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अम्मा
अम्मा
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© archana nema

Abstract Drama

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बौराए, गदराए आम के पेड़ वाले आंगन में खुर खुर आती आवाजें , लगता है , अम्मा ने फिर आज बर्तन वाली बाई के लिए , बर्तनों का ढेर लगा दिया है ; और मन ही मन कुड़कुड़ाती बाई , खुरच खुरच कर ,पटक पटक कर काली कढ़ाई साफ कर रही है । पास ही धनिया की पत्ती तोड़ती अम्मा से जब बाई का यह बरतनी अत्याचार बर्दाश्त नहीं हुआ तो वह बोल ही पड़ी -

 "अरे क्या करती है आहिस्ता से हाथ चला कढ़ाई मांजनी है तोड़नी नहीं है । " 

"तुम भी अम्मा आंच पर बर्तन चढ़ा कर भूल जाती हो , देखो कैसी जलाई है तुमने यह कढ़ाई , और चार घर के काम पड़े हैं , आधा वक्त तो तुम्हारे घर के बर्तन रगड़ने में ही निकल जाता है ।"

बाई का भुन भुनाता प्रत्युत्तर था । अम्मा बाई के इस प्रत्युत्तर को आगे बढ़ा पाती कि इसके पहले सिगड़ी पर चढ़े कुकर ने अम्मा को सीटी बजा कर बुला लिया ।अम्मा बाई को बिना कोई जवाब दिए " हैं राम ! " की ऊर्ध्व श्वास के साथ टेक लगाती ,लड़खड़ाती सी रसोई की तरफ चल पड़ी। कुछ ही समय पश्चात रसोई से शांति संधि की भावना से लबरेज अपेक्षाकृत मृदु आवाज आई -

 " विमला ! चाय पिएगी क्या ? "

 गर्म तासीर वाली चाय का चैन पहुंचाने वाला ठंडा असर हुआ । विमला बाई की सारी चिड़चिड़ाहट मंद मुस्कान में तब्दील हो गई । धुले बर्तन रसोई में रखते हुए वह बोली 

" आज आपने अभी तक नहीं पी क्या ? "

" अरे नहीं वकील साहब के लिए जब बनाई थी तब पी थी ,अब तेरे लिए बना रही हूं तो घूंट दो घूंट मैं भी पी लूंगी । "

 अम्मा अपने चालीस साल पुराने वैवाहिक काल के सबसे प्रथम पर सबसे पुख्ता सबूत अपने पति को , वकील साहब कह कर पुकारती थी ।वकील साहब कितने पुराने व कितने सफल वकील थे यह कहना संशयात्मक था, , किंतु गिरता स्वास्थ्य या कहें बुढ़ापे की मार ने गोरे गट वकील साहब की गर्दन व देहगात को थोड़ा झुका दिया था ।

