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हमदर्द साथी - अंतिम भाग
हमदर्द साथी - अंतिम भाग
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© Varman Garhwal

Drama Romance

109 Minutes   5.6K    16


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अगले दिन पच्चीस जून, रविवार की सुबह छः बजे सुदर्शन जाग गया। कृतिका अभी तक सो रही है। सुदर्शन कृतिका के चेहरे की ओर देखकर मुस्कुराते हुए बैड से उठकर नहाने के लिए चला जाता है।

सुदर्शन ने नहाते हुए सोचा कि कृतिका ने आजकल सुबह–सुबह शराब की जगह चाय पीने की आदत डाली है और अपने को ना चाय बनानी आती है, ना अपने पास चाय बनाने का सामान है। चल जल्दी से नहा ले, फिर चौक वाली चाय की दुकान से चाय लेकर आते हैं।

सुदर्शन नहाकर कपड़े पहनकर कमरे में आकर कृतिका को अभी तक सोती देखकर चाय लाने चला जाता है।

पौने सात बजे कृतिका की नींद खुलती है।

कृतिका ने बैड से उतरकर कमरे से बाहर आकर सुदर्शन को ना पाकर कहा—“अब ये सुबह–सुबह कहाँ चला गया?”

कृतिका वापस कमरे में आकर बैड पर बैठकर सुदर्शन का इंतजार करने लगती है।

पन्द्रह मिनट बाद सुदर्शन एक हाथ में थैली में डली चाय और दूसरे हाथ में चार डिस्पोजल कप लिए आकर किचन में जाकर डिस्पोजल में चाय डालने लगता है।

कृतिका कमरे से बाहर आकर बोली—“सुबह–सुबह कहाँ चले गए थे?”

सुदर्शन दोनों हाथों में चाय से भरे डिस्पोजल कप लेकर किचन से बाहर आते हुए बोला—“तुम्हारे लिए चाय लेने गया था।”

कृतिका—“तुम खाने–पीने का सामान और बरतन वगैरह ले आओ ना। हम यहीं बना लेंगे।”

सुदर्शन एक डिस्पोजल कप कृतिका को देते हुए बोला—“तुम्हें बताया तो था, मुझे चाय–खाना कुछ भी बनाना नहीं आता।”

कृतिका एक डिस्पोजल कप लेकर बोली—“अरे, मैं बना लूँगी। मुझे तो बनाना आता है।”

सुदर्शन ने हँसकर कहा—“तुम मेरी बीवी थोड़े ही हो, जो मेरे लिए चाय–खाना बनाओगी। और फिर इस बिल्डिंग के मालिक से भी पूछना पड़ेगा, वो तुम्हें यहाँ रहने देगा या नहीं?”

कृतिका—“अगर उसने मुझे यहाँ रहने से मना कर दिया तो?”

सुदर्शन—“तो दूसरी जगह देख लेंगे। चलो, अन्दर बैठकर चाय पिलो। फिर नहाना हो तो नहा लेना। कपड़े तो एक बार यहीं पहनने पड़ेंगे। हाँ, अगर मेरे कपड़े पहनना चाहो, तो पहन सकती हो। लेकिन मेरे पास बस ऐसे सिम्पल पेन्ट–शर्ट ही है, जींस वगैरह तो मैं पहनता नहीं।”

कृतिका कमरे के अन्दर आकर बैड पर बैठकर बोली—“तुम्हारे कपड़े मुझे आ जाएँगें?”

सुदर्शन कमरे के दरवाजे के पास खड़ा होकर बोला—“शरीर में तो हम दोनों एक जैसे ही है। बस हाईट में तुम एक-डेढ़ इंच छोटी हो।”

कृतिका ने हँसकर कहा—“चलो, ठीक है। ट्राई करके देख लूँगी।”

सुदर्शन ने मुस्कुराकर अलमारी की ओर संकेत करके कहा—“उसमें मेरे आठ-नौ जोड़ी कपड़े पड़े हैं। जो पसन्द आए, पहन लेना।”

कृतिका—“ठीक है, मैं दिन में नहा लूँगी। मुझे तो सारा दिन घर पर ही रहना है।”

सुदर्शन ने कृतिका की चाय ख़त्म होती देखकर कहा—“जैसे तुम्हारी मर्ज़ी। चाय और है, किचन में।”

कृतिका—“नहीं–नहीं, तुम ले लो।”

सुदर्शन—“अरे नहीं–नहीं क्या? मैं तो वैसे भी रोज ऑफ़िस में जाकर चाय पीता हूँ, तुम पी लो।”

कृतिका—“ठीक है।”

कृतिका उठकर चाय लेने किचन में चली जाती है।

सुबह नौ बजे ऑफ़िस के लिए तैयार हो चुके सुदर्शन ने कृतिका से कहा—“अच्छा, मैं अब ऑफ़िस जा रहा हूँ। आज शाम को जल्दी आ जाऊँगा। तुम अपना और बिल्डिंग का ख्याल रखना। किसी को अन्दर मत घुसने देना और कुछ चाहिए हो, तो ये पास में नारायण की दुकान से ले आना। पैसे मैं दे दूँगा उसको।”

कृतिका—“ठीक है।”

सुदर्शन कमरे से निकलकर फ्लेट से बाहर जाकर सीढ़ियां उतरकर बिल्डिंग से बाहर जाने लगता है।

कृतिका बालकनी में आकर सुदर्शन को जाते हुए देखने लगती है। कृतिका को दिव्यांश की कहीं हुई बातें याद आती है। कृतिका की आँखें भीगने लगती है।

कृतिका ने मन में सोचा कि काश मैं तुम्हारी बीवी बनकर तुम्हारे लिए खाना बनाने के लायक होती। लेकिन मैं तो उस कमीने पर भरोसा करके किसी की बीवी बनने लायक रही ही नहीं। मेरे जैसी लड़कियाँ सिर्फ मज़े लेने के लिए होती हैं, शादी करने के लिए नहीं।

शाम के पाँच बजे सुदर्शन अपना काम पूरा करके कुर्सी से उठते हुए कुर्सी पीछे सरकाकर खड़ा हुआ और अपने टेबल पर रखा सामान उठाकर जयसिंह के केबिन में रखकर सीढ़ियां चढ़ते हुए ऊपर आता है।

सोफे पर बैठी सृष्टि पढ़ रही है।

सुदर्शन—“सृष्टि, पापा कहाँ है?”

सृष्टि बूक रखकर खड़ी होते हुए बोली—“अभी बुलाती हूँ।”

सृष्टि दूसरी मंजिल पर जाती सीढियों के पास आकर जोर से बोली—“पापा, सुदर्शन भैया बुला रहे हैं।”

सृष्टी वापस सोफे पर आकर अपनी बुक लेकर बैठ गई। जयसिंह सीढ़ियां उतरते हुए नीचे आते हैं।

जयसिंह—“वो हो गया क्या?”

सुदर्शन—“हाँ, सारे नेकलेस कड़ी लगाकर केबिन में रख दिये।”

जयसिंह ने बेसमेंट की सीढ़ियों की ओर मुड़ते हुए कहा—“चलो, फिर दूसरा काम देता हूँ।”

सुदर्शन—“सेठ जी।”

जयसिंह रुककर सुदर्शन की ओर मुड़कर बोले—“हाँ।”

सुदर्शन—“आज मैं जल्दी चला जाऊँ?”

जयसिंह—“लेकिन अभी तो पाँच ही बजे है।”

सुदर्शन—“सेठ जी, वो कृतिका अकैली होगी ना।”

जयसिंह मुस्कुराते हुए बोले—“अरे यार, तू तो शादी से पहले ही पत्नीवर्ता बन रहा है। पहले शादी तो कर लें।”

सुदर्शन ने शर्माकर मुस्कुराते हुए कहा—“नहीं, सेठ जी। ऐसी कोई बात नहीं है। बस वो जिन्दगी में परेशान है, इसलिए थोड़ी हमदर्दी है।”

जयसिंह—“कोई बात नहीं, ठीक है। जाओ।”

सुदर्शन मुड़कर घर का दरवाजा खोलता है।

जयसिंह—“अरे, सुनो।”

सुदर्शन रुककर जयसिंह की ओर देखकर बोला—“हाँ, सेठ जी?”

जयसिंह—“तुम उसके साथ रह तो रहे हो, लेकिन अपनी लिमिट का ध्यान रखना। वो तो उसके माँ–बाप गलत है, वरना मैं तुम्हें उसके साथ रहने नहीं देता। इसलिए ये बात हमेशा याद रखना, उससे तुम्हारी शादी नहीं हुई है। कोई हमें ओळमा देकर ये ना कहें, आप लोग सुदर्शन के हिमायती बनते हो।”

सुदर्शन—“मैं सब समझता हूँ, सेठ जी। मैं हर बात हमेशा ध्यान में रखता हूँ। मेरे कारण आपको कभी ओळमा नहीं मिलेगा।”

जयसिंह—“बहुत अच्छी बात है। अब जाओ।”

सुदर्शन चला जाता है।

सृष्टि ने बुक बन्द करके कहा—“पापा, आपसे एक बात पूछू?”

जयसिंह सृष्टि की ओर मुड़कर बोले—“हाँ, पूछो।”

सृष्टि—“पापा, सुदर्शन भैया उस लड़की के साथ रहते–रहते उसके साथ रिलेशन बना लेते है, तो क्या ये गलत होगा? क्योंकि सुदर्शन भैया को तो हम सब बहुत अच्छी तरह जानते है। सुदर्शन भैया उस लड़के दिव्यांश की तरह कृतिका को धोखा नहीं देंगे।”

जयसिंह सृष्टी के पास बैठकर बोले—“बेटा, ये सोचने वाली बात है। सुदर्शन ने तो उस लड़की को इसलिए अपने साथ रखा है, क्योंकि उस लड़की के माँ–बाप ने उसकी मदद करने की जगह उसके साथ बहुत बुरा व्यवहार किया। वो लड़की सुदर्शन से चार–पाँच हजार रुपये माँगकर इस शहर को छोड़कर जा रही थी। अब आजकल टाइम कितना खराब है, ये तो तुम भी जानती हो। ऐसे में सुदर्शन उसकी मदद कर रहा है, तो इसमें कोई बुराई नहीं है। लेकिन अगर कोई लड़का सुदर्शन के देखा–देखी, सुदर्शन लड़की को अपने साथ रख रहा है, तो मैं भी किसी लड़की को अपने साथ रख लेता हूँ। तब उस लड़के का लड़की को अपने साथ रखना सही है या गलत?”

सृष्टि—“हम्म…शायद नहीं।”

जयसिंह—“शायद, तुम्हें समझ नहीं आया। देखो, पहली बात तो ये है, सुदर्शन ऐसा कुछ करेगा ही नहीं। और अगर सुदर्शन उस लड़की के साथ रिलेशन बनाए तो हमें पता है, सुदर्शन उस लड़की को धोखा नहीं देगा। आज नहीं तो कल लड़की से शादी कर लेगा। लेकिन इस बात का फायदा उस दिव्यांश नाम के लड़के जैसे गलत लोग उठा सकते है। फोर एग्जामपल सुदर्शन के आस–पास रहने वाला कोई गलत लड़का सुदर्शन का उदाहरण देकर अपनी गर्लफ्रैंड से कहें, देखो, सुदर्शन शादी किये बिना एक लड़की के साथ रिलेशन में है, तो हम क्यों नहीं रह सकते? अब जो लड़की हमारी तरह सुदर्शन को जानती है, वो क्या सोचेंगी? सुदर्शन जैसा अच्छा लड़का शादी किये बिना रिलेशन में रह रहा है, तो इसमें कुछ गलत नहीं होगा। मैं भी मेरे बॉयफ्रैंड के साथ रह लेती हूँ। जैसे सुदर्शन बाद में शादी करेगा, उसी तरह मैं भी मेरे बॉयफ्रैंड से बाद में शादी कर लूँगी।”

सृष्टि—“हम्म, और बॉयफ्रैंड अपना मतलब पूरा होने के बाद पलट जाता है। लड़की ने एक अच्छे लड़के को फॉलो किया, लेकिन पूरी बात जाने और समझे बिना गलत लड़के को चुन लिया।”

जयसिंह ने सृष्टि के कंधे पर हाथ रखकर कहा—“हाँ, अब तुमने सही कहा। तुम्हें ये तो पता ही है, तुम्हारी मम्मी से पहले मेरी शादी किसी ओर से हो गई थी। बाद में उससे अलग होने के बाद मेरी शादी तुम्हारी मम्मी से हुई। अब कोई मेरा उदाहरण देकर अपनी पत्नी को छोड़कर किसी ओर से शादी करें, तो क्या ये सही होगा?”

सृष्टी—“लेकिन आपकी शादी तो दादाजी और उसके (पहली पत्नी के) घरवालों ने जबरदस्ती की थी। और आपने उससे शादी करने के बाद भी उसे अपनी पत्नी माना ही नहीं था। आप तो मम्मी को ही अपनी पत्नी मानते थे।”

जयसिंह—“हाँ, लेकिन गलत लोग सारी बात नहीं बताएंगे। गलत लोग सिर्फ आधी–अधूरी बात बताएँगें, जिससे अपनी गलत मनमानी को सही साबित कर सकें। अगर कोई पुरुष एक बार किसी नारी को अपनी पत्नी मानकर अपना लें, फिर उस पुरुष का अपनी पत्नी को छोड़ देना, बिलकुल गलत है। या तो किसी को जीवनसाथी बनाओ मत और अगर किसी को जीवनसाथी बना लिया, तो फिर पूरी ईमानदारी रिश्ता निभाओ।”

सृष्टि—“हम्म… मतलब सुदर्शन भैया उस लड़की के साथ रिलेशन बनाए तो गलत नहीं है क्योंकि सुदर्शन भैया उसे धोखा नहीं देंगे लेकिन कहीं मैं सुदर्शन भैया को फॉलो करके बिना किसी मजबूरी के किसी गलत लड़के के चक्कर में फँस गई और अपनी मनमानी करने लगी। तब गलत हो जाएगा।”

जयसिंह ने हँसकर कहा—“हाँ बेटी, हर माँ–बाप के मन में यहीं डर रहता है। इसलिए तो हम हर बात तुम्हें समझाते हैं।”

सृष्टि हँसकर बोली—“डॉन्ट वैरि पापा, मैं ऐसा कुछ नहीं करूँगी। अगर मेरी लाइफ़ में कोई लड़का आया, तो मैं सबसे पहले उसे आपसे और मम्मी से मिलवाऊँगी। वो आप दोनों को पसन्द आया, तो ठीक है। वरना वहीं लव का द एंड कर दूँगी।”

जयसिंह ने मुस्कुराकर सृष्टि को गले लगाकर कहा—“आई एम प्राउड ऑफ यू। हमें पता है।”

शाम के छः बजे बिल्डिंग की छत पर खड़े सुदर्शन और कृतिका बातें कर रहे हैं। नीचे बिल्डिंग की ओर एक गाड़ी आ रही है।

सुदर्शन ने नीचे देखकर कहा—“ये अचानक कैसे आ गया?"

कृतिका ने गाड़ी की ओर देखकर कहा—“कौन आ गया?"

सुदर्शन—“इस बिल्डिंग के मालिक की गाड़ी है।

गाड़ी बिल्डिंग के सामने आकर रुकती है। आयु में बयालिस(42) वर्ष के राज किशोर गाड़ी से उतरकर गाड़ी का गेट बन्द करके ऊपर देखकर सुदर्शन को नीचे आने का संकेत करते हैं।

सुदर्शन और कृतिका नीचे आने लगते हैं।

नीचे आकर बिल्डिंग से बाहर आते हुए सुदर्शन ने कहा—“नमस्ते, अंकल जी। आज अचानक कैसे आना हुआ?”

राज किशोर ने अकड़ते हुए कहा—“क्यों, मेरी बिल्डिंग में आने के लिए तुमसे इजाज़त लेनी पड़ेगी क्या?”

कृतिका नीचे आकर बिल्डिंग के दरवाजे पर खड़ी होती है।

सुदर्शन—“नहीं–नहीं, आप तो बुरा मान गए। मैं तो वैसे ही पूछ रहा था। असल में मैं खुद भी आपसे मिलने आने वाला था।”

राज किशोर—“अब तूने काम ही ऐसा कर दिया, बुरा तो लगना ही था। मैनें ये बिल्डिंग सस्ते किराये में तुझे रहने के लिए इसलिए दी थी, क्योंकि बिजी होने के कारण मेरा इस साइड चक्कर कम लगता है। तू यहाँ रहेगा, तो बिल्डिंग की देखभाल होती रहेंगी। लेकिन तू तो लड़की लाकर मेरी बिल्डिंग को अय्याशी करने का अड्डा बना रहा है।”

सुदर्शन ने गंभीरता से कहा—“अंकल, मैं यहाँ कोई कॉलगर्ल लेकर नहीं आया और ना ही किसी को जबरदस्ती उठाकर लाया हूँ। ये सेठ साँवरमल जी की बेटी है और मैं इसके साथ कोई अय्याशी नहीं कर रहा हूँ।”

राज किशोर—“हाँ, मुझे भी पता है, ये किसकी बेटी है। इसके तो अब गली–गली में चर्चें हो रहे है। तू इसके साथ कुछ भी कर, लेकिन मेरी बिल्डिंग से बाहर।”

सुदर्शन—“कौन से चर्चें हो रहे है? एक लड़के ने प्यार और शादी के वादे करके इसको धोखा दिया, इसने उस लड़के के बारे में फेसबुक पर पोस्ट करके सबको बताया। उस लड़के का कमीनापन सबके सामने आ गया। अब जो उस लड़के जैसे घटिया लोग हैं, वो तो चर्चें करेंगे ही। उनको डर लग रहा होगा, कल को कोई लड़की कृतिका की तरह उनकी पोल ना खोल दें।”

राज किशोर ने कठोरता से कहा—“मुझे तेरे साथ कोई बहस नहीं करनी। तू तो बस अभी के अभी इस लड़की को मेरी बिल्डिंग से बाहर निकाल या फिर तू खुद भी इसके साथ निकल जा।”

सुदर्शन—“ठीक है, मैं दो–चार दिन में कोई दूसरी जगह देख लेता हूँ। फिर आपकी बिल्डिंग खाली कर दूँगा।”

राज किशोर—“मेरी बात तुझे समझ नहीं आई? तू अभी निकल यहाँ से।”

सुदर्शन—“लेकिन अंकल, अभी अचानक हम कहाँ जाएंगें?”

राज किशोर—“भाड़ में जा। मुझे पूछकर लाया था इसको? मेरे भाहे सड़क पर रह। मैं बिल्डिंग को ताला लगाकर जा रहा हूँ। किराया देकर तेरा सामान निकालकर ले जाना।”

कृतिका ने कहा—“एक्सक्यूज मी, आपको सिर्फ मुझसे प्रोब्लम है ना? मैं जा रही हूँ यहाँ से।"

सुदर्शन ने कृतिका से कहा—“रुको ! तुम्हें कहीं जाने की ज़रूरत नहीं है।"

राज किशोर ने कठोरता से कहा—“जाना तो पड़ेगा। तुम दोनों को।"

सुदर्शन—“हाँ, जा रहें हैं। मैं एटीएम से पैसे निकालकर लाता हूँ।”

राज किशोर—“जल्दी ले के आ।”

कृतिका चलकर सुदर्शन के पास आकर बोली—“मैं चली जाती हूँ ना। तुम क्यों परेशान हो रहे हो?”

सुदर्शन ने मुस्कुराकर कहा—“तुम टेन्शन मत लो। सामान नारायण के घर छोड़कर दो–चार दिन किसी होटल में रह लेंगे।”

कृतिका—“लेकिन…”

सुदर्शन—“बस अब सामान निकालने दो। वरना ये ताला लगाकर चले जाएँगे।”

गली के चौराहे पर खड़े होकर आयु में चौदह(14) वर्ष से अठारह(18) वर्ष तक के पाँच लड़के आपस में बातें कर रहे हैं।

सुदर्शन ने आवाज़ लगाकर कहा—“करन ! इन चारों को लेकर इधर आ।”

पाँचों लड़के सुदर्शन के पास आते हैं।

सुदर्शन ने पाँचों लड़कों से कहा—“तुम सब कृतिका के साथ ऊपर सबसे ऊपर वाले फ्लेट में जाओ और वहाँ से मेरा जितना भी सामान है, मेरे कपड़े, घड़ा, बिस्तर, बैड, प्रेस सब नीचे लाकर वहाँ नारायण की दुकान के सामने रख दो। ठीक है, रखवा दोगे ना?”

एक लड़का बोला—“हाँ–हाँ, भैया। अभी रख देते हैं। आप चिन्ता मत करो।”

सुदर्शन—“ठीक है। फिर रखवा दो। मैं इनको किराया देने के लिए एटीएम से पैसे लेकर आ रहा हूँ।”

सुदर्शन ने कृतिका की ओर देखकर कहा—“कृतिका, तुम इनके साथ ऊपर जाओ। देख लेना, कुछ रह ना जाए।”

कृतिका पाँचों लड़कों को लेकर बिल्डिंग में ऊपर चली गई। सुदर्शन आम्रपाली सर्किल की ओर चल पड़ता है।

सुदर्शन ने नारायण की दुकान के सामने आकर कहा—“नारायण भाय जी, बे छोरा मेरो समान ले ग आवेः। थे अठः थारः घृहः रखवा ल्यो एक बारी। बो बिल्डिंग गो मालिक क्योवः, अभी के अभी बिल्डिंग खाली कर। मैं बिन किरोयो देण वास्तः एटीएम उ पिसा ले ग आऊँ।”

नारायण—“क्यों? इसी के बात होई?”

सुदर्शन—“बस इया ई, कृतिका ग कारण क्योवः?”

नारायण—“कित्तो किरायो बाकी है?”

सुदर्शन—“मैं तो दो हजार पूरा ही पकड़ा द्यूगा। हिसाब–हुसुब कोनी लगाऊँ म।”

नारायण ने अपनी जेब से दो हजार रुपये निकालकर कहा—“ल तो पकड़ाया फेर। तू मन दे दई बाद म।”

सुदर्शन—“ये भी सही है।”

सुदर्शन ने नारायण से दो हजार रुपये लिए और वापस आकर राज किशोर को पैसे और बिल्डिंग की चाबियाँ देकर पाँचों लड़कों और कृतिका के साथ मिलकर अपना सारा सामान बिल्डिंग से निकालकर नीचे रखने लगता है।

राज किशोर बिल्डिंग में आकर पूरी बिल्डिंग चैक करने लगते हैं।

सुदर्शन के कृतिका और पाँचों लड़कों के साथ मिलकर सारा सामान बिल्डिंग से बाहर निकालने के बाद राज किशोर बिल्डिंग से बाहर आकर बिल्डिंग को ताला लगाकर अपनी गाड़ी में बैठकर चले जाते है। सुदर्शन कृतिका और पाँचों लड़कों के सहयोग से अपना सामान नारायण के घर में रखने लगता है।

सुदर्शन ने सारा सामान नारायण के घर में रखने के बाद नारायण से कहा—“अच्छा, म्हे जावा अब।”

नारायण—“कढ़ः?”

सुदर्शन—“दो–चार दिन कोई नई जगह नई मिले, इत्ते कोई होटल म ठहरा गा।”

नारायण—“अरे होटल म क्यू जावः? अठः मेर खन रे ले।”

सुदर्शन—“नई यार, तन दिक्कत होवःगी। फेर नयो घर मिलना म के बेरो, कित्तो क टेम लागः?”

नारायण—“कि दिक्कत कोनी होवः, चार दिन म। कोई रिश्तेदार आवः, जद बी तो धिकावा ही हाँ। आपणः मायनः दो कमरा है, एक म आ बाई हर तेरी भाभी सो ज गी। दूसरा म आपा दोनों भाई सो जा गा।”

सुदर्शन—“लेकिन यार…”

नारायण—“यार–यूर की कोनी। तू होटल–हाटल छोड़ हर अठेई टिक जा। आपणा खन बडो घर कोनी, तो के होयो? आपणो दिल घणो ही बडो है।"

सुदर्शन ने मुस्कुराकर कहा—“ये भी सही है।”

रात के नौ बजे सुदर्शन और कृतिका ने नारायण के परिवार के साथ बैठकर हँसते–खिलखिलाते हुए बातें करते-करते खाना खाते हैं।

रात के ग्यारह बजे सुदर्शन नारायण के साथ अलग कमरे में और कृतिका नारायण की पत्नी के साथ अलग कमरे में सो जाती है।

अगले दिन छब्बीस जून, सोमवार की सुबह पौने दस बजे कालीन पर बैठकर जयसिंह और सुजाता अपने तीनों बच्चों के साथ नाश्ता कर रहे हैं। सुदर्शन दरवाजा खोलकर अन्दर आता है।

सृष्टि खड़ी होते हुए बोली—“सुदर्शन भैया आ गए, मैं उनके लिए थाली लेकर आती हूँ।”

सुदर्शन—“नहीं, रहने दो। आज मैं नाश्ता करके आया हूँ।”

सृष्टि वापस बैठकर नाश्ता करने लगती है।

जयसिंह—“बैठो फिर। मैं नाश्ता कर लूँ, फिर नीचे चलते है।”

सुदर्शन ने आगे आकर सोफे पर बैठकर कहा—“सेठ जी, कोई किराये का कमरा या एक–दो कमरो वाला कोई किराये का घर है, क्या आपके ध्यान में?”

जयसिंह—“किसलिए?”

सुदर्शन—“मेरे रहने के लिए।”

जयसिंह—“क्यों? वो बिल्डिंग के फ्लेट को क्या हुआ?”

सुदर्शन—“वो कल शाम को मेरे यहाँ से जाने के बाद बिल्डिंग के मालिक राज किशोर जी आए थे। उन्होंने खाली करवा लिया।”

जयसिंह ने आश्चर्य से कहा—“अचानक कैसे खाली करवा लिया?”

सुदर्शन—“मैनें कृतिका को अपने साथ रख लिया इसलिए।”

जयसिंह—“फिर क्या हो गया? बोल देता, तेरी दोस्त है। कुछ दिन तेरे साथ रहेंगी।”

सुदर्शन—“कहा था, लेकिन वो नहीं माने। उन्होंने कहा, या तो कृतिका को अभी बाहर निकाल या फिर तू भी निकल जा।”

जयसिंह अपना नाश्ता करके खड़े होकर हाथ धोने जाते हुए बोले—“हाँ, तो फिर टाइम तो माँगता। बोल देता, एक तारीख को खाली कर दूँगा।”

सुदर्शन—“कहा था, सेठ जी। लेकिन वो बोले, मैं तो ताला लगाकर जा रहा हूँ। किराया देकर अपना सामान ले जाना।”

सुजाता—“फिर कल रात को कहाँ सोए?”

