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सिर्फ अहसास है
सिर्फ अहसास है
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© Megha Rathi

Drama

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सिर्फ अहसास है.....



सुनो, आज न जाने क्यो तुमसे वो सब कहने का दिल कर रहा है जो बीत चुका। यादों के बहाने ही सही, चलो न ... आज फिर से उन लम्हों के जी लें हम। 

तुम्हें याद है आकाशवाणी का वो रिकॉर्डिंग रूम जहाँ पहली बार तुम्हें देखा था मैंने और देखते ही तुम मुझे बहुत अच्छे लगे थे। आंखों पर लगा काले फ्रेम का चश्मा, तुम्हारी ठोड़ी पर साइड में वो तिल । कमरे में मेरे आते ही तुमने जिस तरह मुझे देखा था ,वह दोस्ताना नजर नहीं थी ये पहचान गई थी मैं।

कमरे में तुम्हारे अलावा दो लोग और थे । परिचय की औपचारिकता के बाद मैं सभी से बात कर रही थी मगर मेरी नजर तुम पर थी। मुझे अच्छा नही लग रहा था कि तुम मुझसे बात करने में ज्यादा रुचि नही ले रहे थे। थोड़ी देर बाद हम सब रिकॉर्डिंग रूम में आ गए और परिचर्चा की रिकॉर्डिंग शुरू हो गई।

मैं देख रही थी कि तुम मेरी बातों को काटने पर पूरा ध्यान दे रहे थे और आंकड़ों के साथ अपनी बात कह रहे थे लेकिन कम मैं भी नही थी और जोर - शोर से अपनी बात रख रही थी। बीच मे एक पल तो ऐसा आया जब लगा परिचर्चा केवल हम दोनों के मध्य हो रही है तब संचालक महोदय को ही हमे टोकना पड़ा।

बीच - बीच मे जब रिकॉर्डिंग रुकती थी तब मैंने ध्यान दिया कि रिकॉर्डिंग रूम के साथ वाले कमरे में कांच के पीछे एक लड़की को देख कर तुम बार- बार मुस्कुरा रहे थे। न जाने क्यो मुझे बुरा लगा , हल्की सी जलन सी हुई।

चेहरे के भाव छिपाने में महारत थी मुझे । आज से पहले तुम कभी नही जान पाए होंगे कि मुझे उस दिन क्या महसूस हुआ था। ये मुझे बाद में पता चला कि वह तुम्हारी केवल एक मित्र थी जो तुम्हारा उत्साह बढ़ाने वहां आई थी।

रिकॉर्डिंग होने के कई दिन बाद एक दिन तुम मुझे सड़क पर अपने स्कूटर से जाते दिखे, मैंने तुम्हें देख कर स्माइल की लेकिन शायद तुमने ध्यान नहीं दिया था और आगे बढ़ गए थे। 

गुस्सा तो बहुत आया था तुम पर और खुद पर भी कि क्या जरूरत थी खुश होकर मुस्कुराने की। लेकिन अल्हड़ मन खुद से एक वादा कर बैठा ," एक दिन तुम्हारी सबसे अच्छी दोस्त बनूंगी और मुझे देखकर तुम्हें मुस्कुराना ही होगा।"

कॉलिज एक होने के वावजूद भी मैं तुमसे नही मिल सकती थी क्योकि तुम विज्ञान वर्ग के छात्र थे और मैं कला वर्ग की फिर उस वक्त का माहौल भी तो आज जैसा नही था कि कॉलिज में लड़के लड़कियां संबके सामने एक दूसरे से बातें कर सकें या साथ बैठ सकें। 

 बस रेडियो स्टेशन के कार्यक्रमों की रिकॉर्डिंग में ही तुमसे मिलना हो पाता था । 

एक दिन रिकॉर्डिंग में समय था और गर्मी के दिन थे। तुमने हम सभी से अपने घर चलकर कुछ ठंडा पीने का प्रस्ताव रखा। तुम्हारा घर आकाशवाणी के बिल्कुल पास था। मैंने भगवान से मन ही मन प्रार्थना करते हुए सबकी ओर देखा। भगवान ने जैसे मेरी सुन ली और हम सब तुम्हारे घर आ गए। मुझे याद है उस दिन पहली बार तुमने मुझसे मेरा फोन नम्बर लिया था।