 उनका दुबला पतला अकड़ा सा व्यक्तित्व उनकी वृद्धावस्था के कारण था या बीती रात की कड़कड़ाती ठंड ने उनकी देह पर ऐसा प्रभाव डाला था , यह कहना भी मुश्किल था । खांसते ,खखारते पुराने भडभूदे से  काले कोट में उनकी देह यष्टि और सिमटी सी जान पड़ती लेकिन इतना सब होने के बाद भी वह अम्मा के 'ही मैन ' थे ।उनके घर के पिछवाड़े वाले आंगन में आम अमरूद व आंवले के पेड़ लगे थे ठंड की धूप अपनी समग्र लकदक के साथ अम्मा के आंगन में पसरी रहती । वही आंगन के एक कोने में छोटा सा चूल्हा जलाए अम्मा वकील साहब के नहाने का पानी गर्म करती रहती थी ।वकील साहब पिछवाड़े के गुसल खाने में जब अपने पट्टी वाले झोले नुमा कच्छे में प्रवेश करते तो अम्मा हाथ में तोलिया लिए वकील साहब की अर्दली में चुस्त मुस्तेेद रहती । वकील साहब की तरह ही थोड़ी झुकी हुई दुबली पतली अम्मा लगभग सफेद हो गए बालों में वकील साहब का साथ उनके काले बालों वाले अतीत से अनवरत निभाती चली आ रही थी । सड़सठ -अड़सठ की उम्र वाली अम्मा सुहाग के एकमात्र चिन्ह से भी कभी खुद को वंचित नहीं रखती थी ।कांच की खनखन बजती चूड़ियों से भरी कलाइयां , माथे पर लाल बड़ी बिंदी , पैरो में पाजेब , बिछिया और गले में पड़ा नाम मात्र के सोने वाला काली गूथनी से सजा मंगलसूत्र । अम्मा जब सफेद बालों में ढेर सा सिंदूर लगाती तो आसपास के सफेद बाल भी गुलाबी रंगत में रंग जाते ।अम्मा तीज पूजती तो चतुर्थी में भी उपासी रहती , ग्यारस में एक अन्न खाती तो पूर्णिमा पर चंद्र को अर्घ्य देना कभी नहीं भूलती , परमा हो या छठ भगवान और अम्मा का साथ बिना किसी गठबंधन के सात जन्मों के प्रण सा मजबूत था । वकील साहब को भोजन जिमा कर अम्मा के होठ किसी चालीसा मे रत हो बुुदबुुदाने लगते । वकील साहब के भोजन के पश्चात अपर्याप्त बची आलू टमाटर की रसीली सालन पानी का साथ पाकर और रसीली हो उठती। सिगड़ी में सिकी काठ जैसी रोटियों को अम्मा रसीली सालन में भिगोकर अपने बिना दांत वाले मसूड़ों से बहुत देर तक चबाती रहती ।

अकेले में भोजन करती अम्मा कभी कभी विचार मगन हो जाती और अचानक से थाली एक और सरका कर सुबक सुबक कर रोने लगती ।शायद भोजन से जुड़ी विगत स्मृतियां अम्मा के कलेजे में आकर अटक जाती और उन स्मृतियों में बसा दुख उनकी आँखों से अश्रु धार बनकर टपकने लगता ऐसे में आम की बौर खुरचती, चिहुकती चिड़िया अपनी अस्पष्ट चहचहाहट से अम्मा का दुख बांटने का प्रयास करती पर इस सब से बेखबर अम्मा मानो अपने अंतर्मन में जैसे किसी चलचित्र का फ्लैश बैक देख कर दुखी हो जाती ।अम्मा के इस दुख का कारण उनके एकमात्र युवा पुत्र की असामयिक मृत्यु थी । जीवन स्तर से निम्न मध्यमवर्गीय परिवार का यह पुत्र बहुत मेधावी रहा हो ऐसा कुछ नहीं था ।अध्ययन में औसत रहे इस पुत्र का इसकी टोपी उसके सिर वाला धंधा था । अम्मा और वकील साहब बस इतना जानते थे कि उनका पुत्र किसी कपड़े की दुकान में काम करता है लेकिन अम्मा के बेटे के धंधे ट्रिक वाले होते थे जिन्हें आपराधिक नहीं कहा जा सकता था । जब कभी लड़के के धंधे में अतिरिक्त आमदनी हो जाती तो रात्रि भोज में सादी सालन के साथ मिठाई नमकीन का चटखारे भरा समागम हो जाता ।

कम सुविधाओं वाला यह घर फिर भी खुशियों की गुनगुनाहट से भरा रहता ।तीनों प्राणी अपने अपने हिस्से की खुशियों का आदान-प्रदान मुक्त हस्त से एक दूसरे को करते रहते और इस तरह से गृहस्ती अपनी चाल से मस्त चलती रहती । 

अम्मा जब संतान साते का उपवास रहती तो वकील साहब गुड मीड़कर अम्मा के लिए पुए बनाने में मदद करते और जब अम्मा हरितालिका तीज पर वकील साहब के लिए निर्जला रहती तो बेटा बड़े मनोयोग से अम्मा के गौरा- शिव के लिए फूलों का फुलेरा बना देता।