सुदर्शन—“बिल्डिंग के पास वो दुकानवाला नारायण है ना। मैं तो सामान उसके घर छोड़कर किसी होटल में जा रहा था। लेकिन नारायण ने कहा, जब तक दूसरी जगह नहीं मिलती, मेरे घर रुक जा। फिर कल रात को मैं और कृतिका उसके घर सोए थे।”

जयसिंह हाथ धोकर तौलिए से हाथ–मुँह पोंछते हुए बोले—“तो तुम मुझे फोन कर देते। तुम्हें बोला हुआ है ना, ऐसी कोई बात हो तो मुझे या मैडम को फोन कर दिया करो। फ्लेट उसने किराये पर दिया है, कोई फ्री में तो दिया नहीं है। और किराया तुम हमेशा टाइम पर देते हो। फिर ऐसे अचानक कैसे निकाल सकता है? यू ही सामान उठाकर निकल गया।”

सुजाता अपना नाश्ता करके हाथ धोने आती है।

जयसिंह हाथ–मुँह पोंछकर बैडरूम में गए और ऑफ़िस की चाबी लिए वापस आकर सुदर्शन को चाबी देते हुए कहा—“चलो, ऑफ़िस खोलो। मैं कपड़े बदलकर आता हूँ।”

सुदर्शन चाबी लेकर सीढ़ियां उतरते हुए नीचे चला गया और जयसिंह वापस बैडरूम में चले गए। सुजाता तौलिए से हाथ–मुँह पोंछकर बैडरूम में आकर बैड पर बैठती है।

सुजाता—“जय, एक बात कहूँ?”

जयसिंह—“बोलो।”

सुजाता—“वो कृतिका कोई आवारा लड़की तो है नहीं और सुदर्शन बता रहा था, अब उसने शराब पीना भी बहुत कम कर दिया है। तो जब तक सुदर्शन को दूसरी जगह नहीं मिलती, तब तक सुदर्शन और कृतिका को हम अपने घर रख लें?”

जयसिंह ने मुड़कर कहा—“मैं तो खुद यहीं सोच रहा था। वो बेचारा नारायण, उसके घर में दो कमरे है। फिर भी वो इनकी मदद कर रहा है। हमारे घर में तो एक कमरा खाली पड़ा है।”

सुजाता—“तो फिर कहा क्यों नहीं?”

जयसिंह—“मुझे लगा, शायद कृतिका को अपने घर में रखने के लिए तुम ना मानो।”

सुजाता—“मैं क्यू नहीं मानूँगी? जब वो सुधरना चाहती है, तो हमें उसकी मदद करनी चाहिए।”

जयसिंह ने दीवार पर टंगा हुआ अपना कोट हाथ में लेकर पहनते हुए कहा—“हाँ, ये तो सही बात है।”

जयसिंह ने कोट पहनकर आवाज़ लगाई—“संयम बेटा, नीचे से सुदर्शन भैया को बुलाना।”

संयम ने सोफे से उठकर बेसमेंट के दरवाजे पर आकर आवाज़ लगाई—“सुदर्शन भैया, पापा बुला रहे हैं।”

संयम वापस आकर सोफे पर बैठ जाता है। सुदर्शन सीढ़ियां चढ़ते हुए ऊपर आता है।

जयसिंह ने बैडरूम से बाहर आकर कहा—“अरे, वो कृतिका ने शराब पीनी छोड़ दी क्या?”

सुदर्शन—“पूरी तरह तो नहीं छोड़ी। लेकिन घर से आने के बाद अभी तक एक बार भी नहीं पी। वो पहले ज्यादा पीती थी, इसलिए कभी–कभी शराब के लिए बैचेन हो जाती है। तब मैं उसे कोल्ड ड्रिंक पिला देता हूँ।”

जयसिंह ने हँसकर कहा—“कोल्ड ड्रिंक पीने से शराब की बैचेनी दूर हो जाती है क्या?”

सुदर्शन ने हँसकर कहा—“पता नहीं, लेकिन ज्यादातर बेवड़े खाना खाने से पहले भूखे पेट शराब पीते हैं। मैनें सोचा, जब पेट भर जाएगा तो शराब के लिए जगह ही नहीं रहेंगी। इसलिए कोल्ड ड्रिंक लाकर पिला देता हूँ।”

जयसिंह—“अच्छा, तुम तो जानता हो, अपने घर में शराब और नॉनवेज नहीं चलता। इसलिए पूछा।”

सुदर्शन—“नहीं सेठ जी, बस उसमें ये शराब पीने की गलत आदत है और इसे भी वो अब छोड़ रही है। बाकी वो हर तरह से बहुत अच्छी लड़की है और नॉनवेज भी नहीं खाते वो लोग।”

जयसिंह—“ठीक है, फिर तुम ऐसा करो। तुम्हारा बाकी सामान तो नारायण के घर पड़ा रहने दो। जब दूसरी जगह मिल जाए, तो नारायण के घर से उठा लेना। तुम्हारे कपड़े लेकर कृतिका को यहाँ अपने घर ले आओ। जब तक दूसरी जगह नहीं मिलती, तुम दोनों यहाँ रह लो। तुम तो ये सामने वाले कमरे में सो जाना। कृतिका ऊपर सृष्टि के पास सो जाएगी।”

सुदर्शन—“लेकिन सेठ जी, आपको प्रोब्लम नहीं होगी?”

जयसिंह—“अरे, प्रोब्लम क्या होगी? तुम ले आओ।”

संयम ने सुदर्शन से कहा—“और अगर कृतिका अकैली सोना चाहें, तो आप मेरे कमरे में सो जाना।”

सुदर्शन ने मुस्कुराकर कहा—“ठीक है।”

सुदर्शन नीचे जाने लगता है।

जयसिंह—“नीचे कहाँ जा रहा है?”

सुदर्शन—“थोड़ा काम।”

जयसिंह—“काम आकर कर लेना। पहले ले आ उसको। फिर सारा दिन काम ही करना है।”

सुदर्शन—“ये भी सही है।”

सुदर्शन मुड़कर दरवाजा खोलकर बाहर चला जाता है।

जयसिंह ने सोफे पर बैठी सृष्टि से कहा—“कोई प्रोब्लम तो नहीं है ना, कृतिका तुम्हारे कमरे में सोए तो?”

सृष्टी—“नहीं–नहीं, कोई प्रोब्लम नहीं है।”

जयसिंह—“चलो, फिर ठीक है।”

जयसिंह सीढ़ियां उतरते हुए नीचे बेसमेंट में चले जाते हैं।

दो दिन बाद अठ्ठाईस जून, बुधवार की शाम को सात बजे जयसिंह के घर के सामने सेठ साँवरमल बागड़ी की गाड़ी आकर रुकती है। सेठ साँवरमल बागड़ी और राजलक्ष्मी गाड़ी से उतरकर घर के मुख्य दरवाज़े पर आकर बेल बजाते हैं।

घर के अन्दर सोफे पर बैठकर सृष्टि हाथ में प्लेट लिए काँटे से चाउमीन खाती हुई चाउमीन की प्लेट सोफे पर रखकर बाहर आती है।

सेठ साँवरमल बागड़ी—“जयसिंह जी घर पर है?”

सृष्टि—“हाँ, आप अन्दर आईए। मैं बुलाती हूँ।”

सेठ साँवरमल बागड़ी और राजलक्ष्मी चलकर अन्दर आते हैं। सृष्टि चाउमीन की प्लेट उठाकर उन्हें सोफे पर बिठाकर चाउमीन की प्लेट हाथ में लिए सीढ़ियां उतरती हुई नीचे बेसमेंट में आने लगती है।

सुदर्शन अपने टेबल पर लैम्प जलाकर नगीने चैक कर रहा है। केबिन में जयसिंह अपनी चेयर पर बैठे सामने रखे कम्प्यूटर में कुछ काम कर रहे है। कालीन जड़े हुए फर्श पर नीचे बैठकर सुजाता और कृतिका ज्वैलरी पैक कर रही है।

सृष्टि ने केबिन में आकर कहा—“पापा, कृतिका दीदी के मम्मी–पापा आए हैं। मैंने उनको सोफे पर बिठा दिया।”

जयसिंह कम्प्यूटर से नजर हटाकर बोले—“चाय–नाश्ता तैयार करो फिर उनके लिए। मैं आता हूँ।”

सृष्टि मुड़कर वापस चली जाती है।

कृतिका—“अंकल, अगर वो मुझे लेने आए है, तो आप उनसे साफ़–साफ़ कह देना। मुझे उनके साथ नहीं जाना। मैं यहाँ जॉब करके बहुत खुश हूँ।”

जयसिंह—“ऐसे नहीं बोलते, बेटी। पहले उनसे बात तो करें, क्या कहते हैं वो?”

कृतिका—“उनकी बातें मुझे पता है। उनके साथ रहकर ना मैं खुश रहती हूँ, ना वो खुश रहते है। इससे अच्छा, मैं उनसे अलग ही रहूँ।”

सुजाता—“अलग रहना कोई सोल्यूशन नहीं होता, कृतिका। अब हम बात करते हैं उनसे। फिर देखते है, तुम्हारे और उनके बीच की प्रोब्लम का क्या सोल्यूशन है?”

कृतिका—“कोई सोल्यूशन नहीं है, अन्टी।”

जयसिंह मुस्कुराकर बोले—“और अगर कोई सोल्यूशन निकल आया तो?”

कृतिका—“अंकल, जब एक बार कोई धागा टूट जाता है। फिर वो दूबारा जुड़ता भी है, तो एक गाँठ के साथ। जो बार–बार कहीं ना कहीं अटकती रहती है।”

जयसिंह—“तुम चिन्ता मत करो, हम वो अटकने वाली गाँठ नहीं रहने देंगे।”

कृतिका चुप होकर उदास हो जाती है। जयसिंह और सुजाता एक-दूसरे की ओर देखते हैं।

जयसिंह ने कहा—“देखो, कभी–कभी माँ–बाप भी अन्जाने में अपने बच्चों के साथ कुछ गलत कर देते है। इसका मतलब ये नहीं होता, माँ-बाप अपने बच्चों से प्यार नहीं करते। हम उन्हें समझाने की कोशिश करते है, शायद वो समझ जाए। लेकिन अगर हम कोशिश ही नहीं करेंगे, तब तो वो बिलकुल नहीं समझेंगे। इसलिए कोशिश तो करनी चाहिए ना?”

सुजाता—“आप ऊपर जाओ, वो लोग इंतजार कर रहे होंगे। कृतिका को मैं समझाती हूँ।”

जयसिंह चेयर से उठते हुए बोले—“ठीक है।”

जयसिंह केबिन से बाहर आकर सीढ़ियां चढ़ते हुए ऊपर आकर सेठ साँवरमल बागड़ी और राजलक्ष्मी की ओर आते हुए हाथ जोड़कर मुस्कुराते हुए बोले—“राम–राम, साँवरमल जी। कहिए, क्या सेवा करें आपकी?”

सेठ साँवरमल बागड़ी और राजलक्ष्मी हाथ जोड़ते हुए खड़े होते हैं।

सेठ साँवरमल बागड़ी—“राम–राम, जयसिंह जी।”

जयसिंह—“बैठिए।(सृष्टि को आवाज़ देकर) सृष्टि, चाय बनी नहीं अभी तक?”

किचन में से सृष्टि ने कहा—“बस पापा, बन रही है।”

सेठ साँवरमल बागड़ी—“चाय रहने दीजिए। हम तो बस कृतिका को लेने आए है। हमें पता चला, वो घर से भागकर आपके पास जॉब करने वाले किसी लड़के के पास आई थी और अब आपके घर पर है। उसे बुला दीजिए।”

जयसिंह ने सोफे पर बैठकर कहा—“अब हम लोग इतने भी बुरे नहीं है, जो आप हमारे घर की चाय नहीं पी सकते। आपकी बेटी कृतिका हमारे घर पर है। बिलकुल सही सलामत है। उसकी चिन्ता मत कीजिए।”

राजलक्ष्मी—“आप भी अजीब बात करते है, जयसिंह जी। जिनकी बेटी पाँच दिन से गायब है। उनको बोल रहे है, चिन्ता मत करो।”

सेठ साँवरमल बागड़ी—“पिछले पाँच दिनों से हमारी क्या हालत है? ये हम ही जानते है। ऊपर से उसके करम ऐसे है, पुलिस में जाकर शिकायत भी नहीं कर सकते।”

जयसिंह—“मैं सब समझता हूँ, साँवरमल जी।”

राजलक्ष्मी ने कठोरता से कहा—“अब रहने दीजिए, जयसिंह जी। ये झूठी हमदर्दी मत दिखाईए। अगर आप सब समझते, तो कृतिका आपके पास नौकरी करने वाले लड़के के साथ है, ये बात जानते हुए भी हमसे छुपाते नहीं।”

सेठ साँवरमल बागड़ी—“छोड़ो, कीर्ति की माँ। जब अपना ही सिक्का खोटा हो, तो दूसरों से क्या शिकायत करनी।”

सेठ साँवरमल बागड़ी ने जयसिंह से कहा—“आप तो कृतिका की बुला दीजिए, हम जाना चाहेंगे।”

जयसिंह—“कृतिका को मैं बुला दूँगा। वो नीचे मिसेज(पत्नी) के साथ है। लेकिन पहले तो हाथ जोड़कर आपसे माफ़ी चाहूँगा, मैनें कृतिका के बारे में आपको बताया नहीं इसलिए। फिर कृतिका के बारे में ही आपसे कुछ बातें करनी है। लीजिए, पहले चाय पीजिए। चाय आ गई।”

सृष्टि ट्रे में तीन कप चाय और तीन प्लेट में नाश्ता लेकर आती है।

जयसिंह खड़े होकर सृष्टि से ट्रे लेकर बोले—“बेटा, वो टेबल यहाँ खिसका दो।”

सृष्टि टेबल खिसका कर सोफे के सामने कर देती है।

जयसिंह ने टेबल पर ट्रे रखकर कहा—“लीजिए, चाय लीजिए।”

सृष्टि—“मैं जाऊँ, पापा?”

जयसिंह—“हाँ, जाओ।”

सृष्टि सीढ़ियां उतरती हुई नीचे बेसमेंट में चली गई। सेठ साँवरमल बागड़ी, राजलक्ष्मी और जयसिंह ने चाय का एक–एक कप उठा लेते हैं।

जयसिंह—“हाँ, तो मैं कह रहा था। सबसे पहले तो मैं आपसे माफ़ी चाहूँगा, मैनें कृतिका के बारे में बताया नहीं इसलिए।”

सेठ साँवरमल बागड़ी—“कोई बात नहीं, अब जाने दीजिए। हमारी सड़कों पर आवारा घूमने वाली बिगड़ैल बेटी एक बहुत इज्जतदार घर में है। यहीं बहुत है।”

जयसिंह—“कृतिका आवारा या बिगड़ैल नहीं है। पहले हम भी कृतिका को बिगड़ैल ही समझते थे, लेकिन वो तो बहुत प्यारी बच्ची है। पिछले ढ़ाई–तीन महिने में कृतिका ने अपने बारे में बहुत कुछ मेरे पास जॉब करने वाले सुदर्शन को बताया और सुदर्शन ने हमें बताया। कृतिका के बारे में जानने के बाद हमें पता चला, वो भटकी हुई है। बिगड़ैल लोगों में और भटके हुए लोगों में बहुत फर्क होता है। बिगड़ैल होते हैं, कृतिका को चीट करने वाले उस लड़के जैसे लोग। जो दूसरों की जिन्दगी खराब करते हैं और भटके हुए होते हैं, कृतिका जैसे लोग। जो खुद की जिन्दगी खराब करते हैं।”

राजलक्ष्मी—“अब जो भी कहिए, हमें तो उसने कहीं मुँह दिखाने लायक नहीं छोड़ा। शर्म के कारण कई सालों से हम दोनों ने कहीं आना–जाना भी बन्द कर रखा है।”

जयसिंह—“इसी के बारे में तो आप लोगों से बात करना चाहता हूँ, ताकि इस समस्या का हल निकलें।”

सेठ साँवरमल बागड़ी—“अब क्या हल निकलेगा, जयसिंह जी? बहुत कोशिश की इस लड़की को सही रास्ते पर लाने की। लेकिन ये तो दिन ब दिन पहले से ज्यादा बिगड़ती गई।”

जयसिंह—“अब तक क्या–क्या कोशिशें की है, आप लोगों ने?”

राजलक्ष्मी—“क्या नहीं किया हमने उसके लिए? बड़ी मिन्नतो के बाद ये पैदा हुई थी। हमने कहा, चलो बेटा ना सही, बेटी ही सही। लक्ष्मी का रूप है। उसे जो चाहिए, उसके माँगने से पहले उसे लाकर दिया। अच्छी से अच्छी एज्यूकेशन दिलाई। कॉलेज में आई तो उसने कहा, मुझे गाड़ी चाहिए। अगले दिन उसे गाड़ी दिला दी। सोचा था, इकलौती बेटी है, इसे किसी चीज के लिए मना करेंगे, तो कहीं भटक कर गलत रास्ते ना पकड़ लें, लेकिन किस्मत फूटी हो तो कोई क्या करें? उसने तो ऐसे उल्टे रास्ते पकड़ें, हमें कहीं का नहीं छोड़ा। इससे अच्छा तो बेऔलाद रहते। कम से कम ये तो कहते, हमारी कोई औलाद ही नहीं है।”

जयसिंह—“ऐसा नहीं सोचते, बाई सा। एक बार आप लोग ठंडे दिमाग से सोचकर देखो, इतना सब करने के बाद भी आपको ये बात क्यों कहनी पड़ रही है?”

सेठ साँवरमल बागड़ी—“सब किस्मत की बात है, जयसिंह जी। जब किस्मत में बच्चों के दुःख लिखे हो तो कौन रोक सकता है?”

जयसिंह—“ऐसी बात नहीं है। और आपको ये जानकर खुशी होगी, कृतिका ने अब शराब पीना छोड़ दिया है।”

सेठ साँवरमल बागड़ी आश्चर्य से बोले—“उसने शराब पीना छोड़ दिया? हम तो हार गए, उसकी शराब छुड़ाने की कोशिश करते–करते। और वो तो रात-दिन चौबीसों घंटे नशे में ही रहती है।”

जयसिंह ने मुस्कुराकर कहा—“रहती है नहीं, रहती थी। उसने आपको बताया नहीं होगा, लेकिन उसने महीनेभर से शराब पीना कम कर दिया और घर छोड़ने के बाद तो उसने अभी तक पी ही नहीं। वो परसो से हमारे घर है। कृतिका पहले बहुत ज्यादा शराब पीती थी, इसलिए कल उसको शराब नहीं पीने के कारण बहुत बैचेनी सी हो रही थी। उसकी हालत देखकर मैंने खुद उसे शराब एकदम से बिलकुल बन्द करने से तबीयत खराब होती है। तुम थोड़ी-बहुत पी लो। लेकिन उसने शराब नहीं पी। मिसेज उसको डॉक्टर के पास लेकर गई। अब वो दवाई ले रही है।”

राजलक्ष्मी—“ये बात उसने हमें क्यों नहीं बताई?"

जयसिंह—“शायद वो आपसे नाराज़ है, इसलिए नहीं बताया। वरना हमारे घर आने के बाद तो खाना भी बना रही है, घर के काम भी कर रही है और हमारे ऑफ़िस के काम में भी हेल्प करवा रही है। कृतिका ने मुझसे कहा, अब वो हमेशा मेरे पास जॉब ही करेंगी और अपने पैरों पर खड़ी होगी।"

सेठ साँवरमल बागड़ी आश्चर्यचकित होकर बोले—"अपने पैरों पर खड़ी होने के लिए कृतिका को जॉब करने की क्या ज़रूरत है? हमारा अपना बिजनेस है, उसे क्यों नहीं जॉइन करती?"

राजलक्ष्मी—“और इतना बदलाव उसमें आया कैसे? जो वो इतनी बड़ी-बड़ी बातें करने लगी।"

जयसिंह—“यहीं तो मैं आपको समझाना चाहता हूँ, वो इतना कैसे बदल गई? वो क्या है, जब कोई हमारे पास होता है, तब हमें उसकी कमियाँ ज्यादा नजर आती है। लेकिन जब कोई हमसे दूर हो जाए, तो लाख बुराईयाँ होने पर भी हमें उसकी अच्छाईयाँ याद आती है। इसलिए मैंने आपको ये नहीं बताया, कृतिका हमारे घर पर है। मैंने सोचा, कुछ दिन आप लोग कृतिका से दूर रहोगे, तो आपको कृतिका की बुराईयों के साथ–साथ उसका भोलापन, उसकी मासूमियत, उसकी नादानियाँ, उसका बचपना, उसके बचपन की शरारतें, ये सब बातें भी याद आएँगी। तो बताईए, इन पाँच दिनों में आपको कृतिका की कौन सी बातें ज्यादा याद आई? कृतिका की बुराईयाँ या…”

सेठ साँवरमल बागड़ी और राजलक्ष्मी की आँखें भीग जाती है। दोनों चाय के कप टेबल पर रखी हुई ट्रे में रखकर सिसक-सिसककर रोने लगते हैं।

जयसिंह अपना कप ट्रे में रखकर बोले—“अरे, प्लीज। आप रोईए मत। मैं माफ़ी चाहता हूँ, मेरा इरादा आपको आपकी बेटी से दूर करना नहीं है। हम दिल से चाहते हैं, आप सब खुश रहें। और कृतिका दिल की बुरी नहीं है। हमारे घर आने के बाद इन तीन दिनों में उसका बचपना देखकर लगता है, जैसे अभी तक वो दस–पन्द्रह साल की बच्ची है। मेरे तीनों बच्चों के साथ तो ऐसे घुल-मिल गई, जैसे पता नहीं, कब से जान–पहचान है?”

सेठ साँवरमल बागड़ी और राजलक्ष्मी दोनों ने अपनी आँखें पोंछकर जयसिंह के साथ बातें करते हुए कृतिका के जन्म से लेकर जवाँनी तक की सारी बातें बताते हैं।

सेठ साँवरमल बागड़ी लम्बी बातचीत के बाद बोले—“ऐसी थी हमारी कीर्ति। कीर्ति हमारे जीवन में इतनी खुशियाँ लेकर आई, हमें कभी इस बात का एहसास नहीं हुआ, हमारा बेटा नहीं है। हम एक बेटी के माँ–बाप बनकर बहुत खुश थे। फिर इसकी बहुत शिकायतें आने लगी। कृतिका गन्दी–गन्दी गालियाँ निकालती हैं, दूसरे बच्चों के साथ मारपीट करती है। बड़ों से बदतमीजी करती है। और भी बहुत सी शिकायतें। अपनी इकलौती बेटी को बिगड़ते देखकर हम डर गए और उसे बिगड़ने से बचाने के लिए बहुत सख़्त हो गए। हमने सोचा, कहीं ज्यादा लाड़–प्यार देकर हम कीर्ति को बिगाड़ ना दें। लेकिन कीर्ति तो दिन बा दिन और ज्यादा बिगड़ती गई। कॉलेज में आने के बाद गलत लड़के–लड़कियों की संगत में आकर शराब पीने लगी। रात–रात भर घर से बाहर घूमने लगी। फिर इस लड़के दिव्यांश के चक्कर में पड़ गई। हमने बहुत समझाया, ये लड़का ठीक नहीं है, लेकिन इसने हमारी एक नहीं सुनी। फिर जो कुछ हुआ, सब आपके सामने है।”

राजलक्ष्मी—“एक इकलौती बेटी, वहीं जब सीधे मुँह बात ना करें। सामने होकर बदतमीजी से जवाब दें, तो माँ–बाप के मन पर क्या गुजरती है? ये सिर्फ वहीं माँ–बाप समझ सकते है, जिनके साथ ऐसा हुआ हो।”

जयसिंह—“बात तो आपकी सारी सही है, लेकिन कभी–कभी हम समझ नहीं पाते, हमें क्या करना चाहिए। आपने भी सभी माँ–बाप की तरह अपनी बच्ची का भला ही सोचा, लेकिन आपने तरीके गलत अपनाए। चाहें लाड़–प्यार हो, चाहें सख़्ती हो। ज़रूरत से ज्यादा चाहें, कुछ भी हो, वो नुकसान करता है। आप लोगों के मन में एक डर आ गया, कहीं इकलौती बच्ची हाथ से निकल ना जाए और इस चक्कर में आप लोग घबराकर कुछ ज्यादा सख़्त हो गए। परिणाम ये हुआ, कृतिका को आपसे मिलने वाली डांट और आपसे होने वाली पिटाई की कोई परवाह ही नहीं रही।”

राजलक्ष्मी—“तो आप ही बताईए, इकलौती बेटी का ये हाल देखकर हम क्या करते?”

इस बीच सुजाता ऊपर आकर जयसिंह के पास सोफे पर बैठ जाती है।

जयसिंह ने सेठ साँवरमल बागड़ी और राजलक्ष्मी से कहा—“देखिए, कई बार क्या होता है? बच्चे हमारे पास आकर बोलते है, मम्मी या पापा, हमें आपसे कुछ कहना है। हम गुस्से से बोलते हैं, क्या हैं? तेरी बात बाद में पहले ये काम कर। हमेशा हमें परेशान करते हो। इस बार क्या गलती की है तूने? बहुत सारे माँ–बाप अपने बच्चों के साथ इस तरीके से बात करते हैं, जैसे बच्चे नहीं हैं, भेड़–बकरी है। बच्चे अपने दिल की बात कहने के लिए माँ–बाप के पास आते हैं, तो माँ–बाप को चाहिए, प्यार से बच्चों की बात सुनकर बच्चों को प्यार से समझाए। लेकिन समझाना तो बहुत दूर की बात है। बहुत से माँ–बाप बच्चों के साथ सीधे मुँह बात तक नहीं करते। ये सच्चाई है। बच्चे नादान है, बच्चे शरारती है, बच्चे कुछ समझते ही नही। अरे…जब माँ–बाप बच्चों को कुछ समझाएगें, तभी तो बच्चे समझेंगे। कोई दूसरा थोड़े ही आएगा, हमारे बच्चों को समझाने के लिए।”

सुजाता—“और सबसे बड़ी गलती होती है, बच्चे बड़े होकर अपने आप सब समझ जाएँगें, ये सोचना। अपने आप तो बच्चे बोलना भी नहीं सीखते। बोलना भी सिखाना पड़ता है। फिर हम ये कैसे सोच लेते है, बड़े होकर बच्चे अपने आप समझदार हो जाएँगें?”

