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शाम का साया
शाम का साया
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© Manisha Joban Desai

Thriller

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तेज दौड़ती हुई ट्रेन की खिड़की के पास बैठी हुई तक्षवी, उड़ती हुई लटो को संभालती घड़ी में टाइम देख रही थी बस, अब आधा घंटा रहा होगा शिमला से ओर एक ट्रेन चैज करके आगे टेैन सहसागढ जा रही थी।उसके हसबैंड ७-८ महीने पहले तबादला होने की वजह से यहाँ आए थे और वो बच्चों की स्कूल के बाद में टूर वगैरह का इंतजाम करके आज पहुँच रही थी। बारिश का समय था और एकदम धूंधला सा एटमॉस्फियर था। ट्रैन में थोड़े से पेसेंजर थे। ट्रेन के टाइम में चेंज होने की वजह से, १५ मिनिट के डिस्टेन्स पर ही गवर्नमेंट बँगला था तो, पहुँचकर फोन करुंगी सोचकर भूल गई। जल्दी से 2- 3 पेसेंन्जर सामान लेकर दरवाजे की आेर जाते हुए देख वो भी वोशरुम से फे्श होकर वापस अपनी सीट पर बैठ गई।उतने में सामने कीसीटवाली औरत पूछनें लगी,

''आप सहसागढ जा रहे हैं।
'हां, मेरे हसबैंड की यहाँ पोस्टींग हुई है और में  6 महीने बाद आ रही हूॅं।अभी 15- 20 मीनट में सहसागढ आ जाएगा।' 'लेकीन आप को दिन में आना चाहिए, शाम को ये इलाका अच्छा नहीं यहाॅं दो-तीन बार खराब हादसे हो चूके हैं और गांव में आत्मावगैरह की अफवाहें भी फैली हुई है'' 
मैंं तो इन सब बातों में बिलकुल ही नहीं मानती, विझान इतना आगे बढ़ चुका है ओर इस टेकनोलोजी के जमाने में अैसा कुछ संभव ही नहीं मैं तो काफी अंजान जगाओ पर रही हूँ, इनका काम ही एेसा है के मुझे बहोत बार अकेले रहेना पडता है।अब तो काफी हिम्मत आ गई है।
'हां, लेकिन ये नेटवर्क का भी कोइ ठिकाना नहीं यहाँ, हमारा गांव नजदीक में ही है सब लोग बातें करते हे वो सुनते रहेते है'
'हां,मेरे हसबैंड भी किसी हादसे के बारे में बता रहे थे, काफी सुनसान इलाका है, लेकिन गवर्नमेंट के  हाउस है और सब सुविधाएँ भी है। वो औरत ये सुनकर चुप हो गई ओर तक्षवी ने फोन लगाकर उद्देश से बात करनी चाही लेकिन डिस्टेबन्स कीवजह से बराबर कुछ सुनाई नहीं दे रहा था। स्टेशन पर ट्रेन के  रुकते ही  धीमी सी बारिश में खड़ी होकर सामने खडे हुए कुली को आवाज़ दी। ओर दो पेसेंजर उतरे थे वो रेल की पटरी क्रास करके सामने की और चले गए। अपने हसबैंड उद्देश को फोन लगाया लेकिन नेटवर्क नहीं था। बारिश तेज़ होने लगी थी। अपना छाता निकालकर  धीरे-धीरे स्टेशन के बाहर आकर खड़ी रही, घने पेड़ों से लिपटा हुआ पूरा इलाका और छोटा सा स्टेशन- ऑफिस कोहरे मे आधा ढक गया था। कुली वापस अंदर की और चला गया। बाहर दूर एक-दो खाली कार पड़ी हुई थी, एक दो स्कूटर वगैरह, एक टैक्सी भी थी लेकिन पास जाकर देखा तो ड्राइवर का कोई पता नहीं था। पता नहीं क्यों ऐसे तो कई बार काफी जगाओ पर रहे थे लेकिन ऐसे हवा में डरावनी-सी  चुप्पी कभी महसूस नहीं की थी। चनार के पेड़ों की सांय-सांय और