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एक बार इशारा किया होता
एक बार इशारा किया होता
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© Tulsi Tiwari

Drama

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रात भर नींद नहीं आती थी उसे, मन कुशंकओ से भरा रहता था, दो तारीख से गायब था सम्पत, वेतन लेने के बाद जैसे इधर का रास्ता ही भूल गया हो, आज हो गई सात तारीख, बच्चों के कारण बनाना पड़ता है कुछ रूखा-सूखा वर्ना उससे तो मुँह में कौर नहीं पड़ता, स्कूल के सभी साथी, खोज में लगे थे अपनी-अपनी जान-पहचान के दायरे में।

पुलिस तक जाने की हिम्मत नहीं हुई थी उसकी अब तक, वैसे अब स्थिति बरदास्त से बाहर हो रही थी। उसे पता है सम्पत का मन सदा नये की ओर भागने वाला है, इसी कमी का लाभ तो मिला था न उसे । यूं तो मोहल्ले का लड़का था, बचपन से एक दूसरे को देखते आये थे, दोस्ती जैसी भी बात नहीं थी, कहाँ वह गर्वोन्मत्त, सुन्दरी और कहाँ साँवले रंग, सामान्य कद काठी का सम्पत, कुछ दिनों के आगे-पीछे दोनों की नौकरियाँ लगीं थीं, उस समय इतना कठिन नहीं था नौकरी पाना, तृष्णा स्कूल में पढ़ाने लगी और सम्पत सिंचाई विभाग में क्लर्क हो गया।

दरवाजे से ही निकली थी उसकी बारात, चोट सी लगी थी दिल पर, फिर उसने स्वयं को धिक्कार कर अपना मन साफ किया था, ’’शादी क्यों नहीं करेगा वह ? कमा रहा है, उसकी आवश्यकताएँ पूरी करने के लिए कोई विशेष तो चाहिए ही न..ऽ ...ऽ.. ? उसके जैसी सबकी परिस्थितियाँ हों, जरूरी तो नहीं । पाँच बहनें दो भाई, शराब के आदी पापा, आशा नाम होना चाहिए था उसका, परन्तु उसे तो सब तृष्णा कहते हैं, नाम बहुत चुन चुनकर के रखा है पापा ने।’’

सुना है पहले-पहले अच्छे थे काम धन्धे में। कहीं न कहीं से कुछ कमा ही लेते थे, रहने को घर था ही, बड़े परिवार में सबका गुजर हो ही जाता है। ये तो लगातार लड़कियों का आना, दस तरह की बातें ‘‘क्या करोगे, कमा-धमाकर कौन खाने वाला है ? रह गईं बेटियाँ ! तो किसी का खेत न तो परती रहता है, न ही किसी की कन्या कुँआरी रहती है, जहाँ भाग्य होगा जायेंगी ही, बच गये दो प्राणी, उन्हें भी जिसने मुँह बनाया वही आहार दे देगा।’’ बस इधर-उधर पान, सिगरेट, शराब और हर साल एक बच्चा, एक लड़का हुआ तो घर से ज्यादा मोहल्ले वाले खुश हुए, चलो नारायण के घर का चिराग आ गया। शायद लड़के के कारण ही कुछ करने लगे।’’

सबसे बड़ी थी वह, बड़ों के पुराने कपड़े काटकर छोटों का तन ढांकती, काॅपी-किताबंे। मांग-जांचकर पढ़ाई करती, घर का सारा काम संभालती, माँ तो साल भर आंह-ऊंह करती रहती, और बेटे की माँ होने के बाद तो और उसे सेवा की जरूरत पड़ने लगी।

असली मुसीबत तो तब आई जब दादा-दादी ने तंग आकर अपने दोनों लड़कों को अलग कर दिया, पापा के हिस्से में पान का ठेला आया, और सभी के पास तो रोजगार था, नौकरी करते थे चाचा, परन्तु आप, भला ठेले में बैठते ? साल भर के अन्दर ही बेच बांचकर फुरसत हो गये। मैट्रिक पास करते ही उसकी नौकरी लग गई थी,

’’बस अब चिन्ताएं खत्म, सरकारी नौकरी एक ही पर्याप्त होती है एक परिवार के लिए, बेटी को पढ़ाया लिखाया तो आज नौकरी मिल गई, नया दौर है भई, बेटी-बेटा एक समान।’’ अब उनसे कौन पूछे कि यदि बेटी-बेटा एक समान है तो यह फौज क्यों खड़ी की ?’’