जयसिंह—“और माँ–बाप के बच्चों की बात नहीं सुनने का फायदा गलत लोग उठाते हैं। माँ–बाप तो अपने बच्चों की बात सुनकर बच्चों को कुछ समझाना जरूरी नहीं समझते, क्योंकि बच्चे नादान है, बच्चे शरारती है, बच्चे नासमझ है, बच्चों को समझाने का कोई फायदा नहीं है। बड़े होकर अपने आप सब समझ जाएँगें। लेकिन गलत लोग बच्चों की बात सुनकर बच्चों को गलत बातें बहुत अच्छी तरह प्यार से समझा देते हैं और बच्चे खुशी–खुशी गलत रास्ते पर चल पड़ते हैं। यहीं आपकी कृतिका के साथ हुआ है।”

सुजाता—“और हाँ, बच्चों को डरा–धमकाकर या पिटाई करके तो हम कभी बच्चों को सही रास्ते पर नहीं चला सकते। जब तक बच्चों के मन में हमारा डर होता है, तब तक बच्चे चोरी–छिपे गलतियाँ करते हैं और जब बच्चों के मन से डर निकल जाता है, फिर बच्चे किसी की परवाह किये बिना मनमानी करने लगते है।”

सेठ साँवरमल बागड़ी—“लेकिन कभी-कभी बच्चे हाथ उठाने पर मजबूर कर देते हैं, बाई सा। अब ये क्या कर रही थी? वो तो आपको पता ही है। टीवी में इसकी खबरें आई। सारी इज्ज़त मिट्टी में मिला दी। बाप की पगड़ी उछालने में कोई कसर बाकी नहीं रखी।”

जयसिंह—“नहीं-नहीं, इस बार उस लड़के के बारे में सोशल साइट्स पर पोस्ट करके कृतिका ने कुछ गलत नहीं किया। अगर ऐसे बेकार लोगों के खिलाफ़ कुछ करेंगे नहीं, तो ये लोग इसी तरह बिना किसी डर के किसी ना किसी मासूम को अपना शिकार बनाते रहेंगे। फोर एग्लामपल ये घटिया लड़के, ये बेकार आदमी लड़कियों और महिलाओं के शरीर पर वहाँ कुछ गलत हरकत करते हैं, जहाँ लड़की या महिला को बताने में शर्म महसूस होती है। पहली बात तो है, ज्यादातर लड़कियाँ और महिलाएँ कुछ बोलती ही नहीं है, बस चुपचाप सहन करती है। अगर कोई हिम्मत वाली लड़की या महिला बोलकर विरोध करें, तो ये घटिया और बेकार लोग कहते हैं, बताओ जरा, हमने किया क्या है? लड़की या महिला शर्म के कारण सब कुछ साफ़–साफ़ नहीं बता पाती और ये घटिया लोग लड़की या महिला को गलत साबित करके हँसते हुए निकल जाते हैं। लड़कियों और महिलाओं का ये शर्म-शर्मिन्दगी के कारण चुप रहना ही, इन घटिया लोगों की ताकत है। जिस तरह कृतिका ने हिम्मत करके उस लड़के की एक–एक गलत और गन्दी बात पूरी डिटेल के साथ फेसबुक पर पोस्ट की है। अगर हर लड़की और हर महिला इसी तरह घटिया और गन्दे लोगों की हर बात कोई शर्म किये बिना सबको बताने लगे, तो इन घटिया और बेकार लोगों के मन में भी एक डर पैदा होगा। और ऐसा सिर्फ वहीं लड़की कर सकती है, जो बहुत सच्ची हो, जो खुद गलत ना हो। इसलिए हमें कृतिका जैसी अच्छी और हिम्मत वाली लड़कियों की मदद करनी चाहिए। ताकी दूसरी अच्छी लड़कियों को भी गलत लोगों के खिलाफ़ बोलने की हिम्मत मिलें।”

सेठ साँवरमल बागड़ी—“ये सब कहने की बातें हैं, जयसिंह जी। हम रोज भुगत रहे हैं।”

जयसिंह—“आप इसलिए भुगत रहे हो, क्योंकि आपकी और आपकी बेटी की कोई गलती ना होते हुए भी आप लोग खुद को गलत मानते हो।”

सुजाता—“और भाई साहब, कहने वाले तो टीवी पर सुदर्शन के साथ इनका नाम आने के बाद हमें भी कहते हैं, लेकिन हम उन कहने वालों को सही और सटीक जवाब देते हैं। उनसे पूछते है, गलत करने वाला बुरा होता है या जिसके साथ गलत हुआ, वो बुरा होता है? जो अच्छे और समझदार लोग है, वो हमारी बात समझ जाते है और गलत लोग इसलिए नहीं समझते, क्योंकि उनको गलत रास्ते पर ही चलना है।”

जयसिंह—“हाँ, बिलकुल।”

सेठ साँवरमल बागड़ी—“लेकिन लोगों के मुँह तो फिर भी बन्द नहीं होते ना।”

जयसिंह—“साँवरमल जी, कृतिका ने किसी का बुरा नहीं किया, कृतिका के साथ बुरा हुआ है। फिर आप क्यों शर्मिन्दगी महसूस करते हो? अगर कृतिका गलत रास्ता छोड़कर सही रास्ते पर चल रही है, तो आप बस उसकी मदद करो। अगर लोग आपके सामने कुछ बोलते हैं, तो उनको जवाब दो। हाँ, पहले कुछ वजह थी, कुछ कारण थे, इसलिए हमारी बेटी भटक कर गलत रास्ते पर चली गई। और हमारी बेटी भटक गई थी, बिगड़ी नहीं थी। हमारी बेटी ने किसी का बुरा नहीं किया। हमारी बेटी के साथ बुरा हुआ था। लेकिन अब वो सुधर गई है। इसके बाद दुनिया कुछ भी कहें, दुनिया की परवाह मत करो। लोग कुछ ना कुछ तो कहते ही है और इन कहने वालों का कोई ईलाज नहीं है। जब हमारी शादी हुई थी, उस वक्त हमें भी लोग बहुत कुछ कहते थे। मुझे कहते थे, ये जयसिंह तो अन्टी का दीवाना है। मिसेज को कहते थे, सुजाता ने एक बच्चे को फँसा लिया। और भी बहुत कुछ कहते थे। लेकिन हमें पता था, हमने कुछ भी गलत नहीं किया। अपने घरवालों की मर्ज़ी से, सारे रीति–रिवाजों के साथ शादी करके हम पति–पत्नी बने है। फिर भी लोग बातें करते हैं, तो करने दो। जब हमने कुछ गलत नहीं किया, तो हम क्यों लोगों को सफाई देते फिरें? हाँ, हमारे सामने कुछ बोलने की किसी में हिम्मत नहीं थी। यहीं बात मैं आप लोगों से कहूँगा, पहले जो होना था, वो हो गया। अब आगे से पुरानी गलती नहीं दोहराएँगें। फिर भी लोग बातें करते हैं, तो उनको करने दो। लोगों को बातें करके खुश हो लेने दो।”

सेठ साँवरमल बागड़ी—“शायद आपकी बात ठीक है। दुनियादारी के चक्कर में हमसे भी गलतियाँ तो हुई है, लेकिन क्या करें? घर–परिवार भी होता है। रिश्तेदारी भी देखनी पड़ती है। कारोबार देखना भी जरूरी है। जीवन में इतनी भागदौड़ होती है, कभी–कभी हम भविष्य पर विचार नहीं कर पाते।”

सुजाता—“देखिए भाई साहब, जीवन में सब कुछ जरूरी है, इसलिए हमें सभी बातों में संतुलन बनाकर रखना चाहिए। जब हम किसी एक बात पर ज़रूरत से ज्यादा ध्यान देते है और दूसरी बात को हल्के में ले लेते है, तो संतुलन बिगड़ जाता है।”

राजलक्ष्मी—“आपकी बात सही है। लेकिन अब क्या कर सकते है? हम तो बेटी को अपना जीवन बर्बाद करते देखकर कुछ समझ नहीं पाए और जो आप बता रहे हैं, वो सारी गलतियाँ हम कर बैठे है। अब तो अगर आप लोग कहो, तो हम कृतिका से माफ़ी माँग लेते हैं।”

जयसिंह—“अरे, कैसी बातें कर रही है आप? ऐसा कुछ करने की ज़रूरत नहीं है। कृतिका को प्यार और अपनेपन की जरूरत है, डांट और डंडे से पिटाई की जरूरत नहीं है। आप लोग बस उसे प्यार और अपनापन दो माफ़ी–वाफ़ी की कोई ज़रूरत नहीं है।”

सुजाता—“डांट और पिटाई से बच्चों को डराने की जगह हमें हर एक बात बच्चों को समझाने की कोशिश करनी चाहिए। फिर बच्चे कभी नहीं बिगड़ते। बस हमारे समझाने का तरीका ऐसा हो, जिससे बच्चों को हमारी बातें भाषणबाजी या लेक्चरबाजी ना लगें।”

सेठ साँवरमल बागड़ी—“हाँ, डांट और डंडे से पिटाई का परिणाम तो देख लिया है।”

सुजाता—“अब पुरानी बातें भूल जाईए, भाई साहब। जो होना था, वो हो गया। उस पर अफ़सोस करने से कुछ नहीं मिलने वाला।”

राजलक्ष्मी—“पर बाई, लड़की के बारे में ये सब जानने के बाद लड़की से कौन शादी करता है? आपकी बातें सारी ठीक है, लेकिन दुनियादारी और समाज को भी तो देखना पड़ता है।”

सुजाता—“हाँ, आपकी बात सही है। लेकिन दुनिया में अच्छे और समझदार लोग भी बहुत है। जो कृतिका की नासमझी के कारण की हुई गलती को माफ़ करके कृतिका की अच्छाईयाँ देखेंगे, उनको कोई प्रोब्लम नहीं होगी, कृतिका को अपने घर की बहू बनाने में।”

जयसिंह—“और अभी आप लोग कृतिका की शादी के बारे में मत सोचो। वो अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती है, इसमें उसकी मदद करो। अभी उसे हम सबके साथ की ज़रूरत है। शादी हो जाएगी, टाइम आने पर।”

सुजाता—“और इस बार तो किस्मत अच्छी थी, जो कृतिका के पास पैसे नहीं थे और वो सुदर्शन को बस स्टैण्ड पर बैठी मिल गई। वरना वो तो यहाँ से कहीं दूर जा रही थी।”

सेठ साँवरमल बागड़ी ने अपने माथे पर हाथ रखते हुए कहा—“हे भगवान…”

जयसिंह—“अब छोड़ो, इन सब बातों को। जो हुआ नहीं, वो बात करने से क्या फायदा? अगर आपको कृतिका को कैद ही करना है, तो उसे प्यार और अपनेपन की जंजीर में बाँध कर अपने दिल के कमरों में कैद कीजिए। किसी को कैद करने के लिए सबसे अच्छी चीज होती है, प्यार और अपनेपन की जंजीर। जब हम किसी को प्यार और अपनेपन की जंजीरों में बाँध लेते है, फिर वो खुद ही कभी इन जंजीरों से आजाद नहीं होना चाहता।”

राजलक्ष्मी—“ठीक है, भाई साहब। अब कृतिका को तो बुला दीजिए। पाँच दिन से आँखें तरस गई, उसे देखने के लिए।”

सेठ साँवरमल बागड़ी—“हाँ, उस पर हाथ उठाकर हम अन्दर ही अन्दर कितना रोते है? ये हम ही जानते है। जब से वो घर से गई, हमारा तो खाना–पीना सब छूट गया।”

जयसिंह—“ओह…फिर तो आज का खाना आप हमारे यहाँ कृतिका के साथ खाओ।”

राजलक्ष्मी—“नहीं–नहीं, भाई साहब।”

सुजाता—“नहीं–नहीं क्या? कोई बहाना नहीं चलेगा। अब आप लोगों ने खाना खाए बगैर जाने की जिद की, तो हम कृतिका को भी नहीं ले जाने देंगे।”

जयसिंह ने मुस्कुराकर कहा—“अब इनके सामने मेरी भी नहीं चलती। पहले ही बता देता हूँ।”

सेठ साँवरमल बागड़ी हँसकर बोले—“ठीक है।”

सुजाता सोफे से उठकर बोली—“आप लोग बातें करो। मैं खाने की तैयारी करती हूँ।”

राजलक्ष्मी खड़ी होती हुई बोली—“चलिए, मैं भी आपकी कुछ मदद कर दूँ।”

सुजाता—“अरे, आप बैठिए, आपकी बेटी है ना। मदद के लिए। वो अब हमारे घर की सदस्य बन गई है।”

राजलक्ष्मी वापस बैठ गई। सुजाता मुड़कर चलती हुई नीचे बेसमेंट में चली जाती है।

सवा तीन महीने बाद आठ अक्टूबर, रविवार की शाम को पाँच बजे कृतिका और सुदर्शन पार्क में आकर एक बैंच पर बैठते हैं।

सुदर्शन—“तो गाड़ी लाने से मना कर दिया क्या तुम्हारे मम्मी–पापा ने?”

कृतिका—“नहीं यार। वो तो खुद कहते हैं, जब गाड़ी है, तो बस में क्यों जाती हो?”

सुदर्शन ने मज़ाकियाँ लहजे में कहा—“वहीं तो ! तुम्हारा असली घर तो तुम्हारी गाड़ी थी और तुमने वहीं लानी बन्द कर दी।”

कृतिका ने मुँह बनाकर कहा—“मज़ाक मत करो।”

सुदर्शन ने हँसकर कहा—“अच्छा–अच्छा, लेकिन तुमने गाड़ी लाना बिलकुल ही बन्द क्यों कर दिया? जब कहीं आना–जाना हो, तब तो ले आया करो।”

कृतिका—“नहीं, बिलकुल बन्द थोड़े ही किया है। पापा के साथ ऑफ़िस आना–जाना गाड़ी से ही करती हूँ। कभी मम्मी को कहीं ले जाना हो और ड्राईवर ना हो, तो गाड़ी ले जाती हूँ। बस पहले की तरह फालतू में गाड़ी ले जाना बन्द कर दिया। पापा से पॉकेट–मनी की जगह सैलरी लेती हूँ और उस सैलरी से अपना खर्च चलाती हूँ। जब मैं अपनी कमाई पर गाड़ी मैनेज करने लायक हो जाऊँगी, फिर ले लूँगी गाड़ी।”

सुदर्शन—“चलो, अच्छी बात है। और तुम्हारे ऑफ़िस में स्टाफ के लोग तुम्हें क्या कहते हैं? सिर्फ कृतिका जी या कृतिका मैडम?”

कृतिका—“दोनों।”

सुदर्शन—“एक महीना हो गया, तुम्हें जॉब करते हुए?”

कृतिका—“नहीं, पिछले महीने पन्द्रह से ही तो जॉइन किया था।”

सुदर्शन—“तो कौनसी जॉब ज्यादा अच्छी लगी? सेठ जी के पास या तुम्हारे पापा के पास?”

कृतिका—“हम्म… जॉब के अकोर्डिंग सोचा जाए, तो पापा के पास ज्यादा सही है। वैसे जय अंकल के पास ज्यादा अच्छा लगता था।”

सुदर्शन—“हम्म…अभी नई–नई हो ना वहाँ। धीरे–धीरे वहाँ भी मन लग जाएगा।”

कृतिका—“अरे, मन तो लग गया। लेकिन वहाँ पापा और एक–दो लोगों के सिवा कोई मेरे काम पर ध्यान ही नहीं देता।”

सुदर्शन—“कोई बात नहीं, जो लोग ध्यान देते हैं, उनसे हेल्प ले लिया करो।”

कृतिका—“फिर भी यार, थोड़ा अजीब सा लगता है। मैं तो यहाँ जय अंकल के पास ही जॉब करना चाहती थी। लेकिन जय अंकल ने कहा, जब तुम्हारे पापा का इतना बड़ा बिजनेस है, तो हमारे पास जॉब क्यों कर रही है? पहले तो मैंने बोल दिया, वहाँ कोई मेरे काम पर ध्यान नहीं देगा, बस पापा के कारण सब तारीफ़ करेंगे और मेरी हाँ में हाँ मिलाएँगें। फिर पिछले महीने जब पापा की तबीयत खराब हुई, तो जय अंकल और सुजाता अन्टी ने कहा, तुम्हारे होते हुए इस उम्र में तुम्हारे पापा अकैले सारा बिजनेस संभालते हैं, ये अच्छा नहीं लगता। अगर तुम अभी उनका बिजनेस जॉइन नहीं करना चाहती, तो उनके पास जॉब कर लो। पॉकेट मनी लेना तो तुमने पहले ही बन्द कर दिया है। जो सैलरी हम तुम्हें देते हैं, वहीं सैलरी अपने पापा से ले लेना। इस तरह तुम सेल्फ डिपेन्ड भी रहोगी और अपने पापा की मदद भी कर दोगी। दूसरी जगह नौकरी करने से कोई ज्यादा आत्मनिर्भरता थोड़े ही आ जाती है, वो तो इन्सान पर निर्भर करता है। और फिर आगे चलकर तुम्हें अपने पापा का बिजनेस ही तो संभालना है। तुम वहाँ जॉब करोगी तो एक्सपीरियंस मिलेगा। हमारा तो ज्वैलरी का बिजनेस है। हमारे पास जॉब करोगी, तो बाद में तुम्हारे पापा का बिजनेस जॉइन करने के लिए तुम्हें शुरू से दूबारा मेहनत करनी पड़ेगी। इसलिए अपने पापा के पास जॉब करो और उनका सहारा बनो। तुम काबिल लड़की हो, अपनी काबिलियत का इस्तेमाल करो।”

सुदर्शन—“सेठ जी और सुजाता मैडम की बातें तो बिलकुल सही है। और अब तो तुम्हारी अपने मम्मी–पापा के साथ चल रही सारी प्रोब्लम भी ख़त्म हो गई। इसलिए तुम्हें भी अपना फर्ज निभाना चाहिए।”

कृतिका—“हाँ, इसलिए तो मैनें जय अंकल और सुजाता अन्टी की बात मानकर पापा के साथ ऑफ़िस जाना शुरू कर दिया।”

सुदर्शन—“ये भी सही है। वैसे अब तुम खुश हो ना, अपनी जिन्दगी में?”

कृतिका ने प्रफुल्लित होकर कहा—“खुश? मैं तो बहुत खुश हूँ। अब तो मेरे मम्मी–पापा मेरा इतना ख़्याल रखते हैं, बस पूछो मत। मुझे छोटी बच्ची की तरह ट्रीट करने लगे हैं। उनका प्यार देखकर मुझे बहुत अफ़सोस होता है। मैंने बहुत बार उनके साथ बदतमीजी से बात की। उनका बहुत दिल दुखाया।”

सुदर्शन ने कृतिका को उदास होती देखकर कहा—“अफ़सोस क्यों करती हो? जब सब कुछ ठीक हो गया है, तो खुश रहो और अपने मम्मी–पापा को भी खुश रखो।”

कृतिका ने मुस्कुराकर कहा—“हाँ, और सब कुछ ठीक जय अंकल, सुजाता अन्टी और तुम्हारे कारण हुआ।”

सुदर्शन—“मैनें क्या किया? मैंने तो बस उस लड़के के बारे में फेसबुक पर पोस्ट करने के लिए कहा था। सब कुछ किया तो तुमने ही है और फिर सेठ जी और मैडम ने तुम्हारे घर की प्रोब्लम सुलझा दी, तुम्हारे मम्मी–पापा को समझाकर।”

कृतिका—“हाँ, जय अंकल और सुजाता अन्टी का ये एहसान तो मैं कभी नहीं भूलूंगी, लेकिन मेरे बारे में उनको सब कुछ बताया तो तुमने ही था ना।”

सुदर्शन—“बताने से क्या होता है? वो बहुत अच्छे और भले लोग हैं। उन्होंने ने तो बहुत लोगों का भला करके लोगों की दुःख भरी जिन्दगी में खुशियाँ भरी है।”

कृतिका—“हाँ, इसलिए तो वो लोग भी बहुत सुखी है।”

सुदर्शन—“हाँ, लेकिन बहुत से लोगों ने उनकी अच्छाई का गलत फायदा भी उठाया है। कई लोग दुःखी और परेशान होने का नाटक करके उनके पैसे लेकर भाग गए। फिर भी उन्होंने दूसरों की भलाई करना नहीं छोड़ा, ये बड़ी बात है।”

कृतिका—“अच्छे लोगों की यहीं तो पहचान है। वो बुरा होने पर भी नहीं बदलते।”

सुदर्शन—“हाँ, ये तो है। वैसे तुमने अपने मॉम–डेड को मम्मी–पापा कहना कैसे शुरू कर दिया?”

कृतिका हँसकर बोली—“बस ऐसे ही। जब मैं कॉलेज में आई, तो मेरे सब फ्रैंड्स अपने मम्मी–पापा को मॉम–डेड कहते थे, वहीं से मुझे भी आदत पड़ गई। अब तुम, सृष्टि, अँकुश, संयम, आलोक सब अपने मम्मी–पापा को मम्मी–पापा बोलते हो, तो मेरी भी यहीं आदत हो गई।”

सुदर्शन ने मुस्कुराकर कहा—“ये भी सही है।”

कृतिका—“अच्छा, एक बात बताओ। ये सुजाता अन्टी जयसिंह अंकल से दो–तीन साल बड़ी है क्या?”

सुदर्शन—“दो–तीन साल नहीं, सुजाता मैडम चार साल और तीन महीने बड़ी है सेठ जी से। सुजाता मैडम का जन्मदिन छब्बीस(26) अप्रेल को आता है और सेठ जी का जन्मदिन पच्चीस(25) जुलाई को आता है।”

कृतिका—“ओह…”

सुदर्शन—“क्या हुआ?”

कृतिका—“कुछ नहीं, आमतौर पर पति की उम्र पत्नी से ज्यादा होती हैं ना, इसलिए पूछा।”

सुदर्शन—“हाँ, लेकिन इनकी लव–मैरिज हुई थी और इनकी लव–स्टोरी भी बहुत अनोखी है।”

कृतिका—“तुम्हें पता है, उनकी लव–स्टोरी?”

सुदर्शन—“हाँ।”

कृतिका ने मचलकर कहा—“तो मुझे भी बताओ ना।”

सुदर्शन ने मुस्कुराकर कहा—“उनके घर जाकर सुजाता मैडम या सेठ जी से पूछ लेना।”

कृतिका—“नहीं, उनसे पूछने में मुझे अजीब लगेगा। तुम बताओ ना।”

सुदर्शन—“मैं उनकी पर्सनल बातें क्यों बताऊँ?"

कृतिका ने मुँह फेरकर कहा—“जाओ, मत बताओ।"

सुदर्शन ने हँसकर कहा—“अच्छा, ठीक है। बताता हूँ। सेठ जी का पुराना घर है ना, जहाँ अब सेठ जी के छोटे भाई रहते हैं।”

कृतिका मुस्कुराकर बोली—“हाँ।”

सुदर्शन—“उसी गली में सेठ जी के घर से चार–पाँच घर छोड़कर सुजाता मैडम की बुआ का घर है। मैडम की बुआ तो अब दुनिया से चली गई। बुआ के दो बेटे है। एक तो मैडम दो–तीन साल छोटे है, दूसरे छः या सात साल छोटे है।”

कृतिका—“हम्म…। उनका भी मुझे पता है।”

सुदर्शन—“सुजाता मैडम बचपन से, छोटी थी तब से ही, साल में कई बार अपनी बुआ के घर आया करती थी। बुआ के घर आती थी, तो बुआ के बच्चों के साथ खेलती भी थी। बुआ के बच्चों के साथ बाहर गली में जाकर दूसरे बच्चों के साथ भी खेलती थी।”

कृतिका—“हम्म,,,,,।”

सुदर्शन—“तो सेठ जी जब चार–पाँच साल के हुए, तो वो भी घर से बाहर गली में बच्चों के साथ खेलने के लिए आने लगे। सेठ जी की सुजाता मैडम के भाईयों के साथ दोस्ती हो गई। फिर जब मैडम बुआ के घर आती, तब सेठ जी मैडम के साथ भी खेलते थे। इस तरह खेल–खेल में खेलते–खेलते सेठ जी और सुजाता मैडम की दोस्ती हुई।”

कृतिका—“ऐसे तो बचपन में बहुत सारे बच्चों की दोस्ती होती है।”

सुदर्शन—“हाँ, उस टाइम सेठ जी चार—पाँच(4–5) साल के थे और सुजाता मैडम आठ–नौ(8–9) साल की थी। दोस्ती होने के बाद सेठ जी मैडम का इंतजार करते थे, कब सुजाता बुआ से मिलने आए और उसके साथ खेलूँ? उधर अपने शहर में सुजाता मैडम भी इंतजार करती थी, कब बुआ के घर जाऊँ और जय के साथ खेलूँ?”

कृतिका ने मुस्कुराकर कहा—“हम्म………फिर आगे क्या हुआ?”

सुदर्शन—“फिर स्कूल के कारण सुजाता मैडम का बुआ के घर आना कम हो गया। पहले मैडम हर महीने दो–चार दिन के लिए आती थी, फिर दो–तीन महीने में एक–दो बार दो–चार दिन या पाँच–सात दिन के लिए आने लगी। धीरे–धीरे वक्त गुजारता रहा और पन्द्रह–सोलह(15–16) साल की उम्र होने के बाद सुजाता मैडम का बाहर गली में खेलना–कूदना कम हो गया, लेकिन सेठ जी अभी ग्यारह–बारह(11–12) साल के बच्चे थे, उनको जैसे ही पता चलता सुजाता आई है, वो मैडम की बुआ के घर आकर सुजाता मैडम को अपने साथ खेलने के लिए कहते और सुजाता मैडम मना कर देती।”

कृतिका—“फिर?”

सुदर्शन—“फिर सेठ जी मैडम को बताते, मैंने तुम्हें कितना याद किया? फिर सुजाता मैडम से पूछते, तुम्हें मेरी याद नहीं आती क्या? तुमने यहाँ आना कम क्यों कर दिया? दोनों में इस तरह की बातें होती।”

कृतिका ने मुस्कुराकर कहा—“फिर सुजाता अन्टी क्या कहती थी?”

सुदर्शन—“सुजाता मैडम को भी अपने बचपन के दोस्त सेठ जी की बातें बहुत अच्छी लगती थी। फिर सुजाता मैडम सेठ जी को समझाती, अब मैं बड़ी हो गई हूँ। अब ऐसे गली में, मिट्टी में खेलना अच्छा नहीं लगता। फिर सेठ जी कहते, लेकिन मेरा तो तुम्हारे साथ खेलने का बहुत मन करता है। मुझे तो तुम्हारी और मेरी सारी बातें याद है। बचपन में खेलते–खेलते हर रोज अपनी लड़ाई होती थी, तुम मुझे पीट देती थी, मैं रोने लगता था। फिर तुम पहले हँसकर मेरा मज़ाक उड़ाती थी। फिर मुझे मनाती थी। फिर हम साथ–साथ खेलते थे।”

कृतिका ने हँसकर कहा—“सुजाता अन्टी, जय अंकल को पीटती थी।”

सुदर्शन ने मुस्कुराकर कहा—“हाँ।”

कृतिका—“तुम्हें कैसे पता?”

सुदर्शन—“अक्सर बताते रहते है। बहुत बार मैं उनके पास बैठा होता हूँ, तब वो आपस में एक–दूसरे के साथ अपने बचपन की बातें करते हैं। इस तरह मुझे भी पता चल गया।”

कृतिका—“हम्म…फिर सुजाता अन्टी क्या कहती थी?”

सुदर्शन—“अब सुजाता मैडम बचपन की तरह गली में जाकर मिट्टी में खेल तो सकती नहीं थी। पहले की तरह हर महीने बुआ के घर भी नहीं आ सकती थी। लेकिन सेठ जी की बातें सुनकर मैडम को भी बचपन की सारी बातें याद आती और घर जाने के बाद सुजाता मैडम को सेठ जी बहुत याद आते। इसलिए सुजाता मैडम ने बातचीत का एक तरीका निकाला, ताकि सेठ जी के साथ उनकी दोस्ती चलती रहे।”

कृतिका—“क्या?”

