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पंडा बाबू की पाठशाला
पंडा बाबू की पाठशाला
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© Yogesh Suhagwati Goyal

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मेरा जन्म २७ नवम्बर १९५४ को हुआ| मुझे याद नहीं, मेरे पिताजी ने मुझे कभी भी गोद में उठाया हो| हाँ एक पुरानी काली और सफ़ेद फोटो में जरूर उनकी गोद में हूँ| मेरी माँ ने बताया था, उस वक़्त मैं ३ महीने का था| बचपन में जैसे ही मैंने ठीक से चलना फिरना सीख लिया, वो मुझे साथ ही रखते थे| बाहर भी कहीं जाते थे, तो अधिकतर मैं साथ ही होता था| घर के बाहर की दुनिया से मुझे मिलाने का ये उनका अपना तरीका था| मेरे पिताजी को पढाई लिखाई से कुछ ज्यादा ही लगाव था| मेरे लिये भी वो बड़े बड़े सपने देखते थे|

मेरे बचपन में ही वो प्रसिद्द पब्लिक स्कूल जैसे दून, मेयो, वुडस्टॉक, सिंधिया आदि में पढ़ाने के सपने देखते थे| वो उनके सम्पर्क में भी थे लेकिन घर की आर्थिक स्थिति को समझते हुए उन्हें अपने फैसले बदलने पड़े| उन दिनों हमारे परिवार की माली हालत बहुत खराब थी| खैर इस सबके बारे में, मैं और कभी बताऊंग | अभी अपनी कहानी में आगे बढ़ते हैं|

गाँव खेरली में ही हमारा एक दूसरा घर भी था लेकिन वो शायद गिरवी पड़ा हुआ था| वो घर ठीक हमारे घर के सामने वाली लाइन में, करीब २५० मीटर दूर था| दोनों घरों के बीच में हमारे गाँव के म्युनिसिपल बोर्ड का दफ्तर था| उस दफ्तर और हमारे घर के बीच एक नाली बनी हुई थी| इसी नाली से हमारे मोहल्ले की गंदगी गाँव के बाहर जाती थी| हम बच्चों के लिये ये नाली बहुत अहम थी| रोज सुबह सभी छोटे बच्चे इसी नाली पर लाइन लगाकर शौच करने बैठते थे| उन दिनों गाँव में मुश्किल से ५-१० घर ही ऐसे थे जिनमें शौचालय बने हुए थे, वर्ना सभी लोग शौच करने खेतों में जाते थे| हमारे गिरवी वाले घर के सामने टीन शेड था| उसी में एक छोटा सा स्कूल चलता था| उस स्कूल में कुल ही १८-२० विद्यार्थी थे| और हमारे मास्टरजी थे श्री बाबू लाल जी, जो पूरे गाँव में पंडा बाबू के नाम से जाने जाते थे| जैसा मैंने ऊपर बताया, हमारी पढाई लिखाई को लेकर पिताजी काफी सोचते थे और आखिर वो दिन नजदीक आ गया जब अगले दिन हमको पंडा बाबूजी के स्कूल में भरती कराना था| हमारे लिये नया स्कूल बैग (बस्ता), नयी सलेट और थोड़ी सफ़ेद पेन्सिल खरीदी गयी| उन दिनों बच्चों के पहले स्कूल में ज्यादातर प्रवेश बसंत पंचमी को कराये जाते थे| बसंत पंचमी को सरस्वती का दिन भी माना जाता है और सरस्वती विद्या की देवी है| सच कहें तो हमको उस दिन का कोई अंदाजा नहीं था| ये सब हमें हमारी माँ ने बताया था| गूगल करने पर पता चला, उस साल २४ जनवरी १९५८ को बसंत पंचमी का दिन था |

उन दिनों एक और चीज बहुत ही आम थी| बच्चों के जन्म दिन का सही हिसाब कोई कोई ही रखता था| गाँव के स्कूल प्रवेश में कोई प्रमाण पत्र आदि की जरूरत नहीं होती थी| मास्टरजी के सामने खड़े खड़े ही हिसाब लगा लेते थे कि बच्चा जब कक्षा १० की बोर्ड की परीक्षा देगा, उस वक़्त १५ साल का होना चाहिये| वर्ना मास्टरजी अपना हिसाब लगाकर जन्म की तारीख लिख देते थे| हमारे साथ भी ऐसा ही हुआ था | हमारी जन्म तिथि २७-११-१९५४ थी लेकिन पंडा बाबूजी के रजिस्टर में २७-९-१९५३ लिखी गई| और आज तक भी हर जगह वही दर्ज है|

२४ जनवरी १९५८ बसंत पंचमी का दिन, हमारे बड़े चाचाजी हमें अपनी ऊँगली थमाकर स्कूल ले गये| स्कूल बैग हमारे पास था और चाचाजी के हाथ में सवा किलो बताशे थे| पिताजी ने पंडा बाबूजी से पहले ही बातचीत कर ली थी| इसीलिए वहां पहुंचकर कोई दिक्कत नहीं हुई| हमको भी स्कूल में अन्य विद्यार्थीयों के साथ जमीन पर बिछी पट्टी पर बिठा दिया गया| फिर मास्टरजी ने सब बच्चों को हमारे लाये हुए बताशे बांटे| और इस तरह से हमारे शिक्षण का प्रारम्भ हुआ| करीब १२ बजे स्कूल की छुट्टी हुई| उन दिनों किसी भी बच्चे के माँ बाप उनको लेने स्कूल नहीं आते थे| सब बच्चे मिलजुलकर अपने आप ही घर पहुँच जाते थे| हम भी धीरे २ लौट चले| बोर्ड का दफ्तर पार किया | इतने में ही शायद पेट में कुछ हलचल हो गई| घर के पास वाली नाली के पास एक पीपल का पेड़ था | उसी के नीचे अपना स्कूल बैग रखा और नाली पर शौच करने बैठ गये | शौच कर घर पहुंचे और फिर अपने खाने पीने और खेलने में व्यस्त हो गये| अगले दिन जब स्कूल जाने का वक़्त हुआ, तब माँ ने पूछा, तुम्हारा बस्ता कहाँ है, तो हमने कहा कि वो तो पीपल के पेड़ के नीचे रखा है | ढूँढने पर बस्ता वहां नहीं था|

कहानी पाठशाला दफ्तर पीपल ग्रामीण मास्टरजी पढाई

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