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जिन्दगी --- एक दिन
जिन्दगी --- एक दिन
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© Upasna Siag

Inspirational

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रात के दस बजे हैं सब अपने-अपने कमरों में जा चुके हैं। आरुषि ही है जो अपने काम को फ़िनिशिंग टच दे रही है कि कल सुबह कोई कमी न रह जाए और फिर स्कूल को देर हो जाए। अपने स्कूल की वही प्रिंसिपल है और टीचर भी, हाँ चपरासी भी तो वही है सोच कर मुस्कुरा दी। मुस्कान और ठंढी हवा पसीने से भरे बदन को सुकून सा दे गई। सोचा थोड़ा पसीना सुखा लूँ तो कमरे में जाऊं नहीं तो एसी की हवा कहीं बीमार न कर दे।

ठंडी हवा के झोंके ने आरुषि को सुकून सा दिया। कितनी उमस थी शाम को। रविवार का दिन सबके लिए आराम का होता होगा, उसके लिए तो दोहरी ड्यूटी का दिन। रविवार को ही तो छुट्टी मिलती है। उस दिन पूरे सप्ताह के पेंडिग वर्क का दिन। अगले दिन से फिर वही स्कूल और घर के बीच चक्कर-घिन्नी सा घूमना है।

अलार्म बजते ही बिस्तर छोड़ दिया और अपने सधे हाथों से काम निपटा लिए। कोई परेशानी नहीं हुई। उसने अपनी माँ का कहावत रूपी मन्त्र, " रात का कमाया हुआ और पीहर से आया हुआ कभी व्यर्थ नहीं जाता " को गाँठ की तरह बांध रखा है। बच्चों को स्कूल भेज दिया। सास का बहुत सहारा है सुबह की रसोई का काम वह देख लेती हैं तो काम आसान हो जाता है। पति भी दूसरे शहर में टीचर हैं। दोनों साथ ही निकलते हैं, उसे स्कूल छोड़ते हुए वह अपने स्कूल चले जाते हैं।

आरुषि कस्बे नुमा गाँव में प्राइमरी स्कूल की टीचर है। बहुत ईमानदार, अपने काम के प्रति समर्पित एक आदर्श शिक्षिका है। स्कूल में लगभग तीन सौ बच्चे हैं और सिर्फ़ दो टीचर।

स्कूल में बच्चे आने लगे हैं। कितने प्यारे और शरारती बच्चे हैं और चिंता रहित भी। सुभद्रा कुमारी चौहान की पक्तियां याद करती वह ऑफ़िस के पास जा पहुंची।

आरुषि को ख़ुद ही ऑफ़िस खोलना पड़ता है।

" मैडम जी ऑफ़िस में सफाई कर दूँ " सफाई कर्मचारी जो कि स्कूल की सफाई कर चुका था उसके इंतज़ार में ही था।

" हाँ कर दो " कह कर वह स्कूल के शौचालयों की तरफ गई।

"ओह ! आज फिर ताले टूटे हैं ! न जाने क्या मिलता है लोगों को, स्कूल बंद हो जाने के बाद यहाँ के शौचालय इस्तेमाल किसलिए करते हैं ! " वह ख़ुद से सवाल कर रही थी। तेज बदबू से मितली सी आ गई उसे।

"उफ्फ़ ! अरे भई, शौचालय इस्तेमाल किया तो किया, फ्लश भी तो चलाया जा सकता है। सफाई कर्मचारी को आवाज़ देते हुए उसे साफ करने को कहा। परेशान हो गई थी वह। कभी गंदगी मिलती तो कभी शौचालय की दीवारों पर अश्लील नाम और चित्रकारी मिलती। वह कभी-कभी अपनी सहयोगी सुहासी से चुहल भी कर उठती कि अगर किसी को काम शास्त्र का ज्ञान नहीं है तो वह यहाँ से ले सकता है। लेकिन जो भी था वह गलत ही तो था। बच्चों पर क्या असर पड़ता? कितनी ही बार वह दीवारों को पुतवा चुकी थी और साफ तो रोज़ ही करवाना पड़ता।

