए बच्‍चे की परवरिश के लिए अपनी सेलेरी का फिफ्टी परसेंट हर महीने उन्‍हें देना होगा। बच्‍चे के 18 बरस का हो जाने तक। अब तुम सोचो, मैं अपने फ्लैट का मार्टगेज देने के बाद अपनी सेलेरी का फिफ्टी परसेंट अपने नाकारा हसबैंड को तब तक देती रहूं जब तक मेरा बेटा 18 बरस का नहीं हो जाता। यानी मैं ज़िंदगीभर अपने नाकारा पति के लिए कमाती रहूं और वह मेरी कमाई पर ऐश करता रहे। मेरे लिए क्‍या बचता!!

अब मेरे पास दो ही तरीके बचते थे। या तो कोर्ट के फैसले का ऑनर करते हुए अपनी सेलेरी का फिफ्टी परसेंट हर महीने उसे देती रहूं या अपनी 16 बरस पुरानी शानदार नौकरी छोड़ कर मैं भी अपने आपको बेरोजगार डिक्‍लेयर कर दूं। लेकिन उस हालत में मेरी ही मुसीबत होती। मेरे लिए सरवाइवल मुश्‍किल हो जाता। मैं बेहद परेशान हो गयी थी और कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्‍या करूं। एक और तरीका था कि इंडिया वापिस आ जाऊं और यहां नये सिरे से जॉब तलाश करूं। जहां भी मिलता है जैसा भी मिलता है।लेकिनयहां आने पर इंग्‍लैंड की कोर्ट केऑर्डर का डिस्‍आनर होता जो मुझे मंजूर नहीं था। बेशक तब मैं कोर्ट की शर्त से तो बच सकती थी।

-हममम!

- इस बीच दो तीन हादसे और हुए। तलाक की अर्जी देने के कुछ ही दिन बाद जब मैंने अजित को घर से निकाल दिया तो उस बेरोज़गार में इतना दम नहीं था कि लंदन में एक हफ्ता भी बच्‍चे को ले कर रह सके। कोर्ट वरडिक्‍ट आने में अभी टाइम था लेकिन हम दोनों को ही पता था कि फैसला यही होना है। वह कुछ दिन के लिए इंडिया वापिस आ गया। वह मान कर चल रहा था कि कोर्ट का फैसला उसके फेवर में ही होना है। जब मूड आता,वह फिर वापिस लंदन आ जाता। मुझसे शादी करके उसे ब्रिटिश सिटीजनशिप मिल ही चुकी थी। लेकिन उसे ये नहीं पता था कि आगे चल कर मैं जॉब भी छोड़ सकती हूं।

-हमम!

-उन दिनों मैं बहुत डिप्रेशन में आ गयी थी, बेशक एक बेमतलब की शादी के जंजाल से छूट रही थी, लेकिन मुझसे मेरा क्‍यूट बेटा भी छिन गया था। था तो मेरा ही बेटा बेशक अजित जैसे नाकारा आदमी से था। लेकिन मैं एकदम खाली हो गयी थी। इतने बरसों से आदत सी हो गयी थी कि अजित ही दरवाजा खोलता था और चिंकी अपनी स्‍माइल से मेरी दिन भर की थकान हर लेता था, अब खाली घर में वापिस लौटने का दिल न करता। हर शाम होती मेरे सामने और करने को कुछ भी न होता। इसी डिप्रेशन के चलते मैंने पब में बैठ कर पीने की लत लगा ली। अकेले बैठी पीतीरहती। किसीसे बात करने या नये सिरे से किसी से जुड़ने के बारे में सोच कर ही डर लगता था। खाना पीना डिस्‍टर्ब हो गया था। बैंक में काम में ध्‍यान न दे पाती और बेवकूफी भरी गलतियां करती।

अजित के वापिस लौटने के बाद मैंने अपनी कार बेच दी थी। मेरा घर स्‍टेशन से एक किलोमीटर दूर था। एकदम सुनसान रास्‍ता। ठंडा और अकेला घर मेरा इंतज़ार करता मिलता। मैं घर पहुंच कर ही हीटिंग सिस्‍टम ऑन कर पाती। सारा माहौल मुझे खूब डराता। मैं खिड़की के पास बैठी बर्फगिरती देखती रहती और भीतर-बाहर के सन्नाटे से लड़ती रहती। मैं एकदम अकेली पड़ गयी थी। अपनी हालत के लिए किसी को दोष नहीं दे सकती थी। मैं सारी लाइट्स ऑन रखती, रात भर टीवी या रेडियो चलता रहता ताकि ये अहसास रहे कि घर में कोई और भी है और इन चारदीवारियों में मैं अकेली नहीं हूं।

-हमम!

-एक बार बैंक से वापिस लौट रही थी। वापिस आने में देर हो गयी थी। स्‍टेशन से निकली तो बर्फ पड़ रही थी। चारों तरफ, ऊपर नीचे बर्फ की सफेद चादर। तुम इंडियंस के लिए ये रोमांटिक नज़ारा हो सकता है लेकिन इंग्‍लैंड वालों के लिए ये बहुत ही तकलीफ़ के दिन होते हैं। मैं सुनसान सड़क पर अकेली बंदी। अचानक पैर फिसला और मैं बर्फ में गिर गयी। तुम यकीन नहीं करोगे वागीशकि उस वक्‍त मेरी क्‍या हालत हुई होगी। मैं सड़क पर गिरी पड़ी थी। बर्फ पड़ रही थी और दूर-दूर तक मेरी मदद करने वाला कोई नहीं था। मेरे हाथ-पैर सुन्न हो चुके थे। दिमाग ने काम करना बंद कर दिया था। उस दिन मैं पहली बार अपने अकेलेपन से डरी थी। किसी तरह से उठी थी,तकलीफ़ में लंगड़ाते हुए घर तक आयी थी। उस रात मैं अपनी याद में बरसों के बाद खूब रोयी थी और पूरी रात रोती ही रही थी।

- ओह।

- अगले दिन मैं बैंक जाने की हालत में नहीं थी। बैंक जाना तो दूर उठने की हालत में नहीं थी। किसी तरह से एक फ्रेंड को फोन किया था कि आये और मुझे हास्‍पिटल ले कर जाये।

- सो सैड

-मुझे दस दिन तक अस्पताल में रहना पड़ा था। एक्‍यूट डिप्रेशन विद सुसाइडल टेंडेंसीज। टेस्‍ट कम हुए थे और कांउसलर और साइकियाट्रिस्‍ट के सेशन ज्‍यादा हुए थे। अस्पतालसेडिस्‍चार्ज के समय मुझे सख्त हिदायत दी गयी थी कि अगर जिंदा रहना है तो मुझे अपनी लाइफ स्‍टाइल बदलनी होगी। अब अकेले रहने की बिलकुल मनाही थी और कहा गया था कि मुझे ईमीडियट चेंज चाहिये। चाहे लम्‍बी छुट्टी ले कर जाना पड़े। हो सके तो इंडिया चली जाओ जहां कोई ख्याल रखने वाला हो।

-मैं अजीब मुश्‍किल में फंस गयी थी। अपना परिवार छोड़ चुकी थी और ऐसा कोई  दूसरा परिवार था नहीं मेरा जो इस हालत में मेरी देखभाल करता। बेशक बैंक ज्‍वाइन कर लिया था लेकिन कुछ न कुछ तो करना ही था। अपने आपको औरतकलीफ़ देने का कोई मतलब नहीं था। जीवन लम्‍बा है और खूबसूरत भी। इसे जीने के तरीके बदलने की जरूरत थी।

-मैंने अपनी लाइफ स्‍टाइल बदलने की कोशिश की।पीनी कम की। कुछ नये दोस्‍त बनाये। फेसबुक की तरफ मुड़ी। वहां भी कई दोस्‍त बने और वक्‍त कुछ हद तक बेहतर गुजरने लगा। बेशक फेसबुक की दोस्‍ती का सच भी मैं जानती ही थी। ये एक ऐसी वर्चुअल दुनिया है जहां रिश्‍ते बेहतरीन तरीके से शुरू हो कर एक चैट पर भी खत्‍म हो सकते हैं और कुछ महीने भी चल सकते हैं। पता ही नहीं चलता कि कौन फेक है और कौन असली। किसी भी रिश्‍ते की वैलिडिटी के बारे में आप पक्‍के तौर पर कुछ नहीं कह सकते। खैर,कुछ दोस्‍त बने। तुम भी तो तभी कांटैक्‍ट में आये थे। तुम्‍हारे अलावा पुणे के ही एक मिस्‍टर दिवाकर थे।फेसबुक पर ही मिले थे। मुझसे तीन-चार बरस बड़े रहे होंगे। एचआर कन्‍सल्‍टेंट थे। अपने फील्‍ड में बड़ा नाम थे। मेरी ही तरह डाइवोर्सी।मैं ताज़ा-ताज़ा, वे पुराने। बातचीत में बेहद इंटीमेट और मैच्‍योर।पता चला कि वे लेक्‍चर सीरीज के लिए यूरोप के टूअर पर आ रहे हैं। उन दिनों हम खूब चैट करने लगे थे। मुझे एक अच्‍छा दोस्‍त मिल गया था। हम आपस में सबकुछ शेयर कर रहे थे। उन्‍हें मेरी प्रॉब्लम का पता था और मुझे उनकी। जब मैंने उनसे लंदन आने के बारे में पूछा तो उन्‍होंने कहा कि अगरदो-तीन जगह उन्‍हें लेक्‍चर के लिए बुलवा लिया जाये तो वे लंदन आने के बारे में सोच सकते हैं। मैंने अपने रिसोर्सेस तलाशे थे और उनकी लंदन की ट्रिपऑफिशियल हो गयी थी। मैं उनकी इस विजिट में खासीदिलचस्पीले रही थी। दिवाकर में मैं एकलॉंग टाइम पार्टनर की तलाश कर रही थी। आगे चल कर हमारी दोस्‍ती कोई शेप ले सकती थी।

वे आये। मैंने उनके लिए खास तौर पर छुट्टी लीजो किआम तौर पर इंग्‍लैंड में एफोर्ड नहीं कर सकता। उन्‍हें घुमाया-फिराया, गिफ्ट दिये। बट माय बैड लक अगेन। उनसे मिल कर मैं बेहद निराश हुई थी। वे जितनेशानदार ओरेटर थे, उतने ही मतलबी और अर्पाचुनिस्‍ट इन्‍सान निकले। वेएचआर के आदमी थे और ह्यूमन रिलेशंस ही नहीं जानते थे। उनके लिए हर रिश्‍ता अपने सेल्‍फ प्रमोशन का एक शानदारजरिया था। कोई बड़ी बात नहीं उन्‍होंने मुझे भी इंग्‍लैंड ट्रिप के लिए ही इस्‍तेमाल किया हो। मेरे जैसी एकोमोडेटिंग लड़की के लिए उनके साथ दो दिन बिताना भारी पड़ गया था। मेरे सामने बैठे दिवाकर फेसबुक दिवाकर के ठीक अपोजिट निकले। हमारे रिश्‍ते वहीं से धीरे-धीरे कम होते चले गये थे। वही हमारी आखिरी मुलाकात थी। मैं पुणे आने के बाद उनसे एक बार भी नहीं मिली। शायद उन्‍हें पता भी न हो कि मैं दो महीने से यहां हूं। इस धक्के से उबरने में मुझे खासा वक्‍त लगा था।

-    हमम!

-बदकिस्मती से ललिता मैडमसे मेरी पहचान उन्‍हीं के ज़रिये हुई थी। दोनों पर्सनल फ्रेंड थे और फेसबुक से भी जुड़े हुए थे। इंडिया में रहते हुए ही दिवाकर ने ललिता मैडमका रेफरेंस दिया था और बातों-बातों में कहा था कि मैं उनकी वॉल पर जा कर देखूं और हो सके तो फ्रेंड रिक्‍वेस्‍ट भेजूं।

-मैं सचमुच इम्‍प्रेस हुई थी ललिता मैडमकी वॉल पर आकर। खूब बढ़िया कोटेशंस का कलेक्‍शन! कुछ अच्‍छी पोस्‍ट भी। लगभग रोज़ानाअप डेट्स। कई बार दिन में दो बार भी। पिक्चर प्रोफाइल भी खासा इम्‍प्रेसिव था और हर रोज़ पिक भीबदली जाती थी। हर बार नयी ईवेंट,नयी जगह और नयी ड्रेस में। मैंने प्रोफाइल देखा था - मास्‍टर्स डिग्री, एलएलबीऔर दो चार और कोर्सेस। एसोसिएटेड विद ए ग्रुप ऑफ कंपनीज़, पुणे। दिवाकर ने ही बताया था कि अच्‍छी-खासी एम्‍पायर है उनकी और 1500वर्कर्स हैं।स्‍टील इंडस्‍ट्री,सिनेमा हॉल, फार्मा कंपनी,टेक्सटाइल और विंड मिल्‍स। और भी बहुत कुछ। उनका फेसबुक एकाउंट हमेशा ऑन नज़र आता। मैं हैरान थी कि इतनी बड़ी एम्‍पायर की मालकिन भला फेसबुक के लिए इतना टाइम कैसे निकाल पाती हैं।

-मैंने पर्सनल मैसेज के साथ उन्‍हें फ्रेंड रिक्‍वेस्‍ट भेजी थी। अपने बारे में बताया था और ये भी कहा था कि उनकी वॉल पर आकर मुझे बहुत अच्‍छा लगा है। खासकर उनके कोटेशंस के सेलेक्‍शन से मैं कितनी इम्‍प्रेस हुई थी।

