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गणेशजी के पांच अनुरोध
गणेशजी के पांच अनुरोध
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© Aswin Patanvadiya

Drama

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मां पार्वती और पिता महादेव के साथ , गणेश जी बैठे हैं। वह बैठे बैठे पृथ्वी लोग के मानव की अपने प्रति , अपार श्रद्धा और भक्ति के बारे में, आपस में बातचीत कर रहे हैं।

" बेटा गणेश इस श्रावन मास में मेरे भक्तों ने तन मन से मेरी भक्ति की है। इसीलिए मैं अपने भक्तों पर बहुत प्रसन्न हूं । "

यह सुनकर मां पार्वती जी बोले " बेटा इस श्रावण मास में तुम्हारे पिताजी के साथ साथ मेरे दसमा स्वरूप , मां दशामा का व्रत करके मेरी भी आराधना भक्तों ने की है। इसलिए मैं भी मानव भक्तों पर बहुत प्रसन्न हूं । "

" क्षमा करें पिताजी, यह मानव जितनी आपकी पूजा करते हैं। इससे कहीं ज्यादा वे मेरी भी पूजा अर्चना करते हैं। मुझे लगता है कि मानव में, हमारे प्रति श्रद्धा और भक्ति अधिक बढ़ती ही जा रही है। मानव की इस आस्था और भक्ति से मैं भी बहुत प्रसन्न हूं । "

" नारायण नारायण , प्रभु महादेव और मां पार्वती जी को मेरा प्रणाम, और देव गणनायक गजानन गणपति जी को मेरा वंदन । हे प्रभु आप सभी को मानव की प्रशंसा करते हुए सुनकर, मैं यहां उपस्थित हुआ हूं। हे प्रभु , मानव जैसे दीखते हैं, वे वैसे है नहीं।

" प्रभु आजकल मानव की बुद्धि बढ़ती ही जा रही हें । उस वजह से वह अपना भले बुरे का ख्याल भी भूल चुका है। यह मानव के कारण पृथ्वी लोक में छोटे बड़े जीव , यह मानव की हरकतों से परेशान हो चुका है । यदि आप मानव भक्ति की बात कर रहे हो तो , मैं बतादूं कि आज मानव भक्ति में अपने स्वार्थ की खातिर ही कर रहा है। मुझे मानव में भक्ति कम और अपनी मौज मस्ती ज्यादा दिखाई दे रही है। आप जैसे देवों का नाम लेकर दानव जैसा काम कर रहे हैं ।

अपने भक्तों के बारे में ऐसा सुनकर गणेश जी क्रोधित हो उठे, " नारदजी मानव आपकी पूजा-अर्चना नहीं करता । इसीलिए आप मानव के बारे में, ऐसा बोल रहे हो । पर यह उचित नहीं है । मुझे लगता है कि आपको हमसे, ईशा और जलन हो रही है। "

" नारायण नारायण, ईर्ष्या! , जलन ! , किससे ? आपसे प्रभु , अरे प्रभु मेरा काम तो है सच्ची भक्ति करना । और भक्तों को सच्ची भक्ति का मार्ग दिखाना । बस यही मेरा काम है। ..हें ! प्रभु मेरे साथ और भी कुछ लोग आपके दर्शन के लिए आए हैं । और वह , आपके मानव भक्तों की कुछ फरियाद लेकर भी आए हैं। वह सब द्वार के बाहर ही खड़े हैं

यह सुनकर , गणेशजी बोले , " नारदजी सब को अंदर ले आओ ,"

सबसे पहले चूहा अंदर आया , और प्रवेश करते हुए , उन्होने सभी देवताओं को प्रणाम किया। और वह बोला , " हे ! गजानन प्रभु , मैं बहुत ही प्रसन्न हूं की मेरा नाम भी आपके साथ लिया जाता है । आपके सभी मानव भक्त आपके साथ मेरी भी पूजा अर्चना करता है। लेकिन सिर्फ दस दिनों के लिए। बाद में तो वही मानव मुझे लाठी लेकर मारने दौड़ते हैं । हे ! प्रभु , यह मानव की कैसी भक्ति है ?"

