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अपूर्णता
अपूर्णता
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© Sanjeev Jaiswal

Inspirational Drama

25 Minutes   14.3K    20


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.          ‘‘हैलो, हाउ आर यू ।’’

अचानक कम्प्यूटर स्क्रीन पर ये चार शब्द उभरे, जिन्हे देख विनीता चौंक पड़ी। विनीता एक आई.ए.एस. अधिकारी थी और इस समय केन्द्र सरकार के एक सार्वजनिक उपक्रम मे परियोजना निदेशक के पद पर कार्यरत थी।

प्रारम्भ से ही विनीता की भोजनावकाश मे कार्य करने की आदत थी। उसने अपने कक्ष मे एक कंप्यूटर टर्मिनल लगवा रखा था, जो कंप्यूटर विभाग मे लगे मुख्य कंप्यूटर से जुड़ा हुआ था। दरअसल पूरा दिन लोगों से विचार-विमर्श करने, बैठकों मे भाग लेने और फ़ाइलें निबटाने मे बीत जाता था। इसलिये भोजनावकाश मे जब दूसरे अधिकारी और कर्मचारी भोजन करने के बाद गप्प मार रहे होते, तब विनीता एकाग्रचित्त होकर कंप्यूटर पर कार्य करती और परियोजना से जुड़ी रिपोर्टों और आंकड़ो का अध्ययन कर अपनी कार्ययोजना तैयार कर लेती।

इस अल्पावधि मे ही इतना कार्य हो जाता, जितना शायद पूरे कार्य-दिवस मे नहीं हो पाता, पर आज पहली बार किसी ने विनीता की एकाग्रता मे विघ्न डाला था। वो बहुत ही तेज तर्रार अधिकारी मानी जाती थी, उसके सामने तेज स्वर मे बात करने की हिम्मत किसी मे नहीं होती थी, फिर उसके कम्प्यूटर पर यह संदेश देने की गुस्ताख़ी किसने की ?

अपने कक्ष से निकल कर विनीता तेजी से मुख्य कंप्यूटर कक्ष तक आयी, पर वहां लगे सभी कंप्यूटर टर्मिनल खाली थे। उसने इधर-उधर दृष्टि दौड़ाई, पर पूरा हाल खाली था। शायद कंप्यूटर पर संदेश देने वाला उसके आने से पहले ही डर के कारण कंप्यूटर कक्ष से भाग गया था या फिर यह संदेश उसके लिये नहीं, बल्कि किसी और के लिये होगा।

विनीता चुपचाप अपने कक्ष में आकर बैठ गई। थोड़ी ही देर मे यह घटना उसके ध्यान से उतर गई और वह अपने कार्य मे पूर्ववत व्यस्त हो गयी ।

अगले दिन भोजनावकाश मे विनीता ने कंप्यूटर का स्विच खोल पहले ‘की-बोर्ड’ पर अपना पासवर्ड लिखा, फिर जैसे ही ‘की-बोर्ड’ पर उसने अपनी फाइल का नाम लिखा, स्क्रीन पर फाइल खुलने के साथ-साथ एक छोटा सा संदेश उभरा ‘‘विनी, कैसी हो तुम? भोजनावकाश में काम करने की तुम्हारी आदत अभी तक नही गई?’’

विनीता का चेहरा तमतमा उठा। कार्यालय मे उससे आंख मिला कर बात करने का भी साहस किसी मे नही था। फिर उसे ‘तुम’ और उसके घरेलू नाम ‘विनी’ से संबोधित करने का दुस्साहस कौन कर रहा था ?

वह लगभग दौड़ती हुयी कंप्यूटर कक्ष तक आयी, लेकिन कंप्यूटर कक्ष कल की ही तरह आज फिर खाली था। शायद संदेश देने वाले को मालूम था कि विनीता अगर कंप्यूटर कक्ष मे उसे रंगे हाथों पकड़ लेगी तो उसकी क्या दुर्गति करेगी ।

विनीता का मन खराब हो गया था। वह चुपचाप अपने कक्ष में आकर बैठ गई। उसके कक्ष और कंप्यूटर मे लगे सभी द्विभाषी कंप्यूटर टर्मिनल ‘वैक्स-बी’ प्रोग्राम से जुड़े थे, जिन पर एक-दूसरे को संदेश प्रेषित किये जा सकते थे। विनीता के अलावा केवल प्रबंध निदेशक/वित्त, आर. डी. कश्यप के कक्ष मे एक और टर्मिनल लगा हुआ था। कश्यप साहब इसी सप्ताह स्थानांतरित होकर यहां आये थे, पर उनसे ऐसी हरकत की उम्मीद नही की जा सकती थी। निश्चय ही यह किसी अधीनस्थ कर्मचारी की शरारत थी। उस दिन विनीता का फिर किसी कार्य में मन नही लगा ।

अगले दिन भोजानावकाश में कंप्यूटर का स्विच खोलते समय विनीता मन ही मन आशंकित थी। उसे डर था कि कहीं आज फिर कोई संदेश उसका इंतज़ार न कर रहा हो। धड़कते दिल से उसने ‘की-बोर्ड’ पर अपना ‘पासवर्ड’ लिख कर फाइल का नाम लिखा तो उसकी आशंका निर्मूल साबित हुई। स्क्रीन पर उसकी फाइल खुल गई थी। वह अपना काम करने लगी। परन्तु थोड़ी ही देर बाद स्क्रीन पर संदेश उभरा,‘‘विनी, अगर तुम मेरा परिचय जानना चाहती हो तो आज मेरी तलाश में दौड़कर अपने कक्ष से बाहर मत आना। मुझे संतोष हो गया तो थोड़ी देर मे मै कंप्यूटर पर ही अपना परिचय दे दूंगा।’’