उस दिन के बाद कई दिन तक मैं तुम्हारे फोन का इंतजार करती रही। मगर... तुम्हारा फोन नही आया। मुझे खुद पर गुस्सा आ रहा था । क्या जरूरत थी मुझे एटीट्यूड दिखाने की जो मैंने तुम्हारा नम्बर नही लिया।

अगले कार्यक्रम की रिकॉर्डिंग में मैंने तुमसे पहली फुर्सत में ही तुम्हारा नम्बर ले लिया।

याद नहीं अब कि हमारी बातों का सिलसिला शुरू कैसे हुआ मगर धीरे- धीरे होने लगा। तुम अपनी पढ़ाई और कैरियर के लिए बहुत गम्भीर थे। तुमसे मेरी बातें इसी विषय पर होती थीं। हम एक दूसरे के घर भी आते थे। तुम्हारा तो नही पता पर तुम जब भी घर आते थे मुझे लगता था जैसे कहीं जल तरंग बजने लगी हो ।

कभी - कभी तो तुम मुझे बहुत बोरिंग भी लगने लगते थे। तुम आम लड़को से अलग हटकर थे। जहां और लड़के मुझे इम्प्रेस करने के चक्कर मे रहते थे , तुम अपनी ही दुनिया मे रहते थे। 

हमारी बातें भी तो केवल देश, दुनिया और कैरियर के बारे में होती थीं।

कई बार तो तुम ऐसे मुद्दों पर मुझसे बात करते थे जिनमें मेरी कोई रुचि नही थी मगर मैंने अपने मन मे तुम्हारी सबसे अच्छी दोस्त बनने का ठाना हुआ था इसलिए तुमसे उन विषयों पर भी बात करती थी। यहां तक कि उन विषयों पर जानकारी जुटाने की कोशिश भी करती थी।

धीरे- धीरे मुझे महसूस होने लगा था कि तुम्हें भी मुझसे बात करना अच्छा लगने लगा है। तुम अपनी भविष्य की योजनाएं मुझे बताया करते थे। 

उन दिनों तुम्हारा मकसद 'एम बी ए ' करना था। हम दोनों की ग्रेजुऐशन का अंतिम वर्ष था । तुम बहुत मेहनत कर रहे थे लेकिन उसके बाद भी दिन में एक बार मुझसे बात करना नहीं भूलते थे।

मैं भी तुम्हें जब तक जरूरी न हो तब तक खुद फोन नही करती थी। उन दिनों मैं एक समाजसेवी संस्था से भी जुड़ी हुई थी। उसके कार्यक्रम जब भी आयोजित होते थे, मैं तुम्हें बताती थी। तुम्हें ये पता था कि यदि मैं तुम्हें बता रही हूं तो इसका मतलब है कि उन कार्यक्रमों में खुद शामिल हो रही हूं और तुम उन कार्यक्रमो में आ जाते थे।

ऐसे ही एक कार्यक्रम में एक ऐसी घटना हुई जिससे मुझे अपने प्रति तुम्हारी परवाह समझ आ गई थी। मुझसे बात करते - करते किसी परिचित ने मेरी पीठ पर हाथ रख दिया था। मैं और तुम साथ बैठे खाना खा रहे थे, तुमने मुझे देखा और दो पल बाद अपनी कुर्सी घुमा कर मेरी तरफ पीठ कर ली थी। उनके जाने के बाद मैंने तुमसे बात करनी शुरू की पर पहले तो तुम बोले ही नहीं फिर मेरे ज्यादा कहने पर बस इतना कहा, " खाना हो गया तो अब चलो, तुम्हें घर छोड़ दूं।" मैं अपनी स्कूटी से आती- जाती थी लेकिन कभी देर हो जाती थी तो तुम मेरी स्कूटी के पीछे - पीछे अपनी गाड़ी से चलते थे और जब मैं अपने घर के गेट में दाखिल हो जाती थी तब तुम चले जाते थे। तुम्हारा घर और मेरा घर बिल्कुल पूरब - पश्चिम थे यानि शहर के एक कोने पर मैं तो दूसरे कोने पर तुम। इसके बावजूद भी तुमने ये नियम कभी नही तोड़ा।

