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बनियो, बिगडियो मत
बनियो, बिगडियो मत
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© Yogesh Suhagwati Goyal

Comedy

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आम तौर पर बनियों को कंजूस और मक्खीचूस कहा जाता है | लेकिन ये बात भी सच है कि लेन देन के मामले में बनियों से ज्यादा पक्का कोई नहीं होता | हर चीज का सही मोल भाव करने में निपुणता, बनियों को इश्वर की देन है | इसीलिये कहा जाता है कि इश्वर भी जब किसी इंसान को बनियों के परिवार में जन्म देता है, तो कहता है कि बनियो, बिगडियो मत | एक बनिया पैदा ही बनने के लिये होता है | बिगड़ना उसके लिए वर्जित है | किस्मत से, मैंने भी एक व्यवसायी यानि बनिये के परिवार में जन्म लिया | ये अलग बात है कि मैंने कभी भी अपना व्यवसाय करने का विचार नहीं किया | हमेशा दूसरों के लिये ही काम करता रहा | शुरू के कुछ वर्षों को छोड़ दूं, जीवन का बड़ा हिस्सा लेन देन में ही बीता | मैंने अपनी नौकरी में काफी समय कॉन्ट्रैक्ट सम्बन्धी विभाग में काम किया | मेरे मोल भाव की क्षमता और निपुणता के बारे में, मेरे सहयोगी और मेरे बॉस भलीभांति परिचित थे |

दुबई से मार्च २००९ में नौकरी छोड़ने के बाद अपने देश वापिस आ गये और जयपुर में बस गये | आने के बाद छुट पुट काम करता रहा लेकिन कोई स्थायी काम मन को नहीं भाया | सन २०१० के आखिर में हमारे दुबई के बॉस नवलजी भी दुबई छोड़कर भारत आ गये और यहीं सूरत (गुजरात) में पानी के जहाज बनाने वाली एक कम्पनी के साथ चीफ एग्जीक्यूटिव के तौर पर जुड़ गये | उस कम्पनी के कॉन्ट्रैक्ट विभाग में किसी अनुभवी आदमी की जरूरत थी | उनको मेरा नाम याद आया और मुझसे सम्पर्क किया गया | मैं भी किसी स्थायी काम की तलाश में था | इस तरह करीब १ महीने बाद, मैं भी उस कम्पनी से जुड़ गया |

कम्पनी से जुड़ने के बाद, धीरे २ मैंने महसूस किया कि वहां ना तो कॉन्ट्रैक्ट्स को कोई गम्भीरता से लेता था और ना ही कोई उनकी अहमियत समझता था | यूं तो कम्पनी अपना सारा काम बाहर के ठेकेदारों से करवाती थी लेकिन ना तो ठेकेदार खुश थे और ना ही कम्पनी | कॉन्ट्रैक्ट्स सिर्फ एक कागज़ का टुकड़ा बनकर रह गये थे | ज्यादातर काम तय कीमत से कहीं अधिक कीमत में पूरे हो रहे थे और साथ ही सारे प्रोजेक्ट देरी से चल रहे थे | ठेकेदारों का पेमेन्ट भी तयशुदा वक़्त पर नहीं हो रहा था |

एक दिन मैंने अपने साथ काम करने वाले साथियों को एक चुटकला सुनाया |

एक बनिया अपने बेटे को मोल भाव का तरीका सिखाना चाहता था | उसने अपने बेटे को बुलाया और कहा, देखो बेटा, बाज़ार चले जाओ और एक दर्जन केले ले आओ | याद रखना, केले वाला शुरू में तुमको जो भी भाव बताये, तुम उसका आधा मोल लगाना | बेटा बाज़ार चला गया | खरीददारी का उसको कोई अनुभव नहीं था |

उसने ठेले वाले से केले का भाव पूछा |

केले वाला बोला, साहिब ४ रू. दर्जन हैं

बेटा बोला, २ रू. दर्जन दोगे ?

केले वाला बोला, अच्छा साहिब, आप साढ़े तीन रू. दर्जन ले लो |

बेटा बोला, १ रू. ७५ पैसे के दर्जन दोगे ?

केले वाला बोला, साहिब, आखिरी आप तीन रू. दर्जन ले लो, इससे कम नहीं होगा |

बेटा बोला, १ रू. ५० पैसे के दर्जन दोगे ?

केले वाला झुंझलाकर बोला, साहिब आप फ़ोकट में ले जाओ

बेटा बोला, दो दर्जन दोगे ?

ऊपरी तौर पर ये हंसने का एक बहाना था लेकिन कहीं ना कहीं इसके पीछे एक सन्देश भी छिपा हुआ था | मेरे साथी मेरा आशय कुछ २ समझ रहे थे | उसके बाद मैंने उन सबको कॉन्ट्रैक्ट्स की अहमियत के बारे में सिखाया | धीरे २ चीजें नियंत्रण में आ रही थी |

कुछ दिनों बाद हम कुछ दोस्त, जिनमें मैं, नवलजी, उनकी पत्नी प्रीती और केके, एक दिन सुबह सूरत से अहमदाबाद, अक्षरधाम मंदिर देखने निकले | रास्ते में एक जगह टोल नाके पर गाड़ी रुकी | प्रीती सड़क पर खड़े मूंगफली वाले से मूंगफली का पैकेट खरीदना चाह रही थी | नवलजी बोले, प्रीती, तुम रहने दो | गोयल खरीद देगा | तुम सिर्फ देखो। मैंने इशारे से मूंगफली बेचने वाले को पास बुलाया और पूछा, भैया ये २०० ग्राम वाला पैकेट कितने का है | वो बोला साहिब ४० रू दे देना |

मैंने कहा, २० रू. लोगे | वो बोला, साहिब ऐसा भी कहीं होता है | ४० का २० में ?

मैंने कहा तुम्हारी मर्जी | ऐसा कहकर मैं चुप बैठ गया | मूंगफली वाला मुझको देखता रहा | ड्राईवर ने जैसे ही टोल का पेमेन्ट खत्म किया और गाड़ी चलने लगी, मूंगफली वाला बोला, आप ही सही २ बता दो साहिब, क्या दोगे | मैंने कहा, २ पैकेट के ५० रू. लोगे | पहले उसने ६० रू. मांगे लेकिन फिर खुद ही ५० रू. में हाँ कर दी |

हमने ५० रू. देकर, २ पैकेट लिये और आगे चल दिये |

उसके बाद नवलजी अपने पत्नी से बोले, प्रीती, तुम २ पैकेट ८० रू. में ख़ुशी ख़ुशी खरीद लेती | लेकिन तुमने देखा, गोयल ने कैसे, वही २ पैकेट ५० रू. में लिये | उसकी मंशा कम कीमत देना नहीं है, बल्कि वाजिब कीमत चुकाकर, लुटने से बचना है भगवान बनियों से सही ही कहते हैं, बनियो, बिगडियो मत |

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