‘ठीक है बच्चू, इंतज़ार कर लेती हूं। एक बार तुम्हारा परिचय मिल जाए, फिर तुम्हे इस गुस्ताख़ी का सबक सिखाउंगी’ विनीता ने दांत पीसते हुए मन ही मन सोचा।

कुछ देर इंतज़ार करने के पश्च्यात स्क्रीन पर पुनः संदेश उभरा - ‘‘विनी, सोचता हूं कि अपना परिचय देने के स्थान पर पहले तुमसे तुम्हारा ही परिचय करा दूं :

    

          नाम : विनीता अग्रवाल उर्फ विनी, पर पुराने दोस्तों मे विनर के नाम से मशहूर।

          उम्र : 33 वर्ष।

          लिंग: आई0ए0एस0 (पर वर्षों पूर्व यह एक लड़की हुआ करती थी)।

          शौक: 1. नया : पुरूष प्रधान समाज की अवहेलना करना, 2. पुराना - स्त्री- पुरूष - एक ही

                जीवन के दो पहलू तथा ‘सुखी गृहस्थ जीवन जैसे सामाजिक विषयों पर पत्रिकाओं में लेख लिखना।                 

         

 शिक्षा : लखीमपुर-खीरी के युवराज दत्त महाविद्यालय से स्नातक। फिर पी0सी0एस0 व

                 दो वर्षो बाद आई0ए0एस0 में चयन।’’

इसके बाद स्क्रीन पर अक्षर उभरने बंद हो गये। विनीता सोच मे पड़ गई कि आख़िर यह कौन है जो उसके बारे में इतना कुछ जानता है। उसका बायोडाटा तो कार्यालय मे उसकी फाइल से कोई भी देख सकता था, पर उसके पुराने नाम ‘विनर’ और पत्रिकाओं मे 10-12 वर्ष पहले लिखे गये लेखों के बारे मे यहां लखीमपुर से सैकड़ो किलोमीटर दूर जानने वाला कौन था ? कहीं उसका कोई पुराना सहपाठी तो नही ?

‘‘तुम्हारा सोचना ठीक है, विनी, मै तुम्हारा एक पुराना सहपाठी हूं, जिसे तुमने एक दिन कस कर डांटा था। पर तुम्हारी वह डांट मेरे लिये प्रेरणा बन गई थी और आज मै जो कुछ भी बना हूं, वो तुम्हारी प्रेरणा से ही बना हूं। इसके लिये मै तुम्हारा शुक्रगुज़ार हूं ।

आज के लिये सिर्फ इतना काफ़ी है, क्योंकि भोजनावकाश समाप्त होने वाला है। वैसे अगर तुम आई0ए0एस0 का अपना मुख़ौटा उतारकर देखोगी, तो शायद तुम्हे मेरा परिचय याद आ जाएगा।’’

इसके साथ ही स्क्रीन पर संदेश उभरने बंद हो गए। उस दिन विनीता का फिर किसी काम मे मन नही लगा।

घर आकर वह चुपचाप लेट गई। माँ ने पूछा तो उसने कहा,‘‘कुछ नहीं माँ, बस हल्की सी थकावट है।’’

माँ ने करीब आ कर प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,‘‘क्यूं इतनी मेहनत करती रहती हो। थोड़ा आराम भी किया करो।’’

विनीता के होठो पर फीकी मुस्कान आकर रह गई। कैसे बताती वह कि वर्षों से उसने अपने चारो तरफ जो एक अभेद्य कृत्रिम दीवार खड़ी कर रखी थी, किसी ने उस दीवार मे छेद कर झांकने की गुस्ताख़ी कर दी थी। उसे इस सत्य से परिचित कराने की कोशिश की थी कि वह भी कभी एक लड़की हुआ करती थी। आई0ए0एस0 के पद की जिस गरिमा को वह आज तक अपने मान-सम्मान का प्रतीक मानती रही थी, उसे किसी ने आज मुख़ौटे की संज्ञा दी थी। कौन है वह ?

वह गुस्ताख़ चाहे कोई भी हो, पर उसने आज विनीता को कुछ सोचने के लिये मजबूर कर दिया था। ख़यालों मे खोई परियोजना निदेशक के अंतरमन से निकल कर विनीता नाम की लड़की अपने छात्र जीवन मे कब पहुंच गई, उसे पता ही नही चला। अगर पता चल जाता तो क्या उसके अन्दर का आई0ए0एस0 उस लड़की को 12 वर्ष पुराना सफ़र तय करने की इजाज़त देता ?

          

विनीता ने उस वर्ष लखीमपुर के युवराज दत्त महाविद्यालय में बी0एस0सी0 प्रथम वर्ष की कक्षा में प्रवेश लिया था। इंटर तक की शिक्षा उसने राजकीय कन्या विद्यालय मे प्राप्त की थी। घर वाले अपनी लाडली को विनी कह कर पुकारते थे, पर परीक्षाओं, खेल-कूद व वाद-विवाद प्रतियोगिताओं मे हर जगह प्रथम आने के कारण वह अपनी सहेलियों के बीच ‘विनर’ के नाम से मशहूर थी।