दूसरे दिन दोपहर में तुम्हारा फोन आया। मैंने तुमसे तुम्हारी नाराजगी की वजह पूछी। मुझे लगा था कि तुम मुश्किल से बताओगे लेकिन तुम तुरन्त फट पड़े जो कि तुम्हारे स्वभाव के विपरीत था। " उसने तुम्हें छुआ क्यों? मुझे नहीं पसन्द, कह देना दूर से बात किया करे। "

" मगर उनको मैं भैय्या कहती हूँ।"

 " मुझे मतलब नही है। ये तुम्हारे भैय्या लोगो पर मुझे भरोसा नहीं।", कहते - कहते तुम एकदम चुप हो गए। शायद तुम्हे लगा था कि ये अधिकार नही जताना चाहिए। लेकिन मैं मुस्कुरा उठी थी। फोन पर चेहरा नहीं दिखता था तब नही तो मेरा चेहरा देखकर तुम शायद तब अपना अधिकार पूरी तरह मुझे बता पाते।

वो दोपहर मेरे लिए बहुत मीठी हो गई थी ।तुमने मुझसे फोन पर ज्यादा बात न करके मुझे घर आने के लिए कहा। मुझे अंदेशा हुआ कि आज शायद तुम .....तुम कुछ और भी कहना चाहते हो ,ये सोच कर मैं मम्मी को बता कर तुम्हारे घर आ गई थी।

पहली बार तुम मुझे अपनी स्टडी में ले गए थे । मैं उत्सुक थी कि तुम क्या कहोगे , क्या बताओगे! तुमने मुझे कुर्सी पर बैठने को कहा और मेरी आँखों मे देखा। दिल को ऐसे मौके पर तेज धड़कना चाहिए था पर वो भी शांत था मेरी तरह। कुछ पल तुम देखते रहे फिर इधर - उधर की बातें करनी शुरू कर दी। काफी देर बात की हम दोनों ने मगर ऐसी कोई बात नहीं हुई जिसका अंदेशा मेरे मन को था।

शायद मैंने ही गलत समझ लिया था ये सोचते हुए मैं अपने घर वापिस आ गई।मन मे थोड़ी खिन्नता थी। दोपहर जितनी मीठी थी शाम उतनी ही साधारण बन गई थी।लेकिन हम एक दूसरे के बहुत अच्छे दोस्त हैं ये बात मुझे तसल्ली देती थी।

फिर एक दिन तुम अपने एक दोस्त के साथ घर आये। बहुत खुश थे तुम। आते ही तुमने बताया कि तुम्हारा चयन 'एम बी ए' के अच्छे कॉलिज में हो गया है। मैंने तुम्हें बधाई दी। तुम बेहद खुश थे और तुम्हारी खुशी देखकर मैं भी खुश थी। तुमने मुझे कहा " बस दो साल !"

मुस्कुरा कर मैंने भी सिर हिला दिया कि हाँ बस दो साल उसके बाद तुम्हारे सपने तुम्हारे पंख लगाकर तुम्हें अपने साथ लेकर उड़ेंगे।

और फिर तुम अपने कॉलिज चले गए। नई जगह, नया माहौल.... तुम मुझे सब बताते रहते थे फोन पर। मुझे भी तुम्हारे फोन का इंतजार रहता था। रात को 8-9 के बीच मे तुम्हारा फोन आता था सप्ताह में किसी भी दिन। उन समय मैं फोन के आस - पास ही घूमती रहती थी।

मैं तुम्हें लंबे - लंबे पत्र लिखती थी जिसमे अडोस- पड़ोस , घर - परिवार, मित्रो, दुनिया की सब बातें होती थीं, नहीं होती थी तो वो तुम्हारे इंतजार में कटते समय की बातें और न ही कभी इस खालीपन को तुम्हें बता पाती थी जो तुम्हारे जाने के बाद मेरी ज़िंदगी मे आ गया था। मुझे तुम्हारे सपने पूरे होने का इंतजार था और मैं कभी नही चाहती थी कि तुम्हारा ध्यान भटके।

एक दिन यूँ ही सी बैठी थी ,एक किताब हाथ मे पकड़े और तुम्हारा फोन आ गया। "इस वक्त दोपहर में तो तुम फोन नही करते ,क्या हुआ? "

