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पश्मीना और एकांत
पश्मीना और एकांत
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© Jiya Prasad

Romance

20 Minutes   14.3K    21


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कमरे के एक कोने में टेबल रखा था। टेबल से सटी दीवार में बड़ी खिड़की थी। उसी से तेज हवा घर में आ रही थी। इसलिए टेबल पर खुली हुई डायरी के पन्ने हवा का मज़ा ले रहे थे। आनंद के लिए यह कमरा कोई मामूली कमरा नहीं था। उसने इस कमरे को पीला रंग दिया था। लेकिन ताज्जुब था कि उसे यह रंग पसंद नहीं था। फिर भी उसने इस रंग को अपने कमरे में जगह दी। खिड़की भी कौन सी उसे पसंद है। शोर के साथ-साथ धूल और बारिश का पानी घर में झोंकें के साथ आ जाता है। कितनी मेहनत लगती है। कभी-कभी उसे पूरा दिन साफ़ सफ़ाई में लगाना पड़ता है। लेकिन जो चिढ़ शुरुआत में इस खिड़की से थी, वह अब हल्की पड़ गई हैं।

काफ़ी समय हुआ कि अब वह घर से बाहर नहीं निकलता।न ही इस कमरे में कोई आता है। आनंद को लगता है कि वह कोई मरी हुई या हादसे की शिकार आत्मा है जिसे दूसरा जन्म नहीं मिला। उसे मुक्ति चाहिए भी नहीं थी। अरे, मरना भी तो नहीं चाहता ! लेकिन अब इतना है कि वह बाहर, घर के लोगों को और स्वयं को दिखाई नहीं देता। उसे यह भी नहीं मालूम कि वह बिना किसी से बात किए, देखे, सुने, अनुभव किए कैसे ज़िंदा है ! एक साल में वह बेहद अजीब बन गया है। पिछली जनवरी की दिल्ली वाली कड़ाके की सर्दी में उसने स्वेटर ही पहनना बंद कर दिया था। वह अजीब है। कुछ दिनों से अजीब बात यह हुई है कि वह जब भी सांस लेता है तब ‘पश्मीना’ नाम उसकी साँसों के साथ दिल में उतर जाता है

हाँ, जनवरी में उसके बड़े भाई का जन्मदिन आता है इसलिए ही उसे यह महीना याद है। वह कई तरीके से महीने याद रखता है। यह उसकी कला है। स्कूल के समय, जनवरी उसे नोच खाने वाला महीना भी लगता था। उसका बस चलता तो वह इन सर्दियों के दिनों को गर्म तेल में तलकर ही बाहर परोसता। इतनी भी सर्दी होती है भला ! उसे तुरंत याद आया कि अरे इसी महीने तो 26 जनवरी भी आती है। उसे बहुत बाद में पता चला कि ‘गणतन्त्र’ किस चिड़िया का नाम होता है। या कानून को लागू करना कैसे होता है या फिर 1950 की तारीख़ उसे आख़िर क्यों कर याद होनी चाहिए। ... उसे परेड और किचन में पकौड़े तलती हुई माँ की लाल छन-छन (दोनों हाथों में) चूड़ियों की खनखनाहट सुनाई दी। उसे महक भी आई। तेल के गर्म होने की या पकौड़े की या फिर दोनों की। वह महक को अलग-अलग नहीं कर पाया। वह आँखें बंद कर सोचता चला

परेड को वह कैसे भूल सकता है पक्का एमपी वाला है। एमपी की झांकी के लिए वह अपनी कमर से गर्दन तक टेढ़ी कर लेता था और जब झांकी आती तो वह गुस्सा जाता कि मन माफ़िक क्यों नहीं बनाते। बेकार बनाई है। लेकिन अच्छी क्या होती है वह बतला भी नहीं पाता। वह इन बातों को सोचकर चकरा जाता और बिना पकौड़े खाए बाहर खेलने चला जाता। हाँ, उसकी ज़िंदगी में जनवरी महीने में ऐसे ही किस्से रहते हैं। वह साल को अलहदा ढंग से याद करता है। वह अजीब है। पूरा अजीब ! अजीब बनने में पश्मीना ने उसका साथ दिया है। वह अदृश्य होकर भी उसके साथ निरंतर रहती है