विनीता के प्रथम आने का सिलसिला बी0एस0सी0 में आकर ठहर सा गया था। कारण था धौरहरा तहसील के एक ग्रामीण स्कूल से पढ़ कर आया छात्र रामदुलारे। अर्ध-वार्षिक परीक्षा मे उन दोनो के बराबर अंक आए थे। पहली बार किसी ने विनीता को चुनौती दी थी। इसलिये वार्षिक परीक्षाओं मे विनीता ने बहुत मेहनत की, भोजनावकाश मे भी वह अकेले ही पढ़ा करती थी, परन्तु इस बार फिर दोनो के अंक बराबर थे। संयोग की बात है कि दोनो ने वार्षिक खेल-समारोह मे छात्र और छात्राओं की प्रतिस्पर्धाओं मे अलग-अलग, प्रथम स्थान प्राप्त किया था।

रामदुलारे न सिर्फ ग्रामीण परिवेश से आया था बल्कि उसकी वेशभूषा भी वैसी ही थी। उसके बालों मे हमेशा तेल चुपड़ा रहता और वस्त्रों के रंगों मे कोई तारतम्य ही नही रहता था। किसी भी रंग की पैंट पर, किसी भी रंग की कमीज पहन लेता था। दूसरी तरफ विनीता की हमेशा से फैशन के अनुरूप सजने-संवरने की आदत थी। इसलिये जब उसकी सहेलियां रामदुलारे को उसका समकक्ष प्रतिस्पर्धी घोषित कर मज़ाक करतीं, तो उसके तन-मन में आग लग जाती।

अगले वर्ष कानपुर में आयोजित अन्तर-विश्वविद्यालय वाद-विवाद प्रतियोगिता में अपने कॉलेज का प्रतिनिधित्व करते हुये दोनो ने जब संयुक्त रूप से प्रथम स्थान प्राप्त किया था तो रामदुलारे भावुक हो उठा था। एकान्त देख कर उसने कहा,‘‘ विनी, पिछले दो वर्षों से हम दोनो हर क्षेत्र मे सफलता के पायदान पर संयुक्त रूप से खड़े हो रहे हैं। क्या हमारा यह साथ हमेशा-हमेशा के लिये नही हो सकता है ?’’

यह सुनते ही विनीता भड़क उठी थी, ‘‘तुमने शीशे में कभी अपनी शक्ल देखी है ? कपड़े पहनने तक की तमीज़ नही है और चले हो मेरा हाथ थामने ?’’

विनीता की डांट सुन रामदुलारे बुझ सा गया। उसकी आंखे छलछला आईं, उसने आहिस्ता से कहा,‘‘विनीता, तुम भी इन्सान के सिर्फ वाह्य रूप को देखती हो ? आन्तरिक प्रतिभा और गुणों का तुम्हारी दृष्टि में कोई मूल्य नही है ?’’

उसकी बात सुन विनीता का मन पश्च्याताप से भर उठा। उसे स्वयं अपने उपर शर्म आ रही थी कि आख़िर वह इतनी निष्ठुर कैसे हो गयी ? शायद इसके पीछे उस अपराजिता को हर क्षेत्र में रामदुलारे से मिल रही चुनैाती की कड़वाहट और उसे किसी तरह पछाड़ने की अतृप्त अभिलाषा ही मुख्य कारण थी। विनीता ने अपने को संयमित करते हुये कहा,‘‘मुझे गलत मत समझो। मेरा यह आशय नहीं था। लेकिन तुम्हारे घर वालों ने तुम्हे अपनी शिक्षा पूरी करने के लिये शहर भेजा है। शिक्षा पूरी करके पहले तुम कुछ बन जाओ, फिर दुनियादारी के बारे मे सोचना।’’

 रामदुलारे ने उसकी बात का कोई उत्तर नही दिया। शायद उसे वास्तविकता का अहसास हो गया था। बी0एस0सी0 अंतिम वर्ष की परीक्षा देने के बाद विनीता पी0सी0एस0 की प्रतियोगिता मे बैठी थी। इस बीच उसके पापा का स्थानांतरण झांसी हो गया था। अपने दोस्तों से बिछड़ने का गम पी0सी0एस0 की परीक्षा उत्तीर्ण करने की खुशी से कम हो गया था। दो वर्षों बाद ही उसका चयन आई0ए0एस0 मे हो गया था। उसके बाद बिल्कुल एक नई ज़िंदगी उसकी प्रतीक्षा कर रही थी। पुराने साथियों और दोस्तों से इस बीच उसका सम्पर्क बिल्कुल टूट सा गया था। सत्य तो यह था कि उसने इन सम्पर्क सूत्रों को जीवन्त रखने का प्रयास ही नही किया था। समय की लहरों पर सवार होकर वह इतनी तेजी से ऊंचाइयो पर चढ़ती चली गयी थी कि अब कोई पुराना सम्पर्क सूत्र उसकी गरिमा के अभेद्य किले को तोड़ कर उस तक पहुंचने का साहस भी नही कर सकता था। .......फिर कौन था वह दुस्साहसी......?