चूहे ने अपनी बात समाप्त की तभी एक दूसरा फरियादी आया उसका नाम था जलदेवता। जलदेवताने गणेश जी के साथ गणेशजी के माता-पिता को भी प्रणाम किया और बोला

" हे ! प्रभु आप देवताओने , सभी छोटे बड़े जीवो की प्यास बुझाने, मेरा सर्जन किया है। पर यह मानव , आपके गणेश विसर्जन के दौरान , मेरा पूरा पानी दूषित कर देता है । इससे मेरा पानी किसी को भी काम नहीं आता , और आज का मानव आप की प्रतिमा , मिट्टी के नहीं बनाता। बल्कि वह बड़ी बड़ी सीमेंट और काक्रीट की प्रतिमा बनाता है । जो आपकी मूर्तियाँ मेरे पानी मे पीगल नही पाती । मैं आपकी अधूरी टूटी फूटी प्रतिमा देखकर, बहुत ही दुखी हो जाता हूं। हे ! प्रभु, यह आपके भक्तोकी कैसी भक्ति है ?

" नारायण नारायण, देखा प्रभु , आपके मानव भक्त , किस तरह आप की भक्ति कर रहें हैं। प्रभु अभी तो औरभी कुछ फरियादी बाहर द्वार पर खड़े हैं। मैं इनमें से पहले मछली को अंदर बुलाता हूं। "

मछली रानी अंदर प्रवेश करते हुए , सभी देवताओं को प्रणाम किया। और गणेश जी से अपनी फरियाद करते हुए कहा की " हें ! प्रभु , आप का यह त्यौहार हमें भी धन्य कर देता है । पहले मानव आप की प्रतिमा अपने हाथों से बनाकर उसे फूल रंगों से सजा कर अपने घर में स्थापना कर्ता था । और बड़े प्रेमभाव से आपकी पूजा अर्चना करता था । पर अब तो वो बाजारों से तैयार मूर्ती खरीदता हैं । तैयार बनी हुई मूर्ति पानी में पिघलती नहीं है । और उस पर लगे केमिकल रंगों के कारण तलाब या नदियों का पानी जहरीला बन जाता है । उस वजह से हमारी मछली परिवार से कई सारी मछलियां मर जाती है!। हमारे साथ कछुआ मेंढक आदि भी पानी में रहने वाले जीव मर जाते हैं। हे ! प्रभु आपके मानव भक्तो की यह कैसी भक्ति हैं ?

" नारायण नारायण, देखा प्रभु , आपके भक्त, अब सच्ची भक्ति का मतलब ही भूल चुके हैं । आज के मानव भक्ति कम और दिखावा ज्यादा करता हैं । "

" नारदजी मेरे भक्तों की फरियाद सुनकर, मैं जरूर पृथ्वीलोक जाऊंगा। और खुद ही देख लूंगा की मानव कितने बदल चुके हैं .। "

" नारायण नारायण, जरूर प्रभु , मैं भी आपके साथ चलूंगा। किंतु पहले अभी भी एक फरियादी आपसे फरियादकरने के लिए उत्सुक है । "

" जरूर नारदजी , हम उनकी भी फरियाद सुनेंगे । ."