सुदर्शन—“लैटर। खत। चिट्ठी।”

कृतिका मुस्कुराकर गाती हुई बोली—“ओह… कबूतर जा–जा–जा, कबूतर जा–जा–जा। पहले प्यार की पहली चिट्ठी साजन को दे आ। फिर आगे बताओ।”

सुदर्शन ने हँसकर कहा—“हाँ, उस वक्त अब की तरह मोबाइल वगैरह तो थे नहीं। इसलिए सुजाता मैडम ने सेठ जी को चिट्ठी लिखना और वो डाक टिकट लगाकर पोस्ट करना, लाल रंग के डिब्बे में खत डालना। जो भी तरीका है, खत भेजने का। वो सब सीखा दिया। फिर सेठ जी और सुजाता मैडम एक–दूसरे को चिट्ठियाँ लिखने लगे। सेठ जी और सुजाता मैडम दोनों एक–दूसरे के खतों को छुपाकर नहीं रखते थे। घर में चिट्ठी के बारे में कोई पूछता था, तो घरवालों को चिट्ठी दिखा देते थे। घरवाले चिट्ठी पढ़ते थे, तो चिट्ठियों में वहीं बचपन वाली हँसी–मजाक और खेलकूद की बातें होती थी। दोनों एक–दूसरे की पढ़ाई–लिखाई के बारे में पूछ लेते थे, एक–दूसरे का हाल–चाल पूछ लेते थे, एक–दूसरे के घरवालों का हाल–चाल पूछ लेते थे। चिट्ठियों में ये साधारण बातें पढ़कर सेठ जी और सुजाता मैडम के घरवालों ने सोचा, दोनों बचपन में साथ खेलते थे, बचपन की बातें याद तो आती ही है। फिर जयसिंह तो अभी बच्चा है। बच्चों को अपने साथ खेलने वालों से लगाव होता ही है, इसलिए खतों के जरिये बातें करते हैं। इस तरह की बातें सोचकर दोनों के घरवालों ने ज्यादा ध्यान नहीं दिया और कोई रोक–टोक नहीं लगाई। इस तरह चिट्ठियों में बातें करते–करते सेठ जी और सुजाता मैडम की दोस्ती मजबूत होती चली गई।”

कृतिका—“फिर अंकल जब बड़े हुए, तब भी किसी ने कुछ नहीं कहा?”

सुदर्शन—“नहीं, साधारण बातें लिखते थे। कोई प्यार–मोहब्बत वाली बात तो लिखते नहीं थे, इसलिए किसी ने कुछ नहीं कहा। दो–चार महीनों से जब सुजाता मैडम अपनी बुआ के घर आती थी, तो दोनों की मुलाकात हो जाती थी। दोनों की चिट्ठियाँ पढ़ने के कारण सबको मालूम था, दोनों के मन में एक–दूसरे के लिए कुछ गलत नहीं है। इसलिए किसी ने मिलने–जुलने से भी नहीं रोका।”

कृतिका—“अच्छा, फिर?”

सुदर्शन—“फिर जब सुजाता मैडम की उम्र अठारह–उन्नीस(18–19) साल की हुई, तो मैडम के घरवाले मैडम के लिए लड़का देखने लगे। उस टाइम सेठ जी चोदह–पन्द्रह (14–15) साल के थे। सुजाता मैडम अपनी बुआ के घर आकर जब सेठ जी से मिली, तो बातों–बातों में सुजाता मैडम ने सेठ जी से कहा, मेरे घरवाले मेरे लिए लड़का देख रहे है। जैसे ही उनको मेरे लिए कोई अच्छा लड़का पसन्द आया, फिर उसके साथ मेरी शादी हो जाएँगी और शादी के बाद हमारी बातचीत बन्द।”

कृतिका—“फिर अंकल ने क्या कहा?”

सुदर्शन—“सेठ जी ने कुछ नहीं कहा। बस सुजाता मैडम की शादी के बाद सुजाता मैडम के साथ बातचीत बन्द होने वाली बात सुनकर सेठ जी उदास हो गए। फिर यहाँ से शुरुआत हुई, सेठ जी और मैडम के प्यार की।”

कृतिका—“वो कैसे?”

सुदर्शन—“सुनती जाओ। सुजाता मैडम दो–तीन दिन बाद जब बुआ के घर से वापस अपने शहर अपने घर जाने से पहले सेठ जी से मिलने आई, तो सेठ जी ने मैडम से कहा, तुम मुझसे शादी कर लो। फिर हमारी बातचीत कभी बन्द नहीं होगी।”

कृतिका हँसकर बोली—“अरे वाह… इतना स्वीट प्रपोज़। फिर सुजाता अन्टी ने क्या कहा?”

सुदर्शन ने मुस्कुराकर कहा—“सुजाता मैडम भी तुम्हारी तरह हँसकर बोली, तुम अभी बहुत छोटे हो और शादी में लड़की की उम्र कम और लड़के की उम्र ज्यादा होनी चाहिए। अगर तुम उम्र में मेरे बराबर या मुझसे बड़े होते, तो मैं तुमसे शादी ज़रूर करती। लेकिन अभी सॉरी।”

कृतिका—“ओह…फिर क्या हुआ?”

सुदर्शन—“सेठ जी फिर से मायूस हो गए। सुजाता मैडम अपने शहर वापस चली गई। सेठ जी मन में सोचने लगे, काश ! मैं उम्र में सुजाता से बड़ा होता। ये सुजाता मुझसे पहले क्यों पैदा हो गई? अगर सुजाता मेरे दुनिया में आने के बाद दुनिया में आती, तो मैं सुजाता से शादी करके हमेशा सुजाता के साथ रह पाता।”

कृतिका—“फिर?”

सुदर्शन—“फिर कुछ दिन परेशान और उदास रहने के बाद सेठ जी ने यहाँ–वहाँ, इधर–उधर, छोटे–बड़े, कुँवारे–शादीशुदा, नारी–पुरुष, अपने आस–पास के बहुत से लोगों से पूछा, शादी में लड़के की उम्र लड़की से ज्यादा होना ज़रूरी है क्या? और अगर ज़रूरी है, तो क्यों जरूरी है? अगर शादी में पत्नी उम्र में पति से बड़ी हो, तो क्या प्रोब्लम होती है? बहुत से लोगों से इस तरह के सवाल–जवाब करने के बाद भी किसी से सेठ जी को कोई सही और जायज़ जवाब नहीं मिला।”

कृतिका—“फिर?”

सुदर्शन—“फिर सेठ जी ने शादी में पति बड़ा और पत्नी छोटी क्यों होती है? इसके बारे में पढ़ा। आखिर में सबसे पूछने और सब पढ़ने के बाद परिणाम निकला, प्रोब्लम तो कुछ भी नहीं है। बस लोगों ने ही अपनी मनमर्जी से ये नियम बनाया है।”

कृतिका—“फिर क्या किया, अंकल ने?”

सुदर्शन—“फिर सेठ जी ने यहीं बातें सुजाना मैडम को समझाना शुरू किया। सारी बातें सोच–समझकर चार–छः महीने बाद सुजाता मैडम सेठ जी की बातों से सहमत हो गई। सेठ जी की बातों से सहमत होने के बाद सुजाता मैडम ने कहा, तुम्हारी बातें बिलकुल सही है, लेकिन फिर भी हमारी शादी नहीं हो सकती। क्योंकि अभी तुम सिर्फ सोलह(16) साल के हो। जब तक तुम शादी के लायक होओगे, तब तक तो मेरी शादी हो चुकी होगी।”

कृतिका—“फिर?”

सुदर्शन—“फिर सेठ जी की आँखों में आँशू आ गए और सेठ जी ने रोते–रोते कहा, मैं समझ गया। तुम मुझसे शादी करना ही नहीं चाहती। मैं तुमसे शादी करने के लिए इतनी कोशिश कर रहा हूँ और तुम हर बार मुझे बहला–फूसलाकर मना कर देती हो। तुम अपने घरवालों को बोल नहीं सकती, तुम मुझसे शादी करना चाहती हो? जब मैं इक्कीस साल का हो जाऊँगा, फिर कर लेंगे शादी।”

कृतिका—“फिर?”

सुदर्शन—“फिर इस बात पर सुजाता मैडम और सेठ जी में बहुत बार झगड़े हुए लेकिन आखिर में सुजाता मैडम को भी झगड़ते–झगड़ते सेठ जी से प्यार हो ही गया। फिर सेठ जी सुजाता मैडम के दिल पर छा गए। सुजाता मैडम भी सेठ की दीवानी हो गई और दोनों एक–दूसरे के प्यार में पागल हो गए।”

कृतिका ने मुस्कुराकर कहा—“हम्म, फिर क्या रास्ता निकाला अंकल—अन्टी ने?”

सुदर्शन—“फिर सुजाता मैडम ने कहा, जब तक तुम इक्कीस साल के नहीं हो जाते, मैं कोई ना कोई बहाना बनाकर अपनी शादी टालती रहूँगी। लेकिन तुम अपने वादे से पलट मत जाना। सेठ जी ने कहा, तुम्हारी कसम ! मैं इक्कीस साल का होते ही तुमसे शादी कर लूँगा। तुम्हारे सिवा किसी ओर से शादी के बारे में सोचूँगा भी नहीं। इस तरह सेठ जी और सुजाता मैडम ने प्यार के वादे कर लिए, प्यार की कसमें खा ली। इसके बाद सुजाता मैडम के लिए जब भी कोई रिश्ता आता, तो मैडम कोई ना कोई बहाना बनाकर शादी से मना कर देती। लेकिन सुजाता मैडम जब बाईस–तैईस(22–23) साल की हुई, तो एक लड़का मैडम के घरवालों को इतना पसन्द आया, कि सुजाता मैडम के घरवालों ने मैडम के मना करने के बाद भी सुजाता मैडम का रिश्ता कर दिया।”

कृतिका—“ओह… फिर?”

सुदर्शन—“फिर सुजाता मैडम ने सेठ जी से कहा, मुझे माफ़ कर दो। मैंने बहुत कोशिश की, लेकिन मेरे घरवालों ने जबरदस्ती रिश्ता कर दिया। सेठ जी ने बेवफाई के इल्जाम लगाकर कहा, मुझे तो पहले ही पता था, तुम्हें मुझसे शादी करनी ही नहीं है। सुजाता मैडम ने कहा, अब तुम चाहें जो मर्ज़ी इल्ज़ाम लगाओ, लेकिन मैं मजबूर हूँ।”

कृतिका—“फिर?”

सुदर्शन—“फिर सेठ जी सबकी परवाह छोड़कर सीधे सुजाता मैडम के घर चले गए और मैडम के घरवालों को सब सच–सच बता दिया, सुजाता और मैं एक–दूसरे से बहुत प्यार करते हैं। एक–दूसरे के बिना नहीं रह सकते। एक–दूसरे से शादी करना चाहते हैं। लेकिन मेरी उम्र कम है, इसलिए दो–ढ़ाई साल रुक जाओ।”

कृतिका—“अरे वाह… मतलब जय अंकल शुरू से ही बहुत हिम्मत वाले है।”

सुदर्शन ने हँसकर कहा—“वो तो है ही। और सुजाता मैडम भी कम नहीं है। वो भी शुरू से ही ऐसी है।”

कृतिका—“हम्म…फिर?”

सुदर्शन—“सुजाता मैडम के घरवालों ने पहले तो सेठ जी का मज़ाक उड़ाया। फिर सुजाता मैडम ने भी सेठ जी का पूरा साथ दिया और कहा, जय सच बोल रहा है।”

कृतिका—“फिर?”

सुदर्शन—“फिर जब सेठ जी नहीं माने, तो सुजाता मैडम के घरवालें सेठ जी की पिटाई करने लगे। सुजाता मैडम सेठ जी को बचाने आयी, इसलिए मैडम को भी पीटा। आखिर में मैडम के घरवालों ने सेठ जी को धक्के देकर घर से भगा दिया। सेठ जी ने फिल्मी स्टाइल में कहा, सुजाता, हम हार नहीं मानेंगे। एक ना एक दिन हम ज़रूर मिलेंगे।”

कृतिका—“ओह… गॉड। फिर क्या किया, अंकल—अन्टी ने?”

सुदर्शन—“फिर सेठ जी ने उँगली टेढ़ी करके घी निकालने का सोचा। सेठ जी ने उस लड़के का पता लगाया, जिसके साथ सुजाता मैडम का रिश्ता पक्का हुआ था। पता लगाकर सेठ जी पहुँच गए उस लड़के के शहर। और वहाँ जाकर उस लड़के की पूरी रिश्तेदारी में ये खबर फैला दी, सुजाता का जयसिंह नाम के लड़के के साथ चक्कर चल रहा है। लड़के वालों तक जब खबर पहुँची, तो उन्होंने सुजाता मैडम के साथ अपने लड़के की शादी करने से मना कर दिया।”

कृतिका ने मुस्कुराकर कहा—“ओह ! वाओ। जय अंकल इज़ ग्रेट।"

सुदर्शन—“अभी कहाँ ग्रेट? अभी तो और भी प्रोब्लम हुई थी। उस लड़के के घरवालों ने तो सुजाता मैडम को बहू बनाने से मना कर दिया, लेकिन सुजाता मैडम को तो तुमने देखा ही है। सुजाता मैडम अभी पचास(50) साल की उम्र में भी कितनी खूबसूरत है, तो उस टाइम तैईस(23) साल की उम्र में तो और भी अच्छी लगती होगी। तो सुजाता मैडम की खूबसूरती देखकर वो लड़का मैडम पर लट्टू हो गया था। उसने अपने घरवालों से कहा, एक बार इस सुजाता से मेरी शादी करवा दो और दो–चार महीने इसके साथ रहने दो। फिर चाहें डिवॉर्स करवा देना।”

कृतिका ने क्रोध से कहा—“उफ्फ… वो तो बहुत ही घटिया और गन्दा लड़का था अच्छा हुआ, सुजाता आंटी की उससे शादी नहीं हुई।”

सुदर्शन—“हाँ, उस लड़के की ये बात किसी तरह सेठ जी को मालूम हो गई। फिर सेठ अपने चार–पाँच दोस्तों को लेकर गए और पीट–पीटकर उसकी हड्डी–पसली एक कर आए। उस लड़के के घरवालों ने सोचा, इस सुजाता ने शादी किये बिना ये हाल करवा दिया। शादी के बाद पता नहीं क्या–क्या करेगी? और अपने लड़के को सुजाता मैडम और सुजाता मैडम के घरवालों से पूरी तरह दूर कर लिया।”

कृतिका ने गंभीरता से कहा—“बहुत अच्छा किया उस लड़के के साथ, अंकल ने।”

सुदर्शन—“हाँ, वो इसी लायक था। फिर ये सब होने के बाद जब सेठ जी और सुजाता मैडम की मुलाकात हुई, तो सेठ जी ने सुजाता मैडम से कहा, मुझे माफ़ दो। तुम्हारी बदनामी तो बहुत हुई है, लेकिन दूसरा कोई रास्ता नहीं था। सुजाता मैडम ने कहा, तुम माफ़ी मत माँगो। तुम्हारे लिए मैं कुछ भी सहन कर सकती हूँ।”

कृतिका—“हम्म।”

सुदर्शन—“फिर सेठ जी ने धीरे–धीरे सुजाता मैडम के सारे रिश्तेदारों में ये बात फैला दी, कि सुजाता का जयसिंह के साथ चक्कर चल रहा है। इसलिए सुजाता मैडम के घरवालों को सुजाता मैडम के लिए कोई लड़का मिल नहीं रहा था। जैसे–तैसे किसी तरह कोई लड़का मिलता, तो सेठ जी वहाँ पहुँचकर किसी ना किसी तरीके से अपने और सुजाता मैडम के चक्कर की बातें फैला देते। इस तरह सुजाता मैडम के घरवाले सुजाता मैडम की शादी नहीं कर पा रहे थे।”

कृतिका—“फिर अंकल ने सुजाता अन्टी के घरवालों को कैसे मनाया?”

सुदर्शन—“सुजाता मैडम के घरवालों को मनाने से पहले सेठ जी के घरवालों ने ही सेठ जी के लिए बड़ी मुसीबत खड़ी कर दी। सुजाता मैडम की बुआ ने सेठ जी के घरवालों से कहा, आपके लड़के को समझाओ, वो मेरी भतीजी की जिन्दगी खराब कर रहा है। एक–दो बार सुजाता मैडम के घरवाले भी सेठ जी के घरवालों से झगड़ा करके गए। फिर सेठ जी के घरवालों ने सेठ जी को समझाया, अभी तो तू छोटा है। अभी तो तेरी शादी की उम्र ही नहीं हुई। वो लड़की तेरे से बड़ी है। अपने से बड़ी उम्र की लड़की का चक्कर छोड़। जवाँनी के जोश में दुनिया से अलग चलने की कोई ज़रूरत नहीं है।

कृतिका—"ओह।"

सुदर्शन—"हम्म। फिर सेठ जी ने पहले प्यार से अपने घरवालों को समझाने की कोशिश की, लेकिन सेठ जी के घरवाले नहीं माने। फिर सेठ जी ने साफ़–साफ़ बोल दिया, शादी तो सिर्फ सुजाता से ही करूँगा, मैं सुजाता के इलावा किसी और को अपनी पत्नी कभी नहीं मानूँगा।”

कृतिका—“फिर?”

सुदर्शन—“फिर सेठ जी के घरवालों ने सोचा, इस उम्र में प्यार का भूत चढ़ता ही है। इससे पहले कि जयसिंह प्यार के चक्कर में कुछ उल्टा–सीधा करें, जयसिंह की शादी कर देते है। शादी के बाद प्यार का भूत अपने आप उतर जाएँगा।”

कृतिका ने आश्चर्य से कहा—“फिर?”

सुदर्शन—“फिर सेठ जी के घरवालों ने सेठ जी के बहुत मना करने के बाद भी सेठ जी का रिश्ता कर दिया। सेठ जी ने अपने घरवालों से कहा, अभी तो मैं बीस साल का ही हूँ। जब मैनें सुजाता से शादी करने का कहा, तब तो बोल रहे थे, अभी तेरी शादी की उम्र ही नहीं है। लेकिन सेठ जी के घरवालों ने सेठ जी की एक नहीं सुनी। बस जल्दी से जल्दी सेठ जी की शादी करने में लग गए।”

कृतिका—“फिर अंकल ने अपनी शादी कैसे रोकी?”

सुदर्शन—“नहीं रोक पाए शादी।”

कृतिका—“मतलब, अंकल ने किसी और से शादी कर ली?”

सुदर्शन—“हाँ, सेठ जी ने शादी से पहले अपने ससुराल वालों को सब सच–सच बता दिया, मैं किसी और से प्यार करता हूँ और उसी से शादी करना चाहता हूँ। आप लोग अपनी बेटी की शादी मेरे साथ मत करो। लेकिन सेठ जी के ससुराल वालों ने भी सेठ के प्यार को बचपना और नादानी समझकर जवाँनी का जोश समझ लिया और सेठ जी की धन–दौलत देखकर सब कुछ जानते हुए भी अपनी बेटी की शादी सेठ जी के साथ कर दी। सेठ जी के ससुराल वालों ने सोचा, एक बार शादी हो जाए, शादी के बाद सब भूल जाएँगा। अब लड़कों को इस उम्र में कोई ना कोई लड़की तो पसन्द आ ही जाती है। इस एक बात के लिए इतना अच्छा लड़का हाथ से क्यों जाने दें?”

कृतिका—“ओह… फिर क्या हुआ?”

सुदर्शन—“फिर सेठ जी की शादी होने के बाद सुजाता मैडम के घरवालों ने सुजाता मैडम से कहा, देख, जिसके लिए तू पागल हो रही है, उसने तो शादी कर भी ली। तू बैठी रह उसके इंतजार में कुँवारी।”

कृतिका—“फिर सुजाता अन्टी ने क्या कहा?”

सुदर्शन—“सुजाता मैडम ने अपने घरवालों से कुछ नहीं कहा। सेठ जी शादी के बाद सुजाता मैडम से मिलने उनके शहर गए, तो सुजाता मैडम बहुत दुःखी होकर सेठ जी से बहुत नाराज़ हुई और सेठ जी को बोली, झूठे, धोखेबाज, बेवफा, मक्कार। मैं तेरे प्यार में इतनी तकलीफ़ सहन कर रही हूँ। हर रोज अपने घरवालों से ताने सुनती हूँ। तुम्हारे कारण बदनाम होकर अपने घरवालों की पिटाई सहन करके भी तुमसे ही प्यार करती हूँ और तुमने किसी और से शादी कर ली। सेठ जी ने कहा, तुम चाहें जो मर्ज़ी कह लो। लेकिन मेरे प्यार पर शक मत करो। मैं दिल से सिर्फ तुम्हें ही अपनी पत्नी मानता हूँ। उस लड़की के साथ मेरी शादी ज़रूर हुई है, लेकिन मैं दिल से उसको अपनी पत्नी नहीं मानता। शादी को दो महीने हो गए। रोज उसके साथ सोता हूँ, लेकिन कभी उसको हाथ भी नहीं लगाया। सुजाता मैडम ने गुस्से में कहा, तो लगा लो ना। मुझे शादी के सपने दिखाकर शादी तो तुमने उससे ही की।”

कृतिका—“ओह…फिर अंकल ने कैसे समझाया सुजाता अन्टी को?”

सुदर्शन—“सेठ जी उस वक्त सुजाता मैडम को नहीं समझा पाएँ। सुजाता मैडम सेठ जी को बहुत सी बातें सुनाने के बाद नाराज होकर अपने घर चली गई और सेठ जी वापस अपने शहर आ गए। फिर सेठ जी की शादी होने के चार–पाँच महीने बाद सेठ जी की पत्नी ने अपने मायके जाकर अपने घरवालों से कहा, जब जयसिंह ने आप लोगों को शादी से पहले सारी बात सच–सच बताई थी, फिर भी आप लोगों ने उसके साथ मेरी शादी क्यों करवाई? आप लोगों ने जयसिंह के साथ मेरी शादी तो करवा दी, लेकिन जयसिंह मुझे अपनी पत्नी मानता ही नहीं है। वो हर रात मेरे साथ सोता ज़रूर है, लेकिन शादी के बाद से अब तक जयसिंह ने कभी गलती से भी मेरी तरफ़ देखा तक नहीं है।”

कृतिका—“फिर?”

सुदर्शन—“फिर सेठ जी के ससुराल वालों ने कहा, ऐसे कैसे पत्नी नहीं मानता? सारे समाज के सामने, सारे रीति–रिवाजों से शादी हुई है। कोई मज़ाक थोड़े ही है। हम ईंट से ईंट बजा देंगे उनकी।”

कृतिका ने आश्चर्यचकित होकर कहा—“ओ माई गॉड ! पहले सब कुछ जानने के बाद भी शादी कर दी। और फिर कहते है, ईंट से ईंट बजा देंगे।”

सुदर्शन—“हाँ, ऐसा भी होता है।”

कृतिका—“फिर क्या हुआ?”

सुदर्शन—“फिर पहले तो सेठ जी के घरवालों और सेठ जी के ससुराल वालों के आपस में बहुत झगड़े हुए। सेठ जी ने कहा, भाड़ में जाओ, लड़ते रहो, मरते रहो। मुझे मतलब नहीं है। मैंने तो बहुत समझाया था, लेकिन आप लोग नहीं माने। अब भुगतो, मैं तो उसको अपनी पत्नी नहीं मानता। मेरे लिए तो वो पराई नारी है।”

कृतिका—“फिर?”

सुदर्शन—“फिर जब लड़ने–झगड़ने से कोई फायदा नहीं हुआ, तो सेठ जी के घरवालों और सेठ जी के ससुराल वालों ने मिलकर सेठ जी को समझाने का फैसला किया। सबने मिलकर सेठ जी को समझाया, शादी कोई खेल या मज़ाक नहीं है। इस लड़की के साथ तेरी शादी हो गई है। अब यहीं तेरी पत्नी है। इसलिए ये बचपना छोड़ और सही रास्ते पर आजा।”

कृतिका—“फिर अंकल ने क्या कहा?”

सुदर्शन—“सेठ जी ने कहा, यहीं सारी बातें तो शादी से पहले मैं आप सबको समझा रहा था। शादी कोई खेल या मज़ाक नहीं है। मैं मन से किसी और को अपनी पत्नी मानता हूँ, इस लड़की के साथ मेरी शादी मत करो। लेकिन किसी ने भी मेरी एक नहीं सुनी। सब बोल रहे थे, जवाँनी का जोश है। एक बार जयसिंह की शादी हो जाए, फिर सब भूल जाएँगा। जिसके साथ मैं शादी करना चाहता हूँ, उसके लिए तो मेरी उम्र कम है और जिसके साथ मैं शादी नहीं करना चाहता, उसके साथ बीस साल की उम्र में ही फेरे करवा दिये।”

कृतिका—“हम्म, फिर?”

सुदर्शन—“फिर सबने मिलकर सेठ जी को थोड़ा और समझाया, कहाँ तू अपने से चार साल बड़ी लड़की के चक्कर में पड़ा है। जरा सोचकर देख, वो तेरे से पहले बुढ़ी हो जाएँगी। लोग तेरा मज़ाक उड़ाएँगें। ये लड़की तेरे से डेढ़–दो साल छोटी, तेरे बराबर की है। सुन्दर भी बहुत है। इसके साथ तेरी जोड़ी बहुत अच्छी है। इसलिए मूर्खता छोड़ और समझदारी से काम लें।”

कृतिका—“फिर अंकल ने क्या कहा?”

सुदर्शन—“फिर सेठ जी ने कुछ लोगों के उदाहरण देकर कहा, मज़ाक उड़ाने वाले तो किसी ना किसी तरीके से मज़ाक उड़ाते ही है। जब किसी बुढ़े आदमी को जवाँन पत्नी के साथ देखते है, तो बोलते है, इस औरत ने या तो किसी लालच में इस बुढ़े से शादी की है या फिर इस औरत में कोई कमी है। जिसके कारण इस औरत को कोई अपनी उम्र का पति नहीं मिला। जब किसी काले–कलूटे या साँवले आदमी को सुन्दर दिखने वाली गौरी पत्नी के साथ देखते हैं, तो बोलते हैं, पता नहीं, क्या देखकर इस सुन्दर नारी ने इस काले–कलूटे साँवले आदमी को पति बनाया। जब किसी गौरे रंग के आकर्षक पुरुष को काली–कलूटी या साँवली पत्नी के साथ देखते हैं, तो बोलते हैं, इस आदमी में ज़रूर कोई ना कोई कमी है, इसलिए इतना आकर्षक होने के बाद भी इस काली–कलूटी या साँवली महिला को पत्नी बनाया। और रही बात सुजाता के मुझसे चार साल बड़ी होने की, तो वो सिर्फ चार साल बड़ी है। कोई चालीस–पचास साल की नहीं है, जो वो जल्दी बुढ़ी हो जाएँगी और मैं जवाँन रह जाऊँगा। फिर ये बात तो जब लड़के अपने से चार–पाँच साल या आठ–दस साल छोटी लड़की से शादी करते है, तब भी लागू होनी चाहिए। जब पति उम्र में पत्नी से ज्यादा बड़ा होता है, तब वो भी तो पत्नी से पहले बुढ़ा हो जाता है। उस वक्त जवाँन और खूबसूरत दिखने वाली पत्नी को भी शर्म महसूस हो सकती है, एक बुढ़े को अपना पति कहते हुए।”

कृतिका—“हम्म… फिर अंकल की इस बात क्या जवाब दिया सबने?”