अगले दो दिन प्रतीक्षा में ही बीत गये । भोजनावकाश के बाद भी विनीता कंप्यूटर खोले बैठी रहती, परन्तु कोई संदेश नही आया । विनीता अपने अन्दर एक अजीब सी बेकरारी का अनुभव कर रही थी। कौन जाने, यह उसका परिचय जान कर सबक सिखाने की व्याकुलता थी या फिर अपने गर्व के दुर्गम दुर्ग पर अज्ञात दिशा से दोबारा होने वाले आक्रमण की आशंका। कुछ भी हो, पर वह निर्मोही कठपुतली का खेल बड़ी कुशलता से खेल रहा था ।

धीरे-धीरे इस बेकरारी ने बेचैनी का रूप ले लिया और उस दिन वह एक बैठक मे अपने अधीनस्थ अधिकारियों पर बुरी तरह बरस पड़ी। विनीता की ख्याति एक सख़्त मिज़ाज अधिकारी के रूप मे थी, पर वह इतनी कटु भी हो सकती है, यह स्वयं विनीता के लिये भी एक अनुभव था। अपने परिर्वतित व्यवहार पर वह स्वयं आश्चर्यचकित थी।

शाम को घर आकर वह चुपचाप लेट गई। एक घंटे बाद कुरियर सर्विस का कर्मचारी एक छोटा सा पैकेट दे गया। उस पर भेजने वाले का नाम अंकित नहीं था। विनीता ने पैकेट खोल कर देखा तो उसमे एक कंप्यूटर फ्लॉपी और एक छोटी सी पर्ची रखी हुई थी, जिस पर टाइप किया हुआ था - ‘‘विनी, इस फ्लॉपी को अपने पी.सी. पर लगा कर देखो।’’

एक अज्ञात आशंका से विनीता का दिल धड़क उठा। उसने आहिस्ता से फ्लॉपी को अपने पी.सी. (पर्सनल कंप्यूटर) पर लगाया तो स्क्रीन पर कुछ ही क्षणों बाद संदेश उभरने लगा :

‘‘विनी, क्या हो गया है तुम्हे ? ज़रा सी उथल-पुथल से ही व्यथित हो गई ? अपनी व्यक्तिगत परेशानियों का रोष अधीनस्थों पर क्यों ?

तुम भारतीय प्रशासनिक सेवा की सदस्या हो, पर अपने जीवन के प्रशासन को कुशासन मे मत परिवर्तित करो। अपने अन्तर्मन की गहराइयों मे उतर कर आत्म-मंथन करो तो तुम्हे आई0ए0एस0 की गरिमा के नीचे दबी एक असहाय नारी नज़र आएगी। क्या दोष है उसका ? सिर्फ इतना, कि कभी उसने कमरतोड़ मेहनत करके तुम्हे आई0ए0एस0 बनाया था। पर उसके प्रतिकार मे तुमने उसे क्या दिया ? अपूर्णता का अभिशाप ?

एक मंत्र देता हूं तुम्हे। प्रशासन-तंत्र के तारों को अपनी नन्ही सी मुट्ठी मे कसकर तुम जितना अधिक शक्तिशाली होती जाओगी, तुम्हारे अन्दर की यह नारी उतनी ही शक्तिहीन होती जाएगी। फिर ऐसी शक्ति का उर्पाजन क्यों ? किसके लिये ? क्या कुछ समा लेना चाहती हो अपनी इस नन्ही सी मुट्ठी मे ? क्या आसमान का एक नन्हा सा कतरा भी समा पाएगा तुम्हारी इस तथाकथित शक्तिशाली मुट्ठी में ? शायद नहीं, फिर इस सत्य को स्वीकार क्यों नही कर लेती कि प्रकृति ने तुम्हे जो जीवन दिया है, वह बहुमूल्य है ।

हो सकता है, कि तुम अपने को अपूर्ण न मानती हो, पर इस बात से इन्कार नही कर सकती कि प्रकृति ने नर और नारी को एक-दूसरे का पूरक बनाया है। हो सकता है कि तुम्हे किसी की ज़रुरत न हो, पर यह भी तो हो सकता है किसी और को तुम्हारी ज़रुरत हो।

आत्म-मंथन करो विनीता। जब तक मेरे प्रश्नो का उत्तर नही खोज लोगी, तुम्हे शांति नही मिलेगी और शांति ही मेरे प्रश्नों का समाधान है। पर शांति प्रकृति के नियमों को अस्वीकार कर, उनका तिरस्कार कर कभी नही मिल सकती।

प्रकृति के नियमों को स्वीकार करना ही पूर्णता की परिभाषा है और जीवन की अंतिम परिणति।

                                                    तुम्हारा

                                                    शुभ चिन्तक ’’

स्क्रीन पर संदेश आना समाप्त हो गया था, पर इन चन्द पंक्तियों ने विनीता की अंतरात्मा तक को झकझोर दिया था। जाने कैसा जादू था, जिसने विनीता को आत्म-मंथन के लिये विवश कर दिया।

सत्य तो यह था कि उसके अन्दर की नारी को उसके अंतरमन ने अंजाने मे नहीं, बल्कि सप्रयास इस स्थिति तक पहुंचाया था । पी0सी0एस0 मे चयन होते ही विनीता अपने आपको आम इंसानो से हट कर विशिष्ट मानने लगी थी और आई0ए0एस0 बनते ही उसे अपने सामने पूरी दुनिया बौनी प्रतीत होने लगी थी।

उसके पिता अपनी एकलौती मेधावी पुत्री के हाथ पीले करने की अभिलाषा लिये हुए परलोक सिधार गये थे और माँ के लिये सुयोग्य दामाद की तलाश आज भी एक मृग-मरीचिका थी। रिश्तों की कोई कमी न थी। एक से बढ़ कर एक रिश्ते आए थे, पर अपने से कनिष्ठ पद वाला कोई पुरूष उसके शरीर का स्पर्श करे, इस विचार मात्र से ही विनीता को वितृष्णा होने लगती थी और अपने से वरिष्ठ पद वाले के आगे झुकने और उसकी सेवा करने की इजाज़त विनीता को उसका अंह कभी नहीं देता था।

