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सेर पे सवा सेर
सेर पे सवा सेर
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© Sakhi Singh

Children Inspirational Classics

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बहुत पुरानी बात है, एक ठाकुर व्यापार के सिलसिले में अपने शहर से दूसरे शहर को जा रहा था। उस समय आने-जाने के साधन कम ही होते थे, तो लोग एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने के लिए घोड़ों का प्रयोग करते थे या फिर पैदल ही अपनी यात्रा पूरी करते थे। जहाँ रास्ते में रात हो जाती थी तो बीच रास्ते में जो भी गाँव पड़ता था वहां वो किसी के यहाँ शरण ले लेते थे। ठाकुर भी अपनी घोड़ी से यात्रा पर निकला था, उसकी घोड़ी गर्भवती थी। जब ठाकुर बीच रास्ते में पहुंचा, तब रात होने पर उसने एक गाँव में शरण लेने की सोची। ठाकुर ने कई लोगों से शरण मांगी, सभी ने मना कर दिया। वो निराश होकर फिर से एक घर में शरण मांगने पहुंचा जो कि एक जाट का घर था, जाट ने ठाकुर को अपने घर में शरण दी। जाट ने ठाकुर की घोड़ी बैलों के तबेले में बंधवा दी और ठाकुर को बैठक में सुला दिया। जाट तेज़ दिमाग वाला था उस ने घोड़ी को देख कर जान लिया की उसको बच्चा होने वाला है, जाट बार बार तबेले में जाकर देख कर आता था की कहीं घोड़ी ने बच्चा तो नहीं दिया। जब वो फिर से तबेले में गया तो देखा घोड़ी का बच्चा कूद फांद रहा है। उसने मन में लालच आ चुका था, उसने घोड़ी के बच्चे के ऊपर सरसों की खली (जानवरों द्वारा खाए जाने वाला पदार्थ) लपेट कर उसे अपने बैल के पास बाँध दिया।  बैल बच्चे को चाटने लगा। सुबह ठाकुर जब उठा तो उसने जाट से कहा की मेरी घोड़ी ने बच्चा दिया है, तो जाट ने कहा – “तेरी घोड़ी को नहीं मेरे बैल को बच्चा हुआ है, देख मेरा बैल बच्चे को चाट रहा है। सभी को पता है जब जानवर के बच्चा होता है तो वो अपने बच्चे को प्यार से चाटता है तो देख मेरा बैल कितने प्यार से चाट रहा है अपने बच्चे को। दोनों में लड़ाई होने लगी, बात पंचायत तक पहुंची। पंचों ने गाँव का सोचते हुए जाट का पक्ष लेकर उसके हक़ में फैसला सुना दिया। ठाकुर को सभी ने यह कह कर गाँव से बाहर भगा दिया कि एक तो जाट ने तेरी मदद की और उसको ही झूठा कह रह है।

 

ठाकुर दुखी मन से घोड़ी के साथ गाँव से चला आया, वो रास्ते में निराश होकर चला जा रहा था, तभी अचानक एक बंदर ने उसको आवाज दी - यार-यार जी कहा जा रहे हो?

 

ठाकुर ने कहा – “भैया अपने गाँव जा रहा हूँ।”

बंदर ने पूछा – “यार दुखी क्यों दिखाई दे रहे हो?”

ठाकुर ने कहा – “क्या बताऊँ भैया, मैं व्यापार के सिलसिले में कहीं जा रहा था और रात होने पर मैंने एक गाँव में एक जाट के यहाँ  शरण ली, मेरी घोड़ी ने जाट के यहाँ रात में बच्चा दे दिया। जाट ने बच्चे को खल लपेट कर अपने बैल के पास बांध दिया। सुबह जब मैं उठा तो मैने कहा की मेरी घोड़ी को बच्चा हुआ है। तब जाट ने कहा की बच्चा घोड़ी को नहीं मेरे बैल को हुआ है, देखो मेरा बैल उसे चाट रहा है। उसने मेरे संग बेईमानी की है, उसकी बेईमानी में उसका साथ गाँव वालों ने भी दिया और मुझे ही झूठा बता कर गाँव से भगा दिया। अब मैं अकेला क्या करता, तो मैं अब अपने घर वापिस जा रहा हूँ।"

