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प्रिये अपराजिता
प्रिये अपराजिता
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© Gyan Priya

Drama Romance

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प्रिय अपराजिता, आज मैं तुम्हें ये पत्र लिख रहा हूँ इसलिए, क्योंकि मैं जो तुमसे कहना चाहता हूँ, वो शायद ही कभी अपने मुँह से तुम्हें कह पाऊँ। अपराजिता मैंने तुम्हें पहली बार बस स्टॉप पर देखा था, नीले-गुलाबी सूट में थी तुम उस दिन। शायद उस दिन मैंने तुम्हें गौर से तो नहीं देखा था, मगर नोटिस जरूर किया था तुम्हें। तुमने भी शायद उस दिन मुझे नोटिस किया था कि मैंने कौन से रंग वाली शर्ट पहनी है। पता नहीं क्यों उस दिन मुझे एक खिचाँव-सा लग रहा था, तुम्हारे साथ। फिर मैंने अपना ध्यान तुम्हारे ऊपर से हटाकर अपनी बस की ओर लगाया। वो आयी नहीं थी अब तक, पर तुम्हारी बस आ गई थी। मैंने देखा तुम डोंबीवली वाली बस पकड़कर निकल गई। पर मेरी बस; उसका तो अब तक कुछ भी अता-पता नहीं था। मेरा ध्यान बार-बार अपनी कलाई पर बँधी घड़ी पर जा रहा था। मुझे अपने ऑफिस के लिए लेट हो रहा था, लेकिन बस थी कि आने का नाम नहीं ले रही थी। मैंने पुछताछ पर बस के बारें में पता किया, तो पता चला बस अभी भी कुछ देर और लेट है। खैर कुछ ही देर में बस आ गई और मैं भी अपनी मंजिल की ओर निकल गया।

अगले ही दिन तुम मुझे फिर दिखी पर बस स्टॉप पर नहीं रेलवे स्टेशन पर, इसे इत्फाक कहूँ या किस्मत हम दोनों एक ही जगह पर, एक ही समय पर टकराने लगे थे। तुमने आज भी सफेद-पीला रंग का सूट पहना हुआ था। और मैनें आज भी तुम्हें गौर से नहीं देखा था। बस तुम्हारी झलक देखी थी और फिर ट्रेन के आते ही हम दोनों ही उसी ट्रेन के अलग-अलग कंपार्टमेंट में चढ़ गये। उस दिन ट्रेन अपने समय पर थी। फिर ट्रेन नें भी धीरे-धीरे अपनी रफ्तार पकड़ ली। मैं झट से जाकर अपनी सीट पर बैठ गया। और अपना ध्यान सामान को सही ढ़ंग से एडजस्ट करने में लगाया। कुछ ही पल में एक मीठी-सी आवाज ने मेरा रूख अपनी तरफ खींचा; मैं मुड़ा तो देखा वो तुम थी। तुम खचाखच लोगों से भरी भीड़ को चीरते हुए मेरी तरफ ही बढ़ रही थी। तब जाकर मैंने तुम्हें कहीं गौर से देखा था। और तुम मेरे सामने की सीट पर अपना सामान रखकर मेरे सामने बैठे शख्स को उठने को बोल रही थी। क्योंकि शायद उसने तुम्हारी बुक सीट पर कब्जा करके बैठा हुआ था। सामने बैठा शख्स तुम पर ही झड़पने लगा था। एक तो तुम लोग देर से आओ और फिर अपनी ही सीट पर बैठे शख्स को उठा दो ये कहकर कि वो तुम्हारी है। इतना कहकर वो उठकर वहाँ से चला गया। मुझे भी उस समय बहुत गुस्सा आया था उस पर, कि कैसे कैसे लोग भरे पड़े हैं इस संसार में ! तुम भी अपना सामान रखने लगी। और फिर अपनी सीट पर बैठ गयी। ट्रेन पूरी तरह से रफ्तार पकड़ चुकी थी। और मैं अपना ध्यान तुम्हारे ऊपर से हटाकर प्रकृति की खूबसूरती की तरफ लगाने में नकाम कोशिशें करने लगा। मुझे तुम्हारा नाम भी नहीं पता था। पर हाँ नाम जानने की इच्छा जरूर थी मेरी। तुमने मेरी तरफ एक बार देखा और फिर बैग में से बुक निकालकर पढ़ने लगी।

