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बेजुबान
बेजुबान
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© ARUN DHARMAWAT

Drama

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"क्या हुआ भाटिया जी, आज बड़े उदास लग रहे हो, न दुआ न सलाम ना कोई बातचीत क्या हुआ भाई सब ठीक तो है ना"

"अरे आइये आइये शर्मा जी बैठिये, क्या बताऊँ आपको आज मेरा माइकल छोड़ के चला गया, आठ साल से था बिल्कुल बच्चे की जैसे पाला था उसको, रोज सवेरे शाम टहलाने ले जाता था, इतना घुलमिल गया था सबसे बेजुबान होकर भी मानों बात करता था"

"अरे अरे भाटिया जी बड़ा दुःख हुआ सुनकर, सच में इंसान का मन ऐसा ही होता है निर्मल कोमल और संवेदनशील तब ही तो पशु पक्षी से प्रेम करता है, और इतना मोह पैदा कर लेता है, वैसे क्या हो गया था उसको"

"कुछ नहीं शर्मा जी कुछ दिनों से खा पी नहीं रहा था हमेशा उछल कूद करने वाला चुपचाप पड़ा रहता था, डॉक्टर को दिखाया तो पता चला किडनी काम नहीं कर रही, फिर भी रोज ड्रिप चढ़वाता इंजेक्शन दिलवाता लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ और देखिए आज सवेरे चला गया .... हमेशा हमेशा के लिए

"दुःख तो होता ही है भाटिया जी इतने साल घर के मेम्बर की तरह रहा और अब यूँ चला गया, लेकिन भाई ये सत्य है, जो आया है उसे एक दिन जाना ही है ...... लेकिन सोचिये .... ये मांसाहारी लोग जो न जाने कितने बेजुबान पशु पक्षियों को रोज नृशंसता से काट काट कर खा जाते हैं, तब इनकी संवेदनाएँ कहाँ चली जाती है, क्या उनमें जान नहीं होती ? इसीलिए कहता हूँ .....

"जियो और जीने दो, मांसाहार छोड़ो और शाकाहारी बनो"

और नित्य मांस खाने वाले भाटिया जी चुपचाप देखते रह गए ....

इंसान दुःख सत्य मृत्यु

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