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हिवड़ो अगन संजोय
हिवड़ो अगन संजोय
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© Anju Sharma

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"ऐ तवा ल्यो, कड़ाही ल्यो, चिमटा ल्यो, दरांत ल्यो ...." बलखाती हुई आवाज़ के साथ  वह लचककर मूलिया दर्जी की दुकान के नुक्कड़ से घूमी  तो चौराहे पर मौजूद नज़रें उसी दिशा में उठ गईं!  हर कदम के नीचे एक दिल बिछा हुआ था। ये पहले कदम पर किराने वाले दुलीराम का दिल जो रामोतार की बोतल में कड़वा तेल डालते हुए भूल गया देखना कि तेल बोतल में जा रहा है या जमीन पर। और दूसरे कदम पर ये दूधवाले हरिया का दिल कि उसकी एक मुस्कान की चोट से बहका और साइकिल भिड़ा दी, धूप में सुस्ता रही डोकरी की खाट से।  अगले कदम के नीचे दिल बिछा था रामसरन धोबी का, जो कपड़े फैलाना छोड़ दिल पर हाथ रखकर बैठ गया। अब बिछे हुए दिलों की गिनती कुछ और आगे बढ़ती अगर रामू चाचा, डोकरी और मनसा धोबन की गालियां एकम-एक न हो गई होतीं।

 

"ऐ तवा ल्यो, कड़ाही ल्यो, चिमटा ल्यो, दरांत ल्यो..." दूर जाती आवाज़ बता रही थी कि काला जादू अब गली के उस पार था। दुनियावी कारोबार फिर चलने लगा। किसे फुर्सत थी कि हिसाब लगाये कि वहां कितने दिल उन सुनहरे काम वाली जूतियों की मालकिन गुलाबो लुहारन के पांव तले आये और आह भी न भर सके।

 

कुदरत का बनाया एक ही शाहकार थी गुलाबो!  किसी दिलफरेब संगतराश की प्रियतमा की दिलकश मूरत-सा तराशा हुआ बदन जो हर कदम पर यूँ लहरा जाता था जैसे शांत स्थिर जल में एक लहर-सी उठी हो। हर अंग इस कदर गढ़ा हुआ कि रत्ती भर कमी, न रत्ती भर बेशी। देह का उठान ऐसा कि एक बार को मुर्दे की भी आह निकल जाए। उस गांव में किसी ने अजन्ता-एलोरा का नाम भी न सुना था पर चांदोली गांव के स्कूल का लाठी टेकता बूढ़ा चौकीदार धनपतसिंह जब भी उसे देखता तो शहर के सिनेमाघर में जवानी में देखी 'नवरंग' फिल्म की नायिका संध्या याद आ जाती! कलेजे से आह निकलती और मन में कहीं बजने लगता, "आधा है चन्द्रमा, रात आधी।" 

 

गहरी कत्थई-सी रंगत पर बड़ी-बड़ी बिल्लौरी आँखें देखने वाले पर जादू-सा असर करतीं। जो इन आँखों में डूबा कहीं का न रहा, बस गया दो जहान से।  कुछ कहते ये सुरमई आँखें जादुई थीं और कुछ इसे उस खास सुरमे की तासीर बताते, जो सुनते थे एक पीर से पढ़वाया गया था चूड़सिद्ध के मेले में। लोगों का क्या जितने मुँह उतनी बात!

 

खैर, कारण जो भी हो पर जानने वाले जानते थे कि सिर्फ आँखे ही नहीं गुलाबो लुहारन हर कोण से पूरा जादू का पिटारा थी। बदन पर कसी हुई ख़ास चोलीकट काट की लम्बी-सी चोली का उठान ही ध्यान नहीं खींचता था, कमर पर कसी डोरियाँ और उनके नीचे तांबई चमकती पीठ तक से नज़र हटाने की कोशिश में नाकाम रहे थे कई जवांमर्द। और तो और पिंडलियों तक के घेरदार घाघरे की हर घूम से सत्तर आँखे चिपटी हुई थी। सोने-चांदी के जड़ाऊ जेवर, रेशम का जामा और सिंगार-पटार से औरत खूबसूरत लगती है, ये बात वो ही कह सकता था जिसने नज़रभर गुलाबो को न देखा हो!