बारिश की बूंदे भी जैसे तूफान के ओले की तरह हाथो पर चुभ रही थी। एक बैग और हेंडलगेज लेते हुए काफी मुश्किल से सड़क के पास आकर खड़ी रही जहां से आता हुआ रास्ता साफ दिखाई रहा था। उतने में दूर से एक कार आती हुई दिखी। हाश, मेरा तो जी गभरा रहा था, थोड़े समय पहले यहाँ पर एक कपल के साथ हुए हादसे की वजह से इस इलाके में शाम को चहलपहल काफी कम हो जाती थी, उद्देश की कही हुई बात याद आते वापस तक्षवी के रोंगटे खड़े हो गए और इतनी ठण्ड में भी रूमाल से मुंह पर से पसीना पोंछने लगी। उतने में कार पास आकर वापस टर्न लगाकर नज़दीक में खड़ी हो गई ,ऑटोलॉक से पीछे का दरवाज़ा खुला और 'जल्दी अंदर बैठो 'उद्देशकी आवाज़ सुनकर जल्दी से अपना सामान सीटपर रखकर बैठ गई। ड्राइवींग सीट और पीछे की सीट के बीच मे कांच था और ड्राइविंग सीट के बाजू मे बड़ा सा बक्सा रखा हुआ था।काफी भीग चुकी थी और रेडियो पर टूटी हुई आवाज़ और काफी डिस्टेबंसके साथ न्यूज़ आ रहे थे दुपट्टे से पोंछती रही और ज़ोर से पूछा 
"फोन क्यों नहीं लग रहा था?"
घबराहट में एकदम से बेतुके सवाल करने लगी।लेकिन ...' क्या ?इतनां ही सुनाई दिया आगे खाली नीले रंगका ओवरकोट और ग्रे हेट दिखाई दे रहा था उद्देश का। फिर चुपचाप बैठी रही। बीस पच्चीस मिनट का रास्ता था। वीन्डो पर जोर की बारिश की वजह से कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। उतने में दूर से थोड़े हाउस दिखाई दिए और कार तेजी से मुड़ती हुई पोर्च में खड़ी रही।तक्षवी ऊतरकर खडी रही ,लेकिन कार वापस धीरे से गेट की और जाने लगी।अंदर से बाय करता हुआ हाथ देखकर उसने भी बाय किया।ओर उद्देश कहीं किसी काम से वापस जाकर आ रहा है सोच जल्दी से हेंडलगेज लेकर  सामने के ऊँचे स्टेप्स पर चढ़ती हुई दरवाजे के पास खड़ी रही और डोरबेल बजाई। तुरंत अंदर से सर्वेन्ट ने दरवाजा खोला।
'अरे, मैंडम आप आ गई?' 
'हाॅं काका, मेरा सामान ले लीजिए बाहर से 'कहकर अंदर आई और सर्वेन्ट कहने लगा,
'सुबह की गाड़ी से ही आना चाहिए, यहाँ पर जिस औरत को बलात्कार कर के उसके हसबैंड को भी मार डाला था उसकी आत्मा घूमती है, लेकिन अच्छी आत्मा है, सबको बचाता है'और एकदम से तक्षवी हँस दी।
'क्या आप भी काका?' कहकर डाइनिंग की और जाने लगी और सामने से उदेश नीला कोट और गे हेट पहने हुए हाथ में कार की चाबी घुमाते हुए रूम से निकला।
'तुम इतनी जल्दी आ गई? मैं अभी तुम्हें लेने ही निकलने वाला था टैक्सी जल्दी से मिलती नहीं है, तुम लकी हो'
तो तुम्हारी नेवी ब्लू जीप मे ही तो आई हूॅं, स्टेशन से साथ में तो आए अभी' 
'क्या बोले जा रही हो तुम्हारी तबियत तो ठीक है? पुरे टाउन में अपनी एक ही नीली जीप है, अपनी गाड़ी तो अभी अपने गराज में है और फोन आया तुम्हारा के लेट है तो में अभी निकल ही रहा था 
'माई गोड तो वो कौन था? कहीं वो.......और..... तक्षवी बेहोश होकर गिर पड़ी।
 

A SUSPENS STORY

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