ठंड में जब वकील साहब खेत मे ,पिरता, खदबदाता, गरम गुड़ लेकर 

 आते तो अम्मा अपने सपूत के लिए गरमा गरम गुलगुले घी की कढ़ाई में छोड़ देती । 

कम में ही सही तीनों से बनी यह छोटी सी गृहस्थी डोलती हिचकोले खाती मस्ती से चल रही थी कि, तभी इसमें एक विघ्न आ गया ।बीती शाम से अम्मा का बेटा कुछ का काँपता सा नरम गरम था, रात होते-होते उसे तेज ज्वर ने जकड़ लिया । बुखार से तपती देह पर पड़ी दो तीन रजाइयां भी धूजती देह को रोक नहीं पा रही थी । देर रात तक होती उल्टीयो ने अम्मा व बूढ़े वकील को किसी अनहोनी की आशंका से भर दिया । आधी रात को ही ऑटो में डाल ठंड से कांपते लड़के को सरकारी अस्पताल ले गए। आधी रात में नींद खराब होने के कारण चिड़चिड़े डॉक्टर ने लापरवाही भरा कौन सा इंजेक्शन लगाया कि वकील साहब के बेटे की ठंड से कांपती देह कुछ ही देर में लकड़ी के काठ सी निष्क्रिय रह गई । लड़के की निर्जीव देह को हिलाते डुलाते अम्मा और वकील साहब कुछ देर तो समझ ही नहीं पाए कि कोई अनहोनी हो गई है । मृत देह पर जब नीले नीले निशान उभरने लगे तब घिघियाते से वकील साहब ने कंपाउंडर से उनके बच्चे को बचाने की मिन्नत की ।आए दिन की मौतें देखने का अभ्यस्त कंपाउंडर संवेदनहीनता से उठा और थोड़ी बहुत जांच करने के पश्चात भाव विहीन होकर बोला 

" लड़का मर गया है, ले जाओ "

स्ट्रेचर नुमा  पलंग पर निर्जीव पड़ी देह को अम्मा और वकील साहब ने एक बार ,एक नजर देखा लेकिन जैसे कंपाउंडर के वाक्य का उन पर कोई असर ही नहीं हुआ हो । लड़के की कलाई धाम वकील साहब ने पुनः कंपाउंडर से दारुण विनती की कि वह एक बार उनके लड़के को प्राण दान दे दे लेकिन मौत की तरह ही स्पंदन विहीन एवं भावना विहीन कंपाउंडर तेज स्वर में बोला -

"अरे दादा कहा ना आपसे ! इस में जान नहीं है ले जाओ इसे यहां से ; सुबह होने को है , अभी बाकी मरीज आने शुरू हो जाएगे " 

अम्मा और वकील साहब जैसे इस बात पर भरोसा ही नहीं करना चाह रहे थे ।अम्मा अपने बेटे के गाल सहला रही थी मानो उस में प्राण फूंक देना चाहती हो , किसी इमारत की नीव में विस्फोटक भरने के बाद इमारत की जो हालत होती है लगभग वही हालत वकील साहब की थी ।पास में ही खड़े किसी व्यक्ति ने उन्हें पहचाना और उनके साथ घटित इस महा भयानक हादसे से उनका परिचय करवाया ।अम्मा की चीख इतनी ह्रदय विदारक थी कि वह उनके सीने में ही घुट के रह गई , वकील साहब तो जैसे सिर्फ अस्थि मज्जा का ढांचा शेष रह गए थे मानो , स्मृति, स्पंदन ,संवेदन ,चेतना की बूंदे, दुख के जेठ की निर्दयी कड़कती धूप के द्वारा सोख ली गई थी  

जब पुत्र की मृत देह घर पर लाई गई तो लगा आंगन के पेड़ की छांव में एक मृत देह नहीं तीन मृत देह पड़ी हो । रोज के व्यस्त आवाजों से भरे आंगन की सभी ध्वनियां मृत प्राय थी , बची थी तो बस मौत से रंगी नीरवता - नि: शब्दता ।