 

अब गाड़िये लुहार कहीं टिककर रहने की आदत और ख्वाहिश, तो राणा जी के समय से ही भूल चुके थे। ये जब अपने धणी चिम्मन लुहार के साथ इस गांव में आई थी तो पेट से थी। बंजारों की सी जिंदगी में कब कहाँ ठौर जमे, कहां ठिकाना हो, क्या पता। कई महीने बीत गए थे, देर सबेर में जचगी होने वाली थी।  गांव में ठाकरों के यहाँ चोरी हुई!  पुलिस ने लुहारों की धरपकड़ की तो कई मर्द उठा लिए!  ठाकरों का कहर टूटा तो  बाकी बचे सब गांव छोड़कर डिगर गए। "कठे जाऊँ?" गुलाबो इसके उसके पैर पकड़ती डोल रही थी। धणी का हाल नहीं और पूरे दिन चल रहे थे। चार दिन बाद छूटा तो उस कच्चे घर में झुककर घुसते ही खून की उलटी की और चित्त हो गया। छाती पीटकर आसमान सिर पर उठाती उसकी चीख गांव भर का कलेजा फाड़ रही थी कि पानी छूट गया। करमजली पेट पकड़कर वहीं लोट गई! कोई दौड़कर चंपा दाई को बुला लाया।

 

एक तरफ चिता जली और एक तरफ सोहर।  दो फ़ाड़ों में चिर गई थी गुलाबो। अपने मालिक का सोग मानती कि गोद में पड़े टाबर का मुंह देखती! पेट की भूख के आगे सब दुःख हार जाते हैं! गुलाबो तो पत्थर हो जाती पर गोद में पड़ा  नवजात सोग क्या जाने! छोरा भूख से बिलबिला रहा था, दो कौर पानी से निगले तो सूखी छाती हरी हो गई! याद आया, खाद पड़े तो खेत, नई तो कूड़ा रेत! सोग पूरा हुआ तो चार दिन में समझ आ गया, पड़ोसी कोई दो दिन, कोई चार दिन! पड़ोसन संतरों मावसी ने समझाया, "बावली, आगे तो आप मरे सुरग दीखेगा! फालतू में कट्योड़ी आंगली पर तो कोई मूते भी कोनी! गई बात ने जावणो, रही बात न सीख,  तू क्यूं पीटे बावली मुवै सांप की लीक! टाबर रो मुंह देख! रामसा पीर का नाम ले, जिनगी काटनी पड़सी! मैं बी काईं कर सकूं!  कर अर  खा!"

 

एक ही काम कर सकती थी उस गांव में, वही किया था! अपने पुरखों की तरह सिर पर धरकर लोहे के तवा, कड़ाही, चिमटा आदि बेचने निकल जाती!  छोरा पिछाड़ी कपडे़ के झूले में टंगा रहता! एक-दो बार छोरा छोड़कर गई! जी नहीं माना तो जल्दी लौट आई!  बिलखते छोरे को छाती से लगा लिया!  मावसी लगी ताना देने, "खिलायां को नाम कोनी होवे, रुवायां को नाम  हो जाय.…! इतना लाड है तो किसी के बैठ जा, खिला जीभर लाल!  लो बताओ! भलाई को जमानो इ कोनी!"  मुश्किल से मनाया मावसी को, गुलाबों ने जी कड़ा कर लिया!

 

बड़े-बूढ़े यूँ ही नहीं कह गए, रांड रंडापा काट ले, जो रंडुए काटन दें! जगण्या दो बरस का हो गया था! किसकी नज़र नहीं थी गुलाबो पर!  गरीब की लुगाई जणे जणे की भौजाई! कभी किसी ने रास्ता रोका तो किसी ने हाथ पकड़ लिया!  सौ जान से जूझी!  फाके काट लिए पर किसी को हाथ ना धरने दिया! रात में भी दरांत सिर के नीचे रखके सोती थी! पर रात कहाँ चैन से कटती थी! रात का अंधेरा सारे नक़ाब हटा देता है! ऐसी ही एक रात वो घर में घुस आया था किवाड़ तोड़कर! दरांत धरा ही रह गया, चौड़ी हथेली के तले दबी  चीख भी दम तोड़ गई और जोबन माटी हो गया! छप्पर जहाँ से टूटा था, चाँद की रिसती चांदनी ने शिनाख्त बताई, बिना वर्दी सब मरद होते हैं कोई चोर हो, चाहे थानेदार!