सुदर्शन—“क्या जवाब देते? वहीं घिसे–पिटे दकियानूसी जवाब। दुनिया क्या पागल है? लोग क्या मूर्ख है? जो समाज के बनाए हुए नियमों के हिसाब से चल रहे है?”

कृतिका—“हम्म… जब कोई जवाब नहीं होता, तो आखिर में यहीं बोला जाता है।”

सुदर्शन—“हाँ, या फिर बोलते है, धर्म की बात पर सवाल–जवाब करना पाप है, हराम है।”

कृतिका—“हम्म… फिर क्या हुआ?”

सुदर्शन—“फिर सेठ जी के घरवालों और सेठ जी के ससुराल वालों के बहुत समझाने के बाद भी जब सेठ जी नहीं माने और खुदखुशी की धमकी देने लगे, तो सेठ जी के ससुराल वालों ने चार–पाँच महीने बाद सेठ जी से अपनी बेटी का डिवॉर्स करवा लिया।”

कृतिका—“फिर अंकल के घरवाले मान गए?”

सुदर्शन—“नहीं, फिर सेठ जी के घरवाले सेठ जी की दूसरी शादी के बारे में सोचने लगे। सेठ जी ने गुस्से में आकर कहा, अब भी अक्ल नहीं आई। क्यों हमारी जिन्दगियाँ खराब करने पर तूले हो? मैं सिर्फ सुजाता को अपनी पत्नी मानता हूँ और मैं उसके सिवा किसी और को अपनी पत्नी कभी नहीं मानूँगा। चाहें मेरी जितनी मर्ज़ी शादियाँ करवा दो।”

कृतिका—“फिर?”

सुदर्शन—“फिर आखिरकार सेठ जी के घरवाले सेठ जी के प्यार के सामने झूक गए। सेठ जी के घरवालों ने सुजाता मैडम के घरवालों से मिलकर सेठ जी और सुजाता मैडम की शादी की बात की। सुजाता मैडम के घरवालों ने चार–पाँच महीने तक नाटकबाजी की। फिर आखिर में सुजाता मैडम के घरवालों ने भी सेठ जी और सुजाता मैडम के प्यार के सामने हार मान ली। तब जाकर सेठ जी और सुजाता मैडम की शादी हुई।”

कृतिका—“उफ्फ… सुजाता अन्टी उम्र में अंकल से चार साल बड़ी है। प्रोब्लम तो बस यहीं थी ना?”

सुदर्शन—“हाँ, सुजाता मैडम उम्र में सेठ जी से बड़ी है। सिर्फ इसलिए सेठ जी और सुजाता मैडम को इतनी परेशानी और इतने दुःख झेलने पड़े।”

कृतिका—“हम्म… लेकिन खुशी की बात ये है, आखिर में जीत प्यार की हुई।”

सुदर्शन ने मुस्कुराकर कहा—“हाँ, वो तो हुई। सेठ जी ने सुजाता मैडम से कहा था, मैं इक्कीस साल का होते ही तुमसे शादी कर लूँगा और जब सेठ जी और सुजाता मैडम की शादी हुई, तब सेठ जी की उम्र इक्कीस(21) साल और सुजाता मैडम की उम्र पच्चीस(25) साल थी। इस तरह सेठ जी ने अपना वादा निभा दिया।”

कृतिका—“हम्म…लेकिन एक वादा टूट गया।”

सुदर्शन—“कौनसा?”

कृतिका—“अंकल ने कहा था, वो सुजाता अन्टी के सिवा किसी और से शादी नहीं करेंगे। लेकिन अंकल के घरवालों ने जबरदस्ती उनकी शादी कर दी। तो अंकल का सुजाता अन्टी के सिवा किसी और से शादी नहीं करने का वादा टूट गया ना।”

सुदर्शन—“वो शादी सिर्फ कहने के लिए शादी थी। जब सेठ जी ने उस लड़की को दिल से अपनी पत्नी माना ही नहीं। उसके साथ सो कर भी कभी उसको हाथ तक नहीं लगाया। तो फिर उस शादी का क्या मतलब? अगर सेठ जी ने उस लड़की को पत्नी का दर्जा दे दिया होता, तो वो लड़की अपने मायके वालों से शिकायत नहीं करती। फिर ना तो सेठ जी के ससुराल वाले उस लड़की से सेठ जी का डिवॉर्स करवाते और ना ही फिर सेठ जी और सुजाता मैडम की शादी हो पाती। इस तरह सेठ जी ने उस लड़की से शादी होने के बाद भी उस लड़की को अपनी पत्नी नहीं माना, तभी तो सेठ जी और सुजाता मैडम की शादी हुई।”

कृतिका—“हम्म… ये तो है। अगर अंकल उसे पत्नी का दर्जा दे देते, तो वो जैसे–तैसे अंकल के साथ एडजस्ट कर लेती। लेकिन अंकल से अलग नहीं होती।”

सुदर्शन—“हाँ, दिल से तो सेठ जी ने सिर्फ एक सुजाता मैडम को ही अपनी पत्नी माना है और आज तक सिर्फ सुजाता मैडम के ही दीवाने है। अब सेठ जी छियालिस (46) साल हो गए है और सुजाता मैडम पचास(50) साल की हो गयी है। अगले महीने पच्चीस नवम्बर को उनकी शादी के पच्चीस साल पूरे हो जाएँगें।”

कृतिका—“ओह… ग्रेट ! सिल्वर जुबली। इसे कहते है, सच्चा प्यार। शादी के इतने साल बाद भी दोनों एक–दूसरे के साथ बहुत खुश है। वरना ज्यादातर लोगों का प्यार तो शादी होने के कुछ साल बाद ही ख़त्म हो जाता है।”

सुदर्शन ने मुस्कुराकर कहा—“अरे अब सेठ जी ना मोटे, ना पतले, एकदम तंदुरुस्त। उस पर इतने स्मार्ट और हैंडसम है, क्लीन शेव होकर बिलकुल हीरो की तरह चकाचक रहते है। सुजाता मैडम साड़ी पहने या सूट पहने, हर ड्रेस में बिलकुल परियों की रानी जैसी लगती है। अच्छी हेल्थ, कसावट भरी गोलमटोल सेहतमंद और तंदुरुस्त। उनको देखकर लगता हैं, जैसे सुन्दरता की देवी हो, खूबसूरती का दूसरा नाम। तो प्यार कम कैसे हो?”

कृतिका ने हँसकर कहा—“अरे नहीं, बहुत से आदमी पत्नी चाहें कितनी भी सुन्दर हो, फिर भी बाहर वाली महिलाओं के पीछे भागते हैं और ऐसी महिलाएँ भी होती है, जो पति चाहें कितना भी स्मार्ट और हैंडसम हो, फिर भी किसी दूसरे आदमी के साथ चक्कर चलाती है।”

सुदर्शन—“हम्म…ऐसा तो मैनें भी बहुत देखा है।”

कृतिका—“तभी तो ! जय अंकल और सुजाता अन्टी का प्यार देखकर मैं तो उनकी जबरदस्त फैन हो गई हूँ।”

सुदर्शन ने मुस्कुराकर कहा—“हम्म…मैं तो हर मामले में उनका फैन हूँ।”

कृतिका ने मुस्कुराते हुए कहा—“कभी उनसे पूछना चाहिए, शादी के पच्चीस साल बाद भी इतना प्यार? इसका राज तो बताओ?”

सुदर्शन ने हँसकर कहा—“हाँ, तो जब उनके घर जाओ, तब पूछ लेना।”

कृतिका—“मुझे पिटना थोड़े ही है, जो उनसे पूछू।”

सुदर्शन—“लो, इसमें पिटने वाली क्या बात है? मैं पूछ लूँगा.”

कृतिका—“वो नाराज नहीं होंगे?”

सुदर्शन—“नाराज क्यों होंगे?”

कृतिका—“तुम उनसे हैंसबेंड–वाईफ के रिलेशन के बारे में पूछोगे, उनका बुरा नहीं लगेगा क्या?”

सुदर्शन—“दिल और दिमाग में गन्दगी नहीं होनी चाहिए। फिर सही और जायज बात पूछने पर कोई नाराज नहीं होता। मैं सेठ जी और सुजाता मैडम की अपने मम्मी–पापा की तरह इज्ज़त करता हूँ। इसलिए मैं उनके बारे में या उनके साथ ऐसी कोई बात नहीं करूँगा, जो मुझे नहीं करनी चाहिए।”

कृतिका—“तुम बुरा ना मानो तो एक बात पूछूँ?”

सुदर्शन—“जरूर पूछो।”

कृतिका—“हम्म…तुम अपनी मम्मी पूछ लेते इस बारे में?”

सुदर्शन—“अगर मेरी मम्मी की सोच सुजाता मैडम जैसी होती, तो जरूर पूछ लेता। लेकिन मेरी मम्मी अलग माहौल में पली–बढ़ी है। उनकी सोच अलग है। बाकी जो सही और जायज बात है, उसके बारे में किसी से भी बात करने में कोई बुराई नहीं है। बस इतना ध्यान रखो, जिसके साथ हम बात कर रहे है, उसके दिल और दिमाग में गन्दगी नहीं होनी चाहिए। किसी से बात करने से पहले ये कन्फर्म करना बहुत जरूरी है।”

कृतिका—“ओके, लेकिन अपने मम्मी–पापा से इस बारे में बहुत कम लोग बात करते हैं।”

सुदर्शन—“यहीं तो सारी प्रोब्लम की जड़ है। सेठ जी और सुजाता मैडम ने यहीं बातें तो तुम्हारे मम्मी–पापा को समझाई है। जन्म के बाद बच्चा सबसे पहले अपने मम्मी–पापा के पास ही रहता है, इसलिए जिन्दगी की हर बात के बारे में बच्चों को मम्मी–पापा जितनी अच्छी तरह समझा सकते है, उतनी अच्छी तरह दूसरा कोई नहीं समझा सकता। बस दो बातों का ध्यान रखना बहुत जरूरी है। पहला तो ये कि हम खुद सही हो, वरना जो माँ–बाप खुद गलत रास्ते पर चल रहे हो, वो अपने बच्चों को गलत रास्ते पर जाने से रोके, तो बच्चे मन में कहेंगे, खुद तो सब कुछ कर रहे हैं और हमें रोक रहे हैं।”

कृतिका—“हाँ, ये तो होता ही है।”

सुदर्शन—“इसी तरह जो लड़का खुद लड़कियों के साथ रिलेशन बनाता हो, वो लड़का जब अपनी बहन को रोकेगा, तो बहन मुँह से बोलकर कहें या ना कहें, मन में यहीं सोचेंगी, वाह भाई, खुद तो लड़कियाँ पटा–पटाकर सब कुछ कर रहा हैं और मुझे पटने से रोक रहा है।”

कृतिका ने हँसकर कहा—“मैं ऐसी लड़कियों को जानती भी हूँ।”

सुदर्शन ने मुस्कुराकर कहा—“ये तो नोर्मल बात है। ऐसा लड़कों में भी होता है। जो लड़की खुद लड़कों को बेवकूफ बनाती हो, वो लड़की अगर अपने भाई को बुरी लड़कियों से दूर रहने के लिए समझाएँ, तो भाई भी यहीं सोचेगा, वाह बहन, खुद तो लड़की होकर सब कुछ कर रही है और मैं लड़का हूँ, फिर भी मुझे रोक रही है।”

कृतिका—“हाँ।”

सुदर्शन—“इसलिए कोई भी बात कहने या समझाने के लिए सबसे पहले तो खुद का सही और अच्छा होना बहुत जरूरी है। वरना हमारी बात का असर नहीं होगा। इसके बाद कोई भी बात कहने या समझाने का तरीका सही होना भी बहुत जरूरी है। तुम्हारे मम्मी–पापा बहुत अच्छे है। उनकी बहुत इज्जत है। वो किसी भी तरह का कोई गलत काम नहीं करते। लेकिन उनका तुम्हें सही रास्ते पर चलाने का तरीका गलत था। कुछ माँ–बाप जरूरत से ज्यादा प्यार देकर बच्चों को बिगाड़ देते है। तुम्हारे मम्मी–पापा ने ज़रूरत से ज्यादा सख़्ती करके तुम्हें बिगाड़ दिया।”

कृतिका—“नहीं, वो इतने सख़्त भी नहीं थे। मैं ही शरारतें बहुत ज्यादा करती थी और फिर मैंने उनको परेशान और दुःखी भी बहुत किया हैं.”

सुदर्शन आश्चर्य से बोला—“क्या बात है? आज तो मम्मी–पापा को सही और खुद को गलत बताया जा रहा है।”

कृतिका—“अब यार, सच तो यहीं है। मैं खुद ही बहुत ज्यादा बिगड़ गई थी। फिर वो क्या करते?”

सुदर्शन—“चलो, अब कौन कितना सही था और कौन कितना गलत? इसका तोलमोल नहीं करना। लेकिन ये देखकर बहुत अच्छा लगा, अब तुम बहुत खुश हो और खुद की गलतियाँ देख रही हो। जब इन्सान खुद में गलतियाँ तलाश करना शुरू कर दें, तब वो दूसरी सबसे अच्छी आदत अपना लेता है।”

कृतिका—“और पहली सबसे अच्छी आदत कौनसी हैं?”

सुदर्शन—“पहली मतलब सबसे ज्यादा अच्छी आदत है, खुद की बुराईयों को ख़त्म करना शुरू कर देना। क्योंकि बहुत सारे लोगों को मालूम होता है, उनमें क्या-क्या बुराई है? और वो उस बुराई का रोना भी रोते रहते हैं, लेकिन उस बुराई को ख़त्म करने की कोशिश नहीं करते।”

कृतिका—“हम्म… लेकिन मैं अब अपनी एक–एक बुराई को जड़ से ख़त्म कर दूँगी। ताकि मेरे कारण मेरे मम्मी–पापा को कहीं शर्मिन्दा ना होना पड़े।”

सुदर्शन ने तालियाँ बजाते हुए कहा—“आज तो तुम्हारी हर एक बात लाजवाब है।”

कृतिका हँसकर सुदर्शन के हाथ पकड़कर सुदर्शन को तालियाँ बजाने से रोककर बोली—“अब बस करो। मुझे ज्यादा हवा में मत उड़ाओ।”

सुदर्शन ने मुस्कुराकर कहा—“वैसे, तुम्हें खुश देखकर बहुत अच्छा लग रहा है।”

कृतिका—“लेकिन यार, एक प्रोब्लम है?”

सुदर्शन—“अब क्या प्रोब्लम रह गई?”

कृतिका—“मम्मी–पापा मेरी शादी को लेकर परेशान रहते है।”

सुदर्शन—“बच्चों के शादी के लायक होने के बाद सारे माँ–बाप अपने बच्चों की शादी के लिए परेशान रहते है। जब कोई अच्छा लड़का मिलेगा, तुम्हारी शादी भी हो जाएँगी।”

कृतिका—“प्रोब्लम तो यहीं है। मैं अब शादी करना नहीं चाहती।”

सुदर्शन ने आश्चर्यचकित होकर कहा—“क्यों? अभी तक बॉयफ्रैंड दिल से गया नहीं क्या?”

कृतिका—“अरे, वो तो कब का चला गया। अगर वो दिल से नहीं जाता, तो उसके बारे में फेसबुक पर पोस्ट थोड़े ही करती।”

सुदर्शन—“फिर शादी क्यों नहीं करना चाहती?”

कृतिका—“बस ऐसे ही। अब शादी से विश्वास उठ गया है। और फिर शादी करना ही जिन्दगी का मकसद थोड़े ही है। अपने मम्मी–पापा के साथ जिन्दगी गुजार लूँगी। वैसे भी अब जाकर मुझे मम्मी–पापा का प्यार मिला है। शादी करके मैं उनसे दूर नहीं जाना चाहती।”

सुदर्शन—“हाँ, तो शादी के बाद उनको अपने साथ रख लेना। जिसके साथ शादी करो, उसको शादी से पहले बोल देना, कि शादी के बाद तुम्हारे मम्मी–पापा तुम्हारे साथ ही रहेंगे।”

कृतिका—“नहीं, यार। एक तो ऐसा लड़का और ऐसा ससुराल मिलेगा नहीं। दूसरा मेरे मम्मी–पापा भी बेटी की शादी के बाद बेटी के साथ रहने के लिए नहीं मानेंगे।”

सुदर्शन—“तुम्हारे मम्मी–पापा को तो सेठ जी और सुजाता मैडम समझा देंगे। और लड़का भी मिल जाएँगा। बस तुम सारी बातें शादी से पहले क्लियर कर लेना।”

कृतिका हँसकर बोली—“तुम्हें मेरे बारे में सब पता है, फिर भी ऐसी बातें करते हो। पहली बात तो ये कि कोई अच्छा लड़का मुझसे शादी करेगा नहीं और अगर कोई अच्छा लड़का मुझ पर रहम खाकर दया करके मुझसे शादी के लिए तैयार हो भी गया, तो जब मैं अपनी शर्तें रखूँगी, तो उसका पहला जवाब यहीं होगा, कि एक तो गर्लफ्रैंड बनकर रिलेशन में रहने के बाद भी मैं तुझसे शादी कर रहा हूँ और तू मेरा एहसास मानने की जगह मेरे सामने शर्तें रखकर रही है।”

सुदर्शन—“तुम अभी तक वहीं अटकी हुई हो। सबने तुम्हें इतनी बार तो समझा दिया, तुमने किसी का बुरा नहीं किया, तुम्हारे साथ बुरा हुआ है। हो गई गलती इन्सान को पहचानने में। तो अब क्या करे? जिन्दगी भर रोते रहें। और बहुत सी लड़कियाँ तो आजकल सोच–समझकर जान–बुझकर रिलेशन में रहती है। कई फिल्म–एक्ट्रेस, टीवी–एक्ट्रेस नाम–पैसा, दौलत–शौहरत सब कुछ होने के बाद भी पहले लिव–इन–रिलेशन में रहती है, फिर धोखा खाने के बाद आत्महत्या करती है। बहुत सी साधारण घरों की लड़कियाँ आजकल सिर्फ इंजॉयमेंट के लिए रिलेशन बनाती है। तुम तो उन सबसे बहुत अच्छी हो। तुम्हारी जिन्दगी में तो कुछ प्रोब्लम थी, इसलिए तुम भटक गई।”

कृतिका—“फिर भी जैसे अच्छी लड़की को अच्छा लड़का मिलना चाहिए। उसी तरह किसी अच्छे लड़के को मेरे जैसी लड़की नहीं मिलनी चाहिए।”

सुदर्शन—“तुम्हारे अन्दर क्या कमी हैं? जो तुम्हें अच्छा लड़का नहीं मिलना चाहिए?”

कृतिका—“छोड़ो ये बात। जब मैं शादी करना ही नहीं चाहती, तो तुम ये सब क्यों समझा रहे हो?”

सुदर्शन—“लेकिन अगर किसी को तुमसे प्यार हो जाए और वो तुम्हारे साथ जिन्दगी गुजारने चाहें तो?”

कृतिका—“मुझसे किसी को प्यार नहीं हो सकता, सिर्फ हमदर्दी हो सकती है। जैसे तुम्हें प्यार के नाम पर रिलेशन बनाने वाली लड़कियाँ पसन्द नहीं, फिर भी तुम मेरे दोस्त बन गए। दोस्त बनने तक ठीक है, लेकिन मैं नहीं चाहती, कोई हमदर्दी के कारण मुझसे शादी करें।”

सुदर्शन मन में सोचने लगा कि अभी इसे कुछ मत बोल। ये अपने पापा के बिजनेस में उनकी मदद करना चाहती है। इसे वहीं करने दें। आज नहीं तो कल, ये जरूर अपनी जिन्दगी में कामयाबी हासिल करेंगी। तू उस वक्त तक का इंतजार कर और खुद को इसके लायक बना। वरना अभी अगर तूने इसे शादी के लिए मना भी लिया तो शादी के बाद तू इसे खुश रख पाएँगा? माना कि इसके माँ–बाप पहले इसके साथ अच्छा व्यवहार नहीं करते थे, लेकिन उन्होंने कभी इसे किसी चीज की कमी नहीं रहने दी। इसे जो चाहिए था, इसके माँगने से पहले इसे दिया।

कृतिका ने सुदर्शन को सोच में खोया देखकर कहा—“क्या हुआ?”

सुदर्शन—“नहीं, कुछ नहीं।”

कृतिका ने सुदर्शन के कंधे पर हाथ रखकर मुस्कुराते हुए कहा—“अरे, तुम मेरे लिए परेशान मत हो। मैं शादी के बिना भी बहुत खुश हूँ। अच्छा, अब मैं चलती हूँ। बहुत देर हो गई, घर से आए।”

सुदर्शन—“ठीक है।”

सुदर्शन और कृतिका बैंच से उठकर पार्क से बाहर चले जाते हैं।

अगले दिन नौ अक्टूबर, सोमवार की सुबह के पौने दस बजे सुदर्शन सीढ़ियां उतरते हुए नीचे बेसमेंट में आकर जयसिंह का केबिन खोलकर अन्दर आया और अलमारी से पचास नेकलेस से भरी ट्रे लेकर केबिन से बाहर आकर नेकलेस अपने टेबल पर रखकर कुर्सी पर बैठकर नेकलेस चैक करने लगा।

पाँच मिनट बाद सीढ़ियां उतरते हुए जयसिंह बेसमेंट में आकर सुदर्शन के पास आकर बोले—“ये कल चैक किये नहीं थे क्या?”

सुदर्शन—“नहीं, ये पचास रह गए थे।”

जयसिंह—“चलो ठीक है, कर लो। अच्छा, सुनो ! आज मैं और अँकुश तो चार–पाँच दिन के लिए बैंगलोर जा रहे हैं। मैडम, सृष्टि और संयम यहीं है। तो तुम जब तक हम वापस ना आए, तब तक यहीं घर पर ही सो जाना।”

सुदर्शन—“ठीक है।”

जयसिंह अपने केबिन की ओर मुड़कर केबिन में जाकर पूजा करने लगते हैं।

धीरे-धीरे एक-एक करके स्टाफ के अन्य लोग आकर एक–दूसरे को गुड मॉर्निंग बोलते हुए अपने–अपने टेबल पर अपने–अपने काम में लग जाते हैं। सुदर्शन आज सारा दिन कृतिका के बारे में सोचते हुए खोया–खोया सा रहता है।

रात के दस बजे सोफे पर सृष्टि और संयम के साथ बैठा सुदर्शन टीवी देखते हुए खोया हुआ है।

सुजाता किचन का काम निपटाकर किचन से बाहर आकर बोली—“चलो, ग्यारह बज गए। अपने–अपने कमरे में जाकर सोओ। सुदर्शन, तुम इस कमरे में सो जाना।”

सृष्टि और संयम खड़े होकर सीढ़ियां चढ़ते हुए ऊपर जाकर अपने–अपने कमरे में चले गए।

सुजाता ने टीवी बन्द करके सुदर्शन को सोच में डूबा देखकर कहा—“सुदर्शन।”

सुदर्शन ने खड़े होकर कमरे की ओर जाते हुए मुस्कुराकर कहा—“सॉरी मैडम।”

सुजाता—“रुकना जरा।”

सुदर्शन सुजाता की ओर मुड़कर बोला—“हाँ।”

सुजाता सुदर्शन के पास आकर बोली—“क्या बात है? मैं आज सुबह से देख रही हूँ। तुम कहीं ओर ही खोये हुए हो।”

सुदर्शन ने मुस्कुराकर कहा—“नहीं, कहीं खोया नहीं हूँ। बस आपको लग रहा है।”

सुजाता ने सुदर्शन का बाजू पकड़कर सुदर्शन को सोफे पर बिठाकर सुदर्शन के पास बैठते हुए कहा—“मैं सब समझ रही हूँ। चलो यहाँ बैठो और बताओ, क्या बात है? क्या सोच रहे हो?”

सुदर्शन—“कुछ सोच नहीं रहा। बस कृतिका की बातें याद आ रही है।”

सुजाता मुस्कुराकर बोली—“ओह… तो ये बात है।”

सुदर्शन ने गंभीरता से कहा—“नहीं, मैडम। वो बात नहीं है। लेकिन इन छः महिनों में उससे बहुत अच्छी दोस्ती हो गई है। अब पिछले एक महीने से उससे मिलना–जुलना कम हो गया। हफ्ते में बस संडे के दिन मिलने आती है। कल उससे मिला था, तो वहीं बातें याद आ रही थी।”

सुजाता—“हम्म… मैं समझ रही हूँ। क्या कह रही थी वो?”

सुदर्शन—“कह तो कुछ नहीं रही थी। बस इधर–उधर की बातें कर रहे थे। और हाँ, कल मैनें उसे आपकी और सेठ जी की प्रेम–कहानी सुनाई।”

सुजाता ने हँसकर कहा—“अच्छा ! फिर क्या कहा उसने? कैसे पागल लोग है? बचपन में खेल–खेल में लड़ते–लड़ते प्यार कर बैठे।”

सुदर्शन ने मुस्कुराकर कहा—“नहीं–नहीं, वो तो आपकी प्रेम–कहानी सुनकर आपकी फैन हो गई। बोली, मैं तो उनकी जबरदस्त फैन बन गई हूँ।”

सुजाता ने मुस्कुराकर कहा—“चलो, इस बहाने हम भी खुश हो लेंगे। हमारे भी दो–चार फैन है।”

सुदर्शन—“आपके फैन तो होने ही चाहिए। आपकी शादी हुए पच्चीस साल होने वाले है, लेकिन आपका और सेठ जी का प्यार देखकर लगता है, बस दो–चार साल पहले ही शादी हुई होगी। वरना ज्यादातर पति–पत्नी का प्यार शादी होने के पाँच–सात साल बाद ऐसे गायब होता है, जैसे ज्वैलरी पहनने के कुछ महीनों बाद ज्वैलरी से पॉलिस गायब हो जाती है।”

सुजाता हँसकर बोली—“देखो, जो लोग एक–दूसरे से आकर्षित होकर एक–दूसरे से प्यार करते हैं, उनका प्यार तो शादी के बाद इसलिए कम होता है, क्योंकि वो सिर्फ एक–दूसरे को पाने के लिए शादी करते है। और जब शादी का मकसद सिर्फ एक–दूसरे को पाना हो, तब शादी करके एक–दूसरे को पाने के बाद प्यार कम हो जाता है। फिर होती है, एक–दूसरे में कमियाँ निकालकर हमेशा एक–दूसरे से शिकायतें।”

सुदर्शन ने मुस्कुराकर कहा—“ये बात तो सही है, मैडम। लेकिन कुछ लोगों को तो सच में प्यार होता होगा। शादी के बाद उन सच्चे प्यार वालों में अनबन और झगड़े कैसे शुरू हो जाते हैं?”