" मैडम , फोन तो क्या ,हम तो तुम्हारे घर भी आ सकते हैं!", तुम्हारे सयंमित व्यवहार से अलग ये शोखी भरा जबाब सुन कर मैं हैरानी से फ़ोन देखने लगी जैसे तुम मुझे और मैं तुम्हें आमने- सामने देख रहे हो।

" क्या हुआ? तुम रुको, मैं अभी 15 मिनिट में तुम्हारे घर आ रहा हूं। "

" इसका मतलब तुम यहाँ हो! कब आये?", मैं खुशी से चीख पड़ी थी और तुमने मुझे सब्र रखने को कह कर फोन काट दिया था।

मैं बहुत खुश थी, कपड़े बदल कर अच्छे से तैयार होना चाहती थी तुम्हारे लिए मगर न जाने क्यों शर्म और अनजान सी झिझक ने पाँव रोक लिए। बस मुँह धो कर और बाल संवार कर मैं तुम्हारा इंतजार करने लगी।

कुछ ही देर में तुम मेरे सामने थे। मैं जानबूझकर अपने बाग में बैठी थी ताकि तुम वही आओ और मैं घरवालों की नजरों से पहले तुमको देख सकूँ। तुम आकर मेरे पास वाली कुर्सी पर बैठ गए। तुम्हारा एक दोस्त भी तुम्हारे साथ था हालांकि इसमें नई बात नहीं थी। तुम्हारा कोई न कोई दोस्त तुम्हारे साथ ही आता था।

मैं उत्साह से तुमसे बात करने लगी। अब तक मम्मी भी तुम्हारी आवाज सुनकर आ चुकी थीं। कुछ देर तुमसे बात कर वो चाय बनाने चली गईं।

बातों ही बातों में तुमने अपने साथ पढ़ने वाली किसी लड़कीं का नाम बार- बार लेना शुरू किया। न जाने क्यों मुझे तुम पर बहुत गुस्सा भी आया और साथ ही मन मे ये भाव भी कि शायद वो तुम्हारी....! मगर तुमसे इस बात की शिकायत भी नही कर सकती थी न ही नाराजगी दिखा सकती थी। हम दोनों तो बस दोस्त ही तो थे। मन के भाव दबा कर मैं तुमसे बात करती रही। 

तुम्हारे जाने के बाद गुलदाउदी के फूलों को देखती हुई देर तक सोचती रही। 

मुझे महसूस हुआ शायद मैं सिर्फ एक दोस्त ही बन सकती हूं इससे ज्यादा नहीं। मन के भागते घोड़ो को लगाम कसनी उसी पल से शुरू कर दी थी। मगर रात होते ही जब तकिए पर सिर रखती तो एक प्यारा सा ख्याल रोकने के बाद भी तब तक आंखों में बसा रहता जब तक नींद नही आ जाती थी।

उन दिनों मेरे लिए रिश्ता खोजने का काम भी शुरू हो गया था।मैं घरवालों को मना नहीं कर सकती थी।करती भी तो कैसे? किस आधार पर?

कुछ महीनों बाद तुम जब छुट्टियों में घर आये हुए थे उन्हीं दिनों मैंने अपनी संस्था के साथ एक बहुत बड़ा कार्यक्रम आयोजित किया था।

उस दिन गुलाबी रंग की साड़ी पहनी थी मैंने। मेकअप के नाम पर एक काली छोटी सी बिंदी और हल्की गुलाबी लिपस्टिक। कंधों तक कटे बालों को ऊपर क्लिप लगाकर खुला छोड़ दिया था। 

मैं मंच पर व्यवस्थाएं देख ही रही थी कि तुम आ गए। मुझे देखते ही तुमने कहा कि आज तुम बहुत अच्छी लग रही हो। मगर मैंने इसे एक साधारण तारीफ मानकर थैंक्स कहा और तुमसे किसी काम को करने के लिए जाने को कहा। तुम जाना नहीं चाहते थे। तुमने कहा भी ," अभी रुको, मुझे तुम्हें जी भर कर देखना है।"

लेकिन कार्यक्रम के दबाब में तुम्हारे उन शब्दों को इग्नोर कर मैंने तुम्हें जबरदस्ती भेज दिया।