- शायद दो तीन मिनट में ही उनका एक्‍सेप्‍टेंस आ गया था। कुछ लाइनें भी लिखी थीं मेरे लिए। और तभी से हम दोस्‍त बन गये थे और हमारी चैट शुरू हो गयी थी। मैंने अपने बारे में उन्‍हें उतना ही बताया जितना फेसबुक पर बताना ज़रूरी लगा। अब हम अक्‍सर चैट करते, पिक्‍चर्स और कोटेशंस शेयर करते।

-तभी उन्‍होंने बताया था कि वे लंदन आ रही हैं। पांच सात दिन के लिए। मिलना चाहेंगी। मेरा नम्‍बर और मेरा ईमेल आइडी लिया था। बताया था खुद कांटैक्‍ट करेंगी। ये भी पूछ लिया था कि मैं कितने बजे तक फ्री हो जाती हूं।

-लंदन पहुंचने पर उनका फोन आया था। मिलना चाहती थीं। पूछा था कहां हूं मैं।

-जब मैंने बताया कि सेंट्रल लंदन में हूं तो उन्‍होंने कहा था कि घर ही चली आओ। मेरा शोफर तुम्‍हें आ कर पिक कर लेगा। मैंने मना किया था कि बाद में घर भी आऊंगी, पहली बार कहीं बाहर ही मिल लेते हैं। लेकिन वे अपनी बात पर अड़ी रही तो मुझे हां कहनी पड़ी। उन्‍होंने मुझे अपना पता टैक्‍स्‍ट करने के लिए कहा और बताया कि उनका शोफर मुझे ठीक टाइम पर पिक करलेगा।

-एक शानदार गाड़ी ले कर उनका शोफर ठीक टाइम पर आ गया था। रास्‍ते में मैं सोचती रही कि मैं उन्‍हें पहली बार मिल रही हूं,कुछगिफ्ट ले जाना चाहिये। इंग्‍लैंड में गिफ्ट को ले कर एक बहुत अच्‍छी बात है कि जब कुछ न सूझे तो वाइन या शैंपेन की बॉटल तो है ही। ये वहां के सदाबहार गिफ्ट हैं। मैंने भी रास्‍ते में गाड़ी रुकवा कर एक महंगी शैंपेन खरीदी।

-मैडमबहुत तपाक से मिली। एक बीयर हग। जब हम आमने-सामने बैठे तो मैंने उन्‍हें ध्‍यान से देखा।45 और 50 के बीच उम्र। स्‍मार्ट और एकदम फिट। सुंदर, लेकिन ध्‍यान से देखने पर पता चल जाता था कि ये सब प्‍लास्‍टिक सर्जरी का कमाल है। पूरा चेहरा जैसे चुगली खा रहा था। उस पर हैवी मेकअप और भड़कीले लगने की हद तक रंगीन कपड़े। मैं हैरान भी हुई थी उनकी ओवरआल पसंद देख कर लेकिन तैंनूं की और मैंनू कीफिलॉसफी के चलते मैं चुप रह गयी थी।

- हमम!

-हम दोनों ने उस शाम खूब बातें की थीं। दो बिछुड़ी सहेलियों की तरह। लगा ही नहीं था कि हम फेसबुक से निकल कर आमने-सामने बैठी हैं।

-उन्‍होंने मुझे डिनर के बाद ही वापिस आने दिया था। वाइन हमने उनके घर पर ही पी थी और डिनर के लिए बाहर गये थे। वापसी में मेरे बहुत मना करने के बावजूद वे मुझे मेरे घर तक छोड़ने आयी थीं और चलते समय ये खूबसूरत घड़ी उपहार में दी थी।

-हम उनके वापिस आने से पहले और तीनबार मिले थे। ये तीसरी मुलाकात में ही हुआ था कि मैंने उन्‍हें अपने लंदन आने,जॉब लगने और डॉट काम के जरिये शादी होने और इस समय शादी के टूटने के कगार पर होने की पूरी दास्‍तान सुनायी थी। ये भी बताया था कि मुझे डिप्रेशन के कारण अस्पताल में रहना पड़ा था और डॉक्टरों की सलाह के हिसाब से मुझे ये सब कुछ छोड़छाड़ कर यहां से कहीं दूर चले जाना चाहिये।शादी अगर मुझे परेशानी में डाल रही थी तो मेरा अकेलापन और ज्‍यादा खतरनाक साबित हो रहा था। मेरी जान ले सकता था।हमारी बातचीत में ये बात भी सामने आयी थी कि इस हालत में मैं अब और अधिक लंदन में नहीं टिक सकती। मुझे जॉब, मार्टगेज का घर और इंग्‍लैंड एक साथ ही छोड़ने के बारे में सोचना होगा। कोर्ट वरडिक्‍ट किसी भी दिन भी आ सकती थी और मैं चाहती थी कि कोर्ट की वरडिक्‍ट आने से पहले मेरे घर के दरवाजे पर बैंक के कब्जे का नोटिस लगा हो।

-हमम!              

- उनकी वापसी की फ्लाइट संडे की शाम की थी। उन्‍होंने उस मुझे दिन लंच पर बुलाया था। लंच के बाद जब हम कॉफी पी रहे थे तो उन्‍होंने कहा था – अगर ठीक समझो, और कोई बेहतर ऑप्‍शन सामने न हो और इंडिया आने के बारे में सचमुच सीरियस हो तो मेरे पास पुणे चली आओ। डॉक्‍टर भी तो तुम्‍हें यही सलाह दे रहे हैं। यहां जॉब छोड़ सकती हो या मिलती हो तो लम्‍बी छुट्टी ले कर चली आओ। किसी भी तरह की चिंता करने की कोई ज़रूरत नहीं। ये समझो कि अब तुम मज़बूत और सेफ हाथों में हो। तुम्‍हें अच्‍छी पोजीशन मिलेगी, जब तक रहने का इंतज़ामन हो जाये, हमारे गेस्‍ट हाउस में रहो। बेशक यहाँ केतुम्‍हारे पे पैकेज के बराबर न सही, तुम्‍हें वहां पर इतनी सेलरी जरूर मिलेगी कि अकेले पुणे में अकेले शान से रह सको। कहो कब की टिकट भेजूं। लेकिन तुम्‍हारे लिए चेंज ज़रूरी है।

-मैं हैरान थी कि कोई सिर्फ कुछ ही दिन पुरानी अपनी फेसबुक फ्रेंड के लिए इतना कैसे कर सकता है।मैं उन्‍हें एयरपोर्ट छोड़ने गयी थी और वापसी में उनके शोफर ने मुझे घर ड्राप कर दिया था। सारे रास्‍ते वे मुझे पुणे की अपनी लाइफ स्‍टाइल के बारे में और अपनी पसंद-नापसंद के बारे में ही बताती रही थीं। उनकी बातों में एक बार भी उनकी फैमिली का या कंपनियों का जिक्र नहीं आया था। मैं तय नहीं कर पा रही थी कि इन्‍वेस्‍टमेंट बैंकिंग के 16 बरस के अपने एक्‍सपीरिंयस के साथ मैं उनकी एम्‍पायर में कहां फिट हो पाऊंगी। आखिर विदा होने से पहले मैंने उनके सामने ये सवाल रख ही दिया था। मेरा हाथ दबाते हुए उन्‍होंने यही जवाब दिया था– ये तुम्‍हारी चिंता नहीं बेबी। यू विल बी वैल रीसीव्‍ड एंड प्‍लेस्‍ड। अब मैं इस वैल रीसीव्‍ड एंड प्‍लेस्‍ड का अर्थ न तो पूछ ही सकती थी और न ही वे बतातीं। जाते-जाते उन्‍होंने एक बार फिर याद दिला दिया था कि मैं उन्‍हें बता दूं कि टिकट कब की भेजें और मैं कब तक ज्‍वाइन करने के बारे में सोच सकती हूं। मैंने उस वक्‍त उनसे सोचने और सबकुछ पैक अप करने के लिए एक महीने का टाइम मांगा था।

-मुझे यही ठीक लगा कि डॉक्‍टर की सलाह मानते हुए मैं मेडिकल ग्राउंड पर इंग्‍लैंड छोड़ दूं और अपने वकील के जरिये कोर्ट तक ये बात पहुंचा दूं।मेरे वकील को पता चल ही चुका था कि मैं अपनी फैमिली टूटने की वजह से गहरे डिप्रेशन में आ गयी हूं और फिलहाल चेंज के लिए इंडिया जाने का इरादा रखती हूं। मेडिकल ग्राउंड पर देश और नौकरी छोड़ने की छोड़ने की ज़रूरत, मज़बूरी में कार बेचने की, फ्लैट सरंडर करने की और अपना ज्‍यादातर सामान चैरिटी होम्‍स में दे देने की बात मैंने वकील के जरिये कोर्ट तक पहुंचा दी। मैंने कोर्ट को बता दिया था कि फिलहाल मैं आराम करूंगी, किसी एक जगह टिक कर नहीं रहूंगी और जॉब करने के बारे में कुछ सोचा नहीं है।

-मुझे अपने जॉब से रिजाइनकरने, अपना बसा-बसाया घर कार्टन्‍स में भरने, बेहद शौक से खरीदी चीज़ें चैरिटी होम्‍स में देनेऔर सबकुछ समेटने में एक महीने का समय लग ही गया था। वागीश, तुम यकीन नहीं करोगे कि कितना तकलीफदेह होता है बसा-बसाया घर इस तरह से उजड़ते देखना। बेहद चाव से खरीदी गयी बेशकीमती चीज़ें सिर्फ इसलिए दान में दे देना कि आप पूरा घर उठा कर इंडिया नहीं ला सकते।खास तौर पर तब आप न सिर्फ बेरोज़गार हों बल्‍कि किसी के सहारे लौट रहे हों और अभी खुद के सेटल होने के बारे में भी कुछ भी तय न हो। मैं रोज़ रात को बैठती और एक एक चीज़ को इस या उस कार्टन में डालने से पहले याद करती और रोने लगती कि कितने चाव से और किस जगह से घर की एक एक चीज जुटाई थी जो अब यूं ही किसी को दे दी जायेगी या पता नहीं कब तक इन पेटियों में बंद पड़ी रहेगी। हर रात पैकिंग धरी की धरी रह जाती और मैं रोते हुए सोने जाती। बहुत मुश्‍किल था ये काम लेकिन करना भी जरूरी था।

इस तरह से इंग्‍लैंड से मेरा लौटना 17 बरस बाद हो रहा था। बहुत कुछ लुटा देने के बाद भी मेरे सामान के बीस के करीब कार्टन बनगयेथे और सामान भेजने में ही मेरे बारह सौ पाउंड यानी एक लाख रुपयेके करीब खर्च हो गये थे। टिकट ललिता मैडम ने भिजवा ही दी थी। काश, फ्री टिकट के लालच में न पड़ती तो ये दिन न देखना पड़ता।

- इंडिया आने के मेरे फैसले का एक ही पाजिटिव पक्ष ये भी रहा कि मैं कोर्ट की वरडिक्‍टसे चाहे अनचाहे बच गयी।एक बात और अच्‍छी हुई कि मैं अजित के कांटैक्‍ट ज़ोन से बाहर आ गयी। जब तब मैं न बताऊं, उसे पता नहीं चल सकता था कि मैं कहां हूं। कोर्ट उसे बताये तो बताये। बेशक अब मैं अपने प्‍यारे बेटे चिंकी से भी मिलने के सारे रास्‍ते बंद कर रही थी लेकिन अब तक यही हो रहा था कि जब तक अजित लंदन में था,अलग होने के बादपिछली हर मुलाकात में वह मुझसे चिंकी के नाम पर अच्‍छी खासी रकम मांग कर ले जाता था। अपने बच्‍चे को देखना ही मुझे महंगा पड़ रहा था।

-गुड,अब मैडम के बारे में कुछ बताओगी या हम सारी रात वाइन पीते हुए सिर्फ ट्रेलर ही देखते रहेंगे।

- अब आगे की कहानी ललिता मैडम की ही है। मैंने वेटर को वाइन के गिलास भरने का इशारा किया है – तो आगे का किस्‍सा यूं है कि हम मुंबई होते हुए पुणे पहुंचे।मैडम के शोफर ने हमें एयरपोर्ट पर रिसीव किया, गेस्‍ट हाउस में ड्राप किया और मैडम का आदेश सुनाया कि सुबह साढ़े आठ बजे लेने आ जायेगा। ब्रेकफास्‍ट ललिता मैडम के साथ उनके घर पर करना है।वहीं से उनके साथ ऑफिस जाना होगा। मैं हैरान थी कि ललिता मैडम इतनी व्‍यस्‍तताओं के बीच भी मुझे याद रखे हुए हैं और इंडिया में पहले ब्रेकफास्‍ट के लिए अपने घर पर बुला रही है। वॉव।

भव्‍य था मैडम का सबकुछ। सारा तामझाम। लेकिन एक तरह का दिखावा। वहां पैसा बोल रहा था, गरिमा नहीं थी पैसे की। बेशक मैं डाइनिंग रूम में ही बैठी थी लेकिन साफ लग रहा था कि उनके यहां पैसे की कद्र नहीं है। चाहे खर्च अंधाधुंध किया जाता हो। शायद ऐसा सोचने के पीछे शायद ये कारण रहा हो कि मैं सोलह सत्रहबरस की उम्र से इंग्‍लैंड में रही हूं और मैंने उस उम्र से कमाना शुरू कर दिया था।मैंने अपने होशो-हवास में इंग्‍लैंड की लाइफ स्‍टाइल ही देखी थी। सोचने समझने की उम्र में आने के बाद इंडिया के किसी घर के भीतर आने और देखने का ये मेरा पहला ही मौका था। ललिता मैडम के यहां स्‍पेस था,स्‍पेस मैनेजमेंट भी था, एक क्‍लास भी थी, महंगी पेंटिंग्‍स लगी थी, लेकिन कुछ था जो एस्‍थीटिकली मिसिंग था। एक रॉयल टच जो मैं उम्‍मीद कर रही थी, नज़र नहीं आया था। शायद इसलिए कि मैं एक-एक पैसे की कीमत जानती रही और ये भी रहा कि मैंने इंग्‍लैंड के लोगों का जीवन बहुत नज़दीक से देखा है कि वे किस तरह से वे अपने कमाये धन की कद्र करते हैं और अपनी और अपने पैसे की डिग्‍निटी बनाये रखते हैं।मैडम के यहां वह डिग्‍निटी मिसिंग लगी।मैडम बहुत प्‍यार से मिली थीं। कहा था – वेलकम जूही। अब तुम अपने कैरियर और लाइफ स्‍टाइल की चिंता करना छोड़ दो। अब तुम सेफ औरस्‍ट्रांग हाथों में हो। अब हँसी आती है कि ललिता मैडम के हाथ इतने सेफ एंड स्‍ट्रांग निकले कि दो महीने में ही मेरा दम निकल गया।