ढोलक ने प्रवेश किया और सभी देव गणों को प्रणाम करके , गणेश जी से अपनी फरियाद करने लगा , " हे ! गजानन गणपति, पहले सभी मानव आपकी भक्ति करने में हमारा उपयोगकर्ता था। जिससे हम भी आपकी भक्ति में शामिल होकर अपने आप को धन्य समझते थे । पर जब से यह आधुनिक संगीत यंत्रों , जैसे कि डीजे साउंड टेप रिकॉर्डर का आपकी भक्ति में उपयोग होने से , आज के मानव भक्त ने भजन कीर्तन करना छोड़ दिया है। उस वजह से हमारा उपयोग भी अब नामशेष होता जा रहा है । हे गणेशजी हमें हमारी परवाह नहीं है। पर आज के डीजे साउंड जैसे यंत्रों से बूढ़े , बच्चे और बीमार लोग इससे अधिक परेशान होते हैं । उससे ज्यादा तो पशु पक्षियां अधिक परेशान होते हैं। हे ! प्रभु आपके मानव भक्तों की यह कैसी भक्ति है ? जिससे भक्ति कम और परेशानियां ज्यादा मिलती है।

यह सुनकर गणेश जी बोले " चलो नाराज जी अब तो पृथ्वी लोक जाकर हमें हमारे भक्तोकी भक्ति को देखना ही पड़ेगा "

" नारायण नारायण, प्रभु चलिए शुभ काम में देरी कैसी, पर प्रभु आपसे एक अनुरोध है की, हम मानव भक्तों को मिलने भिखारी के वेश में जाएंगे , ताकि उन्हें आप के प्रति कितना सच्चा भक्ति भाव है । वह हम जान सके । "

" हां क्यों नहीं ? नारदजी आपकी बात बिल्कुल सही है । हम एक भिखारी का स्वरूप लेकर जाएंगे ।

गणेश जी और नारदजी, भिखारी मानव का स्वरूप लेकर एक शहर के एक छोटे से कोने से गुजर रहे थे । वहां उन्होंने देखा कि, कुछ लोग गणेश जी की पूजा करने के लिए एकत्रित हुए हें । गणेश जी और नारद जी ने पास जाकर देखा तो उन्हें गणेश जी की बड़ी सी प्रतिमा दिखाई दी ।

गणेश जी अपनी मूर्ति को देख बहुत ही प्रसन्न हुए । " " देखा नारदजी, हमारे भक्तों का हमारे प्रति कितना ज्यादा प्रेम भाव है । "

हां प्रभु , मैं भी देख रहा हूं। मानव का आप के प्रति कितना और कैसा भाव है । यह देखो प्रभु, आप की प्रतिमा के दर्शन के लिए लोग पैसे लेकर लाइन में खड़े हैं । यानी कि यहां जिसके पास पैसे हैं। वही आपकी यह बड़ी प्रतिमा की पूजा-अर्चना और दर्शन कर सकते हैं । और वह देखो प्रभु जिसके पास पैसे नहीं है वह बाहर खड़े हैं । गरीबोंको भी आप के दर्शन करने हैं । किंतु, पैसे न होने के कारण वह बाहर खड़े हैं । प्रभु यह कैसा भेदभाव सिर्फ पैसों के लिए, मानव की पहचान क्या अलग हो जाती है ।

हे गजानन प्रभु आप यहां ही रुके। मैं खुद आपकी यह सुंदर प्रतिमा का दर्शन करके आता हूं । नारदजी गणेशजी की प्रतिमा के पास पहुंचे, इससे पहले किसी एक मानव ने आवाज़ दी।

" अरे! ओ पागल तनिक रुक, कहां जा रहा है ? "

नारद जी बोले ," भाई मुझे भी गजानन के दर्शन करने हैं । "

" ए पागल भिखारी , तुझे दिखाई नहीं दे रहा ,यह प्रतिमा तुझ जैसे भिखारी के लिए नहीं रखी । किसी और जाकर दर्शन करो । चल भाग यहां से । " यह कहते हुए उस आदमी ने नारद जी को धक्का दिया नारदजी जमीन पर गिर पड़े इससे पहले गणेश जी ने संभाल लिया ।

" नारायण नारायण, देखा प्रभु, आप के भक्तोका व्यवहार कैसा है। "

