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एक बच्चे की जीवनी
एक बच्चे की जीवनी
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© Bhunesh Chaurasia

Drama

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एक था गोलू जिसका जन्म दिनांक २८ जून दो हजार चार को हुआ था।

गोलू बचपन में काफी स्वस्थ और खूब मोटा-तगड़ा था। उसके माता-पिता गोलू को पाकर बहुत खुश थे। गोलू जब पलते-बढ़ते दो वर्ष का हुआ तब अपने माता-पिता के साथ गाँव गया, अपने दादा-दादी के पास।

इससे पहले वह अबोध बालक जन्म से ही अपने माता-पिता के साथ गुरूगाँव हरियाणा में रहा।

गाँव पहुँच कर अपने दादा-दादी से काफी घूल-मिल गया था।

एक दिन उसके दादा जी और पिता अरंण्डी के सूखे पेड़ की लकड़ियाँ ढो रहे थे तब वह अपने दादा जी और पिता जी की नकल करते हुए नंग-धड़ंग एक छोटी रस्सी लेकर उन लकड़ियों में से एक लक्कड़ रस्सी पर बांध कर पिता के साथ आगे बढ़ने लगा। ऐसा करते हुए देखकर उसके दादा जी बहुत खुश हुए और भविष्यवाणी की कि गोलू बड़ा होकर कामयाब इंसान बनेगा।

देखते-देखते चार साल बीत गए। इस बीच देश और दुनिया ने काफी तरक्की कर ली थी और गोलू साढ़े तीन वर्ष का हो गया। लेकिन अब तक उसके साथ खेलने बाला कोई बच्चा नहीं था।

तब गोलू की माँ ने एक नन्ही परी को जन्म दिया कोमल उर्फ नेहा। अब गोलू खुश रहने लगा। धीरे-धीरे समय बढ़ता गया और गोलू भी इस बीच अपने माता-पिता के साथ कई बार गाँव और शहर का चक्कर लगा चुका था। उसके पिता गुरुगाँव शहर की एक प्राइवेट कंपनी में काम करते थे। गोलू जब छह साल का हुआ तब उसे स्थानीय प्राइवेट स्कूल शन्नी पब्लिक स्कूल में पढ़ने के लिए दाखिला करवा दिया गया। गोलू बचपन से ही पढ़ने लिखने में अव्वल नहीं था।

गोलू बस किसी तरह अगली कक्षा में जाने के लिए पास हो जाता था। अब वह आठवीं कक्षा में पढ़ रहा है और उसकी छोटी बहन कक्षा पाँच में, दादा-दादी अब भी गाँव में ही रहते हैं। गोलू अब दो वर्ष हो गए हैं गांव नहीं गया है। शायद आठवीं कक्षा के इम्तिहान के बाद गाँव जा पाए ताकि अपने दादा-दादी के साथ रह कर वहीं पढ़ें और उनकी सेवा करे।

अब वह चौदह साल का हो गया है लेकिन उसकी बुद्धि अभी भी पूर्ण विकसित नहीं हुई है। वह अब भी अपने माँ के बताने के बाद भी गुरुवार को ही कपड़ा धोता है जबकि उसकी माँ उसे मना करती है। इससे घर में दरिद्रता आती है। लाईफबॉय साबुन की एक पूरी टिकिया और कपड़े धोने के पाँच भाई साबुन वह दो दिन में समाप्त कर देता है।

पता नहीं यह बुद्धि उसे कौन देता है। शायद प्रधानमंत्री जी के स्वचछता मिशन का असर है। पढ़ाई कम सफाई ज्यादा।

वह माँ-पिता जी की सेवा में शाम का भोजन बना लेता है। उसे दाल-चावल और टेढ़ी-मेढ़ी रोटी बनाना आता है लेकिन पूरी तरह से नहीं, इसलिए कभी-कभी दाल में छौंक लगाते हुए जीरा जलकर राख हो जाता है और चावल गीले, रोटी टेढ़ी-मेढ़ी और सब्जी में नमक नहीं होता।

मेरे प्रिय गोलू तुम्हारे जीवन के बारे में इतना कुछ लिख दिया है। ईश्वर तुम्हें सद्बुद्धि दे कि तुम कुछ पढ़-लिख जाओ और अपने माता-पिता का नाम रोशन करो। शेष अब तब लिखूँगा जब तुम कुछ करके दिखाओगे।

बचपन गाँव शहर दादा-दादी

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