उम्र बढ़ती गई थी रिश्ते वापस होते गये थे, अब तो कोई इस संबंध में बात भी नहीं करता, सम्पत के दो बच्चे हो गये, दीपा और दीपू, माँ से गिफ्ट भिजवाया था उसने।

एक दिन पापा को नाली से निकाल कर घर न पहुँचाया होता तो शायद इतनी निकटता न बढ़ती सम्पत से। सुना जा रहा था कि सिंचाई विभाग को दोनों हाथों से लूट रहा है सम्पत, उसकी कमाई का अंदाजा उसके ताम-झाम, लावलश्कर से ही लग जाता था, जब देखो बीवी बच्चों के लिए गहने-कपड़े, खिलौने आदि खरीदता रहता, घर की मरम्मत भी करवाई थी उसने।

‘‘सपूत है सम्पत !’’ पापा कहते अपने दुध-मुँहांें से भी ऐसी ही उम्मीदें थीं उन्हें।

उसने ठंड की रात में नाली से निकालकर उन्हें मरने से बचा लिया था। नहलाने में मदद की थी, उसे लगा था सम्पत एक अच्छा हमसफर हो सकता है कितनी अच्छी किस्मत है उसकी पत्नी की जिसे ऐसा पति मिला ?’’

पापा का इधर-उधर गिरना सामान्य सी बात थी। सम्पत आता तो बैठ जाता एकाध घंटे, मित्रता अंतरंगता में बदली थी उनकी - ‘‘आप शादी के बारे में क्यों नहीं सोचतीं हैं ?" - पूछा था उसने।

‘‘देख ही तो रहे हैं, इतनी जिम्मेदारियाँ हैं, कैसे इनसे आँखें फेर लंू , उसका स्वर अन्तर की पीड़ा में डूब गया था।

‘‘अपना भी तो यही हाल है।’’ वह भी दुःखी हो उठा।

‘‘आप क्यों रो रहे हैं ? सब कुछ तो दिया है भगवान् ने ! इतनी अच्छी बीवी, बच्चे, घर, नौकरी और क्या चाहिये जीने के लिए ?’’ उसने प्रश्न पूछती निगाहों से देखा था सम्पत को।

‘‘दूर के ढोल सुहावने होते हैं मैडम, वह जो है न मेरी बीवी, कूड़मगज है, पढ़ाई-लिखाई में भी वही तेरह- बाइस, ले दे के पांचवी पास, चमड़ी गोरी होने से क्या ? घर का काम भी तो नहीं कर पाती, नौकरानी चाहिये, माँ न भिड़े तो समझ लीजिए, भोजन भी नसीब नहीं, बस ढोना है जिन्दगी।’’ वह उदास हो गया था।

उस साल उसने सम्पत के घर वालों के लिए अपने हाथ से स्वेटर बनाकर भेंट किया था।

ड्यूटी के बाद का समय, दोनों साथ-साथ बिताने लगे थे, दोनों घरों में कलह मचा था, तृष्णा के घर में तो जैसे भूचाल आ गया था।

‘‘एक ही कमाने वाली है, सभी भाई-बहन नादान हैं अभी। ऐसे-वैसे चक्कर में मत फंस ! वह तो लफुट है, घर में बीवी बच्चे हैं, उन्हें छोड़कर कुआर के कुकुर जैसे गर दिये पड़ा रहता है। बदनामी हो गई तो इनकी शादी कैसे होगी ? शादी न हुई तो तेरा भार कैसे हल्का होगा ? हम मना कर देंगे उसे।’’ पापा का दायित्व बोध जागा था।