" अरे नाराद जी , आपने ही कुछ किया होगा। तनिक रुको । "

थोडी ही देर में , गणेशजी की आरती शुरू हुई। भगवान गणेश जी की आरती , कोई भी अपने मुख से नहीं गा रहा था । बल्कि संगीत यंत्र डीजे साउंड से हो रही थी । डीजे की बड़ी आवाज होने के कारण , और गणेश जी के बड़े कान होने के कारण , प्रभु गणेश, इस आरती से खुश होने के बजाय , चिड़चिड़ा हो गए । और वहां से कुछ दूर जाकर खड़े रहे ।

" नारायण नारायण, देखा प्रभु, ! भक्तों की आप के प्रति भक्ति भाव सब में बढ़ चुका है। आपकी प्रतिमा भी बड़ी और आरती करने के लिए म्यूजिक यंत्र आवाजभी बडी है । "

" तनिक सब्र रखें नारदजी "

" हां क्यों नहीं, प्रभु अब मैं आपको ऐसी चीज दिखाने जा रहा हुँ की ', आपको भी सब्र नहीं रहेगा । "

" वह क्या , नारादजी ? "

" नारायण नारायण, प्रभु तनिक आप की प्रतिमा के चरणों में देखिए , आपके मनपसंद मोतीचूर लड्डू , मोदक और केले भी रखे हैं। "

अपने मनपसंद मिष्ठान देखकर , गणेश जी प्रसादकी और दौड़ पड़े । मानव ने रखे हुए प्रसाद के नजदीक जाकर खड़े रहे । तब कुछ लोग गणेश जी को पागल भिखारी समझ कर धक्का देने लगे । पर गणेशजी तलमात्रभी नहीं हीले । तब नारदजी ने गणेश जी का हाथपकड़ कर वह मानव भीड़ से बाहर निकल आए ।

" नारायण नारायण , दिखा प्रभु , यह मानव आज मानवता ही भूल चुके हैं । अब ऐसे मानवताहिन मानव को , आप की भक्ति करना कैसे आएगा ?

" नारदजी यह कैसे मानव है । यह मानव मेरी ही भक्ति का आडंबर करके अपने ही निजी मौज मस्ती कर रहा है । ऐसे मानव कभी भी मेरे सच्चे भक्त नहीं बन सकते । "

" नारदजी मैं ऐसे धन दौलत और पैसों से मानव भक्तों से भक्ति नहीं चाहता, बल्कि मुझे तो मानव भक्त सिर्फ प्रेमभाव से मेरा नाम स्मरण करें इतना ही काफी है ।

रास्ते के एक किनारे बैठा हुआ एक भिखारी यह सब देख रहा था। भिखारी नारद जी, और गणेश जी के पास आकर बोला " हे मित्रों आप यहां पहली बार आए हो एसा मुझे लगता है। क्यू दोस्त, आपको बहुत भूख लगी है ?

" गणेश जी ने कहा हां मित्र बहुत भूख लगी है "

भिखारी ने कहा " लो यह मेरे मोदक के लड्डू मोतीचूर लड्डू खाओ । सुबह - सुबह में , कोई अच्छे भले आदमी ने मुझे यह गणेश जी का प्रसाद दिया था

गणेश जी ने कहा " पर दोस्त तुम मुझे यह प्रसाद देखकर , तुम क्या खाओगे ? "

" देखो दोस्त , तुम यहां नए हो । और मुझ जैसे भिखारी भी हो , तो तुम इस तरह से मेरे मेहमान हो । और शास्त्रों में लिखा है कि मेहमान भगवान का रूप होता है। इसीलिए यदि आप मेरा प्रसाद खाओगे तो मुझे अधिक खुशी मिलेगी ।

गणेश जी बोले " क्यों नहीं ? मित्र मैं जरूर तुम्हारा यह प्रसाद खाऊंगा । "