 लड़के का अंतिम संस्कार हुआ लेकिन इस अंतिम संस्कार ने मानो घर के सभी संस्कारों की इतिश्री कर दी थी । अब आंगन में चालीसा नहीं गूंजता था । अम्मा की चूड़ियों में खनक शेष नहीं थी , सुबह सवेरे नहाने के लिए वकील साहब का ची ची करता हैंडपंप कुछ शांत सा पड़ गया था । वकील साहब और अम्मा साथ रहकर भी जैसे साथ नहीं थे । रोज की अनिवार्य रवायतों के बीच शायद ही कभी ऐसा होता हो कि दोनों पति पत्नी नजर भर एक दूसरे को देखते हो । आंवला नवमी पर अम्मा के घर पर सजी-धजी मंगल सोहरे गाती महिलाओं की टोली अब इस आंगन से बच कर निकल जाती थी । ढोलक की थाप कहीं खो गई थी ।कभी-कभी तो घर की दीवारें एक दूसरे को याद दिलाती थी कि घर में दो जिंदा इंसानों का निवास भी है । घर में छिपकलियों की टर टर और चूहों की उछल कूद के रूप में मात्र जिंदगी शेष थी ।

 एक दोपहर जब अम्मा अनमनी सी बैठी ,अनाज से भरी सूप में उंगलियां फिरा रही थी , के द्वार पर तेज दस्तक हुई , दरवाजा खोला तो देखा एक हष्ट पुष्ट देह वाला युवा पुरुष खड़ा था , चेहरे का ताव , तीखी चुभती आंखें व फड़कती मूंछों से स्पष्ट था । पुष्ट देह पर झूलते ढीले कुर्ते की बाहें मांसल भुजाओं पर परत दर परत इकट्ठा थी । अम्मा की आँखों में युवा ने खुद को लेकर अपरिचित भाव की प्रतिक्रिया देखी तो वह खुद ही थोड़े तेज स्वर में बताने लगा -

" देखो आंटी तुम्हारे लड़के ने हमारे से पन्द्रह हजार रुपये उधार कह के लिए थे , महीना भर से तुम्हारे आदमी के चक्कर लगा रहे हैं कि हमारी रकम वापस कर दो लेकिन आज तारीख तक हमाई रकम की एक अठन्नी भी हमको वापस नहीं मिली इसलिए मजबूर होकर आज हम घर पर आ धमके । "

 एक सांस में कितना कुछ रोबदार आवाज में अम्मा के कानों से आ टकराया । अम्मा कुछ समझ पाती इसके पहले आगंतुक का स्वर पुनः गूंजा ।

" आंटी हमारे रुपए तुम्हारे लड़के ने लिए थे, हमें पता है कि वह मर गया है , इतने दिनों से गम खाए थे लेकिन अब हमारी भी गुंजाइश खत्म हो गई है। बहन बैठी है घर में ब्याहने ,उसकी भी बात पक्की सी ही है ।कल को हमें भी उसका दहेज जुटाना है ।"

अरे ! अब जब खुद का ही पेट खाली है तो परमारथ कहां से सूझे । 

कड़कती आवाज में की गई उगाही के कारण अम्मा के चेहरे पर बेचारगी व विवशता के भाव प्रस्फुटित हो उठे । लाचारी का भाव अम्मा के चेहरे पर इतना अधिक स्पष्ट था कि इसने युवा के क्रोध पर नरमियत का छिड़काव कर दिया । दुख का आधिक्य था अथवा बुढ़ापे का कारण, अम्मा की पलकों की परतें आंखों की पुतली के ऊपरी हिस्से पर ढुलक गई थी । अम्मा से अपेक्षाकृत नरम लहजे में युवा ने अपनी रकम प्राप्ति की बात दोहराई और वहां से डगमगाता सा चला गया । शाम को जब वकील साहब घर वापस लौटे और खूंटी पर अपना काला कोट टांगने लगे तब हाथ में पानी का गिलास लिए अम्मा ने दोपहर वाली घटना सुनाई । पहले से ही सब जानने वाले वकील साहब ने संक्षिप्त " हूं " से अपनी सर्वज्ञता जाहिर की । उनके इस अनुत्तरित भाव से अम्मा थोड़ा सा चिढ़ गई , -