 

किसे पुकारती उस रात गुलाबो!  आपकी जांघ उघाड़े ते आपई लाजां मरे! थानेदार का गवाह कौन? मरद की जरूरत किसे नहीं होती पर बीस बरस की गुलाबो तो जगण्या की माँ बनकर अपनी जिंदगी काट ही तो रही थी!  कितना जतन किया था कि चिम्मन की याद में जिंदगी की साँझ हो जाये! पर जिंदगी कोई एक दिन का खेल तो है नहीं कि ये दिन निकला, ये पहर बीते और ये आ गई साँझ! थानेदार ने नई सोने-सी देह का स्वाद चख लिया तो रोज तलब लगने लगी! कहा करें हैं, घर की खांड करकरी लागे, गुड़ चोरी को मीठो!

  

जोबन माटी हुआ, हर तीसरे दिन सेज पर मृत देह-सी बिछने लगी जिन्दगी! उसी देह पर रेंगते सांप न जीने देते थे न मरने! जो मर न सकी, उसने जिन्दगी को चुन लिया! समयरथ का पहिया अपनी गति से घूम रहा था! थानेदार का ठप्पा तो लगा पर गुलाबो के दिन चैन से कटने लगे! न फाके रहे और सिरहाने दरांत धरने की अब क्या जरूरत! बेटे का मुंह देखती तो सोचती दस की लुगाई बनने से एक की भली!  धीरे-धीरे चिम्मन की तस्वीर धूमिल होने लगी! दिन, महीने, साल के डिब्बों के साथ जिंदगी की गाड़ी पटरी पर सरकती जा रही थी! गांव के कोने पर एक कमरे का पक्का घर बन गया था! एक गाय भी पाल ली थी!  जगण्या सात बरस का हो गया था! बाप पर गया था,  टेम पर दूध-नाज मिलने लगा तो देह का उठान भी अच्छा हो गया! एक साल से पाठशाला भी जाने लगा था! उसे बस्ता टांगकर जाते देख गुलाबो कसमसाती देह के सारे दुःख-दरद भूल जाती!  देह भी अब कहाँ कसमसाती थी!  उसने जान लिया था उसका मालिक बदल गया है!  पहले देह ने घुटने टेके, फिर मन भी उसी राह चल पड़ा! उसकी छोटी सी दुनिया बस गई थी, वो, जगण्या और थानेदार!  थानेदार मूंछो पर ताव देता कहता, "घरबार थारा पण ताला चाबी म्हारा!"

 

मन बदला तो उसकी चाल भी बदली! वो उसकी मन से बाट जोहती! ठीक वैसे ही जैसे लुगाई अपने धणी की बाट देखती है! खूब सिंगर के बैठती! क्या-क्या बनाकर रखती! फिर जिस रात थानेदार आता, उस रात गुलाबो सुहागन हो जाती!

 

"थानेदार साहब, खीर, खीचड़ी, मंदी आंच..... "

 

वो चुहल करती पर सामने सत-पकवानी हो तो बेसब्र को सबर कहाँ, चाहे मुंह ही  क्यों न जल जाये!  पौ फटने से पहले तक वे दोनों धणी-बीर!  पौ फटते ही ये गुलाबो लुहारन और वो थानेदार निहालसिंह!

 

"बावली,  हिवड़ा बड़ी नाज़ुक जान है! सुपने मत देख, एक दिन पिछताएगी! तू उसकी रखैल है, बीरबानी ना…!" मावसी सब जानती-समझती थी! पर गुलाबो को कहाँ समझ आती!  सपने पूछकर थोड़ी आते हैं!

 

"उँह, गुड दियां मरे जके न झैर कुण दे!  जी भरा अर दूध की माक्खी के मान काढ़ बगायेगा! पीछे पिछताण को काई फायदों?"  मावसी चेताती रह जाती पर एक नन्हा-सा सपना यूँ फूट गया जैसे दीवार से पीपल फूट आता है! नन्हा-से सपने का बिरवा, सपना सुख का, सुखी संसार का!  