' गणेश जी देखते ही देखते सारा प्रसाद खा गए। '

" नारायण नारायण " , देखा प्रभु , यह आदमी गरीब है । फिर भी सबसे बड़ी संपत्ति का यह मालिक है ।

" वह क्या नारदजी "

" प्रभु वह है ! मानवता, जो यह गरीब मानव में भरपूर है। "

" गणेशजी ने वह प्रसाद खिलाने वाले भिखारी से कहा , " तुम्हारा कल्याण हो " आज से तुम्हे कभीभी भीख मांगनेकी जरूरत नही पड़ेगी । "

" चलो नारदजी अब चलते हैं "

तब नारदजी बोले." हे ! प्रभु , आपके मानव भक्तों को सच्ची भक्ति करने का कुछ संदेश दे , और कुछ चमत्कार भी दिखाइए। क्योंकि मानव चमत्कार को ही भगवान मानते हैं।

" हां जरूर नाराज मुजे देखो, मैं अब क्या करता हूं? गणेश जी उनकी प्रतिमा में अंतर्ध्यान हो गए । और प्रतिमा के सामने रखे हुए सभी प्रसाद को खाने लगे। यह देख सभी भक्तजनों आनंद विभोर हो गए । और जोर से गणपति बप्पा की जय बुलाने लगे। कई लोग तो, और भी प्रसाद लेने के लिए दौड़ पड़े। प्रसाद खाते हुए रुक कर गणेश जी ." बोले हे मेरे प्रिय भक्तों आपको मेरा पांच अनुरोध है । क्या तुम मेरी बातों का अमल करोगे ?

सभी बोले हां प्रभु , क्यों नहीं ?

तो सुनो." मेरा पहला अनुरोध है कि, मेरी मूर्ति मिट्टी की बनाएं । ताकि मेरी मूर्ति पूरी तरह से पानी में पिघल सकें और तालाब और नदी का पानी दूषित ना हो ।

" मेरा दूसरा अनुरोध है कि, खुद में मानवता रखें क्योंकि भक्तिका प्रवेश द्वार मानवता है "

" अब मेरा तीसरा अनुरोध सुने , मेरे भक्ति का गुणगान आप अपने मुख से गाय। और यह डीजे साउंड जैसे संगीत यंत्रों को न अपनाएं । क्योंकि इनकी ज्यादा आवाज होने के कारण , कई और लोग और पशु पक्षियों अधिक परेशान होते हैं । और मुझे भी जयदा शोर पसंद नहीं है । "

" मेरा चौथा अनुरोध है कि, मेरी भक्ति में , अमीरी गरीबी का भेदभाव न रखें। मेरे दर्शन ओर प्रसाद के लिए अमीर - गरीबी का भेदभाव ना रखें ।"

मेरा आखरी और पांचवा अनुरोध है कि , आप मेरी भक्ति करने से पहले , अपने मात पिता के चरण जरूर स्पर्श करें । क्योंकि मैं अपने माता पिता को अधिक प्रेम करता हूं । इसीलिए जो भी अपने माता पिता को चरण स्पर्श करने के बाद , मेरी पूजा अर्चना करेगा, उसकी भक्ति से मैं अधिक प्रसन्न रहूंगा । और उनके सभी दुख दूर करूंगा ।

इतना कहने के बाद गणेशजी नारदजी के साथ अंतर्ध्यान हो गए ।

' सभी भक्तजन गणपति जी की जय बुलाने लगे '

' गणपति बप्पा की जय...... गणपति बप्पा की जय ....

जिसने देखा यह चमत्कार वह गणपति जी को मान ने लगे , और जिसने नहीं देखा वह यह चमत्कार को मजाक समझने लगे। आप क्या समझते हो यह आप पर निर्भर है । क्योंकि कोई रास्ता और मंजिल दिखा सकता है पर चलना खुद को ही पड़ता है। ....

Ganesh Story Pooja

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