सुजाता—“हम्म, उनका मैं कैसे बताऊँ? कोई ना कोई वजह हो जाती है। सबकी जिन्दगी के बारे में तो हम नहीं जानते ना। इसके इलावा दूसरों को खुश देखकर दूसरों की खुशियों से जलने वाले भी बहुत होते हैं। ऐसे जलने वाले लोग भी कभी दूसरों के घर में गलतफ़हमी पैदा करके, कभी दूसरों के घर में किसी को भड़काकर, दूसरों के घर उजाड़ते रहते हैं। ऐसे लोग बहुत तरह के अलग–अलग तरीके अपनाते है। अब हमने तो कभी किसी का बुरा सोचा नहीं, इसलिए क्या–क्या करते हैं, कैसे–कैसे टोटके लगाते हैं? वो सब हमें तो पता नहीं।”

सुदर्शन ने मुस्कुराते हुए कहा—“ये भी सही है, मैडम। छोड़ो इन बेकार लोगों की बातें। आप तो ये बताओ। आपने सेठ जी को अब तक अपना दीवाना कैसे बना रखा है? वरना पति चाहें कैसा भी हो, पत्नी तो पराए पुरुष के बारे में नहीं सोचती। हालांकि आजकल बहुत सी महिलाएँ सोचने लगी है। फिर भी ज्यादातर पुरुष तो यहाँ–वहाँ पराई नारी के पास कुछ ज्यादा ही भटकते हैं। लेकिन सेठ जी तो आपके सिवा किसी ओर को देखते भी नहीं। ये सेठ जी पर आपने ऐसा कौनसा जादू किया हैं?”

सुजाता ने हँसकर कहा—“अरे, तुम लोग भी ना, बस। मैनें उन पर कोई जादू नहीं किया। उल्टा उन्होंने ज़रूर मुझ पर कोई जादू कर रखा है। जो शादी के इतने साल बाद भी उनसे कुछ दिन दूर रहना मुश्किल होता है।”

सुदर्शन ने मुस्कुराकर कहा—“नहीं, मैडम। प्यार बनाए रखने का भी कोई ना कोई सीक्रेट तो होता ही है। कल कृतिका भी यहीं पूछ रही थी। मैनें कहा, जब घर आओ, तब सेठ जी और मैडम से पूछ लेना। वो बोली, मुझे शर्म आती है। मैंने कहा, चलो, मैं ही पूछ लूँगा।”

सुजाता ने मुस्कुराकर कहा—“हम्म… ज्यादा तो मालूम नहीं। जो मुझे लगता है, वो बता देती हूँ। देखो, हर इन्सान को नई और ताजा चीजें बहुत पसन्द आती है। नये डिजाईन के कपड़े, नई और ताजा सब्जी, कोई नई इलेक्ट्रॉनिक चीज। यहाँ तक की मार्केट में कोई नया मोबाइल हैंडसेट आता है, तो वो भी सबको अच्छा लगता है और पुराने वाला बेकार लगने लगता है। चाहें कुछ भी हो, इन्सान को कोई भी नई और ताजा चीज दिखाई देती है, तो इन्सान उसकी तरफ़ आकर्षित होकर उसे पाना चाहता है। यहीं बात दो इन्सानों के बीच भी होती है, खासकर नारी और पुरुष के बीच। बस इसी बात को ध्यान में रखकर मैंने खुद को पुरानी नहीं होने दिया और हर तरह से खुद को नई और ताजा बनाकर रखने की कोशिश की है, शायद इसलिए तुम्हारे सेठ जी का प्यार बिलकुल वैसा ही है, जैसा पहले था। और तुम्हारे सेठ जी ने भी खुद को नया और ताजा बनाकर रखा है, इसलिए वो आज भी मुझे बिलकुल पच्चीस साल पहले वाले जय लगते है। दूसरी महिलाओं की तरह मुझे कभी उनसे कुछ कहने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती। मेरे हिसाब से पति–पत्नी के रिश्ते में प्यार और अपनेपन का एहसास बनाए रखने के लिए इन्सान को ज़रूरत के हिसाब से लिमिट में रहकर खुद में बदलाव करते रहना चाहिए। लेकिन कुछ लोग खुद को बदलते नहीं हैं और कुछ लोग खुद को बहुत ज्यादा बदल लेते हैं। शायद यहीं प्रोब्लम है, जिसके कारण प्यार में कमी आ जाती है। अगर बैलेन्स बनाकर खुद को पुराना या पुरानी ना होने दें, तो प्यार कभी कम नहीं होता। फोर एग्जामपल तुम इमेजिन(कल्पना) करके देखो, अगर मैं पुराने टाइम की महिलाओं की तरह रहूँ तो कैसी लगूँगी?”

सुदर्शन इमेजिन करता है कि भारी–भरकम गहनें पहनकर पूरी तरह राजस्थानी पहनावे में लम्बा घूँघट निकालकर सुजाता मैडम खड़ी है।

सुजाता ने आगे कहा—“और अगर बिलकुल ही बोल्ड हो जाऊँ तो कैसी लगूँगी?”

सुदर्शन इमेजिन करता है कि जींस–टीशर्ट पहनकर सुजाता मैडम खड़ी है। शॉर्ट ब्लाउज वाली कटिंग साड़ी पहनकर सुजाता मैडम खड़ी है।

सुजाता सुदर्शन को खोया देखकर बोली—“क्या हुआ? सच में इमेजिन कर रहे हो क्या?”

सुदर्शन ने मुस्कुराकर सर हिलाते हुए कहा—“नहीं मैडम, आप अभी जैसे साड़ी और सुट पहनकर रहते हो। वहीं बेस्ट है।”

सुजाता ने हँसकर सुदर्शन के सर पर चांटा मारकर कहा—“अच्छा, मतलब इमेजिन कर लिया। चलो, जब इमेजिन कर ही लिया, तो फिर ये बताओ, तुम्हारी इमेजिनेशन में मैं कैसी लग रही थी?”

सुदर्शन ने शर्माकर कहा—“रहने दीजिए।”

सुजाता—“अरे, बताओ तो?”

सुदर्शन ने मुस्कुराते हुए कहा—“पहले तो मैडम, वो पड़ोस में सेठानी जी है ना। जो भारी–भरकम गहनों से लदी हुई पुराने स्टाइल में रहती है, उनका ख्याल आया।”

सुजाता ठहाका लगाकर हँसने के बाद बोली—“अच्छा, फिर?”

सुदर्शन—“फिर ये पड़ोस के मालपाणी जी की वाईफ है ना, जो उम्र में आपसे बड़ी है, फिर भी जींस–शर्ट, जींस–टीशर्ट पहनती है, उनका ख्याल आया। और फिर फिल्मों में दीपिका पादुकोण और प्रियंका चौपड़ा जिस तरह की साड़ी पहनकर आती है, वो ख्याल आया।”

सुजाता खिलखिलाकर हँसने के बाद अपनी हँसी रोककर बोली—“उफ्फ………अब तुम्हीं बताओ, अगर मैं इनमें से कोई स्टाइल अपनाकर तुम्हारे सेठ जी के सामने जाऊँ, तुम्हारे सेठ जी हिल नहीं जाएँगें?”

सुदर्शन ने हँसकर कहा—“हाँ, समझ गया मैडम, आपने टाइम के हिसाब से खुद में बदलाव किया। लेकिन बदलाव उतना ही किया, जितने बदलाव की ज़रूरत है।”

सुजाता—“हाँ, हर बात एक लिमिट तक ही अच्छी लगती है। जब कुछ भी ज़रूरत से ज्यादा होने लगे, तो बस वहीं से प्रोब्लम शुरू हो जाती है। जैसे तुम्हारे सेठ जी बहुत बार कुछ ना कुछ बोलकर मुझे छेड़ते है। मैं भी उनके साथ बातें कर लेती हूँ। अब अगर मैं इनके साथ बातें नहीं करूँगी, तो ये कोई दूसरी नारी तलाश करने लगेगें, जिसके साथ ये खुलकर ऐसी बातें कर सकें। इसलिए मैं ही इनके साथ सभी तरह की बातें कर लेती हूँ। ताकि ये ऐसी बातें करने के लिए कोई दूसरी नारी तलाश ना करें। लेकिन अगर मैं ज्यादा बातें करूँगी, तो ये कहेंगे, सुजाता तो बिलकुल ही बेशर्म हो गई। फिर ये कोई अच्छी शर्म–लिहाज करने वाली नारी तलाश करने लगेंगे। इसलिए इनको किसी ओर के पास जाने से रोकने के लिए मैं लिमिट में रहकर हल्की–फुल्की बातें करती हूँ। लेकिन ये मुझे बेशर्म ना समझे, इसलिए ज्यादा बातें नहीं करती।”

सुदर्शन—“हाँ, मैडम। मैं भी फिर आपकी तरह लिमिट में रहकर खुद को हमेशा नया और ताजा बनाकर रखूँगा, ताकि मेरी शादी के बाद मेरी वाईफ़ किसी ओर को तलाश ना करें।”

सुजाता ने हँसकर कहा—“हम्म…बहुत अच्छी बात है। अब बताओ, तुम्हारे दिमाग में क्या उलझन चल रही है?”

सुदर्शन—“मैडम, आप तो फिर से वहीं पर आ गई।”

सुजाता—“और जब तक तुम बताओगे नहीं, मैं बार–बार वहीं आती रहूँगी।”

सुदर्शन चुपचाप सर झुका लेता है।

सुजाता—“अच्छा, ठीक है। हम कौनसे तुम्हारे अपने है? तुम हमारे पास जॉब करते हो, इसका ये मतलब थोड़े ही है, हम तुमसे तुम्हारी हर बात पूछे।”

सुदर्शन मन में बोला कि उफ्फ… कैसी ड्रामेबाज मैडम है? लेकिन बहुत अच्छी है। वरना अपने पास जॉब करने वालों से इतना अपनापन कौन रखता है? बस कोई मैडम की इस अच्छाई का गलत फायदा ना उठाए।

सुदर्शन—“मैडम, आप भी अच्छी तरह जानती है, मैं आपको और सेठ जी को कितना अपना मानता हूँ।”

सुजाता—“झूठ! अगर ऐसा होता तो क्या तुम अपनी परेशानी हमसे शेयर नहीं करते? तुम्हारा चेहरा देखकर साफ़ पता चल रहा है, तुम किसी गहरी सोच में डूबे हो।”

सुदर्शन—“एक उलझन है तो सही। लेकिन…”

सुजाता—“लेकिन क्या?”

सुदर्शन—“लेकिन पाँच साल पहले भूख से तड़पकर जब मैं कचरे में से फल उठाकर खा रहा था। हर कोई मुझे दुत्कार कर दूर भगा रहा था। कोई मुझे अपने पास खड़ा भी नहीं होने दे रहा था। उस वक्त आपने आकर मेरी आँखों से बहते आँसू पोंछे और मुझे अपने साथ घर ले आयी। फिर सेठ जी ने ये जॉब दे दी। कुछ दिन घर में भी रखा।”

सुजाता—“ओहो… तुम अभी वो सब भूलें नहीं? और हमने कुछ नहीं किया। तुम मेहनती, ईमानदार और काबिल हो, इसलिए तुम अपनी ईमानदारी और काबिलियत से हमारे पास जॉब कर रहे हो। समझे मूर्ख। यू ही हमें ऊपर वाली हवा में उड़ाते रहते हो।”

सुदर्शन—“नहीं मैडम, जो सच है, वो सच है। इन पाँच सालों में आपने और सेठ जी ने मुझे बहुत प्यार और अपनापन दिया। सृष्टि, अँकुश और संयम ने छोटे भाई–बहनों की तरह मुझे बहुत इज्जत दी। इसलिए अब आप सभी से दूर जाने का मन नहीं कर रहा। अब तो अगर आप कहो, मुझे सैलरी नहीं दोगे। तब भी मैं सारी जिन्दगी फ्री में आपके पास जॉब कर सकता हूँ।”

सुजाता—“तुम असली बात बताओ, क्या है?”

सुदर्शन ने झिझकते हुए कहा—“मैडम…”

सुजाता—“हाँ, बोलो।”

सुदर्शन ने एक सांस में कहा—“मैडम, मैं खुद का काम करना चाहता हूँ। लेकिन ये जॉब छोड़ने का मन नहीं कर रहा।”

सुजाता ने मुस्कुराकर कहा—“ओहो, ये तो बहुत अच्छी बात है। अब कुछ पाने के लिए कुछ खोना तो पड़ता ही है। जैसे पाँच साल पहले तुम अपने मम्मी–पापा, अपने भाई–भाभी, बहन, अपना घर, अपने दोस्त, अपना शहर छोड़कर यहाँ आए थे। अब आगे तुम कुछ ओर करना चाहते हो, इसलिए जॉब तो छोड़नी पड़ेगी।”

सुदर्शन—“लेकिन मैडम, आप लोगों को बुरा लगेगा ना। इसे कचरे में से उठाकर लाए, जॉब दी, इतने एहसान किये। अब थोड़े पैसे आते ही ये छोड़कर जा रहा है।”

सुजाता मुँह फुलाकर बोली—“हे भगवान… क्या–क्या सोचता है? ये लड़का। कचरे में से उठाकर लाए, एहसान किये। मन कर रहा है, एक चांटा लगाऊँ तुम्हें। हमने तुम पर कोई एहसान नहीं किये। तुम जॉब करते हो, इसलिए सैलरी देते है। ऑवर–टाइम करते हो, संडे को आते हो, इसलिए खाना खिलाते है। तुम मेहनत और ईमानदारी से नौकरी करते हो, तुम बहुत अच्छे हो, इसलिए जब तुम्हारे पास रहने की जगह नहीं होती तो अपने घर में रख लेते है। इसमें एहसान कैसा है?”

सुदर्शन ने अटकते हुए कहा—“मैडम…”

सुजाता—“वाह रे वाह! गधे… हम तुम्हें अपना बेटा मानते हैं और तुम अपने दिल में ये सब लिए बैठे हो।”

सुदर्शन ने सोफे से नीचे होकर सुजाता के पैरों को हाथ लगाकर सुजाता के सामने अपना सर झूकाकर कहा—“मुझे माफ़ कर दो, मैडम। मैंने आपके प्यार और अपनेपन को एहसान का नाम देकर बहुत छोटा कर दिया। मैं भूल गया था, माँ कभी अपने बच्चे पर एहसान नहीं करती। एम सॉरी, मैडम।”

सुजाता ने खड़ी होते हुए सुदर्शन को उठाकर गले लगाकर मुस्कुराते हुए कहा—“अरे, बेटे की जगह माँ के पैरों में नहीं, माँ के दिल में होती है। और तुमने भी तो हमें माँ-बाप और सृष्टि, अँकुश, संयम को छोटे भाई-बहन समझा है ना।"

सुदर्शन—“समझा नहीं, मैडम। आप सब मेरे अपने ही है। अपनापन रिश्तों का मोहताज नहीं है।"

सुजाता—“हाँ, और मुझे पता है। तुम ये खुद का काम अपने लिए नहीं, कृतिका के लिए शुरू कर रहे हो। शादी के बाद कृतिका को उसी तरह रखने के लिए, जैसे वो साँवरमल जी के घर में रही है।”

सुदर्शन इधर-उधर देखकर मुस्कुराने लगता है।

सुजाता ने मुस्कुराते हुए कहा—“मैं सही कह रही हूँ ना?"

सुदर्शन सहमति से सर हिलाता है।

सुजाता सुदर्शन के गाल पर चांटा मारकर मुस्कुराते हुए बोली—“हम तो उसी दिन समझ गए थे, जब एक दिन कृतिका से ना मिलने का कारण तुम्हारे चेहरे का रंग उड़ गया था और परेशान होकर दूसरे दिन आलोक के साथ कुछ खाये–पीये बिना भूखे पेट उसे ढूंढने निकल गए। हम तो बस इंतजार कर रहे थे, तुम कहते कब हो?”

सुदर्शन शर्माने लगता है।

सुजाता ने मुस्कुराकर कहा—“चलो, अब ये सारी बातें अपने दिमाग से निकाल दो। इनके बैंगलोर से आते ही मैं इस बारे में इनसे बात करूँगी। और हाँ, अब ये मत कहना। हम तुम्हें खुद का काम शुरू करने में मदद करके एक और एहसान कर रहे है। तुमने पाँच साल तक लगन और मेहनत से पूरी ईमानदारी के साथ हमारे पास जॉब की है, इसलिए हम तुम्हारी थोड़ी सी हेल्प करेंगे।"

सुदर्शन—"जी, मैडम।"

सुजाता—“चलो, अब वो फालतू बातें दिमाग से निकालकर कृतिका के सपने देखो और जाओ सो जाओ।”

सुदर्शन मुस्कुराता हुआ सामने के कमरे में चला जाता है। सुजाता मुस्कुराते हुए हॉल की लाइट बन्द करके अपने बैडरूम में चली जाती है।

तेरह दिन बाद बाईस अक्टूबर, रविवार की सुबह ग्यारह बजे जयसिंह के घर की छत पर सृष्टि, अँकुश और संयम के साथ सुदर्शन कैरम बोर्ड खेल रहा है।

सुजाता आकर बोली—“सुदर्शन, नीचे तुम्हारे सेठ जी बुला रहे है।”

सुदर्शन—“क्या मैडम, मैं जीतने वाला हूँ और आप बुलाने आ गई।”

सुजाता—“अरे, नीचे तो आओ। कृतिका के मम्मी-पापा भी बुला रहे है।”

सृष्टि ने मुस्कुराते हुए कहा—“अब देखो, भैया कैसे दौड़कर जाते हैं।”

सुदर्शन—“चिन्ता मत करो, तुम्हारा भी नम्बर आएगा। फिर देखते हैं, तुम दौड़कर जाती हो या उड़कर?"

सुदर्शन मुस्कुराते हुए खड़ा होकर सुजाता के साथ सीढ़ियां उतरते हुए नीचे आने लगता है।

नीचे हॉल में सोफे पर सेठ साँवरमल बागड़ी, राजलक्ष्मी और जयसिंह बैठे बातें कर रहे हैं। सुजाता नीचे आकर जयसिंह के पास बैठ गई। सुदर्शन सीढ़ियों के पास रुककर खड़ा हो जाता है।

जयसिंह—“इधर आओ, तुम भी बैठो।”

सुदर्शन जयसिंह के पास आकर बैठ जाता है।

जयसिंह ने सुदर्शन के कंधे पर हाथ रखकर सेठ साँवरमल बागड़ी और राजलक्ष्मी से कहा—“सुदर्शन से तो आप पहले भी कई बार मिल लिए है। सुदर्शन को हमारे पास जॉब करते हुए पाँच साल से ज्यादा हो गए। बहुत अच्छा लड़का है। हम अपने बच्चों में और सुदर्शन में कोई फर्क नहीं समझते। अभी दिवाली पर राम–राम वाले दिन सुदर्शन के घरवालों से भी मैंने बात की है। उन्होंने कहा, आप जो ठीक समझें, सुदर्शन के लिए फैसला कर सकते है। इसलिए मैंने आज आपसे सुदर्शन के बारे में बात की। हमें पता है, सुदर्शन और कृतिका एक–दूसरे को पसन्द करते हैं और हमें पूरा विश्वास है, सुदर्शन कृतिका को बहुत खुश रखेगा।”

सेठ साँवरमल बागड़ी—“अगर कृतिका भी सुदर्शन को पसन्द करती है, तो हमें कोई आपति नहीं है। और फिर जिस लड़के ने हमारी बेटी को मुश्किल वक्त में संभाला, हमारी बेटी के लिए उससे अच्छा लड़का कहाँ मिलेगा? आप लोगों के साथ–साथ इस लड़के का भी बड़ा योगदान है, हमारे घर में फिर से खुशियाँ लाने में।”

सुदर्शन ने खड़े होकर सुजाता को साइड में बुलाकर कहा—“मैडम, यहाँ तो मेरी और कृतिका की शादी की बात हो रही है। आपने मुझे बताया क्यों नहीं?”

सुजाता—“क्यों हम तुम्हारी शादी की बात नहीं कर सकते?”

सुदर्शन—“कर सकते हो, मैडम। आप मेरे लिए कोई भी फैसला कर सकते हो।”

सुजाता—“फिर क्या प्रोब्लम है? उस दिन तुमने खुद कहा था ना। तुम्हें कृतिका से प्यार हो गया है।”

सुदर्शन—“हाँ, लेकिन अभी शादी। अभी तो मेरा काम भी शुरू नहीं हुआ।”

सुजाता—“काम तो शुरू हो रहा है। तुम्हारे सेठ जी ने तुम्हें ऑफ़िस भी दिलवा दिया है।”

सुदर्शन—“लेकिन…”

जयसिंह ने कहा—“अरे, क्या बात है? हमें भी बताओ।”

सुजाता ने मुड़कर कहा—“सुदर्शन कह रहा है, अभी तो मैनें अपना काम भी शुरू नहीं किया।”

जयसिंह ने मुस्कुराकर कहा—“इधर आओ।”

सुजाता और सुदर्शन जयसिंह के पास आते हैं।

जयसिंह—“अब बताओ, क्या बात है? यहाँ सब अपने घर के ही तो है। हम है, कृतिका के मम्मी–पापा है, जो भी बात है, खुलकर कहो।”

सुदर्शन सुजाता की ओर देखता है।

सुजाता—“हाँ–हाँ, बताओ।”

सुदर्शन—“सेठ जी, मैं अभी शादी नहीं करना चाहता।”

जयसिंह ने हँसकर कहा—“अरे आज के आज फेरे थोड़े ही करवा रहे है। आज सिर्फ बात कर रहे है। अभी तो तुम्हारे घरवालों को यहाँ बुलाकर साँवरमल जी मिलवाएँगें। फिर सब मिलकर आगे की बात पक्की करेंगे। आज तो मैंने सिर्फ बात की है। आखिरी फैसला तो तुम्हारे घरवाले और कृतिका के घरवाले ही करेंगे।”

सुदर्शन—“नहीं, सेठ जी। वो बात नहीं है। मैं चाहता हूँ, शादी से पहले मैं कृतिका को खुश रखने के लायक बन जाऊँ।”

जयसिंह—“कृतिका को खुश रखने लायक तो तुम हो ही। इसलिए तो मैंने शादी की बात की।”

सुदर्शन—“लेकिन सेठ जी, पहले मैं अपना काम जमाकर घर संभालने लायक तो हो जाऊँ.”

जयसिंह ने मुस्कुराकर कहा—“देखो, घर तो तुम मेरे पास जॉब करके भी संभाल सकते हो। और अब तो कल से तुम्हारा खुद का ऑफ़िस होगा। तुम खुद का बिजनेस शुरू कर रहे हो। सृष्टि और अँकुश भी तुम्हारी हेल्प के लिए तुम्हारे पास आ जाएँगें। अब तो कोई प्रोब्लम ही नहीं होनी चाहिए। फिर भी अगर कोई दिक्कत या परेशानी आती है, तो हम बैठे है। तुम क्यों टेन्शन ले रहे हो?”

सुदर्शन—“सेठ जी, अगर आपकी इज़ाजत हो तो मैं अंकल जी से एक बात पूछ सकता हूँ?”

सेठ साँवरमल बागड़ी—“आराम से पूछो, बेटा। झिझकने ज़रूरत बिलकुल नहीं है।”

सुदर्शन—“मुझे बस यहीं पूछना था, अगर ये सब प्रोब्लम नहीं होती। मतलब कृतिका और आपके बीच कोई प्रोब्लम नहीं होती। सब कुछ ठीक होता। तब मैं आपसे कहता, मैं कृतिका से शादी करना चाहता हूँ, तो आप मुझे क्या कहते?”

सेठ साँवरमल बागड़ी, राजलक्ष्मी, जयसिंह, सुजाता सब एक-दूसरे की ओर देखने लगते हैं।

सुदर्शन—“शायद आप कहते, रिश्ते हैसियत देखकर जोड़े जाते है।”

सेठ साँवरमल बागड़ी—“लेकिन अब तो हम ऐसा नहीं सोचते ना?”

राजलक्ष्मी—“और बेटा, कृतिका को तो तुम जानते हो। वो भी ऐसा नहीं सोचती।"

सुदर्शन—“मैं भी ऐसा नहीं सोचता, लेकिन जब कृतिका मुझसे मिलने आती थी। तब वो आपकी दिलवाई हुई गाड़ी लेकर आती थी। सुबह मुझे घर से ऑफ़िस लेकर आती थी, शाम को ऑफ़िस से घर लेकर जाती थी। हम घंटों तक गाड़ी बैठे बातें करते हैं। अब मेरा सपना है, शादी के बाद जब कृतिका आपसे मिलने, आपके घर जाए, तो वो मेरी दिलाई हुई गाड़ी लेकर जाए। मुझे ज्यादा अरबपति–खरबपति नहीं बनना। बस शादी से पहले कृतिका के लिए एक घर और एक गाड़ी खरीद लूँ। बस इतना ही मेरा सपना है।”

राजलक्ष्मी ने मुस्कुराकर कहा—“लेकिन ये सपना तो शादी के बाद तुम दोनों मिलकर भी पूरा कर सकते हो?”

सुदर्शन—“आंटी जी, सपना शादी के बाद भी पूरा हो सकता है, लेकिन मैं खुद को परखना चाहता हूँ। मैं कृतिका को खुश रखने के लायक हूँ या नहीं? वरना शादी के बाद अगर मैं घर और गाड़ी नहीं खरीद पाया, तो कृतिका को जो है, जैसा है, उसी में एडजस्ट करना पड़ेगा। मैं नहीं चाहता, वो एडजस्ट करें।”

सुजाता ने मुस्कुराकर जयसिंह से कहा—“अब क्या कहना है आपका?”

जयसिंह—“अब मैं क्या कहूँ? लड़की के मम्मी–पापा बैठे है। लड़का सामने है। लड़के ने अपनी बात रख दी।”

सुदर्शन—“एक बात और भी है।”

सेठ साँवरमल बागड़ी—“बताओ।”

सुदर्शन—“कृतिका अब खुश तो है, लेकिन वो खुद को किसी के लायक नहीं समझती। वो सोचती है, वो रिलेशन में रहकर अब किसी अच्छे इन्सान की पत्नी बनने के लायक नहीं रही। इसलिए अगर अभी मैं उससे शादी करूँगा, तो वो सोचेगी, मैं उस पर दया करके या उस पर तरस खाकर हमदर्दी के कारण उससे शादी कर रहा हूँ। इसलिए आप पहले उसको जिन्दगी में कामयाबी हासिल कर लेने दीजिए। वो आपके ऑफ़िस में जॉब कर रही है। धीरे–धीरे उसे बिजनेस की बारीकियाँ सीखाकर आपकी तरह एक कामयाब बिजनेस वूमेन बनाईए। फिर हर कोई उसके साथ अपना नाम जोड़ना चाहेगा। उस वक्त मैं भी लग जाऊँगा, लाइन में।”

राजलक्ष्मी—“बेटा, बातें तो तुम्हारी बहुत अच्छी है, लेकिन हमारी भी उम्र हो गई। पता नहीं कब बुलावा आ जाए। इसलिए मरने से पहले कृतिका का घर बसा हुआ देखना।”

सुदर्शन राजलक्ष्मी के पास आकर बोला—“अन्टी जी, आप ऐसी बातें क्यों सोच रही है? माना कि भविष्य हमारे बस में नहीं है, लेकिन फिर भी हमें अपना भविष्य अच्छा बनाने की कोशिश तो करनी चाहिए ना। सेठ जी और सुजाता मैडम कहते है, अगर हम कोशिश करेगें, तो या हमारी कोशिश सफल होगी, या हमारी कोशिश असफल होगी। लेकिन अगर कोशिश ही नहीं करेगें, फिर तो सफलता के बारे में सोचना ही बेकार है। इसलिए आप ये सब मत सोचो, बस अपना आशीर्वाद दो, ताकि हम अपने छोटे–छोटे सपने पूरे कर सकें।”

सेठ साँवरमल बागड़ी ने मुस्कुराकर कहा—“किर्ती की माँ ! अब जिद करना ठीक नहीं है। हमें तो खुश होना चाहिए, हमारी कीर्ति के लिए हमें ऐसा लड़का मिला है, जो खुद से पहले कीर्ति के बारे में सोचता है। अगर सुदर्शन शादी से पहले कुछ सपने पूरे करना चाहता है, तो हमें उसकी मदद करनी चाहिए।”

राजलक्ष्मी ने सुदर्शन के सर पर हाथ रखकर कहा—“ठीक है। भगवान करें, जल्दी ही तुम अपने सारे सपने पूरे करो।”

सुदर्शन ने मुस्कुराकर कहा—“बस आप सबसे एक रिक्वेस्ट और है।”

सुजाता ने मुस्कुराते हुए कहा—“अब क्या रिक्वेस्ट रह गई?”