‘‘क्या... दे दे रही हूँ उसे ? और उसे किस चीज की कमी है ? पड़े रहते हो नाली में, उठा-उठा कर लाता है, बताओ और है कोई ऐसा ? अपना काम छोड़कर हमारे लिए एक पैर पर खड़ा रहता है, आने-जाने से आपकी कौन सी मान प्रतिष्ठा पर बट्टा लगा जा रहा है ? और कौन सी मान मर्यादा .़ की बात कर रहे हैं आप ? एक शराबी निठल्ले आदमी के मुँह से ये बातें शोभा नहीं देतीं।’’ संभवतः जीवन में पहली बार उसने पापा के सामने इतनी कठोर बात कही थी। बदले में उसे तीन दिन बिना दाना पानी के कमरे में बन्द रहना पड़ा था, चैथे दिन जब वह स्कूल गई तो वापस नहीं लौटी, घर किराये से लिया और अत्यावश्यक सामान जुटाये, सम्पत ने पूरी मदद की। एक जिम्मेदार मर्द की तरह उसने तृष्णा की गृहस्थी बसाई बहुत ही कम समय में।

‘‘इतना मान, इतना प्यार देकर कहाँ छिप गये तुम ? मेरे बिना एक पल जीना दूभर था तुम्हारे लिए और अब एकदम से मुँह फेर लिया। मुझे मेरी गलती तो बताते ? जिसके लिए माँ-बाप बीवीे तक छोड़े उसी तृष्णा को क्यो ंइतना दुःख दे रहे हो ? कहीं से भी आ जाओ या फोन करो ! क्या पता तुम्हें कुछ हो न गया हो। कहीं एक्सीडेन्ट न हो गया हो ?’’ वह मन ही मन सारी बातें गुन रही थी, आँखें लगातार बरस रहीं थीं।

’’माँ ! मैं स्कूल जाऊँ या रुक जाऊँ ?’’ दीपा नहा धोकर तैयार थी, कक्षा नौंवी में पढ़ रही थी। न जाने कितना धैर्य दे दिया था भगवान् ने इस बच्ची को, जब से साथ में रहने लगी उसे घर के कामों की कोई चिन्ता नहीं रह गई, साफ-सफाई, कपड़ा-लत्ता, भोजन-पानी सब संभाल रही है, यह बात अलग है कि उसने उसकी कोख से जन्म नहीं लिया था, किन्तु ममता उस पर सगी औलाद की तरह ही रखती थी। वह ईश्वर का बार-बार गुणगान किया करती थी। ‘‘बड़ा मेहरबान है दाता, कुछ न देते हुए भी सब कुछ दे दिया जो एक औरत को चाहिए।’’

‘‘बेटी, तू जा स्कूल ! घर में रहने का क्या लाभ, दीपू को तैयार करा दे ! वह भी जाये।’’ उसने अपने आँसू पोंछते हुए कहा।

‘‘माँ ! मैंने नाश्ता बना दिया है कुछ खा जरूर लेना।’’ दीपा की बात उसके कानों में पड़ी थी, किन्तु अर्थ समझ में नहीं आया था।

‘‘आज थाने जाकर रिपोर्ट करना आवश्यक है, जहाँ-जहाँ पता लगा सकती थी, लगा लिया, अब तो न शरीर में ताकत बची न मन में धैर्य रहा।’’

‘‘कभी गई नहीं थाना-कचहरी, कैसे अकेली जाये ? इस मामले में मैके- ससुराल वाले भी कोई काम आने वाले नहीं थे, वे कब चाहते थे कि तृष्णा का घर आबाद रहे। बहन भाईयों का खर्च तो आज भी उसने उठा रखा था। सम्पत की ऊपरी आमदनी तो ज्यादातर पीने -खाने में खत्म हो जाती, वेतन से बचा-बचाकर उन्होंने अपने रहने के लिए एक 6 कमरे का सुन्दर सा घर बना लिया था। गृह प्रवेश भी नहीं हो पाया कि सम्पत न जाने कहाँ गायब हो गया ? वैसे तो कुछ दिनों से वह उखड़ा-उखड़ा रह रहा था, घर देर से पहुँचता, बेतहाशा नशे में धुत्त, पकड़ कर सुलाना पड़ता उसे। फिर भी उसके न आने से तो उसका आना बहुत अच्छा था न ?’’