" हूं क्या ? कौन है यह लड़का ? और काय के पैसे मांग रहा है हमसे । "

अम्मा के प्रश्न में किंचित रोष था । बोझ ढोते कंधों के साथ वकील साहब पास पड़ी चारपाई पर निढाल से बैठ गए । अम्मा की आँखों के स्पष्ट प्रश्न से बचकर निकलना जब संभव नहीं दिखा तो वकील साहब बोले --

" दिवाली पर अखिलेश (अम्मा का लड़का ) ने इस लड़के से उधार पर पंद्रह हजार की रकम ली थी ,अब यह लड़का गजानन अपनी रकम वापस चाहता है ।"

अपने प्रश्न का उत्तर पाकर अम्मा चिंतित सी वकील साहब के पास आकर बैठ गई और विचार विश्लेषण करती हुई बोली -

"अरे हां ! अखिलेश लाया तो था रुपए ; लेकिन वह तो कहता था कि उसने मालिक से एडवांस लिया है । "

" उन रुपयों में से कुछ बचे हैं क्या ? "

वकील साहब ने एक उम्मीद भरा प्रश्न अम्मा से किया । -

" कुछ पैसे तो व्रत त्यौहार में खर्च हो गए और बाकी बचे तुम्हारे भाई पुरुषोत्तम की लड़की के ब्याह में ।हजार पांच सौ जो बचे थे वह दवाइयों की भेंट चढ़ गए । "

उम्मीद तोड़ता जवाब वकील साहब के पूछे गए सवाल के परिणाम में प्रस्तुत था । कुछ देर के लिए कमरे में चारों तरफ नि:शब्दता छा गई । दोनों पति-पत्नी एक ही प्रश्न का उत्तर खोजने में व्यस्त हो गए कि कैसे गजानन का उधार चुकाया जाएगा ? विचार-विमर्श के पश्चात यह निर्णय लिया गया कि कुछ मासिक बचत करके ही इस ऋण से मुक्त हुआ जा सकता था ।

चढ़ती ढलती धूप की तरह दिन भी पल-पल ,क्षण क्षण कर के कटने लगे । वही नियमित बे- रंगी , बे- रस सी दिनचर्या , जिसे भरसक प्रयत्न से अंतिम चरण तक पहुंचाया जाता था , लेकिन जल्द ही इस दिनचर्या में एक अनदेखा अनचीन्हा सा रंग , गजानन के रूप में चुपचाप दाखिल हो गया था ।अपने उधार की उगाही करने गजानन समय बे समय आने लगा था ।जख्म पर मरहम सी घटनाएं क्षण दर क्षण घटती रही । एक दोपहर गजानन अपना ऋण लेकर जाने पर अड़ गया और कमरे में पड़ी खाट पर धरना देकर बैठ गया । जेठ की दोपहर का अलसाया सा असर था या पिछले दिन के अतिरिक्त काम की थकान , गजानन खाट पर ही खर्राटे मारने लगा । जब सांझ को पक्षियों के अपने बसेरों में जाने की हलचल प्रारंभ हुई तब गजानन की आँख खुली ।सामने रसोई में अम्मा सुलगती सिगड़ी पर चढ़ी कढ़ाई में कुछ टार रही थी। सुबह का खाया हुआ शाम तक पच गया था और अब गजानन के पेट को कुछ भोज्य पदार्थ की दरकार थी लेकिन कहे तो कैसे कहे ।

 माँ के मन का बच्चों के पेट से एक अदृश्य नाता होता है बच्चों की भूख से मातृत्व कभी अनभिज्ञ नहीं रह सकता ।गजानन खाट से उठ कर जाता इसके पहले अम्मा ने सूजी का हलवा और गरम पकौड़े की प्लेट गजानन के सामने रख दी ,साथ ही एक गर्म चाय का प्याला भी था। गजानन की तीव्र जागी क्षुधा ने उसे ज्यादा सोच विचार का मौका नहीं दिया और वह चाय के साथ गरम पकौड़ो का आनंद लेने लगा । जब पेट भर गया तब गजानन खाट से उठ खड़ा हुआ और -

" आंटी जा रहा हूं "