सुदर्शन—“जब तक मैं इस शहर में एक घर और एक गाड़ी ना खरीद लूँ तब तक आप सब हमारी आज की बातों के बारे में कृतिका को कुछ मत बताना।”

सेठ साँवरमल बागड़ी ने आश्चर्य से कहा—“वो क्यों?”

सुदर्शन—“क्योंकि मैंने और कृतिका ने अभी तक एक–दूसरे से अपने दिल की बात नहीं कही। अब पता नहीं, मुझे घर और गाड़ी खरीदने में दो साल लगे या पाँच साल लगे। हो सकता है, दस साल लग जाए। इस बीच कृतिका की जिन्दगी में कोई और आ गया, तो मैं उसे अपने प्यार के बंधन में बाँधकर रोकना नहीं चाहता। अगर उसे पता चल गया, मैं उससे शादी करना चाहता हूँ, तो वो किसी और से शादी नहीं करेंगी।”

जयसिंह—“अरे, ये क्या बात हुई?”

सुदर्शन—“बस सेठ जी, आपसे ही सीखा है। प्यार में बँधन नहीं होना चाहिए। प्यार में एक–दूसरे की खुशी के लिए जीना चाहिए। अगर प्यार में सच्चाई और गहराई है, तो प्यार, प्यार करने वालों को खुद ही खींचकर एक–दूसरे के पास कर देता है।”

कुछ पल के लिए सभी चुप होकर गंभीर हो जाते हैं।

सेठ साँवरमल बागड़ी—“ठीक है। हम नहीं बताएँगें। अपने दिल की बात तुम खुद ही कृतिका को बताना।”

सुदर्शन ने सेठ साँवरमल बागड़ी, राजलक्ष्मी, जयसिंह और सुजाता के पैर छूकर मुस्कुराते हुए कहा—“अब मैं ऊपर चला जाऊँ। गेम अधूरा छोड़कर आया हूँ, वो तीनों चीटिंग कर लेंगे।”

सुजाता ने मुस्कुराकर कहा—“हाँ, ठीक है।”

सुदर्शन सीढ़ियां मुड़कर छत पर जाने लगता है। सुजाता जयसिंह के पास बैठ गई। सब लोग सुदर्शन की ओर देखते हैं।

सात साल बाद सात अक्टूबर, सोमवार की सुबह दस बजे आयु में तैंतीस (33) वर्ष का हो चुका सुदर्शन आँखों पर चश्मा लगाए ऑफिशियल कोट-पेन्ट पहने हाथ में ऑफ़िस–बैग लिए ऑफ़िस के अन्दर आने लगता है। स्टाफ के लोग खड़े होकर "गुड मॉर्निंग, सर" बोलते हैं। सुदर्शन मुस्कुराकर सबको गुड मॉर्निंग का जवाब देते हुए केबिन में आकर बैग अपनी मेज पर रखकर अपनी चेयर पर बैठता है।

केबिन का दरवाज़ा खोलकर आयु में चौबीस(24) वर्ष की भावना बोली—"मे आई कम इन, सर?"

सुदर्शन—"येस, कहो।"

भावना अन्दर आकर मुस्कुराती हुई बोली—"कॉन्ग्राचुलेशन्स, सर। ग्रीस का ऑर्डर कम्पलीट हो गया है। आपने कहा था, इस ऑर्डर के पूरा होते ही जो प्रोफिट होगा, उससे आपको एक सपना पूरा करना है। अब आप वो सपना पूरा कर सकते हैं।"

सुदर्शन ने मुस्कुराकर कहा—"थैक्यू, थैक्यू सॉ मच। तुम सबकी मदद के बिना ये पॉसिबल नहीं था।"

भावना ने मुस्कुराकर कहा—"सर, कैसी बातें करते हैं आप? हम आपके पास जॉब करते हैं, इसलिए हमने तो बस अपना काम किया है। इसमें थैंक्स कैसा?"

सुदर्शन—"काम अपना समझकर ईमानदारी से किया है ना। इसलिए।"

भावना—"थैक्यू सर, सब आपने ही सिखाया है। हम बहुत खुश किस्मत है, जो हमें आप जैसे बॉस मिलें।"

सुदर्शन—"थैक्यू, मैं भी बहुत खुश किस्मत हूँ, जो मुझे स्टाफ़ के रूप में आप जैसे साथी मिलें।"

भावना—"थैक्यू सर, एंड वो लंदन के क्लाइंट को मैंने नये डिजाईन भेजे थे, वो उनको पसन्द आ गए हैं। आप उनसे डील फाइनल कर लेना। उन्होंने कौन-कौन सी ज्वैलरी सिलेक्ट की है? वो सब डिटेल इस फाइल में है।"

सुदर्शन—"ठीक है, मैं बात कर लूँगा।"

भावना—"ओके, सर।"

भावना मुड़कर बाहर चली गई।

सुदर्शन जेब से मोबाइल निकालकर कॉल मिलाकर मोबाइल कान से लगाता है।

घर के बरामदे में कुर्सी पर बैठे अखबार पढ़ते आयु में छियासठ(66) वर्ष के हो चुके सेठ साँवरमल बागड़ी कॉल आने पर जेब से मोबाइल निकालकर कॉल रिसींव करके मोबाइल कान से लगाते हैं।

सुदर्शन—"नमस्ते, अंकल जी।”

सेठ साँवरमल बागड़ी—“नमस्ते, बेटा। कैसे हो?”

सुदर्शन—“बस आपके आशीर्वाद से सब ठीक है। आप और अन्टी जी कैसे है?”

साँवरमल बागड़ी—“हम भी ठीक है।”

सुदर्शन—“और कृतिका?”

सेठ साँवरमल बागड़ी—“कृतिका भी बिलकुल ठीक है, लेकिन वो तो ऑफ़िस चली गई। हर वक्त बस काम में ही उलझी रहती है।”

सुदर्शन ने मुस्कुराकर कहा—“ये तो बहुत अच्छी बात है। बड़े लोगों के पास फुर्सत कहाँ?"

सेठ साँवरमल बागड़ी—“नहीं-नहीं, बेटा। ऐसी बात नहीं है।"

सुदर्शन ने हँसकर कहा—“जी, जानता हूँ। मैं तो मज़ाक कर रहा था। अच्छा, मैंने आपको एक गुड न्यूज़ देने के लिए फोन किया है।”

सेठ साँवरमल बागड़ी उत्सुक होकर बोले—“बताओ फिर जल्दी से?”

सुदर्शन—“डेढ़ साल पहले मैंने घर बनाने के लिए एक जमींन खरीदी थी। वहाँ अब घर बनकर पूरा हो गया है। कल गृह प्रवेश है और कल मैं एक गाड़ी भी खरीद रहा हूँ।”

सेठ साँवरमल बागड़ी हर्षित होकर खड़े होते हुए बोले—“ऐसी खुश खबरी इस तरह अचानक नहीं बताते। कहीं खुशी से मेरी जान निकल जाती तो?"

सुदर्शन—“ओह,सॉरी। मुझे पता नहीं था। प्लीज माफ़ कर दीजिए।"

सेठ साँवरमल बागड़ी ने हँसकर कहा—“अरे, मज़ाक कर रहा हूँ। मैं और तुम्हारी अन्टी तो कब से इस दिन का इंतजार कर रहे हैं।”

सुदर्शन—“सब आप बड़ों के आशीर्वाद और सहयोग से ही हुआ है। मैं चाहता हूँ, कल आप आंटी जी और कृतिका के साथ हमारे घर आए और अपना आशिर्वाद दें।"

सेठ साँवरमल बागड़ी—“ठीक है। हम जरूर आएँगें।”

सुदर्शन—“थैक्यू अंकल जी। फिर मिलेंगे।”

सेठ साँवरमल बागड़ी—“ठीक है, बेटा।”

सुदर्शन कॉल काटकर मन में सोचता है कि सपने देखना बहुत आसान है, लेकिन सपने पूरे करना बहुत मुश्किल है। सात साल पहले मैंने कितनी आसानी से बोल दिया था, शादी से पहले कृतिका के लिए एक घर और गाड़ी खरीदना चाहता हूँ। उस वक्त लगा था, छोटा-सा सपना है। घर और गाड़ी तो यू आ जाएँगें। लेकिन जिन्दगी की उलझनों के कारण ये छोटा सा सपना पूरा करने में भी सात साल लग गए। चलो, ये भी सही है। आखिरकार सपना पूरा तो हुआ।

अगले दिन आठ अक्टूबर, मंगलवार की दोपहर एक बजे सुदर्शन के घर में पूजा संपन्न होने पर खाना खाकर अन्य सभी मेहमानों के विदा होने के बाद दोपहर के तीन बजे घर के हॉल में सुदर्शन के माता (आयु–59 वर्ष)–पिता(आयु–61 वर्ष), भाई (आयु–39 वर्ष) –भाभी(आयु–38 वर्ष), बहन (आयु–36 वर्ष)–जीजाजी(आयु–38 वर्ष), जयसिंह(आयु–53 वर्ष)–सुजाता(आयु–57 वर्ष), सेठ साँवरमल बागड़ी–राजलक्ष्मी (आयु–65 वर्ष), नारायण(आयु–38 वर्ष) –नारायण की पत्नी (आयु–36 वर्ष) बैठकर हँसते-मुस्कुराते हुए आपस में बातें कर रहे है। दरवाजें से सुदर्शन और आयु में तैईस (23) वर्ष का हो चुका संयम अन्दर आते हैं।

सुदर्शन—“आप सबने खाना खा लिया?”

सुदर्शन के पिता—“हाँ, हम सब ने खा लिया। अब तुम भी खा लो।”

संयम सुजाता के पास बैठते हुए बोला—“सुदर्शन भैया तो कृतिका दीदी के साथ खाना खाएँगें। कब से उसे ढूंढ रहे हैं और वो नजर आकर बार-बार गायब हो जाती है।”

सभी ठहाके लगाकर हँसने लगते हैं।

सेठ साँवरमल बागड़ी—“वो बाहर लोन में बैठी है। जाओ, उसे भी बुला लो।”

सुदर्शन बाहर जाने लगता है।

सुजाता—“अरे, सुदर्शन।”

सुदर्शन रुककर मुड़ते हुए बोला—“हाँ।”

सुजाता—“अब तो तुम्हारा सपना पूरा हो गया। आज बोल दो, कृतिका को अपने दिल की बात।”

सुदर्शन मुस्कुराकर बोला—“नहीं, फिर कभी।”

संयम उठकर बाहर जाते हुए बोला—“ओहो, मैं ही बोलकर आता हूँ। वरना ये तो सात साल और लगा देंगे।”

सुदर्शन संयम को दरवाजे के पास आते ही संयम का बाजू पकड़कर बोला—“अरे रुक। मैं खुद ही बोल दूँगा।”

जयसिंह—“तो फिर जाओ और बोलो। वरना आज हम बोल देंगे।”

सुदर्शन—“सेठ जी…।”

सुजाता—“क्या सेठ जी? यहाँ हम तो तुम्हारी और कृतिका की शादी की डेट फिक्स कर रहे हैं और तुम दोनों ने अभी तक एक–दूसरे से अपने दिल की बात भी नहीं बोली।”

संयम बाहर जाते हुए—“मैं बोल ही आता हूँ।”

सुदर्शन संयम को पकड़कर बोला—"अरे, रुक जा रे… मैं बोलता हूँ।”

संयम–"तो फिर अभी के अभी जाओ और बोलो।"

सभी लोग खड़े होकर सुदर्शन को बाहर कृतिका के पास जाने के लिए कहने लगते हैं।

सुदर्शन ने मन मे कहा कि आज ये लोग नहीं छोड़ेंगे।

सुदर्शन झिझकते हुए बाहर जाने लगा। संयम भी सुदर्शन के साथ आने लगता है।

सुदर्शन—“अरे, तुम कहाँ आ रहे हो?”

संयम—“क्यों आप बिना बोले वापस आ गए तो?”

सुदर्शन आँखें दिखाता है।

संयम–"मैं बोल ही आता हूँ।"

सुदर्शन संयम का हाथ पकड़कर सुजाता से बोला—“मैडम। ये बहुत बिगड़ गया है।”

सुजाता—“क्या मैडम? कुछ नहीं बिगड़ा। ठीक ही तो बोल रहा है।"

सुदर्शन ने आश्चर्य से कहा–"आप इतना कैसे बदल गयी? आप तो मेरी माँ है।"

सुजाता–"हाँ, माँ हूँ ना। और अब ये माँ तुम्हें आदेश देती है, जाओ, जाकर अपने प्रेम का इजहार करो। हम सब यहाँ खिड़की में से देख रहे है। तुम बोलो, वरना हम बोल देंगे।”

सुदर्शन—“ये भी सही है।”

सुदर्शन बाहर आकर लोन में आता है। बैंच पर हाई नेक कॉलर वाली घूटनों तक आती हुई कुर्ती और चूड़ीदार लेगिंग पहने आयु में पैंतीस(35) वर्ष की हो चुकी कृतिका गंभीर मुद्रा में खोई हुई बैठी है। कृतिका के चेहरे पर अभी तक वहीं मासूमियत है, जो सात साल पहले थी।

सुदर्शन कृतिका को देखते हुए मन में कहने लगा कि ये प्यार का इज़हार करना भी कितना मुश्किल है? समझ में नहीं आ रहा, जब शादी की डेट फिक्स कर रहे है, तो इज़हार करने की क्या ज़रूरत है? अब कैसे बोलूँ?

सुदर्शन मुड़कर खिड़की की ओर देखता है। सभी लोग अपने-अपने तरीके से सुदर्शन को कृतिका से अपने प्यार का इज़हार करने के लिए इशारों में कहने लगते हैं।

सुदर्शन कृतिका की ओर मुड़कर बैंच पर बैठते हुए बोला—“अरे, कहाँ खोई हुई हो? मैं तुम्हें अन्दर ढूंढ रहा था और तुम यहाँ बैठी हो।”

कृतिका चौंककर बोली—“अरे, कहीं नहीं। बस यू ही आकर बैठ गई। बहुत अच्छा लोन है।”

सुदर्शन—“तुम्हें पसन्द आया, ये ज्यादा अच्छा लगा। अच्छा, एक बात बताओ। तुमने अपनी शादी के बारे में क्या सोचा है?”

कृतिका—“पहले भी कितनी बार बता चुकी हूँ। मुझे शादी नहीं करनी।”

सुदर्शन—“हम्म…लेकिन तुम्हारे मम्मी–पापा ने तुम्हारी शादी के लिए कुछ सपने देखे होंगे, कुछ अरमान सजा रखें होंगे और पहले तो तुम कहती थी, रिलेशन में रह चुकी लड़की से कोई अच्छा लड़का शादी क्यों करेगा? या तो वो अच्छा नहीं होगा या फिर वो तरस खाकर दया करके शादी करेगा। लेकिन अब तो तुम जिन्दगी में बहुत अच्छे मुकाम पर हो। पिछले पाँच साल से सारा बिजनेस अकैले संभाल रही हो। तुम्हारे पापा की तरह तुमने भी इन सात सालों में बहुत नाम कमा लिया। अब तो तुमसे शादी करने वालों की लाइन लगी हुई है और तुम जिससे भी शादी करोगी, वो अपनेआप को खुशकिस्मत समझेगा।”

कृतिका—“तुम मेरी छोड़ो। मुझे तो शादी नहीं करनी लेकिन तुम क्यों अब तक कुँवारे घूम रहे हो? तुम तो शुरू से ही बहुत अच्छे हो और अब तो तुम्हारी कम्पनी का भी बहुत नाम है। और लड़कियों की लाइन तो तुम्हारे लिए भी लगी हुई है। फिर भी अभी तक कुँवारे हो। वो आलोक तुमसे छोटा है, उसके दो बच्चे हो गए। सृष्टि के दो बच्चे हो गए। अँकुश पापा बनने वाला है। और तुम अभी तक कुँवारे। हट।”

सुदर्शन—“अरे, अभी तो तुमने कहा, तुम्हें तो शादी करनी ही नहीं है। जब तुम शादी नहीं करोगी तो फिर मेरी शादी कैसे होगी?”

कृतिका ने आश्चर्य से कहा—“अरे, मेरी शादी से तुम्हारी शादी का क्या कनेक्शन?”

सुदर्शन—“तुम कहती हो, तुम्हें शादी नहीं करनी। और मुझे शादी तुमसे करनी है। बस यहीं कनेक्शन है।”

कृतिका आश्चर्यचकित होकर बोली—“क्या बोले? फिर से बोलो।”

सुदर्शन मन में कहा कि हत तेरे की। आज जैसे–तैसे करके मुँह से बात निकली और इसे सुनाई देना बन्द हो गया।

कृतिका—“अरे, बोलो ना।”

सुदर्शन— “तुम कहती हो, तुम्हें शादी नहीं करनी। और मुझे शादी तुमसे करनी है। बस यहीं कनेक्शन है।”

कृतिका मुँह फुलाती हुई बोली—“तो पहले क्यों नहीं कहा?”

सुदर्शन—“पहले तुमने कभी पूछा ही नहीं।”

कृतिका—“लेकिन तुम्हें तो रिलेशन बनाने वाली लड़कियाँ पसन्द ही नहीं थी ना।”

सुदर्शन ने कृतिका का हाथ पकड़कर कहा—“रिलेशन बनाने में और किसी धोखेबाज के चक्कर में आकर मूर्ख बनकर रिलेशन बनाने में फर्क होता है।”

कृतिका ने सुदर्शन के हाथ पर अपना हाथ रखकर कहा—“लेकिन तुम्हें पता है, मैं अब अपने मम्मी–पापा की मर्ज़ी के बिना कुछ नहीं करती।”

सुदर्शन ठहाका लगाकर हँसने लगता है।

कृतिका आश्चर्य से बोली—“क्या हुआ?”

सुदर्शन और जोर से हँसने लगता है।

कृतिका—“ये पागलों की तरह हँसते ही रहोगे या बताओगे? क्या हुआ?”

सुदर्शन ने अपनी हँसी रोककर कहा—“तुम्हारे मम्मी–पापा को तो मैनें सात साल पहले ही पटा लिया था। वो तो अन्दर हमारी शादी की डेट फिक्स कर रहे है। वो देखो, पीछे खिड़की में।”

कृतिका ने खड़ी होकर पीछे मुड़कर कहा—“आप लोगों को सब पता था, पहले से?”

सभी लोग हँसते हुए घर से बाहर लोन में आते है। सुदर्शन खड़ा हुआ। सेठ साँवरमल बागड़ी और राजलक्ष्मी कृतिका के पास आते हैं।

सेठ साँवरमल बागड़ी—“अब जो लड़का खुद की खुशी से ज्यादा तुम्हें खुश रखने के बारे में सोचता है। उसे हम नापसन्द कैसे कर सकते हैं?”

राजलक्ष्मी—“हम तो सात साल पहले ही मान गए थे, लेकिन सुदर्शन ने कहा, वो शादी से पहले तुम्हारे लायक बनना चाहता है।”

कृतिका—“और आप दोनों ने मुझे बताया भी नहीं?”

सुदर्शन ने सेठ साँवरमल बागड़ी की नकल करते हुए कहा—“अरे छोरी ! बडेरा गी बात टाबरा ग समझ म कोनी आवः। जाणः कोनी के?”

कृतिका सुदर्शन की ओर आती हुई बोली—“तुम रुको, अभी समझाती हूँ तुम्हें तो।”

सुदर्शन कृतिका से बचने के लिए इधर–उधर भागने लगता है। सभी उनको देखकर हँसते है। सुदर्शन कृतिका से बचकर भाग जाता है और कृतिका सुदर्शन के पीछे–पीछे भाग जाती है।

छत्तीस दिन बाद पच्चीस नवम्बर, सोमवार की दोपहर दो बजे गाजे–बाजे के साथ कृतिका के घर सुदर्शन की बारात आती है। सभी के चेहरे पर खुशियाँ ही खुशियाँ है। सुदर्शन को दूल्हा और कृतिका को दुल्हन बनी देखकर कई लोगों की आंखों में खुशी के आँसू है। सभी लोग सुदर्शन और कृतिका के लिए मंगल कामना कर रहे हैं। सभी के आशीर्वाद से सुदर्शन और कृतिका का विवाह संपन्न होता है।

शाम के आठ बजे दुल्हन बनी हुई कृतिका सुदर्शन के साथ ससुराल जाने के लिए अपने पिता के घर से विदा होती है।

गाड़ी में पिछली सीट पर बैठी कृतिका ने सुदर्शन से कहा—“तुमसे एक बात कहूँ?”

सुदर्शन—“जितनी मर्ज़ी बातें कहो।”

कृतिका—“अगर तुम मेरे लिए ये घर और गाड़ी नहीं भी बना पाते, तब भी मैं हर हाल में सारी जिन्दगी तुम्हारे साथ गुजार लेती।”

सुदर्शन ने मुस्कुराकर कहा—“हाँ, मालूम है।”

कृतिका—“जब मालूम है, तो फिर ये शादी से पहले घर और गाड़ी का सपना पूरा करने की बात बोलकर सात साल इंतजार क्यों किया?”

सुदर्शन—“क्योंकि मैंने सेठ जी और सुजाता मैडम से सीखा है, प्यार का मतलब दूसरों से समझौता करवाना नहीं है। मैं तो ऐसा हूँ, अगर प्यार है, तो इसी हाल में एडजस्ट करो। प्यार का मतलब दूसरों की खुशियों का ख़्याल रखना है। खुद को दूसरों के लायक बनाना ही सच्चा प्यार है। जैसे तुम मेरे लिए अपनी हाई–फाई लाइफ़ छोड़कर मेरे साथ किराये के कमरों या किराये के घरों में रह सकती थी। ये तुम्हारा प्यार था। अगर तुम्हारे इस प्यार का फायदा उठाकर उस वक्त मैं तुमसे शादी कर लेता, तो ये मेरी खुदगर्जी होती। इसलिए मैनें शादी से पहले खुद को तुम्हारे लायक बनाया। तुम्हारी जो गलत आदतें थी, गन्दी–गन्दी गालियाँ निकालना, शराब पीकर घूमना–फिरना, उन सारी गलत बातों को तुम्हारी जिन्दगी से दूर करना ठीक है, लेकिन तुम्हारी जिन्दगी बदलकर तुम्हें मेरे हिसाब से एडजस्ट होने के लिए कहना सही नहीं था।”

कृतिका—“अच्छा, लेकिन अब अगर ऐसा कोई टाइम आ जाए, जब हमें एडजस्ट करना पड़े तो?”

सुदर्शन—“देखो, मजबूरी अलग बात है और जान–बुझकर किसी को दलदल में लाना अलग बात है। ऐसे तो मुझे लड़के और लड़की का शादी किये बिना साथ रहना भी पसन्द नहीं है। लेकिन मजबुरी थी, बुरा टाइम था, इसलिए मैंने दो रातें तुम्हारे साथ गुजारी। हालांकि हमने एक–दूसरे को उस इरादे से हाथ भी नहीं लगाया, फिर भी देखने–सुनने वाले तो वहीं सब सोचते है।”

कृतिका ने मुस्कुराकर कहा—“हम्म…”

सुदर्शन ने गंभीरता से कहा—“लेकिन मेरी एक शिकायत तुमसे अभी तक बनी हुई है।”

कृतिका आश्चर्य से बोली—“कैसी शिकायत?”

सुदर्शन ने कठोरता से कहा—“छोड़ो, क्या फायदा कहने से? अब तो शादी भी हो गई। आज सुहागरात भी हो जाएँगी।”

कृतिका ने बैचेन होकर कहा—“प्लीज, बताओ। क्या बात है?”

सुदर्शन—"अब बताने का कोई मतलब नहीं है।"

कृतिका उदास हो जाती है।

सुदर्शन—“अरे, तुम तो उदास हो गई। चलो, फिर बता ही देता हूँ। जब तुम पहली बार मुझे मिली थी, उस वक्त तुमने मुझे अपना बॉयफ्रैंड समझकर बहुत बार आई लव यू बोला था। एक गाना भी गा दिया। पुलिसवालों से शिकायत करके पुलिसवालों को भी बता दिया। लेकिन उस दिन के बाद आज हमारी शादी हो गई, फिर भी तुमने एक बार भी मुझे आई लव यू नहीं बोला।”

कृतिका हँसकर बोली—“मैंने कम से कम बोला तो है, लेकिन तुमने तो गलती से भी नहीं बोला।”

सुदर्शन—“मुझे तो बोलना नहीं आता।”

कृतिका—“ओह… तो फिर पहले बोलना सीखो, फिर आकर मुझे बोल देना। जब तुम मुझे बोलोगें, उस वक्त मैं भी तुम्हें बोल दूँगी।”

सुदर्शन ने मुँह फेरकर कहा—"ये भी सही है। इससे अच्छा तो मैं भी तुम्हारे बॉयफ्रैंड की तरह होता। एक आई लव यू बोलने में इतने नखरे?”

कृतिका मुस्कुराकर सुदर्शन को चुटकी काटती है।

सुदर्शन बिदकते हुए मुड़कर बोला—“अरे, अब तो सुधर जाओ। इतनी बड़ी हो गई हो।"

कृतिका ने हँसकर सुदर्शन के गाल चूम-चूमकर कहा—"आई लव यू सुदर्शन–आई लव यू सुदर्शन–आई लव यू सुदर्शन–आई लव यू सुदर्शन।”

सुदर्शन कृतिका के होंठ चूमकर बोला—“आई लव यू टू कृतिका।”

कृतिका मुस्कुराकर सुदर्शन के गले लग जाती है।

ड्राईविंग सीट पर ड्राईविंग करता हुआ आयु में इक्कतीस(31) वर्ष का हो चुका आलोक बोला—“अरे भाई, जहाँ सात साल इंतजार किया है, वहाँ घर पहुंचने तक कुछ देर और इंतजार कर लें। फिर बैडरूम में तुम दोनों ही हो।”

सुदर्शन कृतिका से अलग होकर बोला—“जब बहुत लम्बे इंतजार या बहुत मुश्किलों के बाद दो दिल मिलते हैं। फिर इंतजार नहीं होता, मेरे भाई।”

आलोक—“हम्म… वैसे भाभी ! आपको पता है, सुदर्शन की आपसे ड्राईविंग सीखने की बड़ी तमन्ना थी।”

कृतिका—“वो तो तुम भी सीखा सकते हो। एक साल हो गया, तुम्हें ड्राईविंग इंस्टीटयूट खोले हुए। सबको सिखाते हो, अपने दोस्त को नहीं सीखा सकते?”