पांचवीं कक्षा तक स्कूल है और दो टीचर हैं, तो दोनों को आपस में कार्य विभाजन करना पड़ता था। एक कक्षा को पढ़ाती तो दूसरी कक्षा में मॉनिटर की ड्यूटी लगाती कि कोई शोर न करे। लेकिन बच्चे तो बच्चे ही हैं, शोर तो करेंगे ही। पढ़ने का शौक तो बहुत कम बच्चों को होता है। कई बच्चे सोचते हैं कि पढ़ना तो पड़ेगा और उधम मचाने वाले ज़्यादा होते हैं। ऐसे बच्चे कक्षा का माहौल खराब किये रहते हैं। आरुषि के मन में तो आता कि एक दो डंडे धर दे। पर यह भी सम्भव नहीं था उसके लिए। एक तो सरकारी आदेश, कि मारना नहीं है और दूसरे वह ख़ुद बहुत कोमल स्वभाव की है तो हाथ उठाना सम्भव नहीं था उसके लिए।

बच्चों को सज़ा न देने के पक्ष में भी नहीं है, क्योंकि थोड़ा तो डर होना ही चाहिए बच्चे को। प्रार्थना के बाद सभी बच्चों को शांति पूर्वक कक्षा में जाने का आदेश देते हुए ऑफ़िस की तरफ चली।

" मैडम जी ! आज सुहासी नहीं आएगी, मेरी माँ की तबियत कुछ ठीक नहीं है ! "

आरुषि ने मुड़ कर देखा तो सुहासी के पति हाथ में प्रार्थना-पत्र लिए खड़े थे।

"ओह ! कोई बात नहीं ! " कहने को तो कहना पड़ा उसे पर अब सारी ज़िम्मेदारी उस पर आन पड़ी। ऑफ़िस में बैठी ही थी कि सामने एक व्यक्ति आकर खड़ा हो गया।

" नमस्ते बहनजी ! मेरा नाम दयानंद है। मेरा बेटा कहता है कि उसका नाम हाज़िरी में नहीं पुकारा जाता जबकि वह रोज़ स्कूल आता है। "

" ऐसा कैसे हो सकता है ? जब बच्चा स्कूल आता है तो हाज़िरी में नाम तो आएगा ही!"

" वह तो ऐसा ही बोल रहा है।"

" अच्छा दाख़िला कब लिया था ?"

" ज़्यादा दिन नहीं हुए, कोई बीस-पच्चीस दिन ही हुए हैं। "

" आप साथ आए थे क्या ?"

" नहीं जी, मेरी माँ आई थी। मैं और मेरी घरवाली तो खेत जाते हैं। "

 " बहुत अच्छी बात है दयानंद जी ! बच्चों से ज़्यादा तो खेत ज़रूरी हैं !

हैं ! क्यों ?

थोड़ा गुस्सा और खीझ थी आरुषि के स्वर में।

" अजी बहनजी दो-चार अक्षर सीख जाएगा तो हिसाब-किताब कर लेगा, फिर तो खेती ही करनी है। "

" बहुत हैरानी होती है आज के ज़माने में भी ऐसी सोच पड़ी है, तभी तो देश आगे नहीं बढ़ता, किसान अनपढ़ रहेगा तभी तो पिछड़ रहा है। अरे भाई ! खेती से ज़रूरी जरुरी पढ़ाई पढाई है ! बच्चों के लिए भी आपका कोई फ़र्ज़ हकी नहीं ?"

दयानंद को समझ ही नहीं आया शायद।

" अच्छा बताओ क्या नाम है बच्चे का ! "

" जी राम कुमार है। "

आरुषि ने नए दाख़िल हुए बच्चों वाला रजिस्टर निकाल कर देखा। राम कुमार के नाम से कोई भी दाख़िला नहीं था। सहसा एक नाम दिखा जिस पर दयानंद लिखा हुआ था। पिता का नाम भैरू राम था।

"आपके पिता जी का क्या नाम है ?"

" जी भैरू राम। "

" ओह्ह ! अब याद आया " हँसी आते-आते रह गई आरुषि को।

" मैडम जी ! सामान दे दो तो हम काम शुरू करें ! "दरवाज़े पर विमला खड़ी थी। दोपहर का भोजन बनाने वाली बाई थी वह।

" हां अभी आती हूँ ! ज़रा रुको। " कह कर दयानंद की तरफ मुख़ातिब हुई।

" देखो दयानंद जी यह होता है अनपढ़ होने का परिणाम, आपकी माँ से मैंने पूछा था, बेटे का नाम, मतलब कि जिस बेटे कदाख़िला करवाना है उसका नाम और उसके पिता का नाम, उन्होंने ख़ुद के बेटे यानि आपका नाम लिखा दिया और आपके पिता का भी !"