ऊहापोह के इसी भंवरजाल मे फंसी विनीता ने अपने जीवन की आवश्यकताओं की सूची से ‘वैवाहिक जीवन’ नामक शब्द को परे धकेल दिया था। ऐसा नही था कि उसने कभी शारीरिक क्षुधा का अनुभव न किया हो, पर सत्ता और शक्ति अर्जित करने की हवस के आगे अन्य प्राकृतिक क्षुधाएं गौण हो जाती हैं। यह एक ऐसी भूख है, जो संपूर्ण ब्रम्हांड को उदरस्थ करने के पश्च्यात भी अतृप्त ही रहती है।

विनीता आज तक अपने को धन, वैभव, शक्ति और सामाजिक प्रतिष्ठा से परिपूर्ण व्यक्तित्व की स्वामिनी समझती रही, परन्तु आज पहली बार किसी ने उसे अपूर्ण होने का उलाहना दिया था। ‘अपूर्ण’ शब्द किसी गंदी गाली की तरह उसकी मर्मस्थली को भेद रहा था। उसे ऐसा अनुभव हो रहा था जैसे असंख्य बिच्छू लिजलिजाते हुये उसके शरीर पर रेंग रहे हों।

नही, वह अपूर्ण नही, है। वह आज भी एक सुदर्शन देह की साम्राज्ञी है। विनीता उठ कर आदमकद आईने के सामने खड़ी हो गयी। अपने प्रतिबिम्ब को निहार वह दर्प से मुस्कुरा उठी। उसकी झील सी गहरी आखें, उमड़ते मेघों सी लहराती विपुल केशराषि, मोती सी दंत-पंक्तियां, उन्नत ललाट और सुदर्शन ग्रीवा आज भी उसे कालिदास की नायिका के समकक्ष सिद्ध कर रहे थे। हर दृष्टि और प्रत्येक कोण से वह संपूर्ण है। अपूर्णता का कहीं कोई नामोनिशान न था।

तभी अचानक बिजली चली गयी। अंधकार ने संपूर्ण वातावरण को अपनी स्याह चादर मे समेट लिया । कहीं ऐसा ही अंधकार उसके जीवन मे तो नही आ रहा ? विनीता ने सोचा, एक पल के लिये उसके ह्रदय मे कम्पन हुआ, पर अगले ही क्षण उसके अन्दर से किसी ने फन उठा कर कहा, ‘अंधकार करीब आया तो क्या ? अंधेरे को उजाले मे परिर्वतित करने की शक्ति है मुझमे।’

तभी बिजली फिर आ गयी, पूरा कमरा रोशनी से नहा उठा। विनीता अब अपने को हल्का अनुभव करने लगी थी। अपने अंदर स्फूर्ति लाने के लिये उसने अपने केशों पर हाथ फेरा तो चौंक पड़ी। काले मेघों के बीच छुप कर कौन उसे मुंह चिढ़ा रहा था ? विनीता ने ध्यान से देखा तो चांदी के तार सा चमकता हुआ सफ़ेद बाल स्वयं अपना परिचय देने का दुस्साहस कर रहा था। इस घुसपैठिये को वर्जित क्षेत्र में अनाधिकृत प्रवेश करने के अपपराध का तो दंड भोगना ही था। विनीता ने दायां हाथ बढ़ाकर उसे जड़ से उखाड़ लिया। अपनी उंगलियों मे दबे असहाय अपराधी पर एक घृणा भरी दृष्टि डाल उसने उसे उपेक्षापूर्वक कूड़ेदान मे फेंक दिया। उसे चुनौती देने वालों को वह ऐसे ही जड़ से उखाड़ कर नष्ट कर देगी। विनीता ने सोचा और अनायास ही उसके होठों पर एक मुस्कान थिरक उठी।

          ‘विनीता, अपनी इस क्षणिक सफलता पर मुस्कुराओ मत ’ तभी एक आवाज़ सुनाई पड़ी।

          ‘‘कौन है ? ’’ विनीता चौंक पड़ी।

          ‘‘तुम मुझे रक्तबीज का वंशज कह सकती हो। तुम मुझे जितना नष्ट करने की कोशिश करोगी, मेरे उतने

ही प्रतिबिम्ब तुम्हे और नज़र आएंगे।’

विनीता को लगा कि यह आवाज़ कूड़ेदान से आ रही है। उसने ध्यान से देखा लेकिन कूड़ेदान में उसके द्वारा फेंके गए सफ़ेद बाल के अतिरिक्त और कुछ न था। लेकिन निर्जीव वस्तु से तो आवाज़ नही आ सकती ? फिर कौन था, जो अपने को रक्तबीज का वंशज बता रहा था ? उसने चारो ओर दृष्टिपात किया, किन्तु कक्ष मे उसके अतिरिक्त कोई और नही था। शायद उसका वहम रहा होगा, विनीता ने ठंडी सांस भरते हुए सोचा।

अनायास ही विनीता का हाथ एक बार फिर अपने सिर पर चला गया। बिखरे हुये बालों को संवारने के लिये उसने उन्हें अपनी उंगलियों से पकड़ा ही था कि बुरी तरह चौंक पड़ी। चांदी के तार से चमकते हुए कई सफ़ेद बाल इधर-उधर छिपे हुए उसका उपहास उड़ा रहे थे। जड़ हो गयी विनीता। क्या रक्तबीज की तरह उनके इतने प्रतिरूप इसी क्षण तैयार हो गये या उनका अस्तित्व पहले से ही था या फिर उम्र ने उस अपराजिता को पराजित करने की ठान ली थी ?

