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चबूतरे का सच
चबूतरे का सच
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© Asha Pandey

Drama

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लगता है बैंड सिर पर बज ही जायेगा। तमाम कोशिश बेअसर हो गई। छोटी से कुछ उम्मीद बढ़ी थी उर्मिला को। किन्तु आज वो भी छिटक गई। कह रही थी,

‘‘दीदी, तुमको काकी के यहाँ रहने की जगह तो मिल ही गई है, अब इन लोगों से क्यों उलझती हो ? जेठ जी तुमको वहाँ से तो नहीं निकाल रहे हैं। सोचो, अगर जेठ जी अड़ जाएँ तो काका-काकी तुम्हें रख पाएँगे क्या ? इ़़ज्ज़त से ससुराल के घर में ही तो पड़ी हो। संतोष करो"।

                               

सपाट आवाज़ में कहे गए इन शब्दों में किसी प्रकार का अपनापन नहीं था। तो क्या अब छोटी भी यही सोचने लगी है कि पत्नी को खाने-पीने और रहने की जगह भर से संतुष्ट रहना चाहिए ! माँग के सिंदूर का बस यही सुख है ! क्या हो गया है छोटी को ! क्या बाहर के सुख और भीतर के सुख में जो महीन अंतर है, उसको समझना छोड़ दिया है उसने !

                               

उर्मिला का धैर्य टूट रहा था। पूछना चाहती थी कि देवर जी तुम्हें छोड़कर दूसरा विवाह कर लें तब क्या तुम इतनी उदार रह पाओगी कि किसी के द्वारा दी गई चंद सुविधाओं पर संतोष कर लो। पर पूछा नहीं। कितना मुश्किल होता है किसी के दुख को अपने दुख जैसा समझना।

                               

एक छोटी ही तो थी जो उससे चोरी-छिपे मिलती थी। उसके ज़ख़्म को सहलाती थी। ख़ामोश और अँधेरी रातों में भी वह अकेली नहीं है, यह अहसास दिलाती थी। कितनी बार चुपके-से काकी के घर आकर बोल जाती थी कि, दीदी तुम हिम्मत रखना, जेठ जी का दूसरा ब्याह मैं नहीं होने दूँगी। लगी हूँ कोशिश मे। क्या हो गया उसकी कोशिश को ? जानती थी उर्मिला, छोटी के लिए यह सरल नहीं था किन्तु इतना कठोर क्यों हुई ? कम से कम शब्दों का ही सहारा देती। इतना सपाट क्यों बोली आज ! क्या पल्लू झाड़ लेना चाहती है उससे ? छोटी करे भी क्या ? इस घर के बाहरी और भीतरी कायदे को तो उर्मिला भी जानती है। कई वर्षों तक सास के कहे-अनकहे भावों को पढ़ती रही है वह। पति के पोर-पोर से परिचित है। यहाँ विरोध का एक भी शब्द सहा नहीं जाता। इस घर में पूरे अधिकार के साथ जमे रहने का गूढ़ मंत्र छोटी को समझ में आ गया लगता है।

                               

हृदय में लावा-सा फूटा। एक वर्ष बीत गया इस प्रयास में कि रघुबीर का दूसरा विवाह न होने पाए। ससुर से अपनी कमियों को जानना चाहा। सास के आगे गिडगिडाई। कई बार रघुबीर से मिलने का प्रयास किया। सप्तपदी के श्लोक और अग्नि के फेरे कोई खेल नहीं होते कि उन्हें एक मन से बोला जाए, दूसरे मन से भुला दिया जाए। रघुबीर को सोचना पड़ेगा। उर्मिला मजबूर करेगी उसे सोचने के लिए। पर क्या कर पाई ? सारे प्रयास रेगिस्तान में मोती खोजने जैसे साबित हुए।

                               

काका ससुर के यहाँ रहने की जगह मिल गई है। वहाँ से बस इतनी ही उम्मीद है। वो भाई के घरेलू मामलों में उलझना नहीं चाहते थे। गाहे-बगाहे उसे ही समझाते हैं,

‘‘क्या कमी है मेरे घर में, यही पडी रहो।"

काकी कुछ उदाहरणों द्वारा अपने घर में मिलने वाले सुख को गिनाने लगती हैं । उर्मिला दुखी हो जाती है। सोचती है, कैसे कहे कि दया में मिलने वाले ये सुख प्रतिपल उसकी निस्सहाय अवस्था की याद दिलाते रहते हैं। पर इन लोगों को क्या कहे जब अपना ही सिक्का खोटा हो।

                 

वर्षों से उपेक्षा सहते-सहते उर्मिला की आँखें पथरा गई थीं। रोना छोड दिया था उसन। कठोर बने रहने का स्वाँग रचती रही अब तक। किन्तु आज छोटी के पास से लौटने के बाद वह एकदम टूट गई। हृदय में न जाने कैसा सागर उमडा कि आँखें लबालब छलक आर्इं।

                               

कब पडने लगी थी दरार और वह यूँ घर से बेदखल कर दी गई थी, उर्मिला ने सोचना शुरू किया। कुछ बातें जो बहुओं के हुनर में कशीदा-सी मढ जाती हैं वही इस घर में दोष साबित हो गर्इं।

                               