देखने से वो किसी राईटर की कहानी संग्रह थी। मैंने भी अपना लैपटॉप निकाला और कुछ लिखने की कोशिश करने लगा। लिखता भी कैसे ? दिमाग तो जैसे सुन्न पड़ गया था। आँखें तो तुम पर ही गड़ी हुई थी, न जाने कब मैनें ही तुम्हे एक नाम दे दिया था, "अपराजिता" हाँ यही नाम दिया था तुम्हें ! देखते ही देखते कुछ घंटों में हमने एक लंबा सफर तय कर लिया था। लेकिन तुम अब भी चुप थी, और मैं भी। एक दूसरे स्टेशन के आते ही एक फैमिली भी इसी कंपार्टमेंट में चढ़ी। अंकल जी मेरे बगल में आकर बैठ गये, आंटी जी और उनके साथ में आए बच्चे तुम्हारे बगल में। मैं बस; न चाहते हुए भी उनको और साथ आए उनके बच्चों को देख रहा था। और उनमें से एक बच्चा तुम्हारे बगल आकर जिद करने लगा कि उसे खिड़की के पास बैठना है। तभी आंटी जी ने कहा ये मेरा पोता है, बड़ा जिद्दी है, बेटा तुम थोड़ा इधर खिसक जाओ वरना रास्ते भर परेशान कर देगा। तुम्हें भी न चाहते हुए अपनी जगह उनके पोतों को देनी पड़ी। तभी आंटी अचानक तुमसे पूछ बैठी बेटा तुम्हारा नाम क्या है ? बड़ी प्यारी हो तुम ! जी "अपराजिता" ! तुम्हारे मुँह से ये नाम सुनते ही जैसे मेरी आँखों में एक अलग ही चमक आ गई थी। मैंने तो तुम्हारा नाम अपराजिता बस यूँ ही रख दिया था, लेकिन मुझे क्या पता था तुम्हारे नाम की कल्पना भी सार्थक निकलेगी। सच बताऊँ अपराजिता उस समय मेरे मन में लड्डू फूटने लगे थे। आंटी जी को धन्यवाद कहना चाहता था।

बड़ा ही प्यारा नाम है, बेटा ! और उतनी ही प्यारी तुम भी हो। आंटी जी के इतना कहने पर मैं अपनी कल्पना से बाहर आया। वैसे बेटा कहाँ तक जा रही हो ? आँटी जी के ये सवाल पूछने पर मेरी भी नजरें तुम्हारे चेहरे पर गड़ गयी। शायद मैं भी यही सवाल का जवाब जानने के इंतजार में बैठा था।

जी वो मैं, लखनऊ तक जा रही हूँ। वाह ट्रेन से सीधा लखनऊ मैं भी वहीं जा रहा हूँ। पता नहीं क्या हो रहा है मुझे; क्यूँ खिंच रहा हूँ तुम्हारी ओर ! वैसे हम भी लखनऊ ही जा रहे हैं। मैंने मन ही मन सोचा और हँसी भी आई कि बीच में बस एक दो स्टेशन और पड़ेगे; वरना ट्रेन का तो आखिरी स्टेशन ही लखनऊ है। आंटी जी के बोलने पर मेरा रूख तुम दोनों की बातों की ओर गया। वैसे तुम लखनऊ से हो क्या ? "जी" तुमने संक्षिप्त में बस इतना कहकर किताब अपनी सामने कर लिया।