वह भारी मन से उठकर बगीचे की ओर गई, प्रातःकालीन सुषमा से प्रकृति प्रसन्न थी, उसकी पसंद के गुलाबी गुलाब अपने वृन्तों पर इठला रहे थे।

‘‘बस तुम्हारा जीवन भी मेरे जैसा ही है, पल भर का सौन्दर्य, फिर झड़कर मिट्टी में मिल जाना !’’ उसने एक गुलाब तोड़ना चाहा किन्तु ऊंगुली में काँटा चुभ गया और खून बहने लगा। उसने अंगुठे से उसे दबाकर खून का बहना रोका।

‘‘बाप रे ! बड़ी कीमत है गुलाब की ?’’ उसने मन ही मन कहा। और भी कई रंग के फूल थे, जिनमे लगता था जैसे कोई रोग लग गया हो, जब से वह लापता हुआ, उसे अपनी ही परवाह नहीं तो बगीचे की देखभाल कैसे होती ?

‘‘बैठकर क्या होगा, चलती हूँ स्कूल, चार तरह का चेहरा, चार तरह की बातें, मन बहल जायेगा ! हो सकता है उनमें से किसी के पास कोई समाचार हो।’’ इस विचार ने उसकी जड़ता का नाश कर दिया। वह झटपट तैयार हो गई। उसकी बेटी ने श्वेत, अमेरिकन सिल्क की साड़ी, ब्लाउज निकाल कर रख दिया था। वह दिन के हिसाब से वस्त्रों के रंगों का चयन करती थी, दीपा ने बहुत जल्दी इसे समझ लिया था। रविवार, सोमवार सफेद, मंगलवार, लाल, बुधवार हरे, गुरूवार पीले इनका संबंध संबंधित ग्रहों से था। खगोल शास्त्रियों के अनुसार उक्त ग्रहों के रंग प्रयोग में लाने से उनकी अनुकूलता प्राप्त होती है। इन सब बातों से उसे कुछ लेना देना नहीं, बस ज्यादा सोचना नहीं पड़ता कि आज क्या पहने ?

जब स्कूल पहुँची तो उसे देखकर स्टाफ रूम में सन्नाटा छा गया।

मीरा मैडम ने आगे बढ़ कर उसका हाथ पकड़ लिया।

‘‘आईये, मैडम बैठिए’’। प्रधान पाठक ने उसे बैठने का संकेत किया।

उसने प्रश्न पूछती आँखों से सभी को देखा।

किसी ने कोई उत्तर नहीं दिया।

‘‘आप क्यों चली आईं स्कूल ? कितनी विकनेस हैं आप को ?’’ जाइये मीरा मैडम इन्हें घर पहुँचा दीजिए!’’

‘‘ऐसा क्या हो गया मुझे ? भली चंगी तो हूँ।’’ वह अचंभे में पड़ी हुई थी, प्रधान पाठक वैसे तो अच्छे इन्सान हैं परन्तु छुट्टियों के प्रति बेहद कृपण हैं।

‘‘चलिए न बताते हैं।’’ सोनी सर ने कुछ कहने का मौका दिये बिना उसे बाइक पर बैठाया और घर छोड दिया। पैदल-पैदल स्टाफ के और लोग भी आ रहे थे। अनिष्ट की आशंका उसके हृदय को कंपाने लगी, लगता था बस अब रूलाई फूटी तब ! घर पहुँच कर देखा तो दीपा और दीपू अपने कपड़े लत्ते समेट रहे थे।

‘‘ अरे ! तुम कब आई स्कूल से ? दीपू तू कैसे चला आया ?’’ वह विस्फारित नेत्रों से सब कुछ देख रही थी। वे चुप थे, मेन गेट के बाहर विनोद खड़ा था, वह एकदम फटे हाल दिखाई दे रहा था। जब से सम्पत उसके साथ रहने लगा था, दोनों घरों के लोग इधर कभी नहीं आये। आज क्या हुआ ? सम्पत गायब है, विनोद आया है, बच्चे कहीं जाने की तैयारी कर रहे हैं।

‘‘भइया ! ...ऽ...ऽ.. तुम्हारे भाई का कहीं पता नहीं !’’

