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कंजक पूजन
कंजक पूजन
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© Harish Sharma

Drama

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रात को सोने से पहले उसने सारे कार्यक्रम की योजना बना ली थी । छोले भिगो दिए थे । हलवे के लिए नारियल, किशमिश साफ़ कर के रख दिए थे । कंजकों के लिए रंग बिरंगी प्लास्टिक की थालियां खरीद कर रख ली थी । रसोई की पूरी शुद्धता का ध्यान था उसे । उसकी सास ने उसकी इस तन्मयता पर प्रसन्नता प्रकट की ।

पूरी निश्चिंतता से वह सुबह चार बजे का अलार्म लगा कर सोई ।

"हे ईश्वर मैंने क्या गुनाह किये हैं, कितने निष्ठुर हो तुम । एक दिन रुक जाते तो क्या होता । कैसा शरीर दे दिया है तुमने हम स्त्रियों को ।"

सुबह उठते ही वह दुःख और पीड़ा से भर गयी थी । उसे पीरियड आ गए थे । खून का गीलापन उसके मन में अपने से अधिक ईश्वर के प्रति घृणा से भर रहा था ।

उसकी सास ने इस बारे में सुनकर उसे वैसे ही रसोई और पूजा से दूर कर दिया था जैसे उसकी माँ उसे दूर कर दिया करती थी । वह दूषित हो चुकी थी । वह अपराधबोध से भरी घर की छत पर चली गयी और अकेले में बैठ रोने लगी ।

नीचे कंजक पूजन शुरू हो गया था । माता की जय जयकार की आवाजे उसके कानों में पड़ी । कंजक पूजन पूरी शुद्धता से सम्पन्न हुआ ।

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