कार्यक्रम देर रात तक जारी था। सुबह से भागा- दौड़ी में लगी मैं थक कर मंच के पीछे बने ग्रीन रूम में रखी कुर्सी पर जाकर बैठ गई थी। तुम भी मेरे साथ थे।

उस दिन तुम कुछ अलग लग रहे थे। तुमने मुझसे कहा कि मेरे साथ थोड़ी देर के लिए बाहर चलो। मैं कार्यक्रम छोड़ कर नहीं जा सकती थी। मुझे तुम पर भरोसा था लेकिन लोग मुझे तुम्हारे साथ अकेले जाते देख कर बातें बनाते, यही सब सोचकर मैंने तुमसे मना कर दिया। तुम थोड़े उदास हो गए थे। तुम्हें यूँ देखकर मन ने कहा " कहने दो जिसे जो कहना है, चली जाओ इसके संग!"

मैं मन की मानती तब तक मुझे मंच पर बुला लिया गया। मुझे याद है जाते हुए मैंने तुम पर एक गहरी नजर डाली थी। तुम सिर नीचा कर कुछ सोच रहे थे। तुमने मेरी उस नजर को नहीं देखा था मगर हमारे एक कॉमन मित्र ने देख लिया था। बहुत कुछ समझते हुए वह मुझे देख कर मुस्कुराया था और मैंने भी उसके समझने को नकारा नही बस हल्के से मुस्कुरा कर चली गई थी।

काश वो दिन वहीं रुक जाता क्योकि उसके बाद उस पल को कितनी ही बार वापिस लाना चाहा लेकिन जाते हुए पल कभी नहीं लौटते। वो पल तुम्हारे लिए भी नही लौट सका क्योकि उस रात जब तुम मुझे घर पहुंचाने जा रहे थे तो मैंने देखा था तुम्हारी गाड़ी मेरे घर से कुछ दूरी पर रुक गई थी। जब मैं अपने घर मे चलो गई तब तुम मेरे घर के सामने से निकल गए थे। मैं समझ नहीं पाई थी कि तुम रुके क्यो थे क्योकि तुम तो मेरी पीछे आते हुए ही मेरे घर मे पहुंचते ही आगे निकल जाते थे।

बाद में पता चला था कि उस दिन हमारे उस मित्र ने तुम्हें अपने दिल की बात कहने के लिए बहुत समझाया था और तुम असमंजस में थे कि कहूँ या नहीं।

अगले दिन तुम वापिस लौट गए थे और तुम्हारे दिल की बात से अनजान मैं फिर तुम्हारी यादों के साथ रह गई थी।

फिर एक दिन मेरा रिश्ता तय हो गया। न जाने क्यों मैं तुम्हे कुछ नही बता सकी । कितनी ही बार तुम्हे पत्र लिखा और फाड़ दिया। फोन पर भी तुमसे कुछ नही कह सकी।

और फिर एक दिन तुमने मुझे फोन पर कहा कि तुम 11 दिसम्बर को छुट्टियों में घर रहे हो। मैंने तुमसे पूछा ," तुम नौ या दस को नहीं आ सकते?"

" क्यो?"

" क्योकि... क्योकि दस को मेरी शादी है। ", मुझे लगा था कि तुम खुश होकर मुझे काँग्रेट्स कहोगे लेकिन तुमने कुछ देर बाद बात करने की कह कर फोन काट दिया।

बाद में तुम्हारा फोन आया और तुम इधर - उधर की पढ़ाई की बातें करते रहे।

और फिर .….मेरी शादी हो गई , तुम नहीं आये। शादी के बाद जब मैं मायके आई तो तुम मुझसे मिलने आये। मैं उस दिन भी गार्डन में बैठी थी और पिटोनिया के फूलों में अपनी निगाहों से न जाने क्या खोज रही थी।

तुम सधे हुए कदमों से मेरे पास बैठ गए थे। हर बार की तरह इस बार तुम्हारा कोई दोस्त तुम्हारे साथ नहीं था। एक दूसरे को देख कर हम मुस्कुरा दिए मगर फीकी सी मुस्कान.....। 