ह ह हा हा हा बहनजी ! माँ तो निरी अनपढ़ है, कुछ नहीं पता उसे । " वह हँसने लगा।

" अच्छा आप पढ़े-लिखे हैं ! "

" हाँ जी, पांच पढ़ा हूँ। "

आरुषि को ऐसे लोगों से दो-चार होना ही पड़ता था। घर आकर सोचती तो हँसी आती। अभी तो रसोई की तरफ ध्यान था। दयानंद को नाम बदलने को कह ऑफ़िस से बाहर आ गई।

पहले तो कक्षाओं की तरफ गई। वहांउसमें मॉनिटर की ड्यूटी लगाई हुई है कि एक कागज़ पर सारे बच्चों की हाज़िरी लगाए और गिन कर रखे कि कितने बच्चे आए हैं। गिनती के हिसाब से ही तो आटा-दाल दिया जाएगा। कभी सब्जी भी बनाते हैं। खीर-हलवा भी तो बनाया जाता है। खाना बनाने वालियों को बिना हिसाब रसद दे दी जाय तो महीने का राशन बीस दिन में ही ख़त्म हो जाएगा। ऐसा शुरू-शुरू में हो भी चुका है।

तो,पढ़ाई से ज़्यादा तो भोजन ज़रूरी था ! मलाल होता था अपनी पढ़ाई पर, हासिल की हुई डिग्रियों पर कि जब एक दिन खानसामा पना ही करना था तो घर वालों को ही गर्म खाना खिलाती। " चल पड़ी मेम साहब पर्स उठा कर, यह तो सुनना नहीं पड़ता।"

खाने का निर्देश दे कर, साफ-सफाई का ध्यान रखने को कह वह कक्षा की तरफ मुड़ी। घड़ी की तरफ देखा दो पीरियड निकल गए थे, अभी तीन बाकी थे आधी-छुटहोने में। शुरुआत पांचवीं कक्षा से की। उसके जाते ही बच्चे शांत हो गए।

सोचा कि आज बच्चों से सामान्य ज्ञान ही पूछा जाय। जिस प्रकार सवालों के जवाब मिल रहे थे उससे उसे लगा कि बच्चों में जानने की जिज्ञासा तो बहुत है। हालांकि साधन सीमित हैं। उसने सोचा कि बच्चों को किस चीज़ में रुचि है यह जानने के लिए लेख लिखने को कहती हूँ और इस प्रकार उसका भी काम हो जाएगा। वह अगली कक्षा भी देख सकेगी।

चौथी कक्षा ! बच्चे शांत कैसे रह सकते हैं। यह तो मानव प्रवृत्ति है। बोलने का अधिकार भी तो मिला है ! यहां भी एक बार तो शांति छा गई। गणित के सवाल कुछ ब्लैक बोर्ड पर लिखे और बच्चों से हल करने को कह कुर्सी पर बैठना ही चाहा कि डाकिया डाक लिए खड़ा था। डाक ऑफ़िस में रखी और तीसरी कक्षा की तरफ चली। यहां बच्चों के पास करने को कुछ नहीं था। क्योंकि आधे से ज़्यादा बच्चे कुछ नहीं जानते थे सिर्फ मार-पीट करने के अलावा ! इन बच्चों को पूरी तवज्जो की ज़रुरत थी। जो कि सिर्फ एक शिक्षिका के लिए संभव नहीं था।

तभी अगला घंटा बजा। यह भी किसी बच्चे को ही बोला हुआ था कि वह नियत समय पर बजा दे। वह कक्षा से बाहर आई ही थी कि स्कूल प्रांगण में जीप रुकती हुई दिखी। शिक्षा अधिकारी महोदय थे।

" ओह, यह कैसे आ गए ! बिना किसी पूर्व सूचना के। " आरुषि हैरान सी हो गई।

आगे बढ़ कर स्वागत किया। " सर आप बिना कोई पूर्व सूचना के... ?"

" कभी-कभी ऐसा ही सही रहता है मैडम ! "

ऑफ़िस के में सारे रजिस्टर, फाइलें सभी जांची गई अधिकारी महोदय द्वारा जो कि सही थे।

" बहुत बढ़िया मैडम, रजिस्टर में एंट्री तो सही है। आप पढ़ाती भी हैं या बस यही पन्ने भरतीं हैं।"

चिढ़ सी गई वह। एक तो इतना काम,ऊपर से यह महोदय भी आ गए बिन बताए। आख़िर वह चिढ़ती भी क्यों नहीं ? अपना हर काम समय पर पूरा रखती है। घर बाहर सब जगह संतुलन बना कर रखती है। फिर कोई तंज करे तो ऐसा होना स्वाभाविक ही है।

मन की चिढ़ मन में रख कर संयत दिखते हुए खामोश ही रही। तभी आधी-छुट्टी की घंटी बजी। बच्चे लाइन बना कर बाहर आने लगे और बरामदे में बैठने लगे।

"अच्छा तो भोजन तैयार है !"