दीवार घड़ी में रात के बारह बज रहे हैं और वह बिना बत्ती बंद किए फ़रवरी के महीने के बारे में सोच रहा है। वह दिमाग पर जोर डाल रहा है कि उसे फ़रवरी के ख़ास होने के बारे में ख़याल क्यों नहीं आ रहें ? घड़ी में बारह बजकर दस मिनट हुए तो उसके दिमाग ने कहा- “दिल से सोचो!” उसने सोचने का स्थान बदला और वास्तव में उसे वह टीचर याद आई जिसे उसने कॉलेज में इतिहास पढ़ाते हुए सुना था, देखा था और महसूस किया था। शायद उसने दिलचस्पी भी ली थी जो एक तरफा थी। राजपूतों के हार के कारणों को जिस प्रकार से वह पढ़ा रही थी वे सभी कारण उसे याद हैं। वह याद कर रहा है कि पृथ्वीराज चौहान को किसने हराया था। गौरी या गजनवी ने? न जाने वह बार-बार क्यों भूल जाता है! उसे बादाम अच्छे नहीं लगते। जब उस टीचर ने पलटकर आनंद से पूछा कि पहले विश्व युद्ध के कारणों में से कोई चार बताओ तो वह मन में संयुक्ता ही बोल पाया। जिसे उसने ही सुना। लेकिन वह उसे घूरती रही और बोली- “बच्चों, तुम क्लास में हो भी या नहीं?” इस तरफ आनंद यही बोलता रहा- “संयुक्ता सयुंक्त। .

में सुबह के चार बजे हैं और एक-डेढ़ घंटे की नींद लेकर वह उठ गया है। वह अधिक सो नहीं पाता और सोचते-सोचते रात बिता डालता है। वह आज की नौजवान पीढ़ी का लड़का है। वह फिर से खिड़की के पास पहुंचा। कुर्सी, टेबल और फिर खिड़की। उसे खिड़की और अपने दरमियान टेबल बाधा जैसा लगा सो उसने टेबल को परे खिसका दिया। अब क्रम बदल गया। कुर्सी, कुर्सी पर वह और खिड़की पर टंगी उसकी दोनों बाहर देखते हुए भी वह बाहर के दृश्यों से जुड़ नहीं पा रहा।

वह अब मार्च के बारे में सोच रहा है। वह नहीं जानता कि मार्च तीसरा महीना है। बल्कि उसका साफ़ मानना है कि यह महीना आता ही क्यों है? उसकी ऐसी सोच बारहवीं की बोर्ड की परीक्षा में बनी थी। उसे उसी वक़्त से सिर दर्द की बीमारी भी शुरू हो गई थी। क्या कहते हैं, अर्ध-कपारी या फिर मीग्रेन या फिर माइग्रेन...जाने दो मुझे क्या जो भी कहते हैं! लेकिन कितना सिर दर्द होता था। सबसे अधिक सिर दर्द एकाउंटेंसी के पेपर में हुआ था। लेकिन गया अच्छा था। पचहत्तर नंबर आ गए थे। अच्छे से पढ़कर जाता तो और आते। शेयर्स वाले सवाल सब गलत हो गए थे। कुछ नंबर तो दिये ही होंगे।