-हमम।

- ऐनीवेज। नाश्‍ते के बाद मैं मैडम के साथ ही ऑफिस गयी थी। रास्‍ते भर मैडम मुझसे ढेर सारे सवाल पूछती रही। तलाक के डेवलपमेंट के बारे में, मार्टगेज के बारे में और सबकुछ छोड़ कर आने के बारे में। लेकिन मेरी एजुकेशन या प्रोफेशनलएक्‍पर्टीज के बारे में एक सवाल भी नहीं पूछा। मैडम ने अपने चैम्‍बर में पहुंचते ही अपनी पर्सनल एक्‍सक्‍यूटिव स्‍मिताको बुलवाया था।स्‍मिता स्‍मार्ट, शातिर और कनिंग लगी मुझे। उम्र में मुझसे थोड़ी बड़ी लेकिन अपने आपको स्‍मार्ट और फिट बनाये रखने केउसके बाहरी तौर तरीके तुरंत पकड़ में आ गये थे। अब इसमें मैं क्‍या करूं अगर इंग्‍लैंड की लाइफ को इतनी नजदीक से देखने के कारण मेरी निगाह से कुछ भी छुपा नहीं रहता।मैडम ने शायद स्‍मिता को मेरे आने के बारे में पहले से बता रखा होगा। स्‍मिता से मेरा परिचय कराते ही उन्‍होंने मुझे उसके हवाले किया और अपने काम में बिजी हो गयी। मैं स्‍मिता के साथ बाहर आ गयी।

-बाहर आते ही स्‍मिता ने मुझे हौले से हग किया और आंखें झपकाते हुए बोली – लकी हो यार जो यहां आयी हो। इस जगह के लिए तो अच्‍छे अच्‍छे तरसते हैं।

-ये पहला कंपलीमेंट था जो मुझे अपनी पहले इंडियन जॉब के लिए ज्‍वाइन करने के दो मिनट के भीतर मिला था। चाहे पॉजिटिव था या नेगेटिव, मैं सुन कर हक्‍की-बक्‍की रह गयी थी। मैं सड़क से उठा कर तो नहीं ही लायी गयी थी कि इस मीन लेडी को मेरे बारे में ये कहना पड़ा था। सुन कर आग लग गयी थी मेरे भीतर लेकिन मैं चुप रह गयी थी। नहीं जानती थी ये लेडी मैडम के कितने नजदीक है और दूसरी बात मुझे इंडियन वर्क कल्‍चर के बारे में कुछ भी पता नहीं था। सच तो ये था कि इंडिया में लैंड करने के बाद ये ललिता मैडम के बाद ये दूसरी ही लेड़ी थी जिससे मैं बात कर रही थी। बात कर नहीं रही थी बल्‍कि उसकी पहली ही बात सुन रही थी। मैंने अब तक कहा तो कुछ भी नहीं था। मैंने इस कमेंट को हँस कर झेल लिया था। किसी सही मौके पर जवाब देने के लिए।

-मेरे लिए हॉल में मैडम के चैम्‍बर के पास ही एक क्‍यूबिकल का इंतजाम कर दिया गया था जिसमें कम्‍प्‍यूटर्स वगैरह तो थे ही, एक आरामदायक सोफा भी था। थोड़ी प्राइवेसी की गुंजाइश थी। अब मेरे सामने ये मुश्‍किल थी कि किससे पूछती कि मुझे काम क्‍या करना है। ललिता मैडम मुझे स्‍मिता के हवाले कर चुकी थी और स्‍मिता ने सारा दिन इधर उधर की बातों में गुज़ारदि या था लेकिन काम के बारे में एक बार भी बात नहीं की थी। सिटिंग अरेंजमेंट देख कर हलका-सा डर भी लगा कि कहीं मुझे मैडम की पर्सनल सेक्रेटरी की हैसियत से तो काम नहीं करना है। दोपहर तक सबसे मिलना जुलना और खाना पीना चलता रहा।

-तीन बजे के करीब स्‍मिता ने इंटरकॉम पर बताया कि शाम को ललिता मैडम के साथ एक डिनर पार्टी में जाना है। ये भी बताया कि कौन-कौन जायेंगी। ऑफिस के बाद मैं पार्टी के लिए चेंज करके आ जाऊँ। मैडम को उनके घर से पिक करना होगा। वो मेरे जिम्‍मे। उसने जरा-सा भी हिंट नहीं दिया कि किस किस्‍म की पार्टी है और किस तरह से तैयार हो कर आना है। इंडिया में लैंड करने के चौबीस घंटे के भीतर मुझे अपनी बॉस के साथ एक पार्टी में जाना है ये सोच के खुश भी हो रही थी और थोड़ा परेशान भी थी क्‍योंकि यहां की पार्टियों के सिस्‍टम या ड्रेस कोड के बारे में मुझे कुछ भी पता नहीं था।

-मैंने स्‍मिता से शाम की पार्टी के मकसद और उसके लिए ड्रेस कोड के बारे में पूछना चाहा तो वह टाल गयी थी। कुछ भी डाल लेना। एक बार मैं फिर कन्‍फर्म कर लेना चाहती थी कि कम से कम इतना तो बता दे कि फार्मल पार्टी है या इनफार्मल, लेकिन उसने कुछ भी नहीं बताया था। मैं हैरान थी कि आपस में इतने कम्‍यूनिकेशन गैप से कैसे काम चलेगा। क्‍या यहां ऐसे ही काम होता है। आखिर मैं यहां एक दो दिन के लिए तो नहीं ही आयी हूं। अपना भरा पूरा कैरियर, घर बार और अपनी बसी-बसायी बरसों पुरानी दुनिया छोड़कर आयी हूं। मुझे अब यहीं रहना है और यहीं ललिता मैडम के साथ काम करना है।

-मैं अपने हिसाब से बहुत हलका मेकअप करके आयी थी और यूं ही एक कॅजुअल सी ड्रेस डाल ली थी। अगर ललिता मैडम कुछ कहेंगी भी तो मेरे पास कहने के लिए बात रहेगी कि कम से कम पहली पार्टी के लिए तो मुझे पूरी बात बतायी जानी थी।

-मेरी किस्‍मत बहुत अच्‍छी थी कि शाम की पार्टी बेहद कैजुअल थी। पूरे ग्रुप में मेरी ही ड्रेस और उसके हिसाब से मेरामूड ही सबसे कैजुअल था। जब ललिता मैडम को रात को उनके घर से पिक किया था तो चलते समय ही ललिता मैडम की तारीफ भरी निगाहों ने बता दिया था कि मैं खास और अलग नज़र आ रही थी। पार्टी में बाकी कमी ललिता मैडम के परिचितों ने पूरी की दी थी। हर कोई मेरी तरफ दूसरी बार देख रहा था। ललिता मैडम की जिससे भी हैलो हो रही थी, सबके सब पूछ रहे थे – मैडम न्‍यू इन यूअर कंपनी। मैडम बेशक अपनी ओर से बेहतरीन कैजुअल ड्रेस,सादे मेकअप और बहुत कम गहनों में थी फिर भी मेरी सादगी से मात खा रही थी। स्‍मिता भी अपनी सारी कोशिशों के बावजूद अपने कॉमन स्‍टेटस को छुपा नहीं पायी थी। हमारे साथ ललिता मैडम कीकजिन भी थी।

-इंडिया में आने के दूसरे ही दिन की पहली ही पार्टी से मैं रात दो बजे लौटी थी। मेरे लिए ये पार्टी कई मायनों में आइ ओपनर की तरह थी। बहुत कुछ सीखा थामैंने अपनी पहली ही पार्टी में। मैंने देखा था कि मैडम के साथ गयी स्‍मिता,ऑफिस की एक दूसरी लड़की और उसकी कजिन का पूरी पार्टी में वनपॉइंट एजेंडा था कि मैडम की हर बात में हां से हां मिलाओ, उसकी वजह-बेवजह तारीफ करो और उसके आस-पास बने रहो। उसे एक मिनट के लिए भी अकेले मत छोड़ो। पता है ये सब करते हुए मुझे तीनों क्‍लाउंस नज़र आ रही थीं। मुझे हलका-सा डर भी लग रहा था कि कहीं इस ग्रुप की फोर्थ क्‍लाउन मैं तो नहीं जो आज प्रोबेशन पर यहां लायी गयी है और आगे चल कर मुझे भी ये सब ही करना है। बेशक मैडम का रुख मेरे लिए पॉजिटिव ही नज़र आ रहा था। वह मुझसे बराबरी के लेवल पर बात कर रही थी।

-वागीश,मैं तुम्‍हें इस पहली पार्टी और शुरू के दिनों के बारे में इसलिए डिटेल्‍स में बता रही हूं कि यहीं से मुझे पता चल गया था कि मैं यहां क्‍यों लायी गयी हूं। मैं देख पा रही थी कि अल्‍टीमेटली मुझे भी यहां दिन भर वही कुछ करना होगा जो अब तक स्‍मिता करती आ रही थी। थोड़ा बेहतर तरीके से, सलीके से और सो कॉल्‍ड सॉफिस्‍टिकेटेड चार्म के साथ। स्‍मिता की उम्र 39के करीब रही होगी और मैं 34 की थी,इंग्‍लैंड से अपने साथ एक कलर, कल्‍चर और अपना नज़रिया ले कर आयी थी। उससे हर मायने में मैं बेहतर थी लेकिन मेरी परेशानी यही थी कि मैडम ने मुझे उसी के हवाले कर दिया था और मुझे ये पता नहीं था कि मुझे उसे रिप्‍लेस करना है या उसके पेरेलल अपने लिए एक अलग जगह बनानी है। सच तो ये था कि मैं इन दोनों कामों के लिए नहीं आयी थी। मैं मिसफिट थी इस काम के लिए।

-अगले दिन सुबह ही स्‍मिताने मुझे देखने के लिए दो डायरीज़ दी थीं। एक में मैडम के एपांइट्समेंट के डिटेल्‍स थे और दूसरी डायरी में पुणे,महाराष्ट्र, इंडिया और पूरी दुनिया के हर फील्‍ड के हूज हू थे जिनसे मैडम के काम निकलते थे और जिनसे कांटैक्‍ट करने की ज़रूरत पड़ सकती थी या जिनसे कांटैक्‍ट होते रहते थे। एक और फोल्‍डर था जिसमें उन सब तारीखों,मौकोंऔर नाजुक रिश्तों का जिक्र था कि कब-कब और किस-किस को बधाई संदेश, बुके, या उपहार भेजे जाने हैं। कब-कब किस-किस डिग्‍नीटरी या ब्‍यूरोक्रेट को पैकेज या महंगे गिफ्ट पहुंचाये जाने हैं या लंच या डिनर के लिए इन्‍वाइट किया जाना है। ये फोल्‍डर बहुत मज़ेदार था। लगभग सभी को नंगा कर दिया गया था इस फाइल में। सरकार में, इंडस्‍ट्री में, ब्‍यूरोक्रेसी में,कार्पोरेट्स में और सोसाइटी में किस शख्‍स की किस मांग को कब-कब और किस तरह से पूरा कियाजाता रहा है और आगे भी किया जाना है, इसका कच्चा चिट्ठा था इस फोल्‍डर में। किसे और किस तरीकेसेगिफ्ट, कैश या काइंड, कुछ और या लड़की, किस की वाइफ को गहना, किसे फैमिली के साथ या किसे एस्‍कोर्ट के साथ यूरोप ट्रिप पर भेजा जाना है, इस डायरी में सारी बातें दर्ज की गयी थीं। इसके अलावा कुछ खास जगह विज्ञापन देने या डोनेशंस देने या वेलफेयर फंड्स देने के बारे में इस फोल्‍डर में कहा गया था और उसे फॉलो करना था। बेशक ऑफिस में कार्पोरेट मीडिया डिपार्टमेंट भी था और वह अपना काम करता ही था लेकिन ये काम ललिता मैडम का पर्सनल स्‍टाफ ही करता था। कुछ नामों के आगे फाइनैंशियल लिमिट लिखी हुई थी और कुछ के आगे नोलिमिट लिखा हुआ था। 

-इन डायरीज़ को पढ़ने और समझने में मैंने पूरा दिन लगाया। दो चार पेजेज की तो फोटो भी अपने मोबाइल में सेवकरली। आखिर मुझे अब इसी दुनिया से ही तो डील करना था। ये डायरीज़ मुझे दिखाने और मुझसे शेयर करने का मतलब यही था कि स्‍मिता ने अपनी मेज का काम मेरी मेज पर सरका दिया था। जरूर ललिता मैडम ने ही कहा होगा। मैं ये बात न स्‍मिता से पूछ सकती थी और न ही ललिता मैडम से ही पूछ सकती थी कि क्‍या इसी काम के लिए मुझे इंग्‍लैंड से लाया गया है कि मैं आपकेएपांइट्समेंट का हिसाब-किताब रखूं और ये तय करूं कि आपको अपनी शाम कहां और किसके साथ गुज़ारनी है। मेरे ख्याल से दसवीं पासस्‍मिता भी अब तक ये काम सही ही करती रही होगी।

-तकलीफ़ ये भी थी कि बेशक हम दोनों फेसबुक के जरिये दोस्‍त बने थे, बराबरी के लेवल पर हमारे रिलेशंस शुरू हुए थे और उसी तरह से डेवलप भी हुए थे। वे बेशक दोस्‍ती में ही मुझे यहां लायी थीं लेकिन अब सिनेरियो बदल चुका था। वे मेरी बॉस थीं अब और मुझे इसी नये रिलेशन में अपने आपको फिट करना था। अब ललिता मैडम बेशक मेरे कंधे पर हाथ रख सकती थीं या किसी भी तरह की छूट ले सकती थीं, मैं ऐसा नहीं कर सकती थी। अब हमारे रिश्तों की डेफिनेशन बदल चुकी थी। वह बॉस थी अब मेरी। पहले वे मेरे लिए ललिता थीं, अब यहां के सिस्‍टम के हिसाब से मेरे लिए ललिता मैडम थीं। इंग्‍लैंड होता तो उन्‍हें उनके नाम से ही बुलाती। यहां हर बात का सिस्‍टम ही अलग हैं। सर और मैडम के अलावा और कोई एड्रेस ही नहीं। तुम्‍हें हँसी आयेगी वागीश कि वहां सास ससुर को भी उनके नाम से ही पुकारा जाता है। मिस्‍टर वर्मा या मिसेज वर्मा। मां बाप होंगे तुम्‍हारे। हमारे लिए तो....। खैर।

-    अच्‍छा बताया। फिर?

