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दो घंटों का सफर
दो घंटों का सफर
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© Gaurav Sharma

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'पत्रकारों का जीवन, जीवन नहीं, दौड़ होता है। खबरों के पीछे अंतहीन दौड़। इतनी बड़ी दुनिया है, कुछ न कुछ होता ही रहता है। कभी प्रकृति कोई गुल खिला देती है तो कभी लोग। उनकी करतूतों को सभी को बताना हमारा ही तो उत्तरदायित्व होता है।

 

एक खबर बीनी नहीं कि दूसरी तैयार होती है। एक जगह से लौटता हूँ तो दूसरी जगह के लिए रवानगी का फरमान मिल जाता है। खानाबदोश हो गया हूँ। पड़ोसी पहचानते नहीं और परिवार आखिरी साँसें ले रहा है। रश्मि का किसी और से अफेयर है। उसने नहीं बताया पर मुझे पता चल गया। मैंने पूछा भी नहीं। अब वो मेरे घर आने का इंतजार नहीं करती और न पूछती है कि मैं कहाँ जा रहा हूँ। उसकी भी क्या गलती है जब मेरे पास समय ही नहीं है उसके लिए। मेरे पास उधड़े रिश्तों को सीने  की भी फुर्सत नहीं है। मैं विचारमग्न था कि ड्राइवर ने 'डोमेस्टिक टर्मिनल' के आगे टैक्सी खड़ी कर दी।

 

मेरा पड़ाव अब बेंगलुरु था पता नहीं कितने दिन के लिए। सभी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद में प्लेन में पहुंच गया था।

अपनी सीट पर पहुँचा तो ठिठक गया। साथ वाली सीट पर एक महिला थी और मैं उस महिला को जानता था। किसी के द्वारा घूरे जाने का पता स्त्रियों को बहुत जल्दी चल जाता है। उसने मेरी ओर देखा तो उसका मुँह खुला ही रह गया। संयमित होकर मैंने पूछा, 'आप... आप शुचि सिन्हा हैं न।'

 

'अब मुझे पहचानने में भी संदेह हो रहा है तुम्हें, रजत?' वह मुस्कुरा कर बोली।

 

'संदेह नहीं है। पर पन्द्रह साल बाद अपनी भी कोई खोई चीज मिलती है न, तो उठाने से पहले सबको बताना पड़ता है कि मेरी है और तुम तो...' मैं आगे के शब्द नहीं बोल पाया। उत्साह में गलत वाक्य बोल गया था। उसकी मुस्कान भी फीकी पड़ गयी।

 

'यहीं सीट है क्या तुम्हारी?' शुचि ने पूछा।

'यदि तुम्हें आपत्ति है तो बदल लेता हूँ'

'कैसी बात कर रहे हो रजत? इससे अच्छा संयोग कुछ हो सकता है क्या?'

 

मैं हल्का सा मुस्कुराया और बैठ गया।

 

मेरे मुँह से 'कैसी हो' और उसके मुँह से 'कैसे हो ' एक साथ बाहर आए।

 

उसने होंठ भींच कर मेरी आँखों में देखा और हँस पड़ी। वो तो थोड़ा-हँस कर रुक गई लेकिन मेरे कानों में उसकी वैसी ही न जाने कितनी ही हँसीं गूँज रही थी।

 

'कोई ऐसा व्यक्ति जिसके साथ कड़वी यादें जुड़ी हों, यदि वर्तमान में मिल जाए तो पुरानी बातें न दोहरा कर नई शुरुआत करनी चाहिए, ' मेरे अन्दर कोई बोल रहा था।

 

'बातों के सिरे तो मिलाने पड़ेंगें न।' सुझाव मूक था। प्रत्युत्तर भी मूक होना चाहिए था। किंतु शायद मैं अपने आपे में नहीं था। अपने तर्क को आवाज दे बैठा। शुचि ने सुन भी लिया था।

 