फ़ाइनेंस वाले हिस्से में नंबर ज़्यादा आ गए होंगे। मन कहता है, उस हिस्से के सारे सवाल सही गए थे। मन कहता था कि डॉक्टर बनना है। डीएनए स्पेशलिस्ट...कहां बन पाया ! ये स्साला मन क्या-क्या नहीं कहता... कॉमर्स बकवास है। मैंने तो कॉलेज में छोड़ ही दिया... न तो ठीक से हिसाब किताब कर पाया और न ही कुछ और बैठे हुए सिगरेट ही फूंक रहा हूँ। मुझे मार्च का महीना पसंद नहीं। उसने उभरती हुई सुबह में खिड़की से चिल्लाकर कहा- “मुझे मार्च का महीना दुनिया में सबसे बकवास टाइम लगता है। आक-थू...” उसने लगे हाथों थूक भी दिया...खिड़की से बाहर। इसी महीने तो वह पश्मीना से दूर होने के तरीके भी खोजता रहता था। उसे मार्च महीने से नफ़रत हैसिगरेट पी लेने के बाद उसे चाय की तलब जगी। उसने दरवाज़े पर लगी छोटी सी खिड़की पर ध्यान दिया। यही वह दूसरी खिड़की थी जिससे वह बाहर की दुनिया से जुड़ता था। उसी खिड़की से उसे खाना, पानी, अख़बार, किताबें या फिर जो उसकी मांग होती वह सामान दिया जाता है। उसे यह ठीक भी लगता था। उसे भी कहां किसी से बात करने की इच्छा होती थी। उसे यही लगता था कि उसके कमरे के बाहर बहुत बड़ी खाई खुदी हुई है। जैसे ही दरवाज़ा खोलकर वह बाहर आएगा उसमें गिर जाएगा, रफ़्तार के साथ। उसे याद नहीं कि ऐसा क्या हादसा हुआ जो उसे एक कमरे में कैद किया गया। जब उसे बाहर निकालने की कोशिश की गई तो वह ख़ुद ही नहीं गया। वह परजीवी सा महसूस करता है। पर वह क्या करे। मन अजीब हो चवह इसी ख़याल में था। उसने दरवाज़े की खिड़की की तरफ देखा और पाया कि चाय का कप और ब्रेड के दो पीस एक प्लेट में पड़े हुए थे। उसने झट से कदम बढ़ा कर उन्हें हासिल किया और खिड़की के पास चल दिया। वह भूखा था। पहले ब्रेड खाई फिर धीरे-धीरे चाय पीने लगा। उसके दिमाग में न जाने क्या होने लगा। वह आराम से कुर्सी पर बैठा रहा। फिर आँखें बंद कीं। उसे प्रमोद याद आया। उसका दोस्त। स्कूल वाला। कितना होशियार था। सुंदर भी। उसकी धाक जल्दी जम जाती थी। उसने कॉलेज में कॉमर्स ही लिया था। वह हिसाब किताब में अच्छा था। लेकिन वह मर गया। डीटीसी की बस के नीचे आकर मरा। अप्रैल का ही महीना था।

उसके दिमाग में प्रमोद को सोचते ही एक तस्वीर उभरी। जैसे दो पाटों का बंद दरवाज़ा। हाँ, बंद दरकिसी का जाना यही तो होता है। चैप्टर बंद हो जाना...नहीं समाप्त हो जाना, शायद! प्रमोद के मर जाने पर (जिसकी उम्र 15 साल थी) आनंद ने उस के साथ बिताया जाने वाला समय खोया। उसकी बातें खो दीं। एक शख़्स खो दिया जो उसे समझता था। आनंद उसके साथ कुछ भी साझा कर सकता था। ऐसा नहीं है कि लड़कों को अपने स्पेस की ज़रूरत नहीं होती। सच है वे ठहाके लगाते हैं, पर निजी स्पेस की तमन्ना उन्हें भी होती है। उसने अपनी बहन को कई बार देखा था, अकेले में रोते हुए, फ़ोन पर चिपके हुए। ऐसा वह भी तो करता ही था। ओह! प्रमोद की मौत के बाद एकांत में ही उसे राहत मिली। काफी अरसे तक भयानक ख़्वाब आते रहे थे। जब तक उसकी याद पुरानी नहीं हुई, वह याद आता ही रहा। उसके बाद उसकी जगह कोई नहीं ले पाया। पश्मीना भी नहीं। ऐसा सोचते हुए उसकी आँखों में पानी उतर आया। हाँ, अप्रैल का महीना उसने नितांत अपने अहसास को महसूस करते हुए रोने के लिए सुरक्षित कर रखा है। हाँ, इस महीने में वह थोड़ा गमगीन हो जाताउसका ध्यान टूटा तो उसे मालूम चला कि वह कब से चाय का खाली कप हाथ में लिए हुए बैठा है। वह कुर्सी से उठा और कमरे में टहलने लगा। इस काम में उसके दिमाग में हरकत नहीं होती। पर जैसे ही वह कहीं स्थिर होता है उसे बहुत कुछ याद आने लगता है। वह बहुत कुछ सोचने लगता है। वह सच में बीमार है शायद! कमरे में चलते हुए उसे लगा कि कमरा बहुत गंदा हो रहा है। उसने झाड़ू के लिए इधर उधर नज़र दौड़ाई। उसकी चारपाई के नीचे उसे झाड़ू दिखाई दी। वह उसकी तरफ बढ़ा और उठाकर दीवारों के कोने में बन गए जाले साफ़ करने लगा। वह लगभग दो घंटे उस कमरे में यहां-वहां कुछ न कुछ करता रहा। उसकी गर्दन में दर्द हुआ तो वह कुर्सी पर बैठ गया। जैसे ही स्थिर हुआ वह सोचने लगा। साथ ही साथ गर्दन के दर्द को भी महसूस करने लगा। घड़ी पर नज़र दौड़ाई तो ग्यारह बजकर तीस मिनट हो रहे थे। उसने सिर कुर्सी के पीछे वाले हिस्से में टिकाया और आँखें बंद उसे मई का महीना याद आया जब वह गर्मियों की छुट्टी में अपने गाँव जाया करता था। बचपन तो मज़ेदार कटता था पर जैसे ही वह सोलह बरस का हुआ, गाँव भी काटने लगा। “अरे, इसे बस एक अच्छी सी नौकरी मिल जाए वही काफ़ी है। दिन भर न जाने क्या सोचता रहता है। जब देखो कमरे में घुसा रहता है।” पिता के इन शब्दों पर उसकी माँ ने पिता को हैरानी से देखा और फिर चुप कराने की कोशिश में बोलीं- “अभी तो स्कूल में ही है। इसकी उम्र ही क्या है जो नौकरी-नौकरी लगाए बैठे रहते हो। जा आनंद...जा ज़रा बाहर घूम आ! आनंद सिर नीचे किए हुए ही निकला था उस कमरे से।

