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काश ! मैं उड़ जाती
काश ! मैं उड़ जाती
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© Preeti Kumawat

Drama

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कँही से थोड़ी रौशनी नज़र आई, मेरी आँखे तिमतिमयी, आज मैंने पहली बार आँखे खोली थी।

देखा, आस पास क्या था मेरे। शायद सब कुछ था। सब कुछ का मतलब क्या था मेरे लिए?

हवा, मैंने पहली बार ही तो साँस ली थी। मेरी जिंदगी का पहला दिन था। जो था, आज ही मिला था। मालूम नहीं था कि इस से भी ज्यादा कुछ होता है। फिर देखा खुद को, मेरे पैर भी थे। मैं चल सकती थी। हाँ, मैं सच में चल सकती थी। कदम बढ़ाया, इस उम्मीद में की अब जो मैंने देखा सब पा लूँगी। दौड़ना चाहा, पर ज्यादा दूर ना जा सकी। फिर देखा, "अरे ! मेरे तो पर भी हैं"। फड़फड़ाए। मैं उड़ भी सकती थी। हाँ ये भी सच है, मैं एक चिड़िया जो हूँ। मैं उड़ रही थी।

पर ये क्या ? मुझे किसी चीज़ ने रोका। कोई भारी-सी चीज़ थी। पता नहीं क्या थी। बहुत वजन था। इतना कि मैं उड़ कर ज्यादा दूर नहीं जा सकती थी। वो मेरे पैरों से जुड़ी थी। मुझे लगा शायद मेरा ही कोई हिस्सा है। आज ही तो खुद को पहचान रही थी। अब तो ये रोज़ की बात थी। थोड़ा चलती, थोड़ा उड़ती, आसपास देखती। सुन्दर फूल, पेड़, पौधे, झरना, पहाड़, सूरज, चाँद, तारे। और भी ना जाने क्या-क्या दिखा। मन करा की हर चीज़ छू लूँ। पर मेरा एक हिस्सा मुझे रोक लेता था। आज अचानाक मैंने देखा मुझ-सी कई और आकृतियाँ, एकदम आज़ाद ? उड़ रही थी ? दूर ? आसमान में ? क्या ये सच था ? यकीन नहीं हुआ। होता भी कैसे, मेरी ख्वाहिश पूरी हो रही थी, किसी और भेष में, रंग-रुप थोड़ा अलग था। उम्मीद मिली। मैं भी कर सकती हूँ। पूरा जोर लगा कर उड़ी। नहीं जा पाई। फिर कोशिश की, बारबार लगातार। सफल नहीं हुई। मुझे सोचने पर मजबूर किया। वाे क्या था, जो मुझे हर बार रोक लेता था ? बहुत ढूँढ़ने के बाद पता चला, ये तो लोहे की कोई जंजीर जान पड़ती है। पर ये यहाँ कैसे ? एक चिड़िया के पैरों में जंजीर ? ये कैसा सच है ? सपने देख सकती हूँ आसमान छूने के, पर उड़ सकती हूँ सिर्फ कुछ दूर ? आजाद हूँ ख्वाबों की दुनिया में जाने को पर हकीकत में छू भी नहीं सकती ख्वाबों और मेरे बीच की दीवार को ?

आखिर मुझे मालूम हुआ, मेरा एक मालिक भी है। तभी तो मुझे रोज दाना पानी वक़्त पर मिलता है। मेरी आरजू तो इस दाने पानी से बहुत ऊँची थी। मैंने हिम्मत कर पूछा मेरे मालिक से, "मैं कैद क्यों हूँ ? मुझे उड़ना है। बहुत कुछ पाना है। बहुत दूर जाना है।"

उसने यूँ भोलेपन में जवाब दिया, "तुझे जाना है पराये घर अभी। वहाँ जा कर जो करना है सो करना। जो नया मालिक बोले वैसे रहना।"

खुद के मन की करूँ या नए मालिक की बात मानूँ ? समझ नहीं आया। पर आगे कुछ न पूछ पायी। आखिर मुझे भेज दिया गया। ये नयी जगह इतनी डरावनी क्यों थी ? यहाँ भी बेड़ियाँ थी मेरे पैरों में। पुराने घर से भी ज्यादा सख्त और मजबूत। मैं और भी ज्यादा मजबूर। अरे ! ये क्या था ? मैंने पंख फैलाये और कुछ चुभा। "यहाँ तो कांटे हैं। बहुत नुकीले। मुझे चुभ रहे हैं। कोई तो सुनो मेरी बात। मुझे वापस जाना है। यहाँ बहुत दर्द है। कोई है सुनने वाला ?"

कोई नहीं है। मैं अकेली हूँ बस। अब तो चल भी नहीं सकती, उड़ना तो बहुत दूर की बात है। यूँ ही बैठे रहना भी मेरी फितरत नहीं। मैं उड़ूँगी। हासिल करुँगी अपने सपने। लो मैंने अपने पंख फैलाये। कांटे चुभे। जख्म हुए। थोड़ी शांत हुई। चुपचाप बैठी। पर कब तक ?

मेरे पुराने मालिक से पूछने को दिल किया। "यहाँ से कैसे बहार निकलूँ ? वहाँ कम से कम थोड़ी तो आज़ादी थी। उस वक़्त ही क्यों नहीं उड़ने दिया मुझे ? भरोसा तो करने दिया होता मुझे खुद पर। पर आज थोड़ी कमजोर हूँ। उस वक़्त आजमाने दिया होता मुझे खुद को ?"

मैं कमज़ोर हूँ, मेरे हौसले नहीं। चली जाऊँगी यहाँ से। वही जहाँ मुझे जाना है। रोज देखती हूँ वही चाँद तारे। उड़ती हूँ। गिरती हूँ। पर जख्म नहीं गिनती। फिर देखती हूँ, उड़ती हूँ, छिल जाती हूँ, तड़पती हूँ पर रोती नहीं। अभी भी देख रही हूँ उस आसमाँ को। अँधेरा है, चाँद है। सितारे हैं, एक कुछ ज्यादा ही चमकदार है। बस वहीं जाना है। उस चमकते सितारे तक। लगातार उसे देखे जा रही हूँ। काश मैं पहले उड़ जाती। एकटक उस सितारे को ही देख रही हूँ। मेरे पैर हैं पर चल नहीं रही। मेरे पंख भी हैं पर मैं उड़ नहीं रही। आस पास हवा है पर मैं सांस भी नहीं ले रही। आँखे खुली हैं, टिमटिमा नहीं रही। बेसुध-सा पड़ा है शरीर मेरा। वो सितारा वहीं है। मैं उसके पास जा रही हूँ। बहुत हल्की हो गयी हूँ रुई की तरह। खुद-ब-खुद चले जा रही हूँ। अपने अस्तित्व को पीछे छोड़ मैं जा रही हूँ। अब इस शरीर की जरुरत नहीं मुझे। सब पीछे छोड़ जा रही हूँ। काश मैं उस वक़्त उड़ जाती। ये काश भी छोड़ जा रही हूँ। वो चमकता सितारा बनने। जहाँ से मैं शायद आई थी वहीं वापस लौट जा रही हूँ।

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