औपचारिक सी बातचीत के बाद तुमने सीधे कहा, " तुमने पहले क्यों नहीं बताया। जानती हो उस दिन ... उस दिन जब तुमने अपनी शादी का बताया तो... तो...जैसे कहर टूटा था मुझ पर.... धक्क सा रहकर मैं अपने अनकहे जज्बात धूल में मिलते देख रहा था ! मैं तो हमारे लिए ही वो कोर्स करने गया था ताकि अपने पैरों पर खड़ा कर तुम्हारे घरवालों से बात कर सकूं।"

मैं अवाक सी तुम्हारी शक्ल देख रही थी, " तो तुमने मुझे कहा क्यों नहीं? एक बार कहते तो सही।"

" कहा तो था कि बस दो साल !तुम समझी क्यों नहीं !? तुम तो मेरी हर बात समझ जाती थीं न !"

"क्या इसका मतलब ये था, उफ्फ ! मैं नही समझी तो तुम कह देते।", मेरे दोनो हाथों की उंगलियां आपस में उलझने लगी थीं।

" मैंने ये सोचा ही नहीं था कि ऐसा भी हो सकता था। मैं तो यही समझता था कि तुम तो मेरी ही हो।", ये कहते हुए तुम्हारे चेहरे का दर्द मेरे दर्द में शामिल होकर उसे हजार गुना बढ़ा गया था।

" जब बताया तब तो कह सकते थे तुम, तब भी समय था।" मेरे ये कहने पर तुमने कहा था कि कैसे कहता ? शादी के कार्ड बंट गए थे तुम्हारे घरवालों की बदनामी होती और फिर मैं भी तो अभी कुछ नही कर रहा।

तुम्हें हमारे दोस्तों ने बताया भी था कि मेरी शादी हो रही है मगर तुम्हें भरोसा था मुझ पर कि ऐसा कुछ होगा तो मैं तुमसे कहूँगी और मैं... मैं न जाने क्यों उस अनकहे प्यार को समझ ही नही पाई और तुमसे कुछ नही कहा। दोस्ती के नाते भी नहीं, न जाने क्यों।

उसके बाद सालों निकल गए। मैं अपनी ज़िंदगी मे उलझती गई और तुम अपनी चुनौतियों से हार न मानकर खुद को एक अच्छा मुकाम देने की कोशिशों में लगे रहे।

फिर एक दिन मुझे एक मित्र से तुम्हारा नम्बर मिला। धड़कते दिल से तुम्हें फोन लगाया।

तुम्हारी आवाज सुनते ही दिल जैसे गले मे आ गया था। उधर से तुम पूछ रहे थे, " हेलो, कौन बोल रहा है?"

खुद को संभाल कर मैंने तुम्हें अपना नाम बताया। नाम सुनकर मुझे लगा था तुम खुश हो जाओगे लेकिन तुम्हारी आदत थी न अपने मनोभाव आसानी से जाहिर नहीं करने की। मुझे थोड़ी निराशा हुई तुम्हारी आवाज के ठंडेपन पर। हमारे जज्बात भले ही अलग थे मगर हम उसके पहले अच्छे दोस्त तो थे न !

" मैं बाहर हूँ, तुमसे बाद में बात करता हूँ ", कहकर तुमने फोन काट दिया था।एक या डेढ़ घण्टे बाद तुम्हारा फोन आया। एक बार तो तुम्हारे ठंडे व्यवहार से क्षुब्ध मन ने फ़ोन काट देने के लिए सोचा फिर न जाने क्या सोचकर फोन उठा लिया।

आशा के विपरीत तुम चहक उठे थे । एक - दूसरे से बीते सालों की बातें करते - करते, हम उसके बाद अक्सर बातें करने लगे जैसे पहले करते थे।

तुम बिल्कुल नहीं बदले थे।अब भी तुम्हें यही भरोसा था कि मैं तुम्हारी हर बात समझ सकती हूं। हम बात करते थे मगर दोस्तों की तरह।

लेकिन कुछ था जो मुझे बहुत खुश होने से रोक लेता था। बात करते- करते अचानक एक दिन तुमने मुझसे पूछा," अभी कितने मित्रों के सम्पर्क में हो तुम"?