सभी रिशतेदारों के सामने से। सब उसे किस अजीब नज़रों से देख रहे थआनंद ने कभी सोचा ही नहीं था कि आख़िर बड़े होकर उसे करना क्या है। उसे झंझट होती है इस सवाल से। उसने ख़ुद से पूछा- “जीने के लिए क्या कुछ बनना ज़रूरी है? ऐसे बिना सोचे क्यों नहीं जी सकते? जब हालात होंगे वैसा कुछ ज़िंदगी में आ जाएगा। ...सारा खेल इन स्कूल वालों ने बिगाड़ रखा है। बच्चा कलम थामता नहीं कि पूछ लो क्या बनना चाहते हो? लो मैं कुछ नहीं बनना चाहता। मैं आनंद ही रहना चाहता हूँ। किसी को इससे क्या परेशानी है?” यही सोचता-सोचता वह पके हुए गेंहू के खेतों की ओर निकल गया था। उसने पाया कि वह बीच पगडंडी पर खड़ा है और अगल बगल बस खेत ही खेत हैं। दूर कुछ पेड़ भी हैं। लोग खेतों के काम निपटाकर घरों की तरफ लौट रहे हैं। वह और आगे बढ़ गया। वह चलता जा रहा था तभी किसी ने पीछे से आवाज़ लगाई- “ए बाबू ...सुनो ज़रा ये गठरी तो सिर पर रखवा दो।” दो बार एक ही वाक्य दोहराया गया। वह पीछे लौटा। उसने सोचा कोई महिला होगी। वह पास गया। जब पास पहुंचा तो पाया कि वह बीस या इक्कीस साल की लड़की है जो नितांत थकी हुई है। वह मुस्कुराई। पर वह कुछ नहीं बोला और गठरी उठवाकर उसके सिर पर रखवा दी। वह बात करने के लिए कुछ बोली। आनंद ने जवाब नहीं दिया और जल्दी जल्दी घर की तरफ बढ़ गया। आज उस बात को बीते हुए कितने बरस हो गए। पर वह उस मुस्कुराती हुई लड़की का चेहरा नहीं भूला। सांवला सा। सफ़ेद दांत। हाँ, वह कुछ भूल ही नहीं पाता। उसकी यही सबसे बुरी और अच्छी बात है। मई का मतलब वह लड़की, जो मुस्कुराई थी उस शाम! पश्मीना भी तो कितनी सुंदर लगती है हँसती हुई, उसने अपनी आँखों में पश्मीना का चेहरा उतरपर वह इस तरह से क्यों नहीं रह पाता? मुस्कुराते हुए। इसी बीच दरवाज़े पर बनी खिड़की खुली और एक खाने की थाली कमरे में दाख़िल की गई। वह उठा और सुबह के चाय के बर्तन वापस कर खाने की थाली को लेकर चारपाई पर रख दिया।

