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 एक स्लाइड शो
एक स्लाइड शो
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© Vyomkant Mishra

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आज भी वह दिन याद करता हूँ तो शरीर में चन्दन सी शीतलता दौड़ जाती है.....

दिल्ली विश्वविद्यालय में मेरा पहला दिन था। पहली बार कॉलेज जा रहा था। एक अलग ही उल्लास मन में छाया हुआ था। मेरा मन एक नयी उमंग, एक नया लक्ष्य, एक सुन्दर अनुभूति लिए हुआ था। 

मैं विश्वविद्यालय मैट्रो से बाहर निकलकर छात्रा मार्ग की तरफ बढ़ा। छात्रा मार्ग का नामकरण कैसे हुआ होगा यह विचारणीय विषय है। लेकिन वास्तव में लगता है की जैसे वह मार्ग छात्राओं के विचरण के लिए बनाया गया हो। आज भी मेट्रो के बाहर भी छात्राओं की लंबी लंबी कतारें देखी जा सकती है। 

कुछ दूर आगे बढ़ने के बाद आर्ट्स फैकल्टी के पास मैंने देखा लोगों का जमावड़ा लगा हुआ है। जैसे गाँव में मदारी जब बन्दर का खेल दिखाता है तब लोग घेर कर खड़े हो जाते है या शहरों में नाली खोदी जा रही हो तो लोग बहुत ही जिज्ञासा पूर्वक घेर कर खड़े हो जाते है ठीक वैसा ही जमावड़ा लगा हुआ था।

पहले मुझे यही लगा लेकिन मै दूर से ही कुछ झलकियाँ देख सकता था। उसे देखने की उत्सुकता के साथ मै भी उस भीड़ में शामिल होने को बढ़ा।

देखा की छात्र और छात्राएँ काला कुर्ता और नीली जीन्स पहने नौटंकी का प्रदर्शन कर रहे हैं। उस समय तक मै नुक्कड़ नाटक नमक विधा से अपरिचित था।

एक के बाद एक कलाकार उठ कर घेरे के मध्य में आते और डायलॉग बोलकर चले जाते। तभी मुझे अपनी क्लास का ध्यान आया और मैंने सोचा इन कलाकारों को बाद में समय दूँगा पहले क्लास कर लूँ। मै कॉलेज जाने के लिए पीछे मुड़ा ही था कि सहसा एक आवाज आयी "अरे कहाँ चल दिए यार पूरी बात तो सुन लो।" आवाज़ में नाटकीयता थी, लय भी था। बोलने वाली का एक हाथ मेरी तरफ और दूसरा हाथ उसकी कमर पर था, उसकी भाव भंगिमा में एक प्रकार की चंचलता थी, चेहरे पर पसीने की बूँदें चमक रही थी, उसकी आँखे एक प्रश्न चिन्ह की तरह मुझ पर आकर टिक गयी, आँखों में लगा आई लाइनर उसकी भंगिमा को और भी सुन्दर बना रहा था, कानों में लटक रहे कुंडल या कुंडल ना कहे बड़े आकार की बालियाँ लटक रही थी। कुंडल इसलिए लिखा क्योंकि वह उस वक़्त मुझे वह कालिदास के किसी नाटक की नायिका जान पड़ रही थी।

उसके इस तरह मुझसे पूछने पर मैं सकपका सा गया। कुछ भी समझ नही आ रहा था क्या कहूँ। मन में बहुत से सवालों ने एक साथ धावा बोल दिया। मन में सोच रहा था कि "अरे भाई मेरी क्लास है मैं क्लास तो नहीं छोड़ सकता।" क्या सचमुच मैंने कोई अपराध कर दिया? क्या इस लड़की को मेरा मुड़ना इतना खाल गया? ऐसे ही अनेक निराधार प्रश्न सिहरन के साथ मन में दौड़ गए।

मैं आवाक सा, निरुत्तर सा, मूक सा या यूँ कहें मूर्ख सा उसके प्रश्न का जवाब ढूंढ रहा था। 

परंतु यह सब कुछ उन्ही कुछ सेकण्ड्स में घटित हुआ। मुझे इन घटनाओे ने मेरे मस्तिष्क में उत्पन्न हुए एक-एक आवेग का अनुभव करा दिया। वो कुछ सेकण्ड्स जैसे जीवन के डिजिटल स्लाइड शो बन गए हो एक के बाद एक आज भी मैं देख सकता हूँ, अनुभव कर सकता हूँ।

कुछ दिनों बाद वही चेहरा, वही आँखें, वही बालियाँ, बस पहनावा अलग, मुख के भाव अलग, भंगिमाएं अलग मुझे अपनी ही क्लास में दिखलायी पड़ी। न जाने क्यों मैं उसके सामने आने से हिचकिचा रहा था। उस दिन पूरा नुक्कड़ नाटक देख लेने के बाद भी, इस नयी नाटकीय विधा(मेरे लिए) के तौर तरीके समझ लेने के बाद भी और यह समझ लेने के बाद भी की वह नाटक कला का ही एक अंग था मैं उस समय भी एक अपराध बोध महसूस कर रहा था। पहला वाला अपराधबोध तो मूर्खता के कारण था लेकिन उस समय जिस अपराध बोध ने मुझे घेर रखा था उसने कैसे मेरे ह्रदय में जन्म लिया उसे मैं आज भी नहीं समझ सकता। क्या सचमुच यह अपराधबोध ही था या कुछ और ही था? एक हिचक थी.. एक संकोच था.....

खैर इतना सोचते-सोचते मैं फिर उससे मुखातिब हुआ लेकिन इस बार ना कोई प्रश्न था और न ही कोई उत्तर था। लेकिन मेरे और उसके चेहरे पर एक मुस्कान थी जो उस अपराधबोध को कम कर रही थी, क्लास में शोर कम था अगर था भी तो उसका एहसास न था, खिड़की से हवाओं के साथ एक खुशबू कमरे में व्याप्त हो रही थी, स्वर होते हुए भी सब कुछ स्वरहीन सा लग रहा था।

फिर से यह सब कुछ सेकण्ड्स में ही हुआ और जीवन का एक और डिजिटल स्लाइड शो तैयार हो गया।

#ज़िंदगी#एक स्लाइडशो

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