काफी देर तक विनीता सुन्न सी खड़ी रही, फिर अचानक जैसे उस पर दौरा सा पड़ गया। वह एक-एक सफ़ेद बाल उखाड़ कर फेंकने लगी।

 ‘‘यह क्या कर रही हो विनीता ?’’आईने में दिखाई पड़ रहे विनीता के प्रतिबिम्ब ने उसे टोका ।

    ‘‘ये....मेरे साथ नही रह सकते। मै इन्हें नष्ट कर डालूंगी ’’ विनीता ने क्रोध से अपने जबड़े भींचे।

          ‘‘तो क्या तुम राजा ययाति की भांति चिरयौवना रहना चाहती हो ?’’

          ‘‘हां-हां मै चिरयौवना रहना चाहती हूं ’’ विनीता चीख़ सी पड़ी।

‘‘लेकिन ययाति को तो यौवन उसके पुत्र ने उपहार मे दिया था। तुम्हे कौन देगा ? तुम तो वंशहीन हो। एक दिन तुम्हारे साथ ही तुम्हारा वंश समाप्त हो जाएगा’’ प्रतिबिम्ब ने गंभीर स्वर में कहा।

          ‘‘नही, मै वंशहीन नही हो सकती ’’ विनीता ने तीव्र स्वर मे प्रतिवाद किया।

          ‘‘क्यों ? तुम तो अपनी माता-पिता की इकलौती संतान हो और अपने मे एक संपूर्ण मनुष्य, फिर भला......’’

          ‘‘हां...हां, मै एक संपूर्ण व्यक्तित्व की स्वामिनी हूं। क्या कमी है मुझमे?’’ विनीता ने लगभग चिल्लाते हुए कहा।

‘‘किसे धोखा दे रही हो तुम ? मै प्रतिबिम्ब हूं तुम्हारा, ध्यान से देखो मुझे। क्या तुम्हे मेरी मांग का सूनापन नही दिखाई पड़ रहा ? क्या तुम्हे मेरी आंखो में एक अतृप्त प्यास नज़र नही आती ? क्या मेरे कान प्यार के दो बोल और किसी की किलकारी सुनने के लिये नही तरसते ? क्या मेरा हृदय किसी और के लिये नही धड़कना चाहता ? क्या मेरी बाहें किसी और की बाहें थाम सुकून नही ढूंढना चाहतीं ? क्या मेरी कोख किसी का इंतज़ार नही कर रही ? कहां से पूर्ण हूं मै ? क्या मेरा एक-एक अंग अपनी अपूर्णता की दास्तान नही सुना रहा.....?

          ‘‘ चुप हो जाओ, भगवान के वास्ते चुप हो जाओ ’’विनीता अपने कानो पर हाथ रख चित्कार कर उठी।

          ‘‘भगवान, कौन सा भगवान ? जिसका अस्त्तिव ही नही है या अगर है भी तो जिसके बनाए सृष्टि के नियमो को

तुम तोड़ देना चाहती हो ?’’

          ‘‘तो फिर मै क्या करूं ?’’ विनीता की बेबसी उसके स्वर से झलक उठी।

‘‘अपने बहुमूल्य जीवन को अभिशप्त होने से बचा लो’’ इसके साथ ही आईने से उसका प्रतिबिम्ब अंर्तध्यान हो गया। विनीता को विश्वाश ही नही हो रहा था कि जो कुछ भी उसने अभी देखा-सुना था, वह सत्य था या मात्र उसका वहम ? जो भी हो पर वास्तविकता तो यही थी कि आज आईने ने ही उसे आईना दिखा दिया था।

पूरी रात विनीता करवटें बदलती रही, नींद उसकी आंखो से गायब हो चुकी थी। अगले दिन कार्यालय पहुंचने के थोड़ी ही देर बाद चेयरमैन ने उसे अपने कक्ष में बुलवा लिया था। प्रबंध निदेषक/ वित्त कश्यप साहब वहां पहले से ही उपस्थित थे।

          विनीता को कुर्सी पर बैठने का इशारा करते हुए चेयरमैन साहब ने पूछा,‘‘मैडम, कैसी हैं आप ?’’

          ‘‘ठीक हूं सर ’’ विनीता ने संक्षिप्त उत्तर दिया।

 ‘‘मैडम, उत्तर प्रदेश के लखीमपुर-खीरी जिले के तराई क्षेत्र मे एक जंगल है जिसे ‘दुधवा नेशनल फारेस्ट’ के नाम से जाना जाता है। इन जंगलों मे सभ्यता से दूर थारू नाम की जनजाति रहती है। विकास की किरणें अभी तक इस जनजाति तक नही पहुंच सकी हैं। थारूओं के सर्वांगीण विकास के लिये विश्व बैंक से 50 करोड़ रूपये की सहायता मिलने वाली है। मै चाहता हूं कि आप और कश्यप साहब वहां जाकर वहां की परिस्थितियों का आकलन कर एक कार्य-योजना तैयार करें’’ इतना कह कर चेयरमैन साहब एक क्षण के लिये रूके फिर बोले,‘‘आप कब तक वहां जाने की तैयारी कर सकती हैं।’’

          ‘‘मुझे कोई विशेष तैयारी नही करनी है। कश्यप साहब जब भी चलना चाहे, मै तैयार हूं ’’ विनीता ने कहा।

          ‘‘ठीक है मैडम, फिर कल प्रातः 5 बजे कार्यालय की गाड़ी से मै आपको लेने आपके घर आ जाउंगा। आप तैयार रहियेगा ’ कश्यप साहब ने सभ्रांत स्वर मे कहा।

