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वो दिन
वो दिन
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© Himanshu Sharma

Drama

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नयी बहू का गृह प्रवेश हुआ, मीता बहुत खुश थी कि उसकी ज़िंदगी का एक नया पहलू, नया अध्याय शुरू होनेवाला था ! मीता जो कि अब नव-विवाहिता थी, की शादी किशोर से हुई थी ! मीता एवम् किशोर का विवाह भारतीय पारंपरिक तरीके से हुआ था, यानि कि अरेंज्ड मैरिज !

खैर, रीति-रिवाज़ों का कार्य पूर्ण होने के बाद, जैसे ही अपने क़मरे की तरफ़ बढ़ रही थी कि सास कमला ने उसे रोका और पूछा, "बहू ! कहीं तुम्हारे वो दिन तो नहीं चल रहे हैं ?"

मीता थोड़ा सकपका गयी पर गर्दन हिला कर इंकार कर दिया ! "बेटा ! जब भी कभी तुम्हारे वो दिन चलें तो तुम्हें कमरे में ही रहना पड़ेगा, हमारे यहाँ की रीत ऐसी ही है !"

मीता जो कि आज के ज़माने की लड़की थी और घर में भी इन तथाकथित "दिनों" को लेकर कोई हो-हल्ला भी नहीं होता था ! मीता को थोड़ा अजीब लगा पर साथ-साथ इस रूढिवादिता को लेकर मन ही मन थोड़ा रंज भी हुआ !

दिन पँख लगाकर उड़ने लगे और जैसे ही महीने में वो तीन-चार दिन आते, मीता को मानो अपने ही कमरे में नज़रबंद कर दिया जाता और वो लिहाज़ के मारे मन ही मन कसमसा के रह जाती ! "किसी भी महिला के लिए ये दिन उसके मातृत्व के लिए पात्रत्व होने की निशानी होती है परंतु भारत जहां मातृत्व की पूजा होती है, वहाँ इन दिनों को लेकर इतनी अस्पृश्यता कि पत्नी को पति से अलग रखा जा रहा है !"

ये सोच-सोचकर मीता मूड ख़राब होता !

हर स्त्री का अरमान होता है कि वो अपने पति और उसके परिवार को पाले, जी हाँ ! स्त्री होती ही पालक है, जब भी घर में नव-विवाहिता बनआती है, घर के हर सदस्य को अपना मानकर पालना शुरू कर देती है, परंतु मीता के साथ उसके स्त्रीत्व का अपमान किया जा रहा था ! सुबह से ही ये सोच-सोचकर मीता खून के घूंट पीए जा रही थी ! कमला रसोई में चाय बनाने जा रही थी, साथ में चौथ का व्रत होने के कारण उपले को भी बगल के बर्नर पर जला रही थी ! रसोई में गर्मी की वजह से कमला बार-बार सर से निकलते हुए पसीने को पोंछे जा रही थी ! परन्तु दुर्योग से पसीना पोंछता हुआ हाथ उबलती चाय के बर्तन से टकराया और उबलती चाय कमला के ऊपर जा गिरी ! उबलती चाय गिरने कारण तड़प उठी कमला के हाथ से वो आग पकड़ा हुआ उपला उसकी साड़ी पर गिर पड़ा ! जैसे ही साड़ी ने आग पकड़ी, कमला भय एवम् आनेवाली मृत्यु का सोचकर चीख पड़ी ! अचानक घर में गूंजी चीख से मीता का ध्यान टूटा, वो पशोपेश में थी कि वो इस नज़रबंदी से निकले या निकले मगर इस पशोपेश से निकलते हुए मीता चीख की दिशा की तरफ दौड़ी और अंदर का नज़ारा देखकर वो हैरान और भयभीत हो गयी ! बिना देरी किए मीता ने अाग पकड़ी साड़ी की आग को बुझाया और फटाफट एम्बुलेंस को किशोर भागकर अस्पताल पहुंचा तो पता चला कि उसकी जन्मदात्री के शरीर का सिर्फ १५ प्रतिशत हिस्सा जला था और डॉक्टर के अनुसार अगर ज़रा भी देर और हो जाती तो क्या पता वो बच हो ना पाती ! किशोर पहले तो कमला से मिला फिर जाकर मीता को गले लगा लिया और फूट-फूटकर रोने लगा !

दिन बीते और कमला घर आ गयी और आते पहले ही अपनी बहू को अपनी जान बचाने के लिए गले से लगा लिया ! उस दिन के बाद से जब भी मीता के वो दिन आये, अब वो नज़रबंद नहीं रहती थी मगर अब वो घर के सारे काम संभालती थी और तो और अब वो नौकरी भी करने लगी थी ! दिनों ही दिनों में ज़िंदगी ने करवट बदल ली, अब मीता अपनी बोझिल ज़िंदगी के दिनों को पलों में जीने में लग गयी थी...!

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