यह सब उसके लिए सामान्य घटना थी। हर दिन का रूटीनवह कमरे से सटे गुसलख़ाने में गया। कुछ देर बाद नहाकर निकला। उसने सोचा आज मनपसंद रंग पहना जाए। आलमारी को खोला और कुछ देर हर रंग की कमीज को देखा। उसने जामुनी टी-शर्ट निकाली और पहन ली। खाने के लिए वह चारपाई की तरफ बढ़ा। जैसे ही उसने पहला कौर मुंह में रखा बिजली चली गई। उसे मन हुआ कि खाना फेंक दे। गर्मियों में बिजली क्यों काटते हैं! जून और जुलाई के बारे में सोचते हुए उसे दिमाग में दो जलते हुए गोले दिखते हैं जिनमें से भयावह आग निकलती है। उसे इन महीनों में पृथ्वी और लोगों की बहुत फ़िक्र होती है। इतनी गर्मी भी कहीं पड़नी चाहिए! खाना एक कोने में खिसका कर वह लेट गयअख़बार जो कि चारपाई पर ही पड़े थे, में से एक उठाया और ख़ुद को हवा करने लगा। उसे अपनी एक बार गर्मी की छुट्टियाँ याद आईं जो उसके जीवन में सबसे अधिक शानदार थीं। उसने लकड़ी का एक कूलर बनाया था और उसके अंदर की दीवारों पर स्टील लगाई थी। अंदर एक पुराने पंखें की बेकार पड़ी पंखुड़ी का इस्तेमाल किया था। उसने उसे आसमानी रंग से पेंट किया था और बीच-बीच में सफ़ेद रंग के धब्बे रंग किए थे जो बादलों का अहसास देते थे। बहुत ही सुंदर था। घर में उसकी इस रचनात्मकता को देखकर सब हैरान हो गए थे। पापा भी हैरान थे। उसकी बहन ने उसे इस मौके पर एक कमीज भी तोहफ़े में इस ख़ुशी के बाद उसने कई रचनात्मक काम किए। जैसे कुछ घड़े खरीदकर उन्हें रंग किया। उनमें सुंदर चित्र बनाए। घर में उन्हें कोने-कोने में रखकर सजाया। जब मेहमान आते तब उनमें से कइयों ने उन घड़ों को मांगा भी पर माँ ने साफ़ मना कर दिया। ऐसे ही आनंद ने कुछ सीनरी भी बनाई जिन्हें बहन ने फ्रेम करवाकर अपने ऑफ़िस में लगाया और कुछ को तोहफ़ों में भी बांटा। ‘क्रिएटिव आनंद’ उसने कॉपी पर अपना नाम लिखा। वह ख़ुश रहता था, जब वह कुछ रचता था। वह आँखें बंद कर अपनी इस रचनात्मकता को सोचकर मुस्कुरा रहा था तभी बिजली आने पर पंखा रफ़्तार से चलने लगा। वह फ़टाफ़ट उठा और जल्दी-जल्दी खाना खाने लगा। वह जब खा चुका तब कमरे में टहलने लगा। उसने सिगरेट का पैक खोजा। मिला। उसमें एक भी सिगरेट नहीं थी। वह चिढ़ गया। पैक कमरे में फेंक दिया। कुछ पल बाद उसे अपने इस गुस्से पर अफ़सोस हुआ।