मृदुभाषी कश्यप साहब विनीता से एक वर्ष वरिष्ठ आइ0ए0एस0 थे, विनीता की उनसे यह दूसरी मुलाकात थी। कुछ दिनों पूर्व जब उन्होंने इस कार्यालय मे कार्य-भार ग्रहण किया था, तब विनीता से उनका औपचारिक परिचय हुआ था। विनीता ने उन्हें ध्यान से देखा। उनके घुंघराले बाल, फ्रेंच कट दाढ़ी और आंखो पर सुनहरा चश्मा उनके गंभीर व सौम्य व्यक्तित्व मे एक अजीब सा आर्कषण उत्पन्न कर रहे थे।

 विनीता ने कभी सोचा भी न था कि इतने वर्षों बाद पुनः लखीमपुर जाने का अवसर मिलेगा। विद्यार्थी जीवन में वह अपने कॉलेज की तरफ से एक बार दुधवा मे बने राष्ट्रीय उद्यान मे घूमने आई थी। तब उसने अपनी सहेलियों के साथ वहां बहुत धमा- चौकड़ी मचाई थी। पर तब और अब में काफी अन्तर था। फिर भी पुरानी स्मृतियां ताज़ा हो जाने के कारण वह काफी पुलकित थी।

 दिल्ली से दुधवा तक का सफर लगभग 400 किलोमीटर का था। दोपहर बाद वे लोग वहां पहुंच पाए थे। उस दिन देर रात तक विश्व बैंक की टीम और थारू समुदाय के प्रतिनिधियों से विचार-विमर्श चलता रहा। अगला दिन भी थारूओं की बस्तियों का दौरा करने और उनके सामाजिक जीवन और रहन-सहन की परिस्थितियों का अध्ययन करने मे बीत गया। शाम होते ही विश्व बैंक की टीम आवश्यक दिशा-निर्देश देकर लौट गई। विनीता और कश्यप साहब को एक दिन और रूकना था।

वे लोग राज्य सरकार के अतिथि गृह में ठहरे हुए थे। दो दिनों की भाग- दौड़ में विनीता बुरी तरह थक गई थी। दिल्ली की अपेक्षा यहां ठंढ कुछ ज़्यादा थी। अतिथि गृह के केयरटेकर ने अलाव जलवा दिया था। अलाव के पास आराम-कुर्सी पर बैठ कर विनीता और कश्यप साहब कॉफ़ी की चुस्की ले रहे थे। केयरटेकर भी साथ बैठा हुआ था। वह स्थानीय निवासी था। अतिथि गृह से 2 किलोमीटर दूर जंगलों के बीच ही उसका गांव था। शहर जाकर उसने हाई स्कूल तक की शिक्षा ग्रहण की थी। स्थानीय परिवेश के हिसाब से उसे प्रगतिशील कहा जा सकता था। उससे बातचीत करते हुए उन्हें थारूओं के जन-जीवन और रीति रिवाज़ों के बारे मे ऐसी अनेक बातें ज्ञात हुईं जिन्हें बाहर से आये व्यक्ति के लिये जान पाना दुष्कर था।

          तभी केयरटेकर ने पूछा,‘‘मेमसाब, जानती हैं, इन थारूओं के पिछड़ेपन का सबसे बड़ा कारण क्या है ?’’

          ‘‘नहीं’’ काफी का घूंट भरते हुये विनीता बोली।

‘‘इनके समाज मे पुरूषों को हमेशा हेय दृष्टि से देखा और तिरस्कृत किया जाता रहा है। बहुत से घरों में आज भी पुरूषों का रसोई मे प्रवेश वर्जित है। स्त्रियां थाली रख कर पैर की ठोकर से रसोई से बाहर निकालती हैं, तभी पुरूष भोजन ग्रहण कर पाता है। जिस समाज मे आधी आबादी को दोयम दर्ज़े का नागरिक माना जाता हो, वहां के लोग अपनी अपमानित ज़िंदगी को ढो तो सकते हैं, पर विकास के पथ पर अग्रसर नही हो सकते। क्योंकि विकास की ललक पैदा करने के लिये जिस आत्मविश्वाश की आवश्यकता होती है, उसका ऐसे समाज मे आभाव होता है’’ केयरटेकर ने बताया।

 विनीता ने कश्यप साहब की तरफ देखा। वे कॉफ़ी की चुस्कियां लेते हुये बहुत ध्यान से चौकीदार की बातें सुन रहे थे। विनीता ने पास रखी सूखी लकड़ी से अलाव को कुरेदते हुये केयरटेकर से पूछा,‘‘लेकिन ऐसा क्यों है ?’’

अलाव की आंच काफ़ी तेज हो गई थी। केयरटेकर ने पीछे खिसकते हुए कहा,‘‘किवदंती है कि मुस्लिम शासकों ने जब राजपूताने पर आधिपत्य कर वहां की धन-संपदा को हस्तगत करना आरंभ कर दिया था, तब राजपूत रानियां अपने सतीत्व और सम्पत्ति को उनकी कुदृष्टि से बचाने हेतु अपने नौकरों के साथ जंगलों में छिप गई थीं। बाद मे राजपूत तो युद्ध मे शहीद हो गए और उनकी रानियां फिर कभी अपने घर न लौट सकीं । उनमे से कुछ ने तो खामोशी के साथ मृत्यु को स्वीकार कर लिया था, पर कुछ प्रकृति से लड़ न सकीं और समय बीतने के साथ-साथ उन्हीं नौकरों से उन्हें संतानोत्पत्ति हुई, पर अपने को श्रेष्ठ समझने की मानसिकतावश पूर्णता के समीप पहुंच कर भी वे अपूर्ण ही रहीं। उसका अभिशाप उनके वंशज आज तक भोग रहे हैं। प्रकृति ने तो स्त्री और पुरूष को एक-दूसरे का पूरक बनाया है। इस सत्य की आवश्यकता को अनुभव करके भी अपने को श्रेष्ठ समझने का जो पाप उन्होने किया था उसका दंड तो उनके समाज को भोगना ही था ’’ इतना कह कर केयरटेकर खाने का प्रबंध करने चला गया।