'हाँ। सिरे मिलाकर गाँठ बाँध लेते पर अब कहाँ लग पायेगी गाँठ।' मैं भौचक्का सा उसे देख रहा था।

वो वैसी ही थी, पंद्रह साल पहले जैसी। मुँहफट। शरीर कुछ भर गया था बस।

 

'दो आप्शन्स हैं। या तो सिरों को पास लाकर पंद्रह साल पहले जहाँ छोड़ा था उनमें ये दो घंटे का सफर भी जोड़ देते हैं पहले की बातें याद करके।' मैं उस पर से नजरें हटा नहीं पा रहा था। 'या इन पंद्रह सालों की बात कर लेते हैं।' कहकर वो फिर से मुस्कुराने लगी।

 

मुझसे ज्यादा संयमित थी वो।

 

मेरे प्रपोज़ करने के तीन दिन बाद ही उसने मुझसे कहा था, 'प्यार कर रही हूँ पर इसके आगे कुछ उम्मीद मत लगाना। मेरे मम्मी-पापा हमारी शादी के लिए कभी तैयार नहीं होंगे।' ऐसी ही थी वो। शायद सोचती भी जबान से थी।

 

'फैसला तुम्हारा' वह बोली।

'फैसले तो तुम ही करती हो, हमेशा। आज भी तुम ही करो।'

'ये जो अतीत होता है न रजत, इस खिड़की के उस पार उड़ते बादलों जैसा होता है। हम इन्हें बस देख सकते हैं। इनमें हाथ घुमाकर इनकी आकृति नहीं बदल सकते हम'

'सही कह रही हो। मैंने कहाँ बदलने की बात की। जिंदगी पीछे जा भी नहीं सकती'

'चलो बताओ, तुम्हारा तो बहुत नाम सुनती हूँ टीवी पर, बेगम के बारे में बताओ। क्या करती हैं? कैसी हैं?'

'असिस्टेंट लेक्चरर है दिल्ली के एक कालेज में। वो अपनी जिंदगी जीती है और मैं अपनी'

'मतलब'

'महीने में  दो-चार दिन ही घर में रह पाता हूँ। शायद हम ठीक से जानते भी नहीं एक दूसरे को '

'कितने साल हो गए शादी को?'

'पाँच'

'बच्चे हैं?'

'नहीं'

'हा' उसने लंबी साँस ली और कमर को पीछे कर मुझे घूरने लगी।

'क्या हुआ? शायद सोच रही हो कि जो हुआ अच्छा हुआ। मैं बच गई।'

'नहीं। सोच रही हूँ इस सबका कारण मैं तो नहीं हूँ। तुम्हारी पत्नी ने कभी शिकायत नहीं की?'

'करती थी शुरू में। मैं मान भी लेता था। आफिस से लड़-झगड़ कर छुट्टी लेता और जैसा वो चाहती करता। धीरे-धीरे उसने शिकायत करना छोड़ दिया और मैंने छुट्टी लेना।'

 

हम कुछ पलों के लिए एक दूसरे को देखते रहे। मैं इतंजार कर रहा था कि वो कुछ और पूछेगी। न जाने क्यों, लेकिन अपने चरमराते दाम्पत्य जीवन के बारे में पहली बार किसी से बात करके अच्छा लग रहा था।

 

उसने गर्दन घुमाई और खिड़की के बाहर देखने लगी।

 

मैं कहने ही वाला था कि वो अपने बारे में बताए कि उसने सिर मेरी ओर घुमाया और बोली,'मनीष, मेरे पति, कहते हैं कि दूसरों को अपना बनाना पड़ता है। कोई दूसरा लाख चाहे हमारा बनना। जब तक हम नहीं चाहेंगे, वो हमारा नहीं बन पाएगा।' मैं उसके शब्दों को अपने भीतर दोहरा रहा था। 'वो कहते हैं जब निभाने की नियत हो तो अहम को परे रख कर रिश्तों में जुड़ना चाहिए। मेरे लिए भी बहुत मुश्किल था तुम्हें भूलना पर मनीष के साथ रह कर ये जल्दी संभव हो गया। जब मैंने उन्हें तुम्हारे बारे में बताया तो उन्होंने मुझसे पूछा था कि मैं क्या चाहती हूँ। सारी बातें सुनने के बाद उन्होंने कहा था कि प्यार की वजह से बनने वाले रिश्तों की उम्र आमतौर पर छोटी होती है पर रिश्तों की वजह से होने वाले प्यार की उम्र हमेशा लंबी होती है।'