ऐसा लगा कि जैसे तुम आंटी जी की बातों को अब इग्नोर करना चाह रही हो, झेंपकर आंटी जी नें अपनी आँखें भींच ली। सही भी तो है लोग दूसरों की निजी जिंदगी में कुछ ज्यादा ही दिलचश्पी लेने लगते हैं। कुछ देर में तुम्हारे बगल बैठे दोनों बच्चे भी नींद की आगोश में आ गये। और मेरे कानों में किसी के खर्राटों की आवाजें भी बड़ी जोर जोर से सुनाई पड़ने लगी। सभी नींद के आगोश में जा चुके थे।

बचे थे तो हम दोनों बस; चारों तरफ शांति पसरी हुई थी। अगर आवाज थी पटरियों पर दौड़ती रेल के पहियों की या फिर ट्रेन के हार्न की। अब ट्रेन सीधा लखनऊ पर ही रूकने वाली थी और थमने वाला था ये पल; कुछ ही देर में तुम्हारी भी आँख लग गई थी। और देखते ही देखते मैं भी कब नींद की आगोश में चला गया पता ही नहीं चला।

चाय...चाय...चाय...चाय...अचानक चाय वाले की आवाज से मेरी तंद्रा टूटी। ट्रेन रूक चुकी थी और लखनऊ के बादशाह नगर के स्टेशन पर खड़ी थी। फिर सामने देखा तो तुम नहीं थी, शायद जा चुकी थी। लेकिन अभी मेरी मंजिल नहीं आयी थी। मुझे तो लखनऊ के मेन स्टेशन यानी लखनऊ के चारबाग वाले स्टेशन पर उतरना था। वही आखिरी स्टेशन था। फिर भी मैं पता नहीं क्यूँ उतर गया और तुम्हें इधर-उधर खोजने लगा। मगर तुम कहीं दिखी ही नहीं, हारकर मैं वहाँ से निकल गया।

अगले दिन तुम मुझे फिर से दिखी, पर न इस बार किसी बस स्टॉप पर और न ही रेलवे स्टेशन पर तुम मुझे बाई पास पर ऑटो के इंतजार में खड़ी मिली। मैंने आज तुम्हें गौर से देखा कि तुम ही हो या मेरी आँखों का धोखा है; पर वो तुम ही थी लाल-नारंगी सूट पहने हुए खड़ी थी तुम।

मैं वहीं खड़ा-खड़ा बस तुमको देखे जा रहा था। तभी अचानक मैंने कुछ ऐसा देखा कि जैसे मेरे सारे सपने चकनाचूर हो गये। दिल के दो टुकड़े हो गये। तुम्हें किसी और की बाहों में देखकर; पर मैंने इसे देखने के साथ-साथ कुछ और भी देखा। जिसे तुम देखकर भी अनदेखा कर रही थी। वो तुम्हें अपने से दूर कर रहा था और तुम बार-बार उसके गले पड़ रही थी। फिर देखा उसने तुम्हारे हाथ की नाजुक कलाई को बड़े ही जोर से पकड़ा था और तुम्हें वहीं सबके सामने से खींचता हुआ लिये जा रहा था। तुम भी दर्द से अपना हाथ छुड़ाने की नकाम कोशिश कर रही थी। लेकिन वो तुम्हें ऐसे ही खींचते हुए अपनी कार में बिठाया और वहाँ से चलता बना। मैंने अपने चारों तरफ नजरें दौड़ाई सब आपस में तुम दोनों को लेकर खुसुर-फुसुर कर रहे थे।