सिगरेट के पैक को उठा कर कूड़े के डिब्बे में डाला। उसने समय व्यतीत करने के लिए किताब पढ़ने का सोचा। लेकिन उसे लगा कि उसे ऐसी दशा में पश्मीना खिड़की के पास कुर्सी पर बैठी देख रही है। उसने संयमित होने उसे किताब पढ़ने का बहुत शौक तो नहीं था। पर जबसे वह सिर्फ इस कमरे में रहने लगा था तब से ही किताबें पढ़ने के शौक को पनपाने की कोशिश में लगा है। अच्छा है। लोगों से बात करो तब कितनी ऊर्जा ज़ाया होती है। इसलिए वह दुनिया का महान साहित्य पढ़ना ही बेहतर समझता है। कुछ देर वह महान किताबें छांटता रहा और कन्फूज़ हो गया। उसने महान शब्द के बारे में सोचा। उसने अपने मन में ही एक बहस शुरू की। उसे याद आया कि उसने स्कूल और कॉलेज की किताबों में इस शब्द का खूब इस्तेमाल देखा था। बहुत से लोगों से जुड़कर यह शब्द उसके सामने आया था। ऐसे शब्द महात्मा गांधी और बुद्ध आदि व्यक्तितव के संदर्भ में आए थे। उसने कहा- “आख़िर वह क्यों कर किसी के कहने पर किसी दूसरे को महान मान ले। उसे ख़ुद ही पढ़कर समझकर किसी को महान कहना या नहीं कहना चाहिए।” उसने मन में यह तय किया कि वह जब तक किसी के संदर्भ में ख़ुद पूरी तरह निगाह नहीं डाल लेगा कभी महान नहींउसे महात्मा से गांधीजी याद आए। गांधी जी से

अगस्त का महीना याद आया। वह कभी भी गांधी जी के ख़िलाफ़ कुछ नहीं कह पाता क्योंकि उसकी माँ को उसकी केवल इसी एक बात पर बुरा लग सकता है। उसकी माँ गांधी जी की बेहद इज़्ज़त करतीं हैं। वह अभी तक भारत के स्वतन्त्रता संग्राम के बारे में ठीक से नहीं जानता। अगस्त के महीने में जब दिल्ली की हर एक जगह चाक-चौबन्द हो जाया करती थीं (जब वह घर से बाहर जाता था) तब उसे ठीक-ठीक पता चल जाता था कि आज़ादी का दिन आने वाला है। अगस्त से वह बहुत कुछ याद कर सकता है। वह उड़ती-कटती पतंगें याद कर सकता है। वह पांच वर्षीय योजनाओं को याद कर सकता है, भारत के पहले प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, राष्ट्रपति आदि सबको याद कर सकता है। उसे स्कूल की किताबों और अख़बारों से यह जानकारी मिल जाती है कि उसका देश इसी महीने में सन् 1947 में आज़ाद हएक बार उसके इंग्लिश के अध्यापक नौवीं क्लास में सबसे पूछ रहे थे- “देश कब आज़ाद हुआ था?” कइयों को मालुम नहीं था। उसका चौथा नंबर था। वह इतना गुस्से से भर गया था कि उसके मन ने कहा- “देश कभी आज़ाद ही नहीं हुआ। फिर ये आदमी पूछ क्यों रहा है? क्या वह अपना सामान्य ज्ञान अच्छा करना चाहता है? मुझसे पूछेंगे तो कहूंगा अभी देश आज़ाद होना बाकी है। ...नहीं हुआ आज़ाद। 47 तो एक पड़ाव था।” पर उस रोज़ उसकी बारी नहीं आई। उसे यह अच्छा लगा कि उसकी बारी नहींउसे आज़ादी शब्द से सितंबर का महीना याद हो आया। कॉलेज में प्रमोद के बाद शाहजहाँ उसका दोस्त बना था। उसी के साथ उसने सिगरेट पीने की शुरुआत की थी। शाहजहाँ तो मान ही नहीं रहा था। लेकिन आनंद की ज़िद्द पर वह अच्छे सुट्टे लेना सीख गया। बाद में उसे यह भी पता लगा कि सिगरेट पीना कभी भी आज़ादी का प्रतीक नहीं है। बल्कि अपनी ही सेहत को खराब करना है। हालांकि वह इस लत से अभी तक निजात नहीं ले पाया है। कभी-कभी वह इतना लंबा कश लेता था कि उसका दम निकल जाता था। हुतूतू फ़िल्म में भी एक गाना है- “इतना लंबा कश लो यारों दम निकल जाए ..!”