 

उसकी बातें सुनकर लगा कि मनीष या तो कोई दार्शनिक होगा या फिर प्रवचन सुनाने वाला।

 

'प्यार को तोल नहीं सकते पर मैं भी तुमसे उतना ही प्यार करती थी जितना तुम मुझे।मनीष ने  कब मेरे दिल में जगह बना ली पता ही नहीं चला। मैं उनका बहुत सम्मान करती हूँ और प्यार भी। हम साथ बैठकर टीवी पर तुम्हारी रिपोर्ट्स देखते हैं। सराहते हैं। कभी मुझे तुम्हें खोने का अहसास नहीं होता।' मनीष को देखे बिना मुझे उससे ईर्ष्या होने लगी थी।

 

'वो मेरी आँखों में झाँकते ही जान जाते हैं कि मैं क्या सोच रही हूँ'

'और मैं हमेशा गलत अंदाजा लगाता था '

 

'मैं तुम्हारी और मनीष की तुलना नहीं कर रही हूँ, रजत और न ही यह जताना चाह रही हूँ कि मैं अपने वैवाहिक जीवन में कितनी सुखी हूँ। यह सब मैं तुम्हें इसलिए बता रही हूँ कि इन्हें अपने जीवन में लागू करके शायद तुम बिखरे को समेट सको।'

 

कुछ क्षणों के लिए हम एक दूसरे की आँखों में देखते रहे। फिर हमने नज़रें सीधी कर ली। बहुत छोटा, अपमानित और ठगा हुआ महसूस कर रहा था खुद को। इतना दुख रश्मि के अफेयर के बारे में जान कर भी नहीं हुआ था जितना यह जान कर हुआ कि शुचि के दिल में मेरे लिए अब कोई जगह नहीं है। घुटन हो रही थी। जी चाहता था कि यह सफर जल्दी खत्म हो जाए बस।

 

'बेंगलोर में कब तक हो?'

'पता नहीं। शायद एक महीना भी लग जाए'

'अरे फिर तो घर आना।' उसने अपना हैंडबैग खोला और एक बिजनेस कार्ड निकाल कर मेरी तरफ बढ़ा दिया। पता और फोन नंबर है इस पर । आना जरूर।'

 

मैंने कार्ड पढ़ा। मनीष की रियल एस्टेट कंपनी थी।

 

'मैंने तो सोचा था तुम्हारे पति दार्शनिक हैं लेकिन ये तो बिजनेस मैन निकले'

'वो जिंदगी को बहुत अच्छी तरह समझते हैं  और रिश्तों को बहुत अहमियत देते हैं। इतना बड़ा बिजनेस होते हुए भी उन्होंने मुझे कभी इग्नोर्ड महसूस नहीं होने दिया।' उसकी बात मेरे दिल में तीर की तरह चुभी। मन हुआ उड़ते प्लेन से कूद जाऊँ। मुझसे रहा नहीं गया। तुनक कर मैंने उसकी तरफ देखा और पूछा,'रश्मि को बिना जाने समझे तुमने मुझे दोषी ठहरा दिया । मेरे साथ ही क्यों अन्याय करती हो तुम हमेशा?'