" हाँ जी सर। "

" तो आरुषि जी, आप भी यह भोजन खासकतीं हैं ? या नहीं ! "

" हाँ जी, क्यों नहीं ! मेरी देख-रेख में बना है। अभी तक कभी कोई शिकायत नहीं आई।"

" सर आपके लिए भी मंगवाऊं क्या ?"

" चलिए मंगवा दीजिये ! "

विमला बाई दो प्लेटों में दाल-फुल्के रख गई।

" खाना तो बढ़िया है मैडम ! लेकिन एक बात बताइये ज़रा, खाना भी बढ़िया ! कागज़ात भी सही ! सारा ध्यान तो आपका यहीं रहता है तो फिर आप बच्चों को पढ़ाती भी हैं क्या ? "

फिर चिढ़ हो आई आरुषि को।

मन में तो बहुत कुछ आया कि वह सारी भड़ास निकाल दे चिल्ला कर। लेकिन नहींउसने ख़ुद को शांत ही किये रखा।

" जितना समय बचता है उतना तो बच्चों पर देते ही हैं सर। "

" आपका काम पढ़ाना है, खाना बनाने को, परोसने को तो बाई रखी है, फिर क्या दिक्कत है ? "

" दिक्कत तो है ही सर, ठीक है खाना बनाने वाली रखी है, लेकिन उसे बताना पड़ता है, नाप-तोल कर देना पड़ता है और जिस प्रकार का गेहूं सप्लाई होता है वह साफन करवाया जाए या धूप ना दिखाई जाए तो बहुत जल्द खराब होने का डर भी तो होता है। सड़े हुए अनाज से बच्चे बीमार होंगे तो ज़िम्मेवार कौन ? हम लोग ही ना ! भण्डार घर की साफ सफाई भी देखनी पड़ती है। "

"इस स्कूल में हम दो ही शिक्षिका हैं जो कि बहुत मुश्किल से संभाले हुए हैं। आज सुहासी नहीं आई तो मुझे ही सारा देखना पड़ रहा है। हम भी सामाजिक प्राणीहैं अगर आज मेरे घर में भी ज़रूरी काम होता तो स्कूल का क्या होता। मुझे मेरी पावर के अनुसार छुट्टी घोषित करनी पड़ती और आप के आगमन पर यहां ताला लगा होता !"

सरकारी आदेश है कि पढ़ाई से अधिक भोजन सही तरीके से परोसा जाय और सर, टीचर्स को हर जगह जैसे जनसंख्या गणना करना हो, साक्षरता अभियान हो, चुनाव में ड्यूटी लगनी हो, हर जगह हमें ही भेजा जाता है तब भी तो पढ़ाई प्रभावित होती है। विद्यार्थियों को हम एक-एक पल सदुपयोग करने की हिदायत देते हैं और हम ही उन्हें पूरा समय नहीं दे पाते हैं। इतना होने के बाद भी हमारे स्कूल का परीक्षा परिणाम बहुत अच्छा नहीं तो संतुष्टि दायक तो होता ही है ! "

" शिक्षकों के साथ-साथ एक चपरासी और भंडार-घर के लिए एक सहायक की नियुक्ति होनी चाहिए। "

आरुषि ने आज कह ही दिया जो कई दिन से मन में था।

" आपकी बात में दम है मैडम ! मैं सहमत भी हूँ और कोशिश करता हूँ बात आगे पहुंचाने की में। वैसे सभी शिक्षक आप जैसे ही सोचने-करने लग जाएं तो देख का भविष्य बहुत सुधर सकता है। मेरी शुभकामनाएं आपके साथ हैं। " अधिकारी महोदय चल दिए।

अब स्कूल का समय भी ख़त्म होने को था। ऑफ़िस को ताला लगा कर बाहर आ गई। विमला बाई से सामान भंडार घर में रखवा कर ताला लगाया। छुट्टी की घंटी बजते ही बच्चे उछलते-खिलखिलाते दौड़ लगाते हुए कुछ धकियाते हुए बाहर जाने लगे।

आरुषि को ये बच्चे चिंता रहित खिलते हुए, महकते हुए फूलों की तरह लगे। सोच रही थी इन बच्चों को सही दिशा मिलेगी तभी तो देश की दशा सुधरेगी। वह भी ताला लगा कर घर की ओर चल पड़ी।

देश शिक्षा बच्चें भविष्य

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