" मैं... किसी के नहीं।"

" किसी से भी नहीं ! ऐसा क्यों? तुम्हारी तो बहुत सहेलियां थीं, बात नहीं होती उनसे अब ? क्या वे लोग तुमसे अब पहले की तरह बात नही करती ?", बहुत हैरानी से तुमने मुझसे पूछा था क्योकि तुम जानते थे कि मेरी मित्र संख्या बहुत थी।

" दरसल... दरसल ... मैं ही किसी से अब बात नही करना चाहती।", मैं तुमसे झूठ नहीं कह पाई थी।

" ऐसा क्यों? "

" क्योकि सब मुझसे आगे निकल गए हैं और मैं.... मैं तुम सभी से बहुत पीछे रह गई हूं....मेरी पहचान कुछ भी नहीं, बस इसीलिए", सालों बाद तुम्हारे आगे अपना दर्द भीगते स्वर में उड़ेल दिया था।

सन्न रह गए थे तुम , ये सुनकर। " नहीं... अगर इस वजह से तुम सबसे दूर हो गई हो, तो ये गलत है।", तुम बहुत कुछ समझाते रहे और मैं बहुत से शब्दों के संग भीगती रही। इतने सालों का हिसाब उन चंद घण्टो में तुम जान चुके थे।

मेरे अवसाद की गहनता तुमसे छिपी नही रह सकी। अवाक से रह गए थे कुछ दिन तक तुम!

तुम्हारे अतीत का संघर्ष तुम्हारे सामने जीवंत हो गया था और फिर तुमने तय किया किया कि तुम अपनी सबसे अच्छी दोस्त को इस भंवर से बाहर निकाल कर ही लाओगे और मैं थी कि निकलने को तैयार ही नहीं थी।

एक दिन तुमने मुझे एक विषय दिया और कहा "इस पर कविता लिखो।"

चार दिन बाद जब तुमने मुझसे कविता के बारे में पूछा तो मैंने कहा , " नहीं लिखी, समझ नही आया क्या लिखूं। मैं अब कुछ नहीं कर सकती।"

लेकिन तुम तो तुम थे, आखिर एक अच्छा दोस्त ही इतना अधिकार जता सकता था और फिर मेरा तुम्हारा तो अनकहे अहसासों का रिश्ता भी था।

मैंने कुछ दिन बाद बेमन से ही सही कुछ लिखा और तुमने बहुत सराहा भी।

उसके बाद तुम रोज मुझसे पूछने लगे कि आज मैंने क्या किया, क्या लिखा।

मैं चिढ़ने लगी थी तुम्हारी इस जबरदस्ती लिखवाने या कुछ रचनात्मक करने की बातों पर। कई बार तो जानबूझकर तुम्हारे फोन इग्नोर करने लगी थी। लेकिन तुम भी..... न जाने किस मिट्टी के बने थे। एक दिन तुमने मेरे लिए एक ब्लॉग बना दिया और कहा ," जो भी मन मे आये लिखो।.... भले ही कोई नही पढ़े , मैं रोज पढूंगा।"

बेहद प्रेम और विश्वाश भरी आवाज में तुमने मुझसे ये कहा था और इस बार मैं तुम्हारा विश्वाश नहीं तोड़ना चाहती थी।

मैंने लिखना शुरू कर दिया। रोज लिखने लगी। धीरे- धीरे लेखन को मुकाम मिलने शुरू हो गए।

मेरी हर कामयाबी पर मुझसे ज्यादा तुम खुश होते थे, आज भी होते हो। आज तुम्हारी आँखों मे अपने लिए गर्व के साथ छिपे उस प्यार को मैं महसूस कर पाती हूँ जो मेरी ताकत बन गया।

 मैं सोचती हूँ अगर उस प्यार का इजहार हो गया होता और उसके बाद वह प्यार असफल रह जाता तो क्या आज हम एक दूसरे के साथ इतने सहज हो पाते!

प्यार तो आज भी है दोनो के ही दिल में बस उसका रूप बदल गया है। सच कहें तो आज हम दोनों ने ही प्यार को पा लिया है, वो प्यार जिसे सिर्फ महसूस कर सकते हैं क्योकि हमारे प्यार में कुछ पाने की चाहत नहीं बस ये एक खुश्बू की तरह है जो हमें कस्तूरी बनकर महका रहा है। है न!


मेघा राठी

प्यार पढ़ाई शादी मिलन

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