-इसके बावजूद मैं अपनी तरफ से समझने की कोशिश करती रही कि स्‍मिता के काम करने का तरीका क्‍या है। मैडम का काम करवाने का क्‍या सिस्‍टम है और उनकेकौन-से काम कह कर और कौन से काम बिन कहे करने होते हैं। मैडम के ऐसे कामों की लिस्‍ट बहुत लम्‍बी थी जो सिर्फ इशारे से कहे जाते थे या कई बार कहे ही नहीं जाते थे,उनको कैच करना होता था। चूक भारी पड़ सकती थी। हालांकि ऐसा कुछ भी नहीं था जो मेरे जैसे अनुभवी बैंकर के लिए करना मुश्‍किल होता। मैं अपने बैंक में ब्रांच मैनेजर थी और तीस लोगों का स्‍टाफ संभाल रही थी। यहां सारे काम करने के बाद भी मेरे पास इतना काम न होता कि उस पर सारा दिन गुज़ारा जा सके। मैं यही कोशिश करती रहती कि कुछ नया जोड़ा जाये, कुछ हट कर कुछ ऐसा किया जाये कि मैं अपने यहां होने को जस्‍टीफाई कर सकूं। कुल मिला कर पूरा दिन इस तरह गुजारने के बाद शाम की पार्टी या आउटिंग ही सबसे बड़ा एट्रैक्‍शनहोता।

-बेशक यहां आने से पहले मैं सोच रही थी कि ललिता मैडम मुझे अपनी किसी कंपनी में एकाउंट्स, पर्सोनल या ऐसे ही किसी डिपार्टमेंट में रखेंगी जहां मेरे पूरे एक्‍सपोजर का फायदा उन्‍हें और उनकी एम्‍पयार को मिल सके। लेकिन यहां ऐसा कुछ भी नहीं था। मेरा सोचा मेरे साथ ही रह गया था। सच कहूं तो कई दिन तक कहने के लिए मेरे पास कोई काम ही नहीं था। मैडम दिनभर अपने शेड्यूल में बिजी रहतीं, कंपनियों की मीटिंगें चलती रहतीं, जिनके लिए उनका अलग स्‍टाफ था और अपना काम बखूबी करता था। कई बार सारा-सारा दिन मैडम के दर्शन न होते और न ही उनसे बात होती। मेरे या हमारे जिम्‍मे उनकी शामें ही थीं।दिन भरमस्‍ती,बढ़िया खाना-पीना और फेसबुक या ट्विटर। यूं कहें कि आज शाम को नौकरी छोड़ने तक मेरे पास पोर्टफोलियो के नाम पर कोई काम ही नहीं था। जो कुछ मैं कर रही थी उसे उस तरह का काम नहीं कहा जा सकता था जिसके लिए मुझे खास तौर पर लंदन से लाया गया था। मुझे ये भी लगने लगा था कि कहीं मैडम मुझ पर अहसान करते हुए तो नहीं ले आयीं मुझे कि जहां इतने पल रहे हैं एक और सही। लेकिन मैं एक और की कैटेगरी में तो नहीं ही आती थी। मेरे आने के बाद यहां के काम में कोई फर्क नहीं पड़ा था।ये सब काम पहले भी ठीक-ठाक हो ही रहे थे। यही समझ में आता था कि मैं एक तरह से मैडम की पर्सनल एक्‍सक्‍यूटिव थी जिसके जिम्‍मे मैडम को खुश करने वाले सारे पर्सनल लेवल के काम करना होता। कभी किसी पार्टी में मैडम को कहीं पसंद आ जाने वाले बैंड में सिंथेसाइज़र बजा रहे किसी स्‍मार्ट से दिखने वाले किसी लड़के का मोबाइल नम्‍बर लोकेट करके ललिता मैडम से उसकी मुलाकात करानी होती ताकि मैडम कुछ दिन उसे अपने चमचा दल में शामिल करने का सुख पा सकें या कहीं दान पुन्न की बात चल रही हो तो मैडम को बताने की ज़रूरत पड़ती कि मैडम वहां जा कर कुछ देते हुए अपनी फोटो खिंचवा सकें। कुछ न सही, दस बीस कम्‍प्‍यूटर्सदान देने से ही मैडम को न्यूजपेपरकवरेज और फोटो सेशन मिल जाता तो बुरा सौदा नहीं था। अब मैं शहर में रोज़ाना होने वाले बीसियों ईवेंट्स, लंच, डिनर, ओपनिंग, लॉचिंग, स्‍वागत समारोहों और विदाई समारोहों का हिसाब किताब रखती या उनमें मैडम को बुलवाये जाने की राह खोजती होगीया मैडम की प्‍लेजर ट्रिप्‍स के लिए उन्‍हेंनये नये आइडियाज़ देती। सारा दिन एक तरह से कर्टसी मैनेजमेट का ही होता।

-    वाह। हममम

-ऐसा नहीं था कि मैडम को रोजाना बीस बुलावे न आते हों,खूब आते थे और उनमें से मैं कई बार स्‍मिता से या फिर सीधे ही मैडम से ही पूछ कर मैं तय करती कि उन्‍हेंआज की शाम कहां, किन लोगों में, कितनी देर और किस ड्रेस में गुज़ारनी है। साथ में कौन जायेगी और बुके या गिफ्ट कहां से आयेगा, इन फालतू बातों पर अब मुझे सारा सारा दिन खपाना पड़ता।इन मामलों में मैडम बहुत चूजी़ थीं और एकाध बाद उनका मूड गलत जगह जा कर बहुत उखड़ गया था। उस मूड को ठीक करने के लिए मैडम ने उसी शाम यहीं पर क्‍यू बार में खास लोगों के लिए आधे घंटे के नोटिस पर एक पेरेलल पार्टी कर दी थी और उसका बिल चार लाख रुपये आया था। 

- समझ सकता हूं।

-बेशक मैडम ने कभी कुछ नहीं कहा था लेकिन मैं समझ पा रही थी कि वह मुझे अपने ग्रुप में पा कर खुश ही थी।उनके ग्रुप कर कलर बढ़ गया था। मैडम भी आये दिन होटलों में, क्‍लबों में और अपने फार्म हाउस में खूब लैविश पार्टियां देतीं हैं लेकिन अपनी पार्टियों के लिए वह फाइनल लिस्‍ट खुद ही बनाती हैं और छोटी से छोटी बात का पूराख्याल रखती हैं। मेहमान चुनने से ले कर डेकोर,मीनू और शराबें चुनने तक। इस बात में कोई शक नहीं कि मैडम बहुत बड़ी पार्टी बाज हैं।बहुत लैविश लाइफ स्‍टाइल मेनटेन करना एफोर्ड कर भी सकती हैं और करती भी हैं। उनका अपना एलीट सर्किल है जिसमें में पूरी शान से मूव करती हैं।वे पार्टी देने का कोई मौका नहीं चूकतीं।उनकी पार्टियों में मिनिस्‍टर, ब्‍यूरोक्रेट्स और इंडस्‍ट्रियल वर्ल्‍ड और फिल्‍मी दुनिया की हस्तियां आना अपनी शान समझती हैं। अपनी पार्टी में तो वे होती ही हैं, दूसरी पार्टियों में भी वे सेंटर ऑफ एट्रैक्‍शन रहना जानती हैं। उनका अपना औरा है और वे इसके बारे में न केवल अच्‍छी तरह जानती हैं, बल्‍कि इसका पूरा फायदा उठाती है। लेकिन अपने फीयर साइकोसिस का क्‍या करें जो उन्‍हें एक पल के लिए भी चैनलेने नहीं देता। उन्‍हें अपने आसपास पाँच सात ऐसे लोग हमेशा चाहिये जो उनका मोराल बूस्‍ट अप किये रह सकें। उनकी बात बेबात पर तारीफ करें, उनके ड्रेस सेंस की, उनके परफ्यूम कलेक्‍शन की, उनके रूपकी तारीफ में एक नॉन स्‍टॉप धुन उनके आस पास बजती रहे तो उनसे बढि़या दोस्‍त पूरी दुनिया में नहीं। वे ऐसे लोगों पर अपनी पूरी एम्‍पयार लुटा दें। लेकिन सबसे बड़ी दिक्कत, पता है क्‍या है। ये सब कुछ इतना आब्‍वियस हो जाता है कि किसी भी दो आँख वाले इन्‍सान से छुपा नहीं रह सकता। पता चल जाता है कि उनकी चाहत क्या है और इसके लिए कौन-सा रास्‍ता चुना गया है। वे बस, हर समय राइट ही होती हैं और राइट ही माना जाना पसंद करती हैं। वे हर जगह फर्स्‍ट हैं, सेकेंड टू नन। कहीं भी दूसरी पोजीशन उन्‍हें मंजूर नहीं। किसी भी कीमत पर नहीं।

-हममम

-उन्हें अकेले शाम गुजारने से शायद डर लगता है। रोज पार्टी होनी चाहिये। अगर पार्टी बड़ी न भी हो तो पाँच सात लोगों का जमावड़ा तो हर दिन इस या किसी और होटल में जमा ही रहना ही चाहिये। यूं वोंट बिलीव वागीश, इन दो महीनों में मैं शायद पहली बार अपने तरीके से और अपने पैसों से अपनी शाम गुज़ार रही हूं।

- ग्रेट, तभी तो हम आपसे मिल पाये।

-सुनो,एक दिन मैडमनहीं थी। सारा दिन और शाम को भी। मुंबई में किसी मिनिस्‍टर से मिलने गयी थी। वहां हम लोगों का कोई काम नहीं था इसलिए हम साथ नहीं गये थे। ऑफिस में भी दिन भर न स्‍मिता को कोई काम था न मुझे। हम दोनों ही खाली थीं। तभी स्‍मिता ने कहा था – चल तेरे गेस्‍ट हाउस चलते हैं। ललिता मैडम ने रोज़ाना पार्टी बाजी की और पीने की ऐसी लतलगा दी है कि अब एक शाम भी खाली हो बीच में तो अजीब सा लगता है।चल आज शाम हमारी सही। और हम शाम ढलते ही गेस्‍ट हाउस आ गयी थीं।

-एक तरह से एक साथ गुज़ारी हम दोनों की वह शाम एक बेहतरीन और सारी गलतफहमियां दूर करने वाली शाम थी। मुझे यहां आये हुए पन्द्रहदिन तो हो ही गये थे और अजीब बात थी कि हम दोनों बेशक एक ही काम कर रही थीं,दोनों ही हर समय मैडम की चाकरी में उनके दायें बायें रहती ही थीं लेकिन कभी भी हम दोनों में खुल कर बात करने के या हँसी मजाक के मौके ही नहीं आये थे। उसके पहले दिन के कमेंट के बाद तो मैं सोच ही नहीं सकती थी कि हम एक लेवल पर बात कर पायेंगी। अब चूंकि ऑफर उसी की तरफ से था और उसने शाम को फुसफुसा कर मेरे कान में कह दिया था कि तुमसे खूब बातें करनी हैं तो मैंने भी यही सोचा कि संबंध बेहतर बनाने की शुरुआत होनी चाहिये। किसी की तरफ से हो। मेरे लिए भी काम करने में आसानी होगी। मैंने हां कर दी थी! ड्रिंक्‍स हमने रास्‍ते में ले लिये थे और खाना बाहर से मंगवा लिया था। स्‍मिता ने ये भी हिंट दे दिया था कि आज की सिटिंग लम्‍बी चलने वाली है, वह रात वहीं रहेगी क्‍योंकि उसके हसबैंडआउट ऑफ स्‍टेशन हैं और वह अकेली घर जा कर भी क्‍या करेगी। मुझे भला क्‍या एतराज हो सकता था। जितनी लम्‍बी सिटिंग, उतनी ज्‍यादा खुल कर बातें होंगी और उतने ही परदे हटेंगे।