विनीता अवाक बैठी रही। जंगलो मे रहने वाला यह अल्पशिक्षित केयरटेकर पूर्णता और अपूर्णता की कितनी सहज व्याख्या कर गया था। तो क्या अपनी श्रेष्ठता के अभिमानवश वह भी....?’’इसके आगे उसकी सोचने समझने की शक्ति ही समाप्त हो गई।

          ‘‘क्या सोच रही हो विनीता ?’’ उसे चुप देख कर कश्यप साहब ने पूछा।

 ‘‘मै.....मै...सोच रही थी...कि’’ विनीता चाहकर भी अपनी अभिव्यक्ति को शब्दों का रूप नही दे सकी।

‘‘तुम ठीक सोच रही हो विनी, पूर्णता और अपूर्णता की जो व्याख्या जंगलों मे रहने वाले इस अल्पशिक्षित व्यक्ति ने की है, वह बिल्कुल सत्य है। इस सत्य को स्वीकार कर तुम आज भी ‘विनर’ बन सकती हो’’ कश्यप साहब ने गंभीर स्वर में कहा।

‘विनी और विनर’ यह तो उसके पुराने नाम हैं। विनीता चिहुंक सी उठी। उसने कश्यप साहब को घूरते हुये पूछा,‘‘कौन हैं आप और मेरे बारे में क्या जानते हैं ?’’

‘‘मुझे नही पहचाना तुमने ? मै हूं आर0डी0कश्यप। आर0डी0 फॉर......?’’ कश्यप साहब ने अपनी आंखो से चश्मा उतारते हुए कहा। उन्होंने जान बूझ कर वाक्य अधूरा छोड़ दिया था।

‘‘आर.....डी.....’’विनीता मन ही मन बुदबुदाई। उसे कश्यप साहब की आंखे कुछ पहचानी-पहचानी सी लगीं। अचानक जैसे कुंहासा छंट गया और तस्वीर साफ़ हो गई। वह आहिस्ता से बोली,‘‘आर0डी0.....आप कहीं मेरे बी0एस0सी0 के सहपाठी राम....’’

‘‘तुम्हारा अंदाज़ा सही है। मै तुम्हारा सहपाठी रामदुलारे कश्यप ही हूं’’ कश्यप साहब ने अपने बालों मे हाथ फेरते हुए कहा।

          ‘‘ओह, मै तो आपको पहचान ही नही पाई थी’’ विनीता ने सांस भरते हुए कहा।

          ‘‘पहचानती भी कैसे ? तुमने जिस रामदुलारे को देखा था, वह बालों मे तेल चुपड़े रहता था। उसे तो कपड़े ’

पहनने तक की तमीज नही थी।’

          ‘‘उस बात के लिये मै शर्मिन्दा हूं।’’

‘‘इसकी आवश्यकता नही है, क्योंकि तुम्हारी वह डांट ही मेरे लिये प्रेरणा स्रोत बन गई थी और मैंने कुछ बनने की ठान ली थी। तुम्हारे पी0सी0एस0 मे चयन होने के अगले वर्ष ही मेरा चयन आई0ए0एस0 मे हो गया था। उसके अगले वर्ष तुम भी आई0ए0एस0 बन गई थी। पर संकोचवश मै चाह कर भी कभी तुम्हारे पास दोबारा नही आ सका। किस्मत से जब मेरा स्थानान्तरण तुम्हारे कार्यालय मे ही हो गया, तो उस दिन तुम्हें देखते ही पुरानी यादें ताज़ा हो गईं।’’

          ‘‘तो....कंप्यूटर पर संदेश देने वाले आप ही थे ?’’

‘‘हां, तुम्हारी शांति भंग करने वाला अपराधी मै ही हूं। पर विश्वाश करो, मुझे तुम्हारा इंतज़ार आज भी है। तुम्हारे बिना मै आज भी अपूर्ण हूं।’’

‘‘अपूर्ण आप नही बल्कि अपनी अज्ञानतावश अपूर्णता का अभिशाप आज तक मै भोग रही हूं ’’ विनीता ने दर्द भरे स्वर मे कहा।

          ‘‘यह तुम कह रही हो ?’’

‘‘हां, इस सत्य को स्वीकार करने का साहस मुझमे आपने ही उत्पन्न किया है। मै बहुत थक चुकी हूं, असत्य से लड़ते-लड़ते। अपनी अपूर्णता को पूर्णता मे परिर्वतित करने के लिये मुझे आपकी सहायता की आवश्यकता है ...क्या मेरी सहायता करेगें ?’’ विनीता ने अपना हाथ कश्यप साहब की तरफ बढ़ाते हुए कहा।

    

 कश्यप साहब ने एक पल विनीता के बढ़े हुए हाथ को निहारा, फिर आगे बढ़ कर उसे थाम लिया।

 एक सुखद अहसास और तृप्ति की भावना विनीता के चेहरे पर चमक उठी।

                                                     

कंप्यूटर विभाग फाइल

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