वह विनोद को देखकर अपनी भावनाओं को काबू में न रख सकी।

विनोद के चेहरे पर मुर्दनी छाई रही।

‘‘मैडम यहाँ बैठिये, देखिये खुद को संभालियेगा, सम्पत जी अब इस दुनियाँ में नहीं रहे।’’ सोनी सर को यह कठिन कार्य करना पड़ा।

सुनते ही वह पछाड़ खाकर गिर पड़ी।

‘‘नहीं...ऽ...ऽ..नहीं सर ..ऽ...ऽ..! ऐसा क्यों कहते हैं ? वे मुझे छोड़ कर कैसे जा सकते हैं ? मेरे लिए तो सब कुछ छोड़ कर आये थे ?’’

‘‘मैडम, सच का विश्वास कीजिए!’’

‘‘क्या हुआ उन्हें ? हंै कहाँ ?’’ वह गर्म रेत पर पड़ी मछली की तरह छटपटाई।

‘‘उन्होंने आत्महत्या कर ली, यह देखिये अखबार !’’

‘‘देखूँ !’’ उसने सोनी के हाथ से अखबार झटक लिया।

‘‘रायपुर- यहाँ पुरानी बस्ती अमीनपारा में एक प्रेमी युगल ने आत्महत्या कर ली, प्रेमी सम्पत चैरसिया दो बच्चों का पिता था, प्रेमिका निशा ठाकुर पंचायत विभाग में क्लर्क थी, विश्वस्त सूत्रों से ज्ञात हुआ है कि विगत कुछ वर्षों से सम्पत, तृष्णा ठाकुर के साथ टाटीबंध में रहने लगा था। वह शराब का आदी था। प्रेमिका, निशा ठाकुर के द्वारा शादी का दबाव डालने के कारण वह परेशान था। जब उन्हंें साथ-साथ रहने का रास्ता नहीं मिला तो साथ-साथ मौत को गले लगा लिया। उसके पास से 15 हजार रूपये, घड़ी, चेन आदि बरामद हुए हैं, सना हुआ आटा और पकी हुई सब्जी रखी थी। उसने सुसाइड नोट में अपनी पत्नी से क्षमा माँगी है। पुलिस ने उनके शव पोस्टमार्टम के लिये भेज दिया है। प्राप्त वस्तुऐं उनकी पत्नी सरोज को दे दी गई है।’’

‘‘हाय ! तुमने ये क्या किया ? अरे ! मरना ही था तो मुझे इशारा किया होता, मेरे साथ मरना था तुम्हें !’’

‘‘मैडम मैं कहीं की नहीं रही, अब मेरा क्या होगा ?’’ वह मीरा मैडम से लिपट कर रो रही थी।

दीपा-दीपू खड़े थे अपना बैग लिए।

‘‘माँ हम जा रहे हैं’,’ दीपा थी।

‘‘अरे... बेटा तू भी चल दी मुझे छोड़कर ?’’ उसने दीपा की ओर कातर दृष्टि से देखा।

‘‘आओ दीपा जल्दी ! बहुत सारे काम हैं, अभी’’ ? विनोद ने धीरे से संकेत किया।

‘‘यह तो वही बाइक है सम्पत वाली।’’ सोनी सर बुदबुदाये।

‘‘अच्छा हुआ मैडम घर अपने नाम करा लीं, नहीं तो आज सिर छिपाने के लिए छत भी न बचती।’’ प्रधान पाठक कह रहे थे।

‘‘तुम्हें अब कौन पालेगा बच्चों ? उन्होंने हीरे जैसे बच्चों का भी मुँह नहीं देखा! तुम मत जाओ कहीं, मेरे पास रहो! मैं पालूँगी तुम्हंे!’’

’‘‘आप अब इनकी चिन्ता छोड़ दें, भइया का पी.एफ., पेंशन, नौकरी सब कुछ तो मिलेगा इनकी माँ को, आराम से पल जायेंगे।’’ विनोद ने तिरस्कार पूर्वक कहा।

‘‘मुझे भी ले चलो भइया!’’

‘‘जहाँ उनके जीते जी न जा सकी वहाँ उनके न रहने पर किस हक से जाओगी ?’’उसका स्वर इस्पात सा कठोर था।

’’यहाँ मैं कैसे कर पाऊँगी सब कुछ ?’’

‘‘आप को कुछ करने की आवश्यकता नहीं है, सब कुछ हो जायेगा, उनकी ब्याहता पत्नी है जिससे अभी उनका तलाक नहीं हुआ।’’ उसने बाइक स्टार्ट कर दी।

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