आनंद उसके साथ दिल्ली की कई जगहों पर बिना पिता और माँ के घूमा। उसे पहली बार किसी के कंधे या हाथ पकड़ने की इच्छा नहीं हुई। वह बस में यहां-वहां जाता। जगहों और लोगों को करीब से देखता। लड़कियों से भी कॉलेज में थोड़ी बहुत बात करने की शुरुआत उसने इसी महीने से की थी। पश्मीना भी इसी महीने में उसकी दोस्त बनी थी। अजीब सी लगती थी। ऐसा लगता था कि वह कोई रूह है। सांवला सा रंग था। बाल लाल थे। कद कोई ख़ास लंबा नहीं था। वह उससे काफ़ी बातें साझा कर लेती थी। उसके पास रहने से आनंद में अजीब सी अंदरूनी हलचल रहती थी। सितंबर के महीने में वह ज़्यादा ख़ूबसूरत लगती थी। इसलिए आनंद के लिए यह महीना प्रेम का महीना था। पश्मीना का महीना था। वह कहती थी- “मैं जहां भी रहूँ, मैं तुम्हें ऐसी वाइब्स भेजा करूंगी कि तुम्हें पता चल जाएगा कि मैं तुम्हें याद कर रही हूँ। मुझे ज़्यादा कुछ नहीं करना होगा बस मन में एक दर्द के साथ आनंद कहना होगा। तब देखना तुम्हारे दिल में भी पश्मीना...पश्मीना नाम की गूंज हुआ करेगी।” वह झटके से सोच से बाहर आया जब शाम की अज़ान नेअक्टूबर के महीने में उसे दीपावाली ही याद आती है। हांलाकि अब उसमे इस त्योहार को लेकर कोई ख़ास उत्साह नहीं बचा। उसे किसी भी त्योहार के प्रति कोई ख़ास लगाव नहीं है। थोड़ा बहुत क्रिसमस और नए साल में अब भी दिलचस्पी लेता है क्योंकि इन्हीं अवसरों पर पश्मीना उसे याद कर लेती है। अक्टूबर को वह अपनी घर बैठे करने वाली नौकरी के लिए भी याद करता है। वह लोगों और कंपनियों के लिए वेब डिज़ाइन का काम घर बैठे कर देता है। इससे उसे ठीक-ठाक कमाई हो जाती है। कई बार कुछ दूसरी सामाजिक संस्थाओं के प्रपोज़ल और रिपोर्टों को भी अच्छी कीमत पर तैयार कर देता है। उसने सबसे पहला काम और पहली कमाई अक्टूबर के महीने में ही की थी इसलिए वह जल्दी भूल नहीं पाता। उसे दो अक्टूबर को गांधी जी याद आ जाते हैं। गांधी जी के बारे में सोचकर वह कुछ पल मानो कहीं ठहर जाता है। उसका दिल धीमे धड़कता है।