 

'टीवी पर जब तुम्हें देखती थी तो खुश होती थी कि तुम एक सफल और सुखी जिंदगी जी रहो हो। तुम्हारी पर्सनल लाइफ के बारे में जानकर दुख हुआ। इसलिए जान-पहचान होने के नाते वो सब बोल दिया। तुम्हें अच्छा नहीं लगा तो माफी चाहती हूँ। अब इस बारे में हम कोई बात नहीं करेगें।' कहकर वह दूसरी ओर देखने लगी।

 

'तुम ये कैसे सोच सकती थी कि तुमसे अलग होकर मैं खुश रह सकता हूँ? मैंने तो यही सोचा था कि मुझसे अलग होकर तुम बहुत दुखी रहती होंगी', मैंने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा।

वह भी उतने ही व्यंग्यात्मक तरीके से हँसी।

 

'प्रेमी यदि मिल न पांए तो बैरी हो जाते हैं क्या?' उसने मुस्कुराते हुए मुझे देखा। 'प्यार ना, दीवार पर बालॅ मारने जैसा होता है। कोई जैसे बालॅ मारेगा, वैसे ही वह वापिस आएगी। दीवार के किसी गड्ढे में मारी जाए तो गलत दिशा में वापिस जाएगी।'

 

'मैंने शायद गड्ढे में ही मारी थी ' मेरे मुँह से निकल ही गया था लेकिन मैंने शब्दों को निगल लिया। लगभग दस मिनट का सफर शेष था और किसी बहस का अब कोई लाभ नहीं दिख रहा था।

 

'मैं जिद करके मम्मी-पापा को मना लेती शायद पर अपने घर में तुम्हें वो सम्मान नहीं दिला पाती जो तुम्हें मिलना चाहिए था। कम से कम शुरू के कुछ सालों में। और वो कुछ साल काफी होते रिश्तों में खटास लाने के लिए। उस खटास का असर हमारे संबंधों पर भी पड़ता। प्यार दो लोगों के बीच होता है, शादी नहीं।' बोल कर वह फिर बाहर देखने लगी।

 

प्लेन अब लैंड करने लगा था। उतरने से पहले शुचि ने कहा,'जानती हूँ, तुम घर नहीं आओगे। ऐसा कोई संयोग फिर हुआ तो मिलेंगे। आशा करती हूँ तब तक तुम्हारे जीवन में सब ठीक हो जाए।'

 

प्लेन से उतरकर वह मुझसे अलग चली। मैंने भी साथ-साथ चलने की कोशिश नहीं की। मेरे भीतर कुछ उफन रहा था। मन अशांत था, मुझे कटोच रहा था। खबरों के पीछे दौड़ते-दौड़ते अपनी जिंदगी की खबर लेना क्यों जरूरी नहीं समझा मैंने। मेरे और रश्मि के बीच दूरियों का कारण शुचि कभी नहीं थी। उसके जाने के दस साल बाद विवाह किया था मैंने। व्यस्त और घर से बाहर रहना मैंने खुद चुना था पहले। बाद में वो मेरी विवशता बन गयी। दूसरों को खबर देते देते मैं खुद दूसरों के लिए एक खबर बन गया।

 

बाहर आकर मैंने अपना फोन स्विच ऑन किया और रश्मि को मिलाया। ऐसा मैंने कई महीनों बाद किया था। उसने उठा भी लिया।

 

'रश्मि, ये मेरा आखिरी एसाइनमेंट है । इसके बाद मैं कहीं नहीं जाऊँगा। तुम्हारे साथ ही रहूँगा। फोन रखते ही रेसिगनेशन भेज रहा हूँ, एयरपोर्ट से ही'

'इसकी जरूरत नहीं है, रजत। बहुत देर हो चुकी है। जब तक तुम लौटोगे, मैं तुम्हारा घर छोड़ चुकी होंगी। हमेशा के लिए।' रश्मि ने जवाब दिया।

 

मैं निठाल सा वहीं बैठ गया और फफक फफककर रोने लगा। आज मेरा अतीत भी मिट गया था और वर्तमान भी।

 

 

दो घंटों का सफर

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