 

बंदर ने कहा – “यार जी हमसे दोस्ती कर लो, मुझे अपने साथ ले चलो मैं तुम्हारा फैसला करवा दूंगा और तुम्हारी घोड़ी के बच्चे को दिलवा दूंगा।”

 

पहले तो ठाकुर को विश्वास नहीं हुआ की बंदर कुछ कर भी पायेगा। पर फिर उसने मन में सोचा कि मेरे साथ धोखा तो हो ही चुका है, चलो एक बार इस पर भरोसा करके देख ही लेता हूँ।

 

ठाकुर ने बंदर से कहा – “ठीक है भैया।”

बंदर ने कहा – “यार मेरी एक शर्त है, तुम्हें अपना साफ मेरे सर पर बाँधना पड़ेगा, और जहाँ-जहाँ रास्ते में गांव पड़ेगा वहां मैं घोड़ी पर और तुम पैदल चलोगे और जहाँ जंगल होगा, वहां मैं पैदल और तुम घोड़ी पर चलोगे। अगर मेरी ये शर्त मंजूर है, तो मैं तुम्हारा फैसला करवाने तुम्हारे साथ चलूँगा।”

 

ठाकुर ने कहा – “ठीक है जैसा तुम कहोगे मैं वैसा ही करूँगा।”

 

दोनों रास्ते में चले जा रहे थे, जब कोई गांव आता तो लोग ठाकुर और बंदर को देख कर हँसने लगते की ये आदमी कितना बेवकूफ है, जो खुद पैदल चल रहा है और बंदर को घोड़ी पर बैठाया हुआ है। अपना साफा भी बंदर को बांधा हुआ है।

 

चलते चलते दोनों जाट के घर पहुँच गए।

 

ठाकुर ने जाट से कहा – “मैं अपना पंच लेकर आया हूँ और अब मेरा पंच फैसला करेगा।

 

जाट बंदर को देख कर हँसने लगा की ये बंदर क्या फैसला करेगा। उसके साथ बाकी लोग भी हँसने लगे। बंदर एक तरफ जाकर बैठ गया।

 

ठाकुर ने कहा – “तुम अपने गाँव वालों को इकट्ठा तो करो, अपने पंचों को भी बुलवाओ। मैं अपने पंच को फैसला करवाने के लिए लाया हूँ।”

 

जाट ने हँसते हुए पूरा गाँव इकट्ठा किया, सबने देखा बंदर एक जगह बैठा नींद के झोंके ले रहा था। सभी चिल्लाने लगे की ये कैसा पंच है, ये तो नींद के झोंके ले रहा है। बंदर फिर भी नींद के झोंके लिए जा रहा था।

 

सभी चिल्लाने लगे ये कैसा पंच है।

 

ठाकुर ने फिर बंदर को आवाज दी – “भैया सब लोग आ गए है आ जाओ और फैसला करो। कैसे नींद के झोंके ले रहे हो, जल्दी से आकर फैसला करो”

 

बंदर ने कहा – “क्या बताऊँ भैया समुन्दर में आग लग गयी थी, तो मैं कई दिन तक आग बुझाते बुझाते थक गया, और सो नहीं सका। इसलिए मुझे जोर से नींद आ रही है।”

 

सभी गाँव वाले बोले – “समुन्दर में तो पानी होता है उसमें आग कैसे लग सकती है भला?”

 

बंदर घुड़की लगाकर बोला – “अगर समुन्दर में आग नहीं लग सकती तो बैल कब से ब्याने लगे? ये बच्चा मेरे दोस्त की घोड़ी का है जिसे तुम सब जाट के बैल का बच्चा बता रहे हो।”

 

सब के मुंह बंद हो गए, और जाट से सभी ने बच्चा ठाकुर को दिलवा दिया।

 

बंदर और ठाकुर की दोस्ती हो गयी वो वहां से ख़ुशी ख़ुशी चले गए।

 

 

ठाकुर घोड़ी बंदर बेइमानी

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