वह दिमाग में एक शांति का अनुभव करता है। जब वह शांति शब्द सोचता है तब उसे महात्मा बुद्ध भी दिखाई देते हैं। उसे मन करता है कि वह ध्यान लगाए और अपने आप को अंदरूनी शांति दे। लेकिन जब पश्मीना नाम उसके अंदर साँसों से गुज़रता है, तब उसे सबसे ज़्यादा शांति महसूस होतआजकल वह देश के हालातों पर भी कड़ी नज़र बनाए रखता है। हालांकि वह अख़बार में बहुत दिलचस्पी नहीं लेता पर सोशल साइट्स से उसे काफ़ी सटीक जानकारी मिल जाती है। उसने हर साइट्स पर अपने बिना फ़ोटो वाले एकाउंट खोल रखे हैं। वह सब पर नज़र भी रख लेता है। वह समय की तरह है। सब जगह होते हुए भी वह कहीं नहीं है। क्योंकि वह किसी से चैट नहीं करता। इसकी एक वजह पश्मीना भी है। वह फ़ेसबुक इस्तेमाल करती है। इसलिए वह उसे यहीं इसी जगह जी भर के देख लेता है। कई बार पश्मीना ने उससे अपनी भी प्रोफ़ाइल फोटो लगाने की गुज़ारिश की है। पर वह नहीं लगाता। वह सुंदर है या नहीं, उसने कभी ध्यान नहीं दिया। उसे क्या करना है आईने में ख़ुद को देखकर! वह तो जब पश्मीना को देखता है तब उसके चेहरे में ख़ुद को पा लेता है। क्या पश्मीना के साथ भी ऐसानवंबर ख़ुद के लिए वह ऐसा महीना मानता है जब वह ध्यान, मौन, अवलोकन, जीवन-मरण, परिपक्वता जैसे शब्दों को समझने और रत्ती भर भी अपने व्यक्तित्व में उतार लेने की कोशिश करता हुआ पाया गया था। एक बार फिर वह बुद्ध को याद करता है। यही वह परिवर्तनकारी महीना था जब वह अपने अंदर कुछ अलग सा महसूस करता था। हांलाकि यह सब उसके लिए बहुत आसान नहीं था। आज भी नहीं है। वह इंकार भी नहीं करता अपनी कमज़ोरियों से। लोग लक्ष्य बनाकर जीते हैं। आनंद बिना लक्ष्य ही जीता है। उसे किसी से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि लोग दुनिया में तमाम तरह का ताम-झाम हासिल करना चाहते हैं।

पर वह बिना किसी ताम-झाम के जीना चाहता है। वह हमेशा इस कमरे में बंद होकर नहीं जिएगा। उसे दुनिया के रंग देखने हैं। शायद एक दिन किसी यात्री की तरह घूमने में उसकी मौत हो जाए पर वह उसी मौत को गले भी लगा लेगा। उसके घर के लोग उसके बारे में सोचते हैं कि उनका लड़का पागल हो गया है। पर यह सच नहीं है। यह उसके ख़ुद के जीने का तरीका है। वह पागल नहीं है। वह बस ऐसा ही है। वह सभी की नकल नहीं कर सकता। इसलिए वह दिमागी तौर पर मजबूत बनना चाहता है। ताकि जब वह बाहर की दुनिया में प्रवेश करे तो अपने को तिनके की तरह गिरते हुए न पाए बल्कि एक पेड़ की तरह खड़ा हुआ पाए और अपने आप को हर तरह के अनुभवों से सींचे। नवंबर का महीना ही है जब वह अपने से बेहतर मुलाकात कर पाता है। उसे पश्मीना के लिए अपने व्यक्तित्व को और निखारने की तमन्ना भी तदिसंबर उसे एक रहस्यमयी महीना लगता है। या फिर वह कभी समझ नहीं पाता कि यह महीना आख़िर उससे क्या कहता है। कभी कभी वह दुविधा में फंस जाता है। क्या करे वह? वह पश्मीना को पा ले, या फिर अपने देश भ्रमण की योजना को शुरू करे, या फिर समाज के लिए कुछ करना शुरू करे या फिर ध्यान लगाकर संत बन जाये।

वह पागल हो जाएगा यदि दिसंबर को न समझ पाया। वह ठीक से सोच नहीं पाता। उसके दिमाग के सारे पुर्ज़े ढीले पड़ जाते हैं। वह अपनी चारपाई पर आकर लेट जाता है। वह रोता है कभी हँसता है। वह इसी दशा में न जाने कब सो गया। सुबह की चार बजे की अज़ान पर उसकी आँख खुली। वह उठ कर बैठ गया। उसने अपने दिल में कुछ हरकत होते हुए महसूस की। उसे लगा उसका दिल पश्मीना...पश्मीना बोल रहा है। वह जल्दी जल्दी तैयार हुआ। दाढ़ी बनाई। गुलाबी टी-शर्ट पहनी। हाथ घड़ी को टेबल पर ही छोड़ दिया। कई अरसे से बंद कमरे के दरवाज़े को खोलकर निकला। वह कुछ सोच नहीं रहा था क्योंकि उसका दिल बस पश्मीना…पश्मीना कह रहा था। कुछ देर बाद वह अपने होठों से भी यही नाम दोहराता हुआ पश्मीना के घर की तरफ बढ़ गया।

ठण्ड पश्मीना घड़ी टेबल याद

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