उसका तुम्हें इस तरह से खींचकर ले जाना और तुम्हारा उसके गले पड़ना दोनों ही इस बात की तरफ इशारा कर रहा था कि तुम और वो आपस में किसी रिश्ते से जुड़े हुए हो ! या तो वो तुम्हारा पति है या प्रेमी। इतना अंदाजा तो लग ही गया था। खैर मैं भी वहाँ से चला गया था लेकिन बार-बार बस वही मेरे इर्द-गिर्द घूम रहा था। दिल मानने को तैयार ही नहीं हो रहा था कि तुम ठीक हो, वो जिस तरह से तुम्हें खींचकर ले जा रहा था, ऐसा लग रहा था कि तुम जैसे किसी मुसीबत में हो। पर फिर दिल को समझा लेता कि ये तुम्हारा और उसका आपसी मामला है। मैं कैसे दखल दे सकता हूँ। कहीं इससे तुम्हारी मुसीबत और न बढ़ जाए। पर फिर दिल कहता कि जब वो सामने से इस कदर सबके सामने तुम्हारा हाथ पकड़कर खींचते हुए ले जा सकता है। तो मैं क्यों नहीं दखल दे सकता हूँ। इंफैक्ट वहाँ खड़ा हर शख्स दखल दे सकता है और दे सकता था; मगर किसी कि हिम्मत नहीं हुई रोकने की। इंफैक्ट मैं भी तो वहाँ बुत बना खड़ा तुमको इस तरह से जाते देखता रहा। तो गलत वो क्यों ? मैं तो सबसे ज्यादा गलत था यहाँ ! पर कर क्या सकता था। तुम जा चुकी थी और मैं बस देखता रहा।

अगले दिन तुम फिर खड़ी मिली उसी जगह बाईपास पर, पर आज तुम मुझे हमेशा से कुछ अलग दिख रही थी। डरी सहमी हुई-सी, पर हाथ में तुम्हारे कुछ था। मैंने सोचा कि आज मैं तुमसे बात करूँगा। पर आज भी हिम्मत नहीं जुटा पाया। बस दूर खड़ा देखता रह गया। कुछ ही पल में वो मेरे सामने था। लेकिन आज मैंने सोच लिया था कि आज मैं इसकी तुम्हारे साथ बद्तमीजी बर्दास्त नहीं करूँगा। मैं तुम दोनों की तरफ बढ़ने लगा। और तुम दोनों की बातें धीरे-धीरे मेरे कानों में पड़ने लगी। आवाज तेज होने लगी थी। क्योंकि मैं तुम दोनों के बहुत ही नजदीक पहुँच चुका था।

तभी मैंने सुना तुम्हारे गिड़गिड़ाने की आवाज सुनी, तुम उसके सामने गिड़गिड़ा रही थी कि ये क्यों ? प्लीज मुझे मत छोड़ो ! मैं नहीं जी पाऊँगी तुम्हारे बिना, मगर उसने वो तुम्हारे हाथ से छीन लिया और तुम्हें वहीं छोड़कर चला गया। उस समय मुझे ऐसा लग रहा था कि जैसे मैं वहाँ होकर भी नहीं हूँ। इतना असहाय महसूस कर रहा था, मैं अपने आपको ! मैं वहाँ तुम्हारे पास होकर भी कुछ नहीं कर पाया। तुम निश्चेत अवस्था में वहीं सड़क पर बैठ गई रो रही थी तुम, मगर मेरे हाथ तुम्हें संत्वाना देने के लिए जैसे बढ़ ही नहीं रहे थे। कि तभी पीछे से जोरों की आवाजें सुनाई पड़ रही थी। बहुत भीड़ जमा थी वहाँ, वहाँ जाकर देखा तो एक ऐक्सीडेंट हो गया था, पास से देखा तो वो मैं था, मुझे याद आया कि जब मैं तुम्हारे करीब आ रहा था तभी मेरा ऐक्सीडेंट हो गया था। चेक करने पर पता चला कि मेरी नब्स अभी भी चल रही थी। मुझे वहीं पास के हॉस्पिटल लाया गया।

मैं बाहर खड़ा-खड़ा तुम्हारे बारे में ही सोच रहा था। फिर मुझे महसूस हुआ कि जैसे मुझे कोई खींच रहा है। और मैं अपने शरीर में वापस प्रवेश कर गया। शायद मुझे तुम्हारा प्यार, और तुम्हें मेरी जरूरत है ये सोचकर मैं फिर से जी उठा था। सिर्फ तुम्हारे लिए अपराजिता, और आज ये पत्र भी इसी के साथ समाप्त कर रहा हूँ अपराजिता, कि मुझे ये नयी जिंदगी भी केवल तुम्हारे लिए ही मिली है और तुम नहीं तो ये जिंदगी भी बेकार है।

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