-और उतने ही भ्रम भी टूटेंगे।

-हां, ये भी सही है। उस रात हमने जम के पी थी और उतनी ही जम के बातें भी की थीं। उसने ललिता मैडम के बारे में जो ओपन और क्‍लोज्‍ड बातें बतायी थीं, शायद उस शाम हम न मिलतीं तो कभी भी मुझ तक न पहुंचतीं। मैडम की ताकतें, उनकी कमजोरियां, उनके सपने,बचपन, प्‍यार, शादी, अफेयर, बच्‍चे, पति, उनकी हैसियत,उनके डर,उनके घरसब के बारे में स्‍मिताने खूब बातें बतायी थीं।

उस दिन ही स्‍मिता ने अपने पहले दिन के कमेंट के बारे में भी सॉरी कहा था कि वह मुझे पहले दिन गलत समझ बैठी थी और उस कमेंट के बाद वह पछतायी भी थी कि पहली ही बार उसे मुझसे ये नहीं कहना चाहिये था। उसने माना था कि वह मेरे आने से डर भी गयी थी कि कहीं मैं उसकी जगह न ले लूं। मैंने उसकी बात रखते हुए हौले से हग करते हुए उस बात को जाने ही दिया था।

स्‍मिता ने उस दिन बताया था कि मैडम की एम्‍पायर लगभग 1500 करोड़ की है जिसमें हर बरस जो एक्‍सपान्‍शन होता है या डाइवर्सिफिकेशन होता रहता है, वो अलग। मैडम को मां-बाप की तरफ से जो कुछ मिला था इन दस पन्द्रह बरसों में बढ़ा ही है।हर महीने मैडम की हैसियत में दस बारह करोड़ या उससे ज्‍यादा जुड़ जाना मामूली बात है। इसके अलावा हर अब हर महीने में जितना कमा लेती हैं, आप लाख कोशिशें करें, उतना खर्च नहीं कर सकतीं। कर ही नहीं सकतीं। उनकी वर्क फोर्स इस एम्‍पायर को रोज़ाना और बड़ा करने में लगीहुई है।

पूरी जायदाद की अकेली वारिस हैं ललिता मैडम।माता-पिता की अकेली संतान। पिता नहीं रहे। मां साथ रहती है। वे अलग हीमॉडल की लेडी हैं, लेकिन उनकी पर्सनैलिटीमैडम के लाइफ स्‍टाइल से कहीं क्रॉस नहीं करती है। उनकी अपनी दुनिया है और वे अपने ठाठ-बाठ से अपना जीवन जीरही हैं। वैसे थोड़ा बहुत मैं भी अपनी स्‍टडी से और पेपर्स देख कर जान ही चुकी थी और पहलेदिवाकर भी थोड़ा बहुत बता ही चुके थे।

-    हमम

- मैडम ने दो शादियां कीं। दोनों टूटीं। दो बार शादी करके भी वेअकेली ही हैं।एक तरह से दोनों हसबैंड मैडम के घर आये थे और दोनों ही जिस तरह आये थे उसी तरह लौट भी गये थे। पहला तो खाली हाथ ही।स्‍मिता ने ही बताया था कि मैडम की ये शादियांकैसेटूटी थीं।पहली शादी एलएलबी करते हुए ही बाइस बरस की उम्र में घर से भाग कर अपने क्‍लास फैलो से की थी और इतने दिन चल पायी थी जितने दिन वह ललिता मैडम के अंधाधुंध खर्च बर्दाश्त कर पाया था। उसने तो मैडम से ये सोच के शादी की थी कि मैडम के आने से वह खुशहाल और निहाल हो जायेगा लेकिन ललिता मैडम की शादी को उनके घर वालों ने पूरी तरह से नकार दिया था और मैडमने जिस तरह खाली हाथ शादी की थी, उसी तरह से कुछ ही दिन बाद उनका पति खाली हाथ बाहर कर दिया गया था। पहली शादी का वह चैप्‍टर जल्‍दी ही भुला दिया गया था। और पहला पति भी।

-पहलीशादी के चक्‍कर में मैडम की अपनी एम्‍पायर में ताजपोशी में देर ही हुई थी बेशक अपने आपको इसके लिए जस्‍टीफाई करने के लिए मैडम को और मौके मिल गये थे और मैडम ने अपनी पढ़ाई पूरी की थी और सब कुछ हासिल करने से पहले अपने आपको पूरी तरह से तैयार भी किया था। उसी मेहनत का नतीजा है कि मैडम न केवल पूरी तरह सफल हैं बल्कि अपनी पोजीशन दिन हर दिन बेहतर बनाती जा रही हैं।

-स्‍मिता ने ही उस रात बताया था कि मैडम की दूसरी शादी बहुत देर से हुई थी। पहली शादी के दस बरस बाद। बीच में कई छोटे मोटे चक्‍कर चले। एकाध सीरियस भी। दूसरी शादी अपने ही लेवल पर बल्‍कि थोड़ा ऊपर के लेवल पर हुई थी। ये शादी कुछ बरस तो ठीक चली लेकिन मैडम पता नहीं किस मिट्टी की बनी हुई हैं, कम्‍प्रोमाइज शब्‍द इनकी डिक्‍शनरी में ही नहीं है। न बिजिनेस में न पर्सनल लाइफ में। बेशक दूसरी शादी ने इन्‍हें दो बच्‍चे दिये लेकिन जो चीज हसबैंड वाइफ को जोड़े रखती है, वह बॉंडेज यहां पर भी नहीं थी। मैडम ने शादी के बाद भी अपनी किसी भी कंपनी या प्रॉपर्टी या एम्‍पायर को अपने पति की किसी की कंपनी के साथ मिलाया नहीं था। दोनों हसबैंड वाइफ पहले ही की तरह अपनी अपनी कंपनियोंके मालिक बने रहे थे इसलिए अलग होने में कोई भी दिक्कत नहीं आयी थी। न इमोशनली न इकानामिकली। दूसरी शादी 6 बरस चली। दोनों बच्‍चे मैडम ने रखे। एक तरह से रखे ही, पाले तो सर्वेंट्स ने या बाद में हॉस्टल वालों ने। पंचगनी में पढ़ते हैं। वेकेशंस में ही आते हैं। दूसरेहसबैंड बेशक अलग रहते हैं लेकिन कई बार कई मीटिंग्‍स वगैरह में मिल भी जाते हैं तो फ्रेंडली ही मिलते हैं।

-स्‍मिता ने ये भी बताया था कि वह मैडम के पास पिछले दस बरस से है। वह मैडम के सारे पर्सनल काम देखती है इसलिए दोनों में इम्‍पलायी इम्‍पलायर वाला रिश्‍ता कम और दोस्‍ती वाला रिश्‍ता ज्‍यादा है।वह मैडम के सारे काम पूरी डेडीकेशन के साथ करती है इसलिए मैडम को कई बार कहना या याद दिलाना नहीं पड़ता और काम हो चुका होता है। उसका अपना घर मैडम की मदद से ही बना है।तभी मैंने उससे पूछा था कि तब उसने वे दोनोंडायरियां मुझे क्‍यों दी थीं।

- मैडम ने कहा था देने के लिए ताकि तुम्‍हें इस काम के लिए तैयार किया जा सके। लेकिन डोंट वरी,कुछ और चीज़ें हैं जो इन डायरियों में भी नहीं हैं। बताऊंगी किसी दिन। बस, काम कोई भी करे, कुछ भी मिस नहीं होना चाहिये। अपडेटिंगऔर परफैक्‍शन भी जरूरी है।

- बताना, लेकिन तभी मैंने कह ही दिया था- स्‍मिता तुम्‍हें नहीं लगता कि मैं कम से कम इन कामों के लिए तो यहां नहीं ही लायी गयी थी। तुम सब कुछ ठीक-ठाक संभाल ही रही हो। वही काम दो लोग करें, मैं समझ नहीं पा रही। ललिता मैडम के पास इतने आप्‍शंस हैं। मुझे कहीं भी रखवा सकती हैं।मैं भी खुश रहूं और ललिता मैडम को भी लगे कि मेरा भला ही किया है।

-जूही,इस बारे में मैडम से मेरी बात हुई थी। उन्‍होंने कोई जवाब नहीं दिया कि तुम्‍हें  लेकर वे क्‍या सोचती हैं। यहां लाने के बारे में भी और तुम्‍हारे प्‍लेसमेंट के बारे में भी। मैंने हिंट भी दिया था कि हम जूही को बेहतर पोजीशन दे सकते हैं लेकिन तुम्‍हें तो पता ही है,मैडम कितने कम सवालों के जवाब देती हैं।

-हमारी ये बात यहीं पर खतम हो गयी थी। न मैं स्‍मिता का सच जान पायी थी और नमैडम का ही कि आखिर मेरे साथ आगे चल कर क्‍या होने वाला है। वैसे वह रात मेरे लिए इस मायने में अच्‍छी रही थी कि स्‍मिता के मन में मुझे ले कर जो गलतफहमियां थीं वे दूर हुईं और मैं भी स्‍मिता को एक नये नजरिये से देख पायी थी। कई बातें साफ हो गयी थीं।

-    हममम

-वागीश, वैसे मुझे इन दो महीने में मुझे कभी अपने लिए फुर्सत ही नहीं मिली। हम या तो मैडम के साथ होते या मैडम की सेवा में। एवरेज एक पार्टी रोज। यहां नहीं होते थे तो कहीं ट्रिप पर होते। हम इन दो महीनों में दो बार दुबई,एक बार इंग्‍लैंड और एक बार सिंगापुर गये। पहली बार दुबई में ललिता मैडम के साथ हम तीनलड़कियां गयी थीं। बस एक शाम ललिता मैडम का मूड आया कि कल दुबई जाना है। अब जाना है तो जाना है। मैडम के काम ऐसे ही होते थे। दो घंटे में ही सारा इंतज़ाम हो गया था। वहां मैंने पहली बार मैडम के कई चेहरे देखे थे। बेहद प्‍यारे भी और बेहद डरावने भी। ऐसे भी कि जिन पर तरस आये और ऐसे भी कि जिन्‍हें देख कर चिढ़ छूटे या तकलीफ़ हो।

-हम चारथीं लेकिन कमरे तीनही बुक कराये गये थे। कमरे स्‍मिता ने ही बुक करवाये थे। स्‍मिता और मैडम के लिए एक ही सुइट बुक कराया गया था। तब मुझे हलका-सा अहसास हुआ था कि कहीं मैडम और स्‍मिता लेस्‍बयिन तो नहीं। सीधे-सीधे उन्‍हें लेस्‍बयिन तो नहीं कहा जा सकता था क्‍योंकि मैडमकी दो शादियां हो रखी थीं और उन्‍हें दूसरी शादी से दो बच्‍चे थे। स्‍मिता भी शादीशुदा थी और उसकी ग्‍यारह बरस की बेटी थी।वह स्‍मिता के इरैटिक शेड्यूल और लाइफ स्‍टाइल की वजह से पंचगनी के एक स्‍कूल में पढ़ती थी। यही लगा कि दोनों ही बाइ सैक्‍सुअल होंगी। लेकिन देखने में और आपसी व्‍यवहार में दोनों ही मैस्‍क्‍युलिन नज़र आती थीं।

-ये ट्रिप पूरी तरह से मज़ा मारने के मकसद से बनायी गयी थी। बेहतरीन खाना-पीना, लैविश लक्‍जरी और ऑन द टॉप ऑफ द वर्ल्‍ड शॉपिंग। कुछ भी ऐसा नहीं था जो मैडम को पसंद आये और वह खरीदा न गया हो। खूब महंगा स्‍नेक स्‍किन का पर्स,सिग्नेचरघड़ी,दुनिया के बेहतरीन डिज़ाइनरनेकलेस,सैंडिल या ड्रेस। या ढेरों फालतू जी चीज़ें या महंगे गिफ्ट आइटम, जिन्हें खरीदते समय कोई आइडिया नहीं था कि किसके हिस्‍से में जाने हैं या यूं ही बंद रह जाने वाले हैं।बस पसंद आये और ले लिये वाला मामला था। ढेर सारा सामान तो वहीं हम लोगों में ही बांट दिया गया था।

-स्‍मिता ने ही ये राज़ खोला था कि ललिता मैडम के खजाने में ये सारी चीज़ें हर शॉपिंग में जुड़ती ही हैं, बेशक इस्‍तेमाल एक बार भीन होती हो। वह बता रही थी कि मैडम के पास इसीया इससे ज्‍यादा कीमत की सारी चीज़ें बीसियों की संख्‍या में हैं। ये बाद में या तो अपने पसंदीदा स्‍टाफ या लोगों में बांट दी जाती हैं या इधर उधर हो कर आखिर गुम ही हो जाती हैं और इस तरह नयी चीजों के लिए जगह खाली होती है।

-मैडम के लेस्‍बियन होने का थोड़ा-सा अंदाज़ा मुझे दुबई में दूसरे दिन ही लग गया था। हम दोपहर को शॉपिंग करके थके हुए आये थे। मेरी ड्यूटीज़ में यहां आकर एक काम और भी जुड़ गया था कि मैडम के शॉपिंग बैग उठा कर उनके कमरे तक लाओ। मैंने ये काम कभी भी किसी के लिए नहीं किया था, लेकिन मेरी परेशानी यही थी कि मुझेइतने दिनों में अपनी हैसियत का ही नहीं पता चल पाया था कि मैं यहां आखिर आयी ही किस लिए हूं। कभी तो मैं सिर्फ एक क्‍लर्क होती, कभी मैडम की पीए हो जाती, कभी उनकी ईवेंट मैनेजर, कभी शाम की पार्टी के लिए ड्रेस की सलाहकार की भूमिका निभा रही होती या फिर यहां दुबई आने के बाद पता चला था कि उनके भारी भरकम शॉपिंग बैग उठा कर उनके सुइट तक पहुंचाने का काम भी मुझे ही करना है। हालांकि स्‍मिता उनके साथ ही ठहरी हुई थी और इस तरीके से वह ये बैग आसानी से ले जा सकती थी लेकिन सब कुछ मेरे हिस्‍से में ही डाल दिया गया था। स्‍मिता पता नहीं कहां सरक गयी थी।