कहकर मुख्य द्वार से बाहर निकल गया । अम्मा के ह्रदय में भी एक अनचीन्हा सा संतोष था बिल्कुल वैसा ही जैसा अखिलेश के भोजन कर लेने के पश्चात होता था । वह शाम कुछ हल्की थी , रोज के अवसादी छीटों के स्थान पर उस शाम में महकते वात्सल्य की खुशबू तैर रही थी ।टेबल से प्लेटे बटोरती अम्मा का मन ना जाने क्यों हल्का था । गजानन का आना पूर्ववत जारी था बस भाव बदल गए थे । अम्मा और गजानन एक अंनदेखी स्नेह डोर से बंधते चले जा रहे थे । अखिलेश का उल्लेख बातचीत में अब भी होता था लेकिन किसी कर्ज उगाही सा नहीं बल्कि अखिलेश की विषयान्तरगत बात के दौरान की गई चर्चा जैसा । एक रोज पंचांग बांचने के लिए अम्मा ने कैलेंडर उठाया तिथियों पर फिसलती अम्मा की उंगलियां अचानक से रुक गयीं । लाल घेरे से घिरे खाने में "हरछट " लिखा था । 

 "कल हरछट है ! अखिलेश के बाद की पहली हरछट ! " 

अम्मा का मन ही मन बुदबुदाना जारी था । ना जाने क्यों अम्मा का मन हुआ कि वह पुनः पुत्र की दीर्घायु की कामना वाला हरछट वृत उपासी रहे ,लेकिन दिमाग इस व्रत को करने की नकारात्मकता की तरफ संकेत कर रहा था फिर भी मन न जाने क्यों कहता था कि यह व्रत साध लिया जाए।

 अगले दिन सारे विचार विश्लेषण को दरकिनार कर अम्मा ने मुंह अंधेरे ही स्नान कर लिया और फूल, दूब ढूंढने मंदिर के प्रांगण की तरफ चल निकली ।मन में एक हिचक सी थी लेकिन फिर भी मन हल्का था ।वात्सल्य से परिपूर्ण , संतान की दीर्घायु एवं संतान समृद्धि के लिए गुपचुप तरीके से रखें इस व्रत की पोल अम्मा की चूड़ियों की खनक खोल रही थी । वकील साहब को भेजने के पश्चात व्रत धारिणी अम्मा पूजा के लिए धूप दीप नैवेद्य खोजने लगी। मन में कोई इच्छा घुमड़ रही थी कि सामने से गज की तरह डौलता, मुस्कुराता, गजानन प्रत्यक्ष था ।

" और आंटी क्या बात है ? आज बड़े सवेरे ही नहा ली ? "

 सामने आंगन में आंवले के पेड़ के नीचे गीली मिट्टी के ढेर में " काँस " खुसी देखी तो एक प्रश्न सा आँखों में उभर आया, त्वरित ही अनजाने में जब अम्मा की तरफ देखा तो अम्मा कुछ सिहरी सी खड़ी थी । अगले ही पल कुछ भापकर गजानन सम्भला ।  

"अरे आंटी ! आज उपासी से हो ! पहले क्यों नहीं बताया ! "

 कहकर गजानन घर की देहरी लांघ गया । कुछ देर बाद जब लौटा तो हाथ में केले का एक बड़ा गुच्चा ,खारक ,महुआ, सतनजा व व्रत में उपयोगी सभी चीजों के पैकेट हाथ में थे । व्रत की समस्त सामग्री हाथ में झुलाता आंटी ! आंटी ! चिल्लाता गजानन व्रत साधिनी अम्मा के समक्ष खड़ा हुआ था । अम्मा की आँखे वात्सल्य से सजल हो छलकना चाह रही थी तभी बगल की आंगन से महिलाओं के समवेत स्वर में मंगल सोहरो की आवाज़ गूंजने लगी । अम्मा कहीं खो सी गई तभी गजानन का स्वर गूंजा -

" अरे आंटी पूजा नहीं करना क्या ? मुहूर्त बस दूसरे पहर का है ! "

माँ स्नेह ममता

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