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शनि शिंगणापुर
शनि शिंगणापुर
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© Sonias Diary

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बचपन से ही देखा करती थी। शनि शिगनापुर के दर्शन करने का सौभाग्य टेलेविज़न में ही मिला था। बहुत कुछ सुन रखा था इस जगह के बारे में।

आज पुणे से सुबह १० बजे निकल गए थे। थोड़ा लेट ही हो गये थे हम लोग। बच्चों के साथ वैसे भी लेट हो ही जाता इंसान। दो रास्ते जाते हैं शनि मंदिर को। एक शिरडी से पहले रास्ता कटता ७० कमी की दूरी है वहां से। दूसरा बीच में से गाँवों से होते हुए गुजरता है। ये रास्ता रात में थोड़ा सुनसान प्रतीत होगा। सुबह तो सुनसान रास्ते में भी जाना खौफ़ नही देता।

गूगल मैप एक बहुत ही नायाब खज़ाना मिला है हमें। मैप को चालू करो और चल पड़ो अपने लक्ष्य की ओर।

सुबह का नाश्ता उपमा बना दिया था सबके लिए। वोही आसान पड़ता है। बच्चों ने तो थोड़ा थोड़ा ही खाया। मैं और पतिदेव ने पेट अच्छा भर लिया था।

घर से ही गूगल मैप शुरू कर दिया था मैंने। पेट्रोल डलवाने उल्टी दिशा जाना पड़ा। पति को शैळ का पेट्रोल थोड़ा ज़्यादा भाता है। उसकी वजह से १०.३० वहीं हो गया हमे ।

इसलिए बोल सकते १०.३० पे शनि शिंगणापुर की यात्रा आरंभ हुई। पुणे से चाकन तक बहुत ही गंदी भीड़ का सामना करना पड़ता है । प्रणाम गूगल महाराज को, तकरीबन १ घंटे की ट्रैफिक से छुटकारा मिला।

ऐसे लग रहा था मानो छोटी छोटी गलियों में से जा रहे हों। हर जगह कहीं बच्चे दौड़ रहे। कहीं सब्जी मंडी से आती लोगों की आवाज़ें।

एक बात और कहना चाहूँगी यहां भारत के बहुत सारे राज्य के भ्रमण का मौका मिला बहुत सौभाग्यशाली हूँ।

एक चीज़ है जो सबकी समान है। वो है कपड़ों का रंग। बड़े बुज़ुर्ग कहीं भी हों पंजाब हरयाणा गुजरात महाराष्ट्र या हो तेलंगाना। संग सफेद ही है सबको भाता।

कहीं पजामा तो कहीं धोती, कहीं पगड़ी तो कहीं टोपी

रंग बस एक और वो सिर्फ सफेद।

१.३० बजे के करीब शनि मंदिर के बाहर हम लोग खड़े थे। वहां पर पति की एक अच्छी जान पहचान थी। उसको हमने फोन किया। वो थोड़ा दूर था मंदिर से। पेट मे चूहे कूद रहे थे। ऐसे चाहे हमें भूख न लगे मगर सफर के दौरान दोगुना खाया जाता है। १० मिनट के भारी इंतज़ार के बाद वो शख्स हमारे सामने था । बहुत खुशी हुई देख के। मन में आया आज एक अलग रोशनी का संचार होगा आत्मा में। शनि मंदिर के बारे में बहुत कुछ सुन रखा था। वहां औरतों का जाने की इजाज़त नहीं। दूर से ही दर्शन करने होते हैं। एक ओर हैरान करने वाली बात वहां उस गांव में किसी के भी घर में दरवाज़ा नहीं। क्योंकि वहां किसी के भी घर में चोरी नही होती। अगर कभी किसी ने चोरी करने की कोशिश की भी वो अंधा या पागल हो गया है।

तीसरा एक और सच जो भी आदमी वहां जाता है उसे वस्त्र त्याग संतरी धोती डाल के ही पूजा करनी रहती है।

बहुत सारी बातों की उथल पुथल चल रही थी। अब मौका भी था और वहां रहने वाला शख्स भी। मेरे प्रश्न शुरू हो गए।

"भईया वो धोती बोल रहे थे पूजा के लिए"

मुझे देखने नही मिलेगा?

उनके उत्तर ने मुझे बहुत खुशी दी।

"मैडम वो तो १५ साल पुरानी बात है। अब आप किसी भी वेषभूषा में दर्शन कर सकते हैं। बस मंदिर डालने लायक वस्त्र हों। उस मर्यादा का ध्यान हमें स्वयं रखना होता है। और रही स्त्रियों के दर्शन की बात। अब दर्शन सबके के लिए समान हैं।

हम सब ने पीछे के रास्ते से मंदिर में प्रवेश किया। अभी मंदिर में निर्माण कार्य चालू था। मंदिर का प्रवेश द्वार अभी सीमेंट का बना था। एक तरफ लंबी कतारें थी। २ घंटे बाद बारी आएगी ऐसा प्रतीत होता था।

पीछे का रास्ता एक बागीचे से होके मंदिर के सामने के गेट पर निकलता था। वहीं चप्पल उतार हम आगे बड़े। फोन हाथ में थे और मन में श्रद्धा । "जै शनि देव"

दायीं तरह लोग कतारों में लगे लगे अगरबत्ती कर रहे थे। शनि मंदिर में अगरबत्ती जलाना वर्जित है। चढ़ता है तो केवल तेल।

हमे सबसे आगे सीढ़ियों के समक्ष गेट से अंदर कर दिया गया। शनि देव की मूरत ४ सीढ़ी दूर थी। उस भैया ने वहां के पंडित को कुछ इशारा किया उन्होंने हमसे तेल ले चड़वा दिया और वहां से तेल ले हम सब के माथे पे लगा दिया।

अलग सा माहौल अलग सी ध्वनि अलग सा कम्पन। आंतरिक सुख शांति और कृपा का प्रतीक शनि देव की विशाल मूरत जो एक विशाल पत्थर के रूप में विराजमान थी वहां। वहां से नीचे आ दायीं तरफ़ चरण पादुका दर्शन हैं। वहां माथा टेक के हम लोग पीछे आ गए। शनि देव के बिल्कुल सामने अभिषेक चल रहा था। पंडित जी से भैया ने कुछ कहा उन्होंने हमें पाटले पर बैठने को बोला ओर मंत्रो के साथ शनि देव का अभिषेक किया गया। पता नही मन में क्या आया अभिषेक के बाद ही माँ को फोन किया। शनि प्रतिमा के बिल्कुल समक्ष खड़े होकर। और फोन पे बात करते करते विडियो कॉलिंग शुरू कर दी। माँ की आवाज़ में खुशी साफ महसूस हो रही थी।दर्शन कर के बाहर आते हुए मैंने पूछा..

"भैया यहां के घरों में सच में दरवाज़ा नहीं होता। आपके घर दरवाज़ों के बगैर हैं?"

मैं बहुत हैरान थी।

"मैडम जी पहले पर्दो से घर के प्रवेश द्वार को ढका जाता था। अभी स्लाइडर दरवाज़े लगने चालू हो गए मगर ताले आज भी हम अपने घरों पर नहीं लगाते। "सब शनि देव की कृपा है।।

यादगार पल , श्रद्धा विस्वाश और अलग सोच विचार धाराओं से परिपूर्ण हमारा भारत देश।।।

मंदिर अभिषेक प्रतिमा

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