-मैडम आते ही अपने कमरे में पलंग पर पसर गयीं थीं और मुझे भी वहीं लेट जाने का इशारा किया था। मैं भी उनसे थोड़ी दूरी रखते हुए वहीं लेट गयी थी। धीरे धीरे उनका हाथ मेरे माथे पर आया था और मेरे बाल सहलाने लगा था। मैं अनईजी तो हुई थी लेकिन इस बात पर बहुत ज्‍यादा ध्‍यान नहीं दिया था। वे अक्‍सर मुझे छूती ही रहती थीं या धौल धप्‍पा करती ही रहती थीं। थोड़ी देर तक यही चलता रहा था। तभी वे उठी थी और बात करते करते मेरे सामने ही कपड़े चेंज करने शुरू कर दिये थे। पहने हुए सारे कपड़े साइड टेबल पर उछाल दिये थे और तभी खरीदा गया एक ट्रांसपेरेट छोटा सा गाउन गले में डाल दिया था। ये पहला मौका था जब मैं उन्‍हें इस तरह से इतनी नजदीकी से देख रही थी। डर भी लग रहा था कि पता नहीं उनका अगला स्‍टेप क्‍या हो। तभी उन्‍होंने ठीक वैसा ही गाउन मेरी तरफ उछाल लिया था - ये लो, ये तुम्‍हारे लिए है। तुम भी यहीं चेंज कर लो। मैं एकदम सकपका गयी थी। उनके अगले कदम के बारे में सोच कर ही मेरी रूहकांप गयी। नहीं जानती थी कि वो कदम क्‍या होगा। मेरे सामने अजीब-सा संकट आ खड़ा हुआ था। मेरे सामने मेरी बॉस थीं। मुझे अपना देश,जॉब और अपना सबकुछ छोड कर यहां आये सिर्फ बीस दिन ही हुए थे। अभी तो मेरी सेलेरी भी तय नहीं हुई थी। इस समय मैं परदेस में मैडम के रूम में थी और नहीं जानती थी कि मेरा कौन-सा कदम सही होगा और कौन-सा कदम गलत हो सकताहैजोमुझेसीधे सड़क पर ले आयेगा। सब कुछ मेरी आंखों के सामने तेजी से एक फिल्‍म की तरह घूम गया। अचानक स्‍मिता का सीन से गायब हो जाना, सारे बैग ले कर मुझे मैडम के साथ उनके सुइट में आना, यहां मैडम का इस तरह का बिहेवियर जो अगले पलों में न जाने क्‍या मोड़ ले,मैं उनकी आदतों के बारे में कुछ भी तो नहीं जानती थी। बेशक उनके गुस्‍से से मेरा एक बार भी वास्‍ता नहीं पड़ा था लेकिन मुझे बताया गया था कि अगर उनका मूड खराब होतो दुनिया की कोई ताकत उनके चेहरे पर हँसी वापिस नहीं ला सकती। उनका मूड कब और कितनी देर के लिए खराब हो और किस बात पर खराब हो जाये और फिर खराब मूड कब और किस बात पर ठीक हो, कहा नहीं जा सकता। इसमें हफ्तों भी लग सकते हैं। इस मौके पर मैं बेहद संकट में फंस गयी थी। सेकेंड्स में ही मुझे फैसला लेना था। मैडम के अगले कदम सेया अगले शब्‍द कहने से पहले ही। अपने आपको उनके अगले मूवमेंट के लिए तैयार करना था या पीछे हट कर वह सब कुछ झेलने के लिए तैयार रहना था जिसके बारे में मैं सोच ही नहीं सकती थी।मैं एकदम उठी थी और जितनी माइल्‍ड आवाज में कह सकती थी, कहा था – इट्स ओके मैडम। मैं अपने रूम में जा कर चेंज कर लूंगी।

उनकी आवाज ऊंची हो गयी थी- यहां क्‍या तकलीफ़ है। मैं तुम्‍हारे सामने चेंज कर सकती हूं तो तुम...

इससे पहले कि वे अपनी बात पूरी करतीं, मैं हकलाते हुए बोली थी – इट्स ओके।आयम चेंजिंग मैडम। और मैंने वहीं चेंज भी किया और उनका दिया गाउन भी पहना और पहले की तरह पलंग पर वापिस लेटने आने से पहले दो गिलास रेड वाइन केभरे और हँसते हुए एक गिलास मैडम को पेश किया। मैडम खुश हो गयी – ये बात हुई ना हनी। आइ जस्‍ट वांटेड इट। मैंने पूरी कोशिश की और अपने मूड को बिगड़ने से बचाते हुए कोई मजाकिया बात शुरू कर दी। उन्‍होंने उस पर हंसते हुए रिएक्‍ट किया। बात चल निकली। अब उन्‍हें मैं कैसे बताती कि मैं कैसे अपने आपको ये नाटक करने के लिए तैयार कर पायी थी। खुद को भी बचाना था और उन्‍हें भी देखना था कि उनके मन में क्‍या है। गिलास हाथ में होने के कारण अब मुझे ये मौका मिल गया था कि उनके सामने कुर्सी पर बैठ गयी थी।

मैं अपनी चाल में कामयाब हो गयी थी। मैडम ने शॉपिंग बैग्‍स खोल कर आज की शॉपिंग दिखानेके लिए कहा तो मुझे मौका मिल गया, बात बदलने के लिए। मैं मैडम की शॉपिंग देख-देख कर हंस रही थी। मैडम की घड़ी, बैग, सैंडिल, गाउन और दूसरी शॉपिंगका बिल ही इंडियन करेंसी में कई लाख रुपये था। मैंने ठंडी सांस भरी थी। कुछ कहने या कम्‍पेयर करने का मतलब ही नहीं था।

-जब तक सारे शॉपिंग बैग देखे जाते, लंच का टाइम हो चुका था और तब तक मैं तीन बार वाइन के गिलास भर चुकी थी। मैं एक बहुत बड़े संकट को कम से कम टालने में सफल हो गयी थी। लंच के समय स्‍मिता पता नहीं कहां से सीन पर हाजिर हो गयी थी।

-उसी दोपहर लंच के बाद स्‍मिता ने मुझसे फिर से शॉपिंग के लिए चलने के लिए कहा। मैं हैरान थी कि सुबह तो इतनी शॉपिंग कर चुके, अब क्‍या बाकी है तो उसने हंसते हुए कहा –हम दोनों ने ही करनीहै। मैडम के बच्‍चों के लिए डिज़ाइनरअंडरक्‍लोद्सऔरकैजुअल्‍सलेने हैं। मैं हैरान हुई थी कि बच्‍चों के लिए अंडरक्‍लोद्स यहां दुबई में लिये जायेंगे। स्‍मिता ने तब मुझे वो शॉपिंग लिस्‍ट दिखायी थी जो बच्‍चों ने अपनी मॉम को भेजी थी और मैडम ने स्‍मिता को दे दी थी। स्‍मिता बरसों से हर फॉरेन ट्रिप पर ये शॉपिंग करती आ रही थी। हमने तबजो सामान खरीदा था, लगता था वह किसी प्रिंसली स्‍टेट के किन्हीं राजकुमारों के लिए खरीदा गया था। हर आइटम के कई-कई सेट। ये सोचे बिना कि हॉस्टलमें रहने वाले बच्‍चे उनकी कितनी कद्र कर पायेंगे या ये चीज़ें उन तक रहेंगी भी या नहीं।

- बाद में स्‍मिता ने ही बताया था कि इस पूरी ट्रिप की बिलिंग मैडम की किसी कंपनी केखाते में बिजिनेस ट्रिप के नामडाल दी गयी थी।सिर्फ यही क्‍यों,उनकी सारी विजिट्स इतनी ही शानदार और खर्चीली होतीथीं। हमारीसारी विजिट्स ही प्‍लेजर ट्रिप्‍स थीं। इंग्‍लैंड जाना मेरे लिए इसलिए भी अच्‍छा रहा कि मैं वहां जा कर एक बार फिर चार दिन के दिन के लिए एट होम फील करके आयी थी, बैंक के कुछ पेमेंट्स बाकी थे, वे भी इस विजिट में मिल गये थे बेशक मैडम के चक्‍कर में अपने लिए ज्‍यादा समय नहीं मिल पाया था।

-इंग्‍लैंड में चार दिन में मैडम ने सिर्फ दो बिजिनेस मीटिंग्‍स की थीं। उनमें भी हमारी ज़रूरत नहीं के बराबर ही थी। उनकी अपनी ऑफिशियल सेक्रेटरी ये काम देख रही थी। इंग्‍लैंड में भी खूब और खर्चीली शॉपिंग की गयी थी।

-मैं कई बार परेशान होती कि क्‍या यही मेरा कैरियर या कैरियर पाथ है इंडिया में जिसके लिए सब कुछ छोड़-छाड़कर आयी थी। मैडमसे जब भी पूछती, वो या तो टाल जाती या कोई ऐसी चुभती तीखी बात कह देती कि मैं बेशक तिलमिला जाती लेकिन कुछ कह न पाती। कुछ सूझता नहीं था कि करूं तो क्‍या करूं। ये तय था कि मैडम की एम्‍पायर में रहते हुए कुछ हो नहीं सकता था और बाहर मैं कुछ कर पाने की हालत में नहीं थी। अगले जॉब के लिए प्रोफाइल में इन्‍वेस्‍टमेंट बैंकर के बजाये पर्सनल सेक्रेटरी टू सीईओ लिखना कितना खराब लगेगा।

- इस बीच एक दो किस्‍से ऐसे हुए कि मैडम का मेरे लिए बदला हुआ रुख सामने आने लगा था। एक बार इसी वेस्‍टिन होटल में इंटरनेशनल चीज़ टैस्‍टिंग ईवेंट था। मैडम को चीफ गेस्‍ट के तौर पर बुलाया गया था। मैडम हमेशा की तरह अपनी शार्ट ड्रेस में और मैं अपनी लम्‍बी ड्रेस में थी। मैडम मुझे लम्‍बी ड्रेसेस के लिए अक्‍सर टोकतीं लेकिन इसबात का मैं क्‍या कर सकती थी कि हर बार उनकी भड़कीली और एक्‍सपोज़ करने वाली ड्रेस के बावजूद मेरी लम्‍बी ड्रेस की ज्‍यादा तारीफ होती। वे हर बार पहले से ज्‍यादा जलती भुनतीं और किसी न किसी तरीके से मुझ पर भड़ास निकालतीं। उस ईवेंट में भी यही हुआ। सब कुछ ठीक चल रहा था। हम दोनों सबसे अलग हट कर एक तरफ खड़ी थीं कि एक खास मेहमान आये और मैडम से बात करने लगे।अब हुआ ये कि उस बंदे ने मैडम के बजाये मुझसे बात करना शुरू कर दिया। मैडम भला ये कैसे सहन करतीं। उन्‍होंने मुझे वहां से हटाया और कहा कि उनके लिए कुछ चीज़ और टोस्‍ट ले आऊं। मैं अभी मैडम के लिए प्‍लेट भर ही रही थी कि टीवी और प्रेस वाले आ गये और मुझसे बाइट लेने लगे। मैं मीडिया से बचना चाहती थी। जानती थी कि इस एपिसोड का क्‍या नतीजा होगा। लेकिन टीवी वाले थे कि मुझसे ही सवाल पूछे जा रहे थे। मैंने मैडम की तरफ देखा था। इन दो मिनटों में ही हुआ ये कि मैडम का चेहरा काला पड़ चुका था।  इस बीच वह बंदा भी मैडम को अकेले छोड़ मेरे पास आ गया था। और टीवी वालों को बाइट देने लगा था। मुझे नहीं पता था कि मैं मैडम के लिए प्‍लेट भरने आऊंगी और ये सब हंगामा हो जायेगा। जब तक मैं सबसे पीछा छुड़ा कर मैडम के पास प्‍लेट ले कर पहुंचती, वे जल कर पूरी तरह खाक हो चुकी थीं। वे चीफ गेस्‍ट थीं और अकेले खड़ी थीं। अपने आपको पूरी तरह इग्‍नोर्ड महसूस करती हुईं। उन्‍होंने मेरे हाथ से प्‍लेट नहीं ली और ये कहते हुए एकदम बाहर हो गयीं कि मैं एक मीटिंग में जा रही हूं,तुम सीधे ऑफिस चली जाना। मैं जानती थी कि डैमेज हो चुका है और इसकी रिपेयर नहीं की जा सकती। वे अपने ही स्‍टाफ के सामने इतनी बुरी तरह से इग्‍नोर की जायें, वे सहन कर ही नहीं सकती थीं। आग में घी डालने का काम अगले दिन के लोकल टैब्‍लायड ने किया जिसने थर्ड पेज पर ईवेंट को कवर करते हुए मेरी पिक्चर डाल दी थी।

-ये ईवेंट हम दोनों के बीच चल रहे कोल्‍ड वार में एक टर्निंग पॉइंट थी। अब चाहे अनचाहे, जाने अनजाने हम दोनों में कम्‍यूनिकेशन गैप बढ़नेलगा था। बिना कोई रेफरेंस बीच में लाये।कई बार पूरा-पूरा दिनमैडम से बात ही न हो पाती। जो भी कहना होता वेस्‍मिता के जरिये कहलवातीं। बेशक हम पार्टियों में अभी भी जाते थे,मैडम की थीम पार्टियों को ग्रैंड सक्‍सेस बनाने में कोई कसर न छोड़ते,मैडम के इशारा करने से पहले ही उनकी बात समझने की कोशिश भी करते। बता ही चुकी हूं कि मैडम अपने ज्‍यादातर ऑर्डरबॉडी लैंग्‍वेज के जरिये ही देतीं। इशारे से ही अपनी बात कहतीं। ये जेस्‍चर्स भी कई बार इतने कम्‍प्‍लीकेटेड होते कि कई बरसों से उनके साथ काम कर रही स्‍मिता भी गच्‍चा खा जाती। न उनसे दोबारा पूछते बनता, न काम पूरा किये बिना ही चलता। मेरी तो बिसात ही क्‍या थी। काम उनके मन के माफिक पूरा न होने के नतीजे हम, खास तौर पर स्‍मिता जानती थी। वह कई बार भुगत चुकी थी। बहुत बुरे होते थे ये पल। जहां मैडम के अगले वार के बारे में कुछ भी नहीं कहा जा सकता था। मैडम का मूड बुरी तरह से उखड़ जाना, गुस्‍से का उस सीमा तक चढ़ जाना कि उतरने में पता नहीं कितना समय लगे,मैडम का गुस्‍से में ऐसे ऐसे फरमान जारी कर देना कि आप सोच ही न सकें कि वे सामने वाले से बदला ले रही हैं या अपने आप से।

   - हमम। कहती चलो, वेरी इंटरेस्‍टिंग!

