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खुशनसीब भिखारी
खुशनसीब भिखारी
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© Sunil Kumar Purohit

Drama Tragedy

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प्रशान्त ने अपने मन में उठ रही उठापटक को नियन्त्रित कर कहा, अब शान्त हो जा प्रिये, इन अश्रुओं को दो दिन के लिए विराम दे दे। कहीं तो होगी बची-खुची खुशी, ढ़ूँढ़कर बाहर निकाल अपने होंठो पर ले आ। कल भाईसाहब की बेटी का पाणिग्रहण संस्कार है। तुझे तो मालूम ही है ना, उन्होंने अपने सेवक के साथ हमें निश्चित समय पर आने के लिए मौखिक निमन्त्रण भेजा है। पत्नी के चेहरे की रंगत भाँपकर प्रशान्त ने अपने मनोभावों को नियन्त्रित कर कहा, अरे भागवान ! कुंकुम पत्रिका तो दूर के रिश्तेदारों में देते देते ही खत्म हो जाती है और हाँ हम तो एक ही खून के रिश्तेदार जो ठहरे, हमें इस औपचारिकता की कहाँ जरूरत है।

चल छोड़ ये बातें। अब तैयारियाँ करना शुरू कर। मेरी बिना जेब की पतलून और कमीज जो भाईसाहब ने पाँच वर्ष पहले ही, उनके वहाँ जब कभी कोई मंगल कार्य हो, पहनकर आने के लिए सिलवा कर दी थी, देख ले, मैली हो तो धोकर सुखा दे और अच्छी तरह से समेट कर बिस्तर के नीचे रख दे ताकि कोई सलवटें ना रह जाए वर्ना वो नाराज हो जाएँगे। तू भी वो अपने कपड़े जो सहेज कर रखे हैं, एक बार देख ले और नलिन की जीन्स, झब्बा तो भाईसाहब ने दो वर्ष पहले ही दिये हैं, ठीक ही होंगे।

और हाँ, इतनी जल्दी नहीं है क्योंकि दोपहर तीन बजे से पहले तो जाना नहीं है हमें क्योंकि भतीजी के ससुराल वाले तीन बजे ही आएँगे, तब ही तो उनसे हमारा परिचय करवाएँगे, खून का रिश्ता जो ठहरा, कोई दूर के रिश्तेदार थोड़े ही है। समाज में मेरे बड़े भाईसाहब की बहुत इज्जत है, संबंधियों को हमारे संयुक्त परिवार का परिचय तो देना होगा ना।

और हाँ, मैं तो भूल ही गया, उस सेवक ने साथ में टिफिन भी लाने का बोला था, सो वो भी ले लेना। नलिन की माँ का पारा सातवें आसमान को छू ले उससे पहले ही प्रशान्त ने अत्यन्त ही शान्त स्वर में समझाने के लहजे में कहा, अरे तू बड़ी भोली है। एक तो वहाँ जो संबंधी और भाईसाहब के यार-दोस्त जो आ रहे हैं, उनमें कई बड़े डॉक्टर, इंजिनियर, हाकिम और बड़े-बड़े अफसर लोग आएँगे। उनकी मेजबानी में हम चाचा-चाची को जी-जान से जुटना पड़ेगा। शायद तू नहीं जानती कि भाईसाहब को हमारी कितनी चिन्ता रहती है। मेजबानी करते-करते बहुत देर तो होगी ही, बस इसीलिए तो टिफिन लाने को कहा और फिर ऑटो वाले को भी जल्दी ही हमें अपने घर पहुँचाने को कह रखा है ताकि समय पर घर पहुँचकर तुम, मैं और नलिन साथ बैठकर खाना खा सके।

एकटक घूरकर देखती पत्नी को अब और चुप रखना प्रशान्त के लिए कठिन हो रहा था, आखिर कहा ,हाँ हाँ बोलो, क्या कहना है तेरे को नलिन की माँ।

हाँ, समझ गया मैं सब कुछ। हर मंगल बेला पर तेरे वे ही प्रश्न होते हैं जिन्हें मैं कोशिश कर हँसी-हँसी में आज तक टालता आया हूँ। चलो आज तुझे जिन्दा और जिन्दा से दिखने वाले लोगों में फर्क बताता हूँ।

बिना जेब की पतलून और कमीज इसलिए बनाकर दी है ताकि वो निश्चिन्त रहे क्योंकि अमीरों को डर लगा रहता है कि गरीब की जेबों में पेपर मेग्नेटिक पॉवर होती है, जो कहीं उनकी करेन्सी को खींचकर अपनी जेबों में ना भर ले और जहाँ तक टिफिन में जितना आ सके उतना डाल विदा करने के पीछे का राज तो यही है कि अगर साथ मिल कर खाना खाने बैठे और बातों-बातों में हम जैसों की जुबान फिसल जाए तो तथाकथित सभ्य समाज में उनकी ख्याति का बना महल ढ़ह ना जाये।

समझ गई ना अब। फिर तीन महीने बाद हमें ऐसे ही जिन्दा होकर चलना है। उस रिश्ते का बोझ लेकर जिसका समाज को तो मालूम है पर जिससे रिश्ता है, उनके ना चाहते हुए भी कुछ देर के लिए ढ़ोना है।

ले छोड़ अब बहुत रात हो गई, सो जाते हैं। कल से एक दिन के लिए खुशनसीब भिखारी का अभिनय जो करना है।

रिश्ते बोझ भिखारी

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