आलोक ने हँसकर कहा—“इंस्टीटयूट तो आपने और सुदर्शन ने ही मदद करके खुलवाया है। सब आपका ही है। जब मर्ज़ी आकर सीखो, लेकिन इसे आपसे सीखने की तमन्ना है। प्यार से, प्यार करते–करते।”

आलोक, कृतिका और सुदर्शन तीनों हँसने लगते हैं।

शादी होने के पाँच दिन बाद तीस नवम्बर, शनिवार की सुबह के दस बजे पहले से बड़ा और आलिशान हो चुके नारायण के दो मंजिला घर सामने आकर कृतिका सुदर्शन की गाड़ी रोककर बन्द करती है। सुदर्शन और कृतिका गाड़ी से उतरकर नारायण के घर की ओर आने लगते हैं।

दरवाजे पर खड़े नारायण ने अपनी पत्नी से कहा—“सुदर्शन हर कृतिका आ गया।”

सुदर्शन आकर नारायण से गले मिलता है और कृतिका सर पर हाथ फिरवाती है।

नारायण—“म तनः ई अडीकन लाग रयो।”

सुदर्शन—“थानः केयो तो हो, एक बारी ब्याह गो सारो काम हो जावः, फेर आराम उ आवागा।”

नारायण—“चालो, अब तो सब आछी तरया होग्यो, सगळो काम?”

सुदर्शन—“सारो की अठैई गेट पर ही पूछ लें, मायने आण बई ना केई।”(हिन्दी अनुवाद : सब कुछ यहीं गेट पर ही पूछ ले। अन्दर आने के लिए मत कहना।)

नारायण हँसकर बोला—“अरे, सॉरी–सॉरी। आ मायने आ। आजा बाई।”

सुदर्शन और कृतिका नारायण के पीछे–पीछे अन्दर आते हैं। नारायण की पत्नी किचन से बाहर आकर कृतिका से गले मिलती है। चारों बैठकर आपस में बातें करने लगते हैं।

शाम के चार बजे बैडरूम में बैठकर नारायण की पत्नी के साथ बातें कर रही कृतिका को बाहर नारायण के साथ सोफे पर बैठे सुदर्शन ने आवाज़ देकर कहा—“अब चले, कृतिका। सेठ जी और सुजाता मैडम ने भी बुलाया है।”

कृतिका नारायण की पत्नी के साथ बैडरूम से बाहर आती हुई बोली—“हाँ, चलते है।”

सुदर्शन ने खड़े होकर नारायण से कहा—“अच्छा, नारायण भाई जी।”

नारायण खड़ा होकर बोला—“हाँ, ठीक है।”

नारायण और नारायण की पत्नी सुदर्शन और कृतिका को गाड़ी तक छोड़ने आते हैं। सुदर्शन दूसरी साइड और कृतिका ड्राईविंग सीट पर बैठ जाती है।

नारायण की पत्नी—“आवता-जावता रैया करो। थै तो अब जमा ई भूल ग्या।"

कृतिका—“अच्छ्या। जाणा थे बोळा आओ। मेरः मम्मी-पापा गा ब्याह गी साल गिरह च्यार(चार) बार भाय जी न फोन कृओ म। फेर ई थे एकला ई आया। भाय जी कोनी आया।”

नारायण—“देख बाई, इमः सारी गलती तेरी है। थे दोन्यू जणा नया-नया काम सुरू करवार म्हारी तरक्की तो घणी करूँआई, पर अब टेम कोनी। पैली तो रात न दस-ग्यारह बजे ताई बैठया रेवःता। कोई ब्याह-ऐडा होवःतो, दो दिन पैली पूगता हर एक-दो दिन पछः आराम उ आवःता। अब तो बस भागता ई रयोओ, कोई ऐडो कोनी।”

सुदर्शन ने मुस्कुराकर कहा—“अब की पाण खातर, की खोणो बी पड़ः। अच्छा, फिर मिलेंगे।”

नारायण—“हाँ, ठीक है।”

कृतिका गाड़ी स्टार्ट करके चल पड़ती है।

सुदर्शन—“चार तो इसने ही बजा दिये। सेठ जी के घर भी काफ़ी टाइम लगेगा। आज तो हनुमानगढ़ नहीं जा पाएँगें। अब तो कल सुबह ही निकलना पड़ेगा।”

कृतिका—“हम्म… हनुमानगढ़ अगले हफ्ते चले जाते तो सही रहता।”

सुदर्शन—“नहीं, अभी ठीक है। दो दिन रुककर आ जाएँगें। एक बार सारे परिवार वालों को तुमसे मिलवाना है। उसके बाद कोई बुलाएगा तो जाएँगें, वरना क्या करना है, वहाँ जाकर?”

कृतिका—“तुम्हारा मन नहीं करता, अब अपने शहर जाने का?”

सुदर्शन—“मुझे यहाँ सेठ जी और सुजाता मैडम से बहुत प्यार और अपनापन मिला है। कभी–कभी जब मैं सोचता हूँ, तो सेठ जी और सुजाता मैडम मुझे अपने मम्मी–पापा से बढ़कर लगते है। मेरे मम्मी–पापा मुझसे इसलिए प्यार करते हैं, क्योंकि मैं उनका बेटा हूँ। अगर मेरे मम्मी–पापा से मेरा कोई रिश्ता नहीं होता, तो उनको मुझसे कोई मतलब नहीं होता। जैसे किसी अन्जान से किसी को कोई मतलब नहीं होता। लेकिन सेठ जी और सुजाता मैडम से कोई रिश्ता नहीं है, फिर भी उन्होंने ने मेरे लिए क्या–क्या किया हैं? तुम्हें सब कुछ पता है। आज मैं जो कुछ भी हूँ, सिर्फ उनके ही कारण हूँ। तो ऐसे अपनों को छोड़कर मैं हनुमानगढ़ जाकर क्या करूँ? मम्मी–पापा, भाई–भाभी, बहन–जीजाजी इन सबको यहाँ बुला लिया। भाई और जीजा जी का अच्छे से बढ़िया काम सेट करवा दिया। अब बाकी परिवार वाले और रिश्तेदारों में से किसी को कोई मदद चाहिए हो, तो उनकी मदद करते ही हैं।”

कृतिका—“हाँ, सच में बहुत अच्छे लोग है। मुझे तो हैरानी होती है, कदम–कदम पर बुरे लोग मिलने वाली इस दुनिया में जय अंकल और सुजाता आंटी जैसे लोग भी है।”

सुदर्शन—“हाँ, वैसे तो उनकी जिन्दगी में सब कुछ बहुत अच्छा है। उनके तीनों बच्चे सृष्टि, अँकुश और संयम भी उनकी तरह बहुत अच्छे है। लेकिन कभी–कभी उनके लिए डर लगता हैं, कहीं उनकी अच्छाईयों का गलत फायदा उठाकर कोई उनके साथ कुछ बुरा ना कर दें।”

कृतिका—“चिन्ता मत करो। अच्छे लोगों की जिन्दगी में मुश्किलें और परेशानियाँ आ तो सकती है, लेकिन ज्यादा देर टिक नहीं सकती। तुमने देखा नहीं, इस उम्र में भी उनके चेहरे पर कितनी रौनक है। वरना इस उम्र में और कुछ नहीं तो, लोग बीमारियों से परेशान रहते है। लेकिन जय अंकल और सुजाता आंटी को देखो, एकदम फिट, बिलकुल तंदुरुस्त और हेल्थी है। मैं तो चार साल पहले सृष्टि की शादी से चार–पाँच दिन पहले उस वक्त हैरान रह गई, जब मैनें देखा, सुजाता अन्टी पैंतीस किलो गेहूँ से भरी बोरी सर पर उठाकर बिलकुल आराम से ले आई। जय अंकल भी चालीस किलो तक वजन कितनी आराम से उठा लेते है।”

सुदर्शन ने हँसकर कहा—“अरे, वो तो मेरे मम्मी–पापा भी आठ–दस साल पहले पचास की उम्र होने तक उठा लेते थे। वो क्या है? पुराने लोगों की कुछ बातें बहुत अच्छी है। गरीब लोग तो अब भी मेहनत वाले काम करते हैं, लेकिन बड़े लोग अब नौकर–चाकर रख लेते है या फिर भारी काम पैसे देकर करवा लेते है। पहले बड़े(पैसेवाले) लोग भी अपने बच्चों से मेहनत वाले भारी भरकम काम करवाते रहते थे। अब मेहनत वाले भारी काम करने से भूख भी लगती थी, इसलिए पहले के बच्चे खाना पूरा खाते थे। इससे बच्चों का शरीर भी बढ़िया बन जाता था और जिम जाने की ज़रूरत नहीं पड़ती थी।”

कृतिका—“हाँ, ये सब तो मेरे मम्मी–पापा भी बताते रहते है।”

सुदर्शन—“पहले ज्यादातर लोग ऐसा करते थे। एक तो उस टाइम अब जितनी सुविधाएँ नहीं थी। दूसरा लोग चाहते थे, उनके बच्चे आलसी ना बने, मेहनती बने। सेठ जी और सुजाता मैडम ने भी अपने टाइम में मेहनत वाले भारी भरकम काम बहुत किये है। जैसे सर पर उठाकर पानी का मटका लेकर आना, गेहूँ, चावल, अनाज से भरी बोरी सर पर उठाकर लाना। जब मैं सेठ जी के पास जॉब करता था, उस टाइम सेठ जी और मैडम बताया करते थे, अपनी जवाँनी में वो पचास–साठ किलो वजन आराम से उठा लेते थे।”

कृतिका आश्चर्यचकित होकर आँखें ऊपर करके बोली—“बाप रे………पचास–साठ किलो वजन। मेरा तो बीस–पच्चीस किलो वजन उठाते ही दम निकल जाता है और सर पर उठा लूँ, तब तो सारा दिन चक्कर आएँगें।”

सुदर्शन ने हँसकर कहा—“इस मामले में हम पुराने लोगों की बराबरी नहीं कर सकते। ये जो पुराने लोग बीमार होते हैं ना। असल में ये लोग अपने गलत खानपान और नशे का कारण बीमार होते है। वरना सेठ जी और सुजाता मैडम को देखो, उनको घर के मेहनत वाले भारी काम करने की बिलकुल भी ज़रूरत नहीं है। फिर भी घर के काम तो खुद ही करते है। कोई ज्यादा काम हो, तब दूसरों को बुलाते हैं। इससे उनको कभी दवाईयाँ लेने की ज़रूरत नहीं पड़ी। हर रोज अनार, सेब, केले, संतरे, चीकू, पपीता, आम, सभी फल खाते है। खाने में हर रोज बढ़िया हरी सब्जी जरूर बनाते हैं। इस तरह सेठ जी और सुजाता मैडम ये सब शरीर को फायदे पहुँचाने वाली चीजें तो हर रोज पेट भरकर खाते हैं और चाट–पकौड़ी, समोसा–कचौरी, चाउमीन–बर्गर, पिज्जा वगैरह हफ्ते–दस दिन में एक या दो बार थोड़ा–बहुत खाते हैं। सबसे बड़ी बात सभी तरह के नशे से पूरी तरह दूर है। तो एकदम फिट, हेल्थी, सेहतमंद और तंदुरुस्त क्यों नहीं होंगे?”

कृतिका—“हाँ, ये बात तो बिलकुल सही है।”

सुदर्शन—“हम्म…और यहीं सब उन्होंने अपने बच्चों को सिखाया है। मैं इनके पास आया तो यहीं सब मुझे भी सीखा दिया।”

कृतिका ने हँसकर कहा—“और तुमने यहीं सब मुझे सीखा दिया।”

सुदर्शन ने हँसकर कहा—“और तुमने यहीं सब अपने मम्मी–पापा को सीखा दिया।”

कृतिका खिलखिलाकर हँसती हुई बोली—“और अब हम दोनों मिलकर यहीं सब अपने बच्चों को सिखाएँगें।”

सुदर्शन ने हँसते हुए कहा—“ये भी सही है।"

शाम के साढ़े चार बजे कृतिका गाड़ी जयसिंह के घर के सामने लाकर रोककर बन्द कर देती है। सुदर्शन और कृतिका गाड़ी से उतरकर घर के दरवाजे पर जूते और सैंडल निकालकर घर के अन्दर आकर सीढ़ियां उतरते हुए नीचे बेंसमेंट में आकर केबिन में आते हैं।

जयसिंह मुस्कुराते हुए बोले—“अरे सुजाता, सुदर्शन और कृतिका आ गए।”

सुदर्शन और कृतिका मुस्कुराते हुए जयसिंह के पास आकर जयसिंह के पैर छूते हैं।

जयसिंह ने मुस्कुराते हुए दोनों को आशीर्वाद देते हुए कहा—“सदा खुश रहो।”

कालीन जड़े फर्श पर बैठी ज्वैलरी पैक करती सुजाता ज्वैलरी छोड़कर खड़ी होती है।

सुदर्शन और कृतिका सुजाता के पास आकर सुजाता के पैर छूते हैं।

सुजाता मुस्कुराते हुए बोली—“अरे, बस–बस। सदा हँसते–मुस्कुराते खुश रहो।”

जयसिंह—“इन्हें ऊपर ले जाकर चाय–नाश्ता करवाओ। मैं आता हूँ, थोड़ी देर में।”

सुजाता कृतिका के कंधे पर हाथ रखकर बोली—“हाँ, चलो। ऊपर चलते है। सुदर्शन, आ जाओ।”

सुदर्शन और कृतिका सुजाता के साथ केबिन से बाहर आकर सीढ़ियां चढ़ते हुए ऊपर आकर सोफे की ओर आने लगते हैं।

सुदर्शन—“सृष्टि, जीजाजी(सृष्टी के पति), अँकुश और संयम कहाँ है?”

सुजाता—“अँकुश तो तुम्हारी शादी में शामिल होकर अगले दिन अपने ससुराल चला गया। वो पापा बनने वाला है ना। उसकी वाईफ का आखरी महीना चल रहा है। इसलिए वहाँ बहू के साथ रहेगा तो अच्छा है और संयम कल सृष्टि और जवाँई(दामाद) जी के साथ बैंगलोर चला गया। हफ्ते–दस दिन बाद आएँगा।”

सुजाता सोफे के पास आकर बोली—“तुम दोनों यहाँ बैठो। मैं तुम्हारे लिए चाय–नाश्ता लाती हूँ।”

कृतिका—“चलिए, आपकी हेल्प कर देती हूँ।”

सुजाता—“अरे, तुम दोनों शादी के बाद पहली बार घर आए हो। इसमें हेल्प क्या है? बस चाय ही तो बनानी है।”

कृतिका—“ओहो अन्टी, आप भी क्या फॉर्मेलिटी करने लगी?”

सुजाता ने मुस्कुराकर कहा—“अरे, सुदर्शन यहाँ अकैला बैठा रहेगा। अभी तुम बैठो और बातें करो। जब खाना बनाएँगें, तब हेल्प कर देना।”

सुदर्शन—“नहीं–नहीं, मैं नीचे सेठ जी के पास जा रहा हूँ।”

सुजाता—“अच्छा ठीक है।”

कृतिका सुजाता के साथ किचन में चली गई और सुदर्शन वापस नीचे बेसमेंट में चला जाता है।

रात को साढ़े दस बजे खाना खाने के बाद सोफे पर बैठी सुजाता और कृतिका सामने बैठे जयसिंह और सुदर्शन आपस में बातें कर रहे हैं।

सुदर्शन—“अच्छा, सेठ जी। अब हम चलते है। साढ़े दस बज गए।”

सुजाता—“अरे, साढ़े दस बज गए। बातों–बातों में पता ही नहीं चला। दो मिनट रुको, मैं अभी आती हूँ।”

सुजाता खड़ी होकर बैडरूम में गई और दो मिनट बाद हाथ में एक पैकेट लिए वापस आती है। जयसिंह, सुदर्शन और कृतिका खड़े हो गए।

सुजाता ने सुदर्शन और कृतिका को पैकेट देते हुए कहा—“ये तुम दोनों के लिए हमारी तरफ से एक छोटा सा उपहार।”

सुदर्शन—“मैडम, अब इसकी क्या ज़रूरत थी?”

सुजाता—“क्यों? हम तुम्हें गिफ्ट भी नहीं दे सकते?”

सुदर्शन मुस्कुराकर जयसिंह की ओर देखता है। जयसिंह ने अपनी पलकें झपकाई। सुदर्शन कुछ बोले बिना मुस्कुराकर कृतिका को पैकेट लेने का इशारा करता है और कृतिका मुस्कुराते हुए पैकेट ले लेती है। सुदर्शन और कृतिका जयसिंह और सुजाता के पैर छूते हैं।

जयसिंह और सुजाता एक साथ बोले—“हमेशा खुश रहो। तुम दोनों के प्यार को किसी की नजर ना लगे।”

सुदर्शन—“अच्छा, मैडम हम चले।”

जयसिंह—“अरे, पैकेट खोलकर तो देखो, उसमें क्या हैं?”

कृतिका पैकेट खोलकर देखने के बाद बोली—“ये तो हनीमून ट्रिप के टिकट है।”

सुजाता ने मुस्कुराते हुए कहा—“हाँ ! मुझे पता था, ये सुदर्शन तो अपने सेठ जी की संगत में कंजूस हो गया है। ये तो तुम्हें कहीं ले जाएगा नहीं। इसलिए ये काम मैंने कर दिया। अब तुम दोनों तीस दिन के लिए घूमने जाओ और जल्दी से खुशखबरी देना।”

सुदर्शन और कृतिका शर्माकर इधर–उधर देखते हुए मुस्कुराने लगते हैं।

सुजाता—“चलो, अब घर जाओ। देर हो रही है।”

सुदर्शन ने सुजाता और जयसिंह से कहा—“आपसे एक बात पूछूँ?”

सुजाता—“हाँ, बोलो।”

सुदर्शन—“पहले तो मैं आपके पास जॉब करता था। उस वक्त आप लोग कहते थे, मैं मेहनत, लगन और ईमानदारी से जॉब करता हूँ, उसके बदले में आप भी मेरे लिए कुछ कर देते हो। लेकिन पिछले सात सालों में आपकी जॉब छोड़ने के बाद आपने जो मेरी इतनी मदद की। मुझे खुद का बिजनेस शुरू करवा दिया। शुरू के दो साल बहुत खराब रहें, तो आप लोगों ने मेरे बिजनेस पर पचास लाख से ज्यादा खर्च करके मेरी हेल्प की। ढ़ाई–तीन साल बाद बिजनेस अच्छा चलने लगा, वरना आप लोग और मदद करते। फिर जब मैं आपको आपके पैसे वापस देने आया, तब भी आप लोग ले नहीं रहे थे। मैंने जबरदस्ती आपको आपके पैसे वापस दिये। बिना किसी रिश्ते के आपसे इतना प्यार और अपनापन पाकर मैं हैरान हूँ।”

सुजाता ने मुस्कुराते हुए सुदर्शन के सर पर हाथ फेरते हुए कहा—“एक बार तुमने मुझे माँ कहा था ना। तो माँ के प्यार पर हैरानी कैसी?”

जयसिंह—“और जब से तुम हमारे पास आए हो, हमने तुम्हें अपने बच्चों की तरह ही समझा है। अब कहने वाले कहते है, हिसाब तो बाप–बेटे का भी होता है। लेकिन जब रिश्ता दिल से जुड़ जाए, फिर कोई हिसाब नहीं रहता।”

सुदर्शन—“लेकिन सेठ जी आप लोगों की अच्छाई का बुरे लोग गलत फायदा भी उठा सकते हैं। आपने सृष्टि, अँकुश और संयम को भी अपके सारे गुण दिये है। वो तीनों भी बिलकुल आपकी तरह बहुत अच्छे हैं। बस इसलिए कई बार आप सबकी चिन्ता हो जाती हैं।”

सुजाता ने हँसकर कहा—“बुरे लोग गलत फायदा उठाकर एक बार धोखा दे सकते हैं, दो बार धोखा दे सकते हैं। फिर वो अपना चेहरा दिखाने लायक नहीं रहते। हमने बहुत से लोगों को उनकी मुसीबत और परेशानियों में मदद की। लेकिन जब उनको मौका मिला, कोई रुपये–पैसे लूटकर भाग गया, कोई ज्वैलरी लूटकर भाग गया, और बहुत से लोगों की गन्दी नीयत भी सामने आई। अब उन लोगों के लिए हमारे दिल में कोई जगह नहीं है।”

जयसिंह—“और अगर तुम चाहते, तो तुम भी इस तरह से रुपये–पैसे लूटकर भाग सकते थे, लेकिन तुमने ऐसा नहीं किया। इसलिए तो तुम बिलकुल हमारे घर के सदस्य बन गए। हमें ऐसा लगने लगा, जैसे हमारे तीन नहीं, चार बच्चे है। और रही बात तुम्हारी मदद की। तो जैसे तुम्हें कृतिका के आँसूओं में तुम्हारा खाया हुआ धोखा याद आता था। बिलकुल उसी तरह तुम दोनों के प्यार में हमें अपना प्यार नजर आया। हमें भी कभी तुम्हारी तरह प्यार हुआ था। हमारी कहानियाँ भले ही अलग–अलग हो, लेकिन प्यार का एहसास तो एक ही है ना।”

सुदर्शन ने मुस्कुराकर कहा—“हाँ, सेठ जी। रुपये-पैसे से कुछ दिन अच्छे गुजर जाते, लेकिन मैं आपको खो देता। आपके प्यार और अपनेपन की कोई कीमत नहीं है। मेरी धोखा खाकर बुरी हालत हुई थी, इसलिए मैं धोखे का दर्द समझता था। आपको और मैडम को एक–दूसरे से प्यार हुआ था, इसलिए आप लोग हमारा प्यार समझते हो। अब आपका प्यार और अपनापन हमेशा हमारे साथ है।”

सुजाता ने मुस्कुराकर कहा—“हम्म…”

सुदर्शन—“अच्छा, हम चलते है।”

सुजाता—“हाँ, ठीक है।”

जयसिंह और सुजाता सुदर्शन और कृतिका को छोड़ने बाहर आते हैं। कृतिका ड्राईविंग सीट पर और सुदर्शन दूसरी ओर आकर बैठता है। कृतिका गाड़ी स्टार्ट करती है। सुदर्शन और कृतिका जयसिंह और सुजाता को बाए–बाए बोलकर चले जाते हैं।

जयसिंह और सुजाता मुस्कुराते हुए घर के अन्दर आने लगते हैं। बहादुर मुख्य दरवाजा बन्द करके अपनी कुर्सी पर बैठ जाता है। जयसिंह दरवाजा अन्दर से बन्द करने लगते है। सुजाता बैडरूम में आकर बैड पर बैठ जाती है।

जयसिंह बैडरूम में आकर सुजाता के पास बैठते हुए बोले—“हम्म…सुदर्शन ने इंतजार तो बहुत लम्बा करवाया, लेकिन आज सुदर्शन और कृतिका को देखकर बहुत खुशी हुई।”

सुजाता ने मुस्कुराते हुए कहा—“हाँ, जिनका प्यार सच्चा हो, उनका मिलन देर–सवेर हो ही जाता है।”

जयसिंह ने एक हाथ सुजाता के गले में डालकर दूसरा हाथ सुजाता के गाल पर रखकर सुजाता के होंठ अपने होंठ के पास लाकर मुस्कुराते हुए कहा—“हम्म,,,,मैं तो सोच रहा हूँ, संयम की शादी करके हम भी हनीमून पर चलते हैं।"

सुजाता खुद को छुड़ाकर जयसिंह को धकेलती हुई बोली—“अरे, शर्म करो। अभी तक बैडरूम-बैडरूम करते थे, अब हनीमून-हनीमून करने लगे। रिश्तेदारों का तो सोचो? हम नाना–नानी बन गए हैं और दादा–दादी बनने वाले हैं।”

जयसिंह फिर से सुजाता को अपनी बाहों में समेटकर बोले—“अब ये किसने कहा, नाना–नानी और दादा–दादी बनने के बाद पति-पत्नी एक-दूसरे से प्यार नहीं कर सकते?”

सुजाता जयसिंह के गले में अपनी बाहें डालकर जयसिंह से आँखें मिलाती हुई बोली—“समाज की बातें भूल गए? इस उम्र में हम हनीमून पर जाएंगे, तो लोग तुम्हें कहेंगे ठरकी बुढ़ा और मुझे बोलेंगे बुढ़ी घोड़ी लाल लगाम।”

जयसिंह ने सुजाता की हथेली से हथेली मिलाकर कहा—“लोगों की तो आदत है, कुछ ना कुछ बोलने की। लोगों के बारे में सोचेंगे, तो मुझसे बड़ी होने का फायदा उठाकर बचपन में जो तुम बात-बात पर मुझे पीटती थी, उसका हिसाब कैसे बराबर होगा?"

सुजाता मुँह फुलाकर बोली—“आज तुम फिर से पिटोगे। पहले खेल में बेईमानी करते थे और बेईमानी सामने आने पर मुझे मारते थे। अब कहते हो, मैं बड़ी होने का फायदा उठाकर बात-बात पर पीटती थी।"

जयसिंह—“सुजाता की बच्ची, पिटोगी तो तुम। पहले में बच्चा था, अब तुम बुढ़ी हो।"

सुजाता—“जय के बच्चे, अब बुढ़े होकर फिर से वहीं गलती कर रहे हो, जो बचपन में सुजाता से पंगा लेकर करते थे।"

जयसिंह—“हाँ, तो क्या कर लोगी? जयसिंह ना बचपन में डरता था और ना अब डरता है।"

सुजाता—“मतलब, तुम नहीं मानोगे?”

जयसिंह—“बिलकुल नहीं। तुम्हें अपनी पत्नी मानने के लिए नहीं बनाया, सारी जिन्दगी तुम्हें तंग करके परेशान करने के लिए तुम्हारा पति बना हूँ। और आज तो तुमसे सुदर्शन और कृतिका को हनीमून पर भेजने का हिसाब भी करना है।”

सुजाता खिलखिलाकर हँसती हुई बोली—“तुम कभी मत सुधरना।”

जयसिंह मुस्कुराकर सुजाता को गले लगाकर बोले—“बिलकुल नहीं। तुमसे प्यार करने का मौका मिलें और मैं छोड़ दूँ?”

सुजाता ने मुस्कुराकर कहा—"हम्म। चलो, फिर हिसाब करते हैं।

जयसिंह सुजाता का चेहरा निहारते हुए मुस्कुराकर बोले—"आई लव यू, सुजाता।"

सुजाता जयसिंह का चेहरा निहारती हुई मुस्कुराकर बोली—"लव यू टू, जय।"

जयसिंह और सुजाता एक-दूसरे को अपनी बाहों में समेटकर बचपन के खेल-कूद से लेकर अब तक के प्यार का हिसाब करने के लिए एक-दूसरे में सिमटते हुए आहिस्ता-आहिस्ता बैड पर लेटकर अनंत प्रेम के शून्य में खो जाते हैं।

-------------समाप्त

दिल इंतज़ार बात

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