-अब मैं इसमें क्‍या कर सकती थी कि उन्‍हीं की पार्टियों में, उनके ही ऑफिस में मैं,जूही,उनकी स्‍टाफ, उनकी सेलेरीड स्‍टाफ उनसे ज्‍यादा पसंद की जाती थी। अपनी सादगी की वजह से, चेहरे पर पॉजिटिव वाइब्‍स की वजह से होने वाले ग्‍लो से और अपनी ड्रेस सेंस की वजह से। वे कितना भी सादा मेकअप करें,सादे कपड़े पहनें या कानों में मेरी तरह सिर्फ सादे ईयर पिन ही डालें, वे अपनी ढलती उम्र का क्‍या करतीं जो उनकी चुगली खा ही बैठती थी। ग्रेसफुल दिखने की उनकी सारी कोशिशें नाकाम हो जातीं। वे हर बार झल्लातीं और फिर मूड खराब कर गुस्सा न किसी पर निकालतीं या अपने आप से बदला लेतीं। ज्‍यादा पी लेतीं, होश खो बैठतीं और तब हम लोगों की जिम्‍मेवारी हो जाती कि संभालें उन्हें। कितनी ही बार हुआ ऐसे। उन्‍हें इग्‍नोर किया जाना बिल्‍कुल पसंद नहीं और ये बात भी पसंद नहीं कि उनकी प्रेजेंस में किसी और को ज्‍यादा वेटेज मिल जाये।इसका तरीका उन्‍हें यही समझ में आया कि मुझे अपने साथ ले जाना ही बंद कर दिया।

-शुरू शुरू की बात है,एक बार उन्‍होंने फैब इंडिया की मेरी एक ड्रेस की सुबह-सुबह ही तारीफ कर दी। ड्रेस ग्रेसफुलथी और अच्‍छी लग रही थी। मैंने उसी दिन फैब इंडिया जा कर उससे भी बेहतर ड्रेस मैटिरियल ला कर उन्‍हें गिफ्ट किया था और ड्रेसडिजाइन करने के लिए कुछ आइडियाज़ दिये थे। यूं कहें कि कहा था कि मैडम अगर कहें तो मैं उनकी ड्रेस डिजाइन करके दूं। मैडम मान गयी थीं और उनकी ड्रेस डिज़ाइनरबुलवायी गयी थी। उनकी डिज़ाइनर ने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की थी कि अच्‍छी ड्रेस बने। लेकिन इसमें मेरा क्‍या कुसूर था कि वह ड्रेस अच्‍छी बनने के बावजूद उन्‍हें पसंद ही नहीं आयी थी। ज़रा भी नहीं जंची थी। सिर्फ एक ही घंटे के लिए पहनी गयी थी। उनका मूड उस बार भी खराब हुआ था। नतीजा ये हुआ किवह खूबसूरत ड्रेस भी हमेशा के लिए किसी अलमारी में ही बंद हो गयी। उस दिन के बाद मैंने भी अपनीवह ड्रेस नहीं पहनी थी।ऑफिस में हो नहीं पाया और बाहर के लिए समय ही नहीं मिला।

-उधरस्‍मिताकी चिंता मैं समझ सकती थी। वह पहले दिन से ही ये मान कर चल रही थी कि मैं उसे हर जगह से रिप्‍लेस करने आयी हूं और आते ही ये काम कर दूंगी। मेरेभीतर आते ही उसे बाहर का रास्‍ता दिखा दिया जायेगा। मुझसे माफी मांगने के बावजूद वहअपने डर ले कर चल रही थी कि मैडम के इनर सर्किल से,ऑफिस से और जहां भी हो सके, मैं उसे बाहर कर दूंगी। आखिर सारी बातें उसकी तुलना में मेरे ही फेवर में थी। मैं इंग्‍लैंड से आयी थी, उसकी तुलना में मेरी बैकग्राउंड और स्‍टेटस बेहतर थे और सबसे बड़ी बात मैडम ने मुझे खुद चुना था। ये सारे संकट उसे डराये हुए थे और इन सब वजहों से वह मुझसेकट कर रहती और पूरी कोशिश करती कि मुझे कोई भी ऐसा मौका न मिले कि मैं मैडम के नजदीक आ सकूं या मैडम मुझ पर उससे ज्‍यादा भरोसा करने लगें या उसकी जानकारी के बिना मुझसे कुछशेयर करने लगें। वह यही मान कर चल रही थी कि मैडम मुझे लायी ही इसलिए है। जब मुझे ये पता चला था कि वह मैडम की बेड पार्टनर है तो मेरा मन कैसा भी हो गया था। छी:, मैं उस लेवल तक जाने के बारे में सोच ही नहीं सकती थी। स्‍मिता की जगह स्‍मिता को ही मुबारक। दैट वाज नॉट माई कप ऑफ टी। कम से कम मैं इस काम के लिए तो यहां नहीं ही आयी थी।अब मैडम की देखा देखी वह भी रंग बदलने लगी थी।

-मैं नहीं जानती थी कि वह मैडम की कितने सीक्रेट डील्‍स संभालती थी या फंड मैनेजमेंट देखती थी। ये तो मैं देख ही चुकी थी कि वह मैडम की बेड पार्टनर होने के नाते उनकी मुंह लगी तो थी ही। वह उनके सारे सीक्रेट्स की राज़दार भी थी। कोई बड़ी बात नहीं थी कि वह मेरे खिलाफ मैडम के कान भरती रही हो। वह अपनी पोजीशन कम करने या डाइलूट करने वाला कोई काम नहीं होने देगी। उसकी फिलॉसफी साफ थी- ऐश, ऐश और ऐश। मैं अगर उसके इस काम में कहींरुकावट बनती थी तो वह कोई रिस्‍क नहीं ले सकती थी। बेशक उस दिन गेस्‍ट हाउस में पीते हुए उसने मैडम के ढेर सारे भेद खोले थे और अपने पहले दिन के कमेंट के लिए माफी भी मांगी थी, सच मैं भी जानती थी और वह भी जानती थी कि मेरा यहां लम्‍बे अरसे तक रहना उसकी पोजीशन ही खराब करेगा। अगर किसी को हटना होता तो वह मैं ही थी।

-ओह बट यू आर राइट।

- आगे सुनो। एक नया डेवलपमेंट ये होने लगा था कि अब मैडममुझे पूरी तरह इग्‍नोर करने लगी थीं। पूरा-पूरा दिन बात ही न करना, कोई काम ही न देना या किसी न किसी तरीके से अपनी नाराज़गी जतलाना, ये सब होने लगे थे। एक बार तो जिस पार्टी की सारी तैयारी मैंने अकेले के दम पर की थी और बहुत खुश भी थी कि एक बहुत बड़ी पार्टी का सारा इंतज़ाम मैंने अकेलेकिया है और सब कुछ उस लेवल का किया है कि मैडम को कुछ कहने का मौका ही न मिले। मेरे लिए इससे बड़ा सदमा और क्‍या हो सकता था कि उसी दिन मुझे उनकी तरफ से एक स्‍टेट मिनिस्‍टर को उसके बर्थडे पर गिफ्ट देने के लिए मुंबई भेज दिया गया था। और ये काम मुझे स्‍मिता के जरिये दिया गया था। स्‍मिता भी जानती थी कि शाम की पार्टी में मेरी ज़रूरत होगी क्‍योंकि सारे के सारे काम मेरी ही जानकारी में हुए थे और किसी भी मिसिंग लिंक के लिए मुझे ही ढूंढा जाता। मेरे लिए इससे बड़ी तकलीफ़ की बात क्‍या हो सकती थी कि मेरी बॉस मुझसे ही बात न करे। मैं अपनी तरफ से कोशिश करके देख चुकी थी और अपनी इन्‍सल्‍ट करवा चुकी थी।

-मैं मैडम की तकलीफ़ समझ रही थी लेकिन मेरे पास कोई तरीका नहीं था कि मैं उनका ये फीयर फैक्‍टर कम कर पाती। अब अगर ऑफिस में आने वाले उनके गेस्‍ट मेरी तरफ मुड़ कर दोबारा देखते या मुझसे बात करना चाहते या मुझे कम्‍पलीमेंट दिये बिना न रह पाते तो इसमें मैं क्‍या कर सकती थी। मैं पिछले कई बरसों से लंदन में अपने ड्रेस सेंस,अपनी ब्‍यूटी और अपने चेहरे की चमक के लिए हमेशा कम्‍पलीमेंट लेती आयी थी और मुझे इसमें कुछ भी खराब नहीं लगता था। अब मैडम की इस ईर्ष्याका मैं क्‍या करती कि लोग मेरी तरफ क्‍यों देखते हैं। अब मैडम ने पार्टियों में मुझे ले जाना ही छोड़ दिया,ऑफिस में बात करना बंद कर दिया और अपने क्‍लोज ग्रुप से लगभग बाहर ही कर दिया।

-अब तक मुझे भी समझ में आने लगा था कि मैडम को मुझे यहां लाने का पछतावा हो रहा है। सीधे कह नहीं सकतीं, हेठी होती है और मुझे रखने में अब तकलीफ़ महसूस कर रही हैं। चाहतीं तो मुझे अपनी नजरों के सामने से हटाने के लिए अपनी किसी भी कंपनी में आसानी से भेज कर मुक्त हो सकती थीं लेकिन इसमें भी उनका ईगो आड़े आ रहा था। मैं समझ रही थीं कि वे मेरे लिए ऐसे हालत बना रही थीं कि मैं ही उन्‍हें छोड़ कर जाऊं। वे किसी भी तरह की वादाखिलाफी से बच जाना चाहती थीं।

-ये बात पंद्रह दिन पहले की रही होगी। दो और डेवलपमेंट हुए थे। मेरा एकाउंट खुलवा दिया गया था और उसमें मेरे पहले महीने की सेलेरी के साठ हज़ार रुपये डाले गये थे। ये सेलेरी बेशक मेरी उम्‍मीद और हैसियत से कम थी लेकिन जो काम मैं कर रही थी उसके हिसाब से तो ज्‍यादा ही थी।

-दूसरा काम ये किया गया था कि मुझे गेस्‍ट हाउस खाली करना पड़ा था और उसकी जगह मेरे लिए फर्निश्‍ड फ्लैट किराये पर ले लिया गया था जिसका किराया अब मुझे ही देना था। चूंकि ये सब इंतजाम ऑफिस की तरफ से हुआ था मैं ग्‍यारह महीने के लीव एंड लाइसेंस के बजाये सिर्फ तीन महीने का एडवांस किराया दे कर ही ये फ्लैट पा सकी थी। 

-सच कहूं वागीश तो मैं मैडम को कभी समझ नहीं पायी। उनके कितने चेहरे थे और सब एक दूसरे से अलग। एक बार फेसबुक पर उनकी फ्रेंडलिस्‍ट देख रही थी। ज्‍यादातर फ्रेंड उनसे कम ही उम्र के थे। स्‍मार्ट थे, अच्‍छी पोजीशन वाले थे और ऐसे लोग थे जिनके प्रोफाइल बताते थे कि इंटरेस्‍टैड इन फ्रेंडशिप विद वीमेन ओनली। शुरू के दिनों की बात है,एक दिन ललिता मैडम बहुत अच्‍छे मूड में थी। उनके केबिन में सिर्फ मैं ही थी। मैडम ने तब मुझे अपना एक खास ईमेल आइडी दिखाया था। उसमें उनके कई दोस्‍तों ने अपने न्‍यूड फोटो शेयर किये थे। यंग,डायनामिक एंड फुल ऑफ लस्ट।मैडम के चेहरे पर ये तस्‍वीरें दिखाते समय जरा भी शिकन नहीं थी। मेरे दिमाग में तुरंत एक सवाल आया था कि क्‍या मैडम ने भी अपने दोस्‍तों को अपनी इसी तरह की तस्‍वीरें भेजी होंगी या उनसे पर्सनल मीटिंग करती होंगी। वन नाइट स्‍टैंड के नाम पर। हां, एक बात और याद आ रही है।

-क्‍या

-मैडम कई बार पूरी शाम के लिए या रात भर के लिए गायब हो जातीं। पता ही न चलता कि कहां हैं। हम परेशान होते रहते कि ऑफिस में उनका इंतज़ार करें या अपने ठिकाने पर जायें। अब मैं अपनी तरफ से मैडम को फोन नहीं कर सकती थी। फोन वही करती थीं। स्‍मिता से जब इस तरह की शाम के बारे में मैंने पूछा तो वह या टाल गयी थी या फिर बात का टॉपिक ही बदल दिया था। अब समझ में आता है इस तरह के चैप्‍टर उनकी बेहद पर्सनल शामों के लिए होते होंगे।