 

घर में पड़े-पड़े जी उचाट होता, तो जगण्या के पाठशाला जाने के बाद टोकरी ले, गांव का एक चक्कर  जरूर लगाकर आती थी!  कुछ बिके तो राजी, नहीं तो घर की राह ली!  खरी मजूरी चोखा दाम, नहीं तो राम-राम!  किसी की हिम्मत नहीं होती थी उसे अब छू भी जाए!  दूर से सब आँख सेंकते! अपनी ठसक के इसी सुख को जीने तो निकलती थी गुलाबो!

 

कई दिन हुए थानेदार नहीं आया!  गुलाबो का जी आया, थाने देख आये एक बार पर  जानती थी सख्त मनाही थी!  मावसी पूछती तो गुलाबो मानो खुद से ही कहती, "सौ आफत जाण को! आवेगा जल्दी!  थे काईं फिकर करो!"  दिमाग कहता वो अब पहले से नहीं रहा, चोरी के गुड़ का स्वाद अब उसे सेधने लगा है, पर दिल तो कुछ और ही कहता, दिमाग की मानने से साफ़ इनकार कर देता और कछुए-सा  सरकता समय एक दिन ठिठका जब उस दिन बगीची में शोर मचा तो हरिया चिल्लाता आया, "गुलाबो, ए गुलाबो, देख तो तेरो  छोरो पुलिस ने पकड़ लियो!" बदहवास भागी गई थी गुलाबो बगीची में!

 

पता चला पाठशाला की आधी छुट्टी में बच्चे बगीची में आम तोड़ने आये थे!  वहीं एक कोने में विधायक जी की मजलिस जमी थी!  बैठक के बाद थोड़ी देर सुस्ता रहे थे, उठे तो सिरहाने से बटुआ गायब था! शोर मचा तो और बच्चे तो भाग निकले, बगीची में पेड़ पर चढ़ा जगण्या पकड़ा गया! नन्ही-सी जान, कहता रहा, मैं बेकसूर हूँ! मार-मारकर नील डाल दिए थे नन्ही-सी देह पर नेताजी के कारिंदों ने!

 

"थानेदार साहब, थे तो जाणो हो! म्हारो जगण्यो चोर कोणी…. ये सब ...."   बाहर से थानेदार आया तो गुलाबो ने हुलसकर उसका हाथ खींचना चाहा! उसने हाथ झटका तो गुलाबो पैरों में गिर पड़ी!

 

"बता कहाँ छुपाया है साहब का बटुआ?"

 

"सौगन ले लो हज़ूर, म्हारा छोरा चोर कोणी......"

 

"झूठ की काईं पिछाण, काईं कि बो सौगन खाये ..... "  कोई बोला!

 

किसी ने उसकी चोटी पकड़ उठाया, "चोट्टी रांड का उठाईगिरा पूत....इसका धणी भी चोरी में पकड़ा गया था साहब.... . तलाशी लो इस रांड के घर की!" 

 

जो सामने था वो गुलाबो का थानेदार नहीं था!  हो भी कैसे सकता था!  उसके सख्त  चेहरे पर वो अजनबीपना पसरा था जो गुलाबों के कलेजे पर कटार-सा वार कर गया!  फ़टी आँखों से गुलाबो सियासतदानों का हुकम बजाते हुक्काम को देख रही थी! उसके पांव तले कुचल गया था गुलाबो का नवजात-सा सपना! जिसे मालिक मानती थी वो तो बैरियों का यार बन गया! फिर आगे क्या हुआ, क्यों और कैसे हुआ? तलाशी में क्या निकला, न निकला!  बटुआ कहाँ मिला, कहाँ नहीं, सारे सवाल उस अंधड़ के बाहर चक्कर लगा सिर पीट रहे थे जिसकी कैद में घिर गई थी गुलाबो!  इस सबमें गुलाबो कहाँ थी! होती भी कैसे, वो तो उसी दिन रीत गई थी! और जो जगण्या की माँ थी, वो अपने छोरे की अधमरी देह छाती से लगाये, रात की चादर ओढ़ चुपचाप निकल चली थी, नए नामालूम ठिकाने की तरफ!  मन में अगन का बवंडर था, जिसकी आंच में झुलस रहा था एक सपना! उस नाबालिग सपने की लाश को मुखाग्नि दे, उन बंजारन कदमों ने समय के चलते चक्के पर पैर धरा और भटकने का अभिशाप कब से प्रतीक्षा में था, चुपके से वो भी साथ हो चल दिया अंतहीन यात्रा पर!

 

 

 

#हिवड़ो अगन संजोय

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