- हममम

-उधर धीरे धीरे मैडम और मेरे रिश्तों में दरार और बढ़ने लगी थी। वे अब मुझसे बिना वजह ही खफा हो जातीं। डांटने लगतीं या मेरे कामों में खामियां निकालतीं। सबसे बड़ी तकलीफ़ कम्‍यूनिकेशन गैप की थी कि मुझसे ऐसे काम और वो भी मैडम के टोटल सैटिस्‍फैक्‍शन से पूरे किये जाने की उम्‍मीद की जाती जो मुझसे कहे ही नहीं गये होते। जब मैं अपनी बात रखना चाहती तो यही सुनना पड़ता -यू मस्‍ट एंटीसिपेट एंड एक्‍ट अकार्डिंगली। अब ये एंटीसिपेट करना कम से कम हवा में तो नहीं हो सकता था। स्‍मितातोमैडम के पास कई बरसों से थी और उसकी ग्रूमिंग ही इस हिसाब से हुई थी कि मैडम के इशारे करने से पहले ही काम कर दे या उन्‍हें सरप्राइज देती रहे। मेरी मैंटल फैकल्‍टी न तो इस तरह के फालतू कामों के लिए बनी थी और न ही मैं इसके लिए तैयार ही थी।

-नतीजा यही हुआकि हम दोनों में दूरियां बढ़ती गयीं और अल्‍टीमेटली एक दिन ऐसा भी आया कि मुझे साफ-साफ कहना ही पड़ा कि मैं ये सब करने के लिए अपनी लाइफ स्‍पाइल नहीं कर सकती। मैं बेहतर काम करती आयी हूं और बेहतर काम करने के लिए ही बनी हूं। बेहतर रिजल्‍ट्स भी दे सकती हूं। इन कामों के लिए अपनी लाइफ और अपना कैरियर बरबाद नहीं करूंगी। मैंने लगे हाथों उन्‍हें सुना ही दिया कि मैं उन सब कामों के लिए तो यहां नहीं ही आयी थी जो मैं कर रही हूं या जो मुझसे करने की उम्‍मीद की जा रही है। मैडम ने अपने खास अंदाज में अपना चश्मा उतार कर मेज पर रखा था और मेरी तरफ घूरते हुए कहा था- मेरा ख्याल है कि मैंने यहां पूरी कोशिश की है कि तुम आराम से रहो और अपनी लाइफ नये सिरे से एन्‍जाय करो। तुम शायद भूल रही हो, बैक लंदन में तुम्‍हारी क्‍या हालत थी। कितने डिप्रेशन में थी। मुझे बताओ तुम्‍हें यहां किस चीज की कमी है। सब कुछ तो है तुम्‍हारे डिस्‍पोजल पर। मेरे साथ ही खाती पीती हो, एन्‍जाय करती हो,फॉरेन ट्रिप्‍स किये, मैंने कहां कमी रखी। जस्‍ट टेल मी। तुम्‍हें तो ऑन द टॉप ऑफ द वर्ल्‍ड महसूस करना चाहिये। कितनीलड़कियां हैं जो इस पोजीशन के लिए तरसती हैं और मैंने तुम्‍हें खुद ये पोजीशन ऑफर की है।यू शुड..

-मैं समझ रही थी, वे जो भी कह रही हैं, मेरा मन रखने के लिए कह रही हैं। सच तो ये था कि वे मुझे लाने के अपने फैसले पर पछता ही रही थीं। वे चाहतीं तो अपनी किसी भी कंपनी में मुझे अच्‍छी पोजीशन पर रख सकती थीं लेकिन वे यही नहीं चाहती थीं। वे यही चाहती थीं कि मैं ही अपने आप ये जॉब छोड़ कर जाऊं। उन पर कोई आंच न आये।मैंने अपनी आवाज़ को जितना सॉफ्ट रखा जा सकता था, रखा और कहा –मैं आपसे मिली मदद और सपोर्ट से मना नहीं करती मैम। आपके साथ काम करने का मतलब ही एक वंडरफुल दुनिया में काम करने और रहने जैसा है। लेकिन मैं सोचती हूं कि मैं इस काम के लिए अपना कैरियर और सैक्रीफाइज नहीं कर सकती। मैं यहाँ भी बेहतर पोजीशन में बेहतर रिजल्‍ट्स दे सकती हूं। आपको पता ही है कि मैं लंदन में किस पोजीशन पर थी। यहां मैं उससे बेहतर की उम्‍मीद करती थी।

-ओके। लेट मी थिंक। और उन्‍होंने बात खत्‍म करने और मुझे जाने का इशारा कर दिया था।

-लेकिन ये मौका कभी नहीं आया था। हम दोनों के बीच बात पूरी तरह बंद हो चुकी थी। अब स्‍मिता के जरिये भी काम मिलना बंद हो चुका था। वागीश तुम यकीन करोगे कि पिछले एक हफ्ते से मेरे पास कोई काम नहीं था। जो रूटीन काम थे,कर्टसी के, बुके भेजना और गिफ्ट भेजना, वही मैं कर रही थी। पार्टी में ले जाना भी अब धीरे-धीरे कम होता चला गया था। कोई भी ईडियट इस मैसेज को समझ सकता था। आखिर मैं भी कब तक नहीं आंखें मूंदे रहती।

-आज वह घड़ी आ ही गयी। आर या पार। तुम यकीन नहीं करोगे वागीश कि ये पूरा हफ़्ता मैंने कैसे गुजारा है। पूरी तरह साइड ट्रैक्‍ड। कोई काम नहीं। हंसी मजाक नहीं। अपने खाने के लिये जो मंगानाहै, लाउंज से मंगाओ और अपने वर्क स्‍टेशन पर अकेले खाओ। शिट। इज वाज सच ए हॉरिफाइंग एक्‍सपीरिंयस। जब और नहीं सहा गया तो मैडम से टाइम मांगा और जो मन में आया, कह आयी। अपने आपको खाली करने की हद तक। मैडम ने सब कुछ सुना। कहा वही सब कुछ जो पहले कह चुकी थीं। एक भी लफ्ज नहीं और जब मैं आने लगी तो वे खड़ी हो गयीं। अपना हाथ आगे बढ़ाया और कहा- आइ विश जूही, तुम अपने मन पर इतना बोझ ले कर न जाती। आइ अश्‍योर यू, हमारे दरवाजे तुम्‍हारे लिए हमेशा खुले रहेंगे। कभी भी लगे, वापिस आ सकती हो। बेस्ट आफ लक।

- सच बताना वागीश, मैंने सही किया या गलत? कोई भी कब तक...

-जूही तुमने बिलकुल सही किया। बल्‍कि जब तुम्‍हें लगने लगा था कि सब कुछ खत्‍म हो चुका है तो ही बाहर आ जाना चाहियेथा।

-सचवागीश?

-एकदम सच और अब एक और सही फैसला करो।

-क्‍या?

-बारह बजने को हैं। भूख लगी है। ढाबा अब तक खुल चुका होगा।

-क्‍या मतलब खुल चुका होगा?

-मैडम ये पुणे है। इसे काम करने के लिए चौबीस घंटे कम पड़ते हैं। यह शहर कई शिफ्टों में काम करता है। सबकी ज़रूरत का ख्याल रखता है। हाईवे के ढाबे हमारे जैसे रात के मुसाफिरों के लिए रात को ही खुलते हैं। बस दस मिनट लगेंगे। चलो।

-    ओह श्‍योर। मुझे भीतेज भूख लगी है।

मैंने वेटर को बिल लाने का इशारा किया है।

Ø   

ढाबा पूरी तरह आबादहै। अच्‍छा है। भीड़ खूब है। ढाबे में मुझे बिठा कर मेरी पसंद का ऑर्डर दे कर वह गायब हो गया है। मैं पूछती रही लेकिन उसने मुझे चुप रहने का इशारा किया कि पाँच मिनट में आ रहा है। वह ठीक पाँच मिनट बाद मेरे सामने बैठा है। उसके हाथ में स्‍प्राइट की दो बॉटलहैं। उसने इशारा किया – चीयर्स। मैंने पूछा क्‍या है ये तो बताया उसने – यार, वाइन जितनी अच्‍छी पी लो, जितनीअच्‍छी जगह पी लो,हम इंडियंस की तसल्‍ली नहीं होती। मेरी बाइक में हाफ रखा था व्‍हिस्‍कीका। हमेशा रहता ही है। ये मिसाइल बना कर लाया हूं। एन्‍जाय। नाइटढाबा में बॉटल में चीयर्स।

अच्‍छा लगा मुझे वागीश का तरीका। मुझे भी तीन गिलास वाइन पी लेने के बाद भी अपनी प्यास अधूरी लग रही थी। ढाबे पर इस तरीके से पहली बार व्‍हिस्‍की पीते हुए बहुत अच्‍छा लग रहा है। अब जा कर लग रहा है, कुछ भीतर गया है। कई महीने बाद। खाना खाते-खाते रात का डेढ़ बज गया है। बाइकस्‍टार्ट करते समय वागीश मुस्‍कुराया है- अब आज की आखिरी आइटम आइसक्रीम। चलो बैठो, आइसक्रीम खाने चलें।

आइसक्रीम खाते हुए मुझे याद आया है कि पिछले चार पाँच घंटे से मैं ही बकबक करती रही हूं। वागीशसे मैंने कुछ भी तो नहीं पूछा है। हंसते हुए पूछा है मैंने – यार मेरी इतनी बकबकतुमने सुनी। अपने बारे में एक शब्‍द भी नहीं कहा तुमने। अपने बारे में भी तो कुछ बताओ ना। अब हम भी तैयार हैं आपकी कहानी सुनने के लिए।

- मजाक नहीं जूही।वागीश एकदम सीरियस हो गया है - मैंने लगभग पूरी शाम तुम्‍हारी बात सुनी। एक ही बरस में चौथी बार तुम्‍हारेउजड़ने की बात सुनी। आयम रीयली सॉरी फॉर द स्‍टेट ऑफ अफेयर्स यू हैड टू कम अक्रास। रीयली वेरी सैड। लेकिन तुम चिंता मत करो। तुम्‍हारी क्‍वालीफिकेशन और एक्‍सपीरिएंस के साथ तुम्‍हें यहां काम की कोई कमी नहीं रहेगी। कई कंपनियों में एचआर में मेरे दोस्‍त हैं। डोंट वरी। आइ विल सी टू इट कि यू गेट ए बैटर जॉब। तुमने मेरे बारे में जानना चाहा है। ओके तो सुनो। इस समय मैं तुमसे एक ऐसी बात शेयर कर रहा हूं जिसके बारे में तुम सोच भी नहीं सकती।

-ऐसा क्‍या है वागीश?

-ये मेरी कहानी है। सिर्फ पाँच सात लाइनों में बयान की जा सकती है।

-अब कहो भी?

- तुम्‍हारा सोचना सही है कि मैडम बाय सैक्‍सुअल हैं। कुछ हद तक निम्‍फोमैनिक भी।

- ये तुम कैसे जानते हो वागीश।

-दरअसल, इन फैक्‍ट,मैंज्‍यादाडिटेल्‍स में नहीं जाता। मैं मैडम को तुमसे पहले से और तुमसे ज्‍यादा जानता हूं।

- अरे तुमने इतनी देर में पहली बार बताया। कैसे जानते हो उन्‍हें।

- सुनो ध्‍यान से।मैं..मैं.. मैं..दरअसलतुम्‍हारी ललिता मैडम का टॉम बाय रहा हूं। समझ रही हो ना। पूरे चार महीने तक। एक बरस पहले। हम भी फेसबुक से ही मिले थे। इट वाज एन एरेजमेंट बिटवीन अस। ..... ललिता मैडम ने मुझे इस्‍तेमाल किया था और बदले में मुझेखूब ऐश करायी थी। मेरी पंद्रह दिन की अमेरिका ट्रिप स्‍पांसर की थी। बेशक ये ट्रिप ललिता मैडम की किसी कंपनी के खाते में बिजिनेस प्रमोशन के नाम डाली गयी होगी लेकिन इसका पूरा फायदा तो ललिता मैडम ने ही पर्सनल और फिजिकल लेवल पर उठाया। मुझे फाइनैंशियली हैल्‍प मिली लेकिन तुम मेरी हालत समझ सकती हो कि किस तरह से मुझे चारमहीनों तक अपने से तेरह बरस बड़ी उस खूसट बुढिया को झेलना पड़ता होगा। पता नहीं मुझे क्‍या हो गया था कि मैं उसकी टीमटाम और पैसे के दिखावे में आ गया और एक बार फंसा तो फिर फंसता ही चला गया। जब भी छूटने की कोशिश की, हर बार एक और बड़ा लालच मेरे सामने आता गया। निकलना और मुश्‍किल होता चला गया।

- ओह गॉड। आइ जस्‍ट कांट बिलीव वागीश। मैं हकलायी हूं।

-ये तो मेरी किस्‍मत अच्‍छी थी कि ललिता मैडम का मोहभंग पहले हुआ और वह खुद ही धीरे धीरे मुझसे दूर होती चली गयी। हो सकता है कोई नया टॉम बाय मिल गया हो। डिस्‍गस्‍टिंग।अब तो याद करके ही रुह कांप जाती है।

मैंवागीश की तरफ देख रही हूं।वागीश आंखें चुरा रहा है। मैं समझ नहीं पा रही कि वागीशज्‍यादा तकलीफ़सेगुज़रा है या मेरी तकलीफ़ ज्‍यादा बड़ी थी।

- लीव इट। और आइसक्रीम खाओगी। पूछा है उसने और मेरा जवाब सुनने से पहले ही दोबारा आइसक्रीम लेने चला गया है।

 

 

ललिता मैडम डॉट कॉम

Rate the content


Originality
Flow
Language
Cover design

Comments

Post

Some text some message..