उन दिनों गाँव तो क्या शहरों में भी लडकियों की पढाई-लिखाई की तरफ कोई अधिक ध्यान नहीं देता था, उर्मिला ने अपने पिता से अक्षर-ज्ञान प्राप्त कर लिया था और रामचरितमानस, दुर्गा चालीसा, सप्तशती आदि पुस्तकें बाँचने लगी थी। पिता ने दहेज मे झबिया, संदूक, पिटारी, पलंग आदि चीज़ों के साथ दो-चार धार्मिक पुस्तकें भी दे दीं। यही वजह थी कि उर्मिला ससुराल में भी कुछ देर के लिए पुस्तकों को फैलाकर बैठ जाती थी।

                               

एक दिन सेठ रतन सिंह, जिन्हें इस बात का गर्व था कि उनकी बहू रामायण, गीता आदि पढ लेती है, आँगन में आकर बोले, ‘‘सुना है बहू रामायण का पाठ अच्छा करती है, जरा मुझे भी सुनाती। घर में ससुर के सामने हाथ भर घूँघट में रहने का रिवाज़ था। उर्मिला सामने नहीं आई किन्तु दरवाज़े की ओट से मानस की कुछ चौपाइयाँ सस्वर सुना दी । रतनसिंह गद्गद् हो गए। सुर, उच्चारण, भक्तिभाव और तल्लीनता की मुक्त कंठ से प्रशंसा कर दिये। सास की भृकुटी तन गई। ससुर के जरा-सा कहने पर बहू ने किस बेशर्मी से गा-गाकर रामायण सुना दी, यह बात बेटे समेत घर के अन्य सदस्यों तक पहुँच गई।

                               

शक्की मिज़ाज का रघुबीर, जिसे पहले भी पत्नी में कोई खास रुचि नहीं थी, तनकर खडा हो गया। सेठ परिवार का गाँव में खूब दबदबा था। रघुबीर का मानना था कि ऐसे घर की बहुओं को दबकर रहना चाहिए नहीं तो गाँव भर में घर-परिवार की नाक कट जाती है। उर्मिला सोचती, कुछ परिवारों की नाक इतनी नाजुक क्यों होती है कि बहू के ज़रा-सा बोलने या घूँघट हट जाने भर से कट जाती है। वह लाख कोशिश करती किन्तु जहाँ सिर झुकाकर ज़रूरी,ग़ैर -ज़रूरी, उचित-अनुचित को मान लेना ही क़ायदा था, वहाँ उर्मिला कैंची की तरह ज़बान चलाने वाली मनबढी औरत साबित हो गई थी।

                               

सात पुश्तों को बखानती सास की गालियाँ सुन-सुनकर उसका मन छलनी हो चुका था। पति का मिज़ाज भी गर्म ही रहता। सेठ रतनसिंह का दबदबा बाहर चाहे जितना रहा हो, घर की चारदीवारी के अंदर उनकी एक न चलती।

                               

इधर उर्मिला में एक अवगुण और समा गया। शादी को पाँच वर्ष हो गए किन्तु वह सास को दादी नहीं बना पाई। गाँव में इससे बाद आई बहुओं ने अपने-अपने घरों को किलकारियों से भर दिया। अब सास की इच्छा थी कि बेटे का दूसरा विवाह कर दिया जाए किन्तु, उर्मिला घर से हटने को तैयार नहीं थी।

                              

सेठ रतन सिंह कुछ दिनों के लिए कहीं बाहर गए थे। एक दिन सास ने उर्मिला को सुनाते हुए बेटे से कहा,

"रघुबीर, बहुत दिनों से बहू कहीं गई नहीं है। उसका मन भी बाहर घूमने-फिरने को करता होगा। कहीं और नहीं तो जाकर गंगा स्नान ही करा लाओ।"

माँ के कहने और बेटे के मान लेने में जो प्यार झलक रहा था वह उर्मिला के लिए सातवें आश्चर्य से कम नहीं था। उसे थोडी शंका हुई। वह रघुबीर से पूछना चाहती थी कि मुझमें आज ऐसी कौन-सी अच्छाई उपज आई जो आप लोग इतना प्यार उँडेल रहे हैं। पर हाथ में आई खुशी के पल की शुरुआत नोक-झोंक से क्यों हो, यह सोच चुप रह गई।

                               

सुबह तडके घर से निकलने के बाद भी संगम तट पर पहुँचते-पहुँचते खासी दोपहर हो गई थी। सूर्य की किरणों से गंगा का जल चमक रहा था। ध्यान से देखने पर जल में हल्की लहर-सी उठती दिख रही थी। ऐसी ही एक खुशी की लहर उर्मिला के हृदय में भी उठ रही थी। अपने पति में आए इस बदलाव के लिए उर्मिला माँ गंगा के प्रति कृतज्ञ हो रही थी और इस प्रेम को सदा बनाए रखने के लिए प्रार्थना कर रही थी। प्रार्थना रघुबीर भी कर रहे थे पर उनकी प्रार्थना संबंधों के बने रहने की थी या कुछ और, यह तो वही जानें।

                               

उर्मिला को कुछ अक्षर ज्ञान जरूर था किन्तु थी वह गाँव की ही। कुछ सपने, कुछ प्यार, कुछ विश्वास और ढेरों भोलापन लिए वह पति के साथ निकल पडी थी। गंगा मइया के दर्शन से वह धन्य हो गई थी। रघुबीर उसे घुमाते-फिराते, उसके विश्वास को जीतते, आराम से आगे बढ रहे थे। शाम धुँधला रही थी किन्तु उन्हें कोई जल्दी नहीं थी और जब पति साथ में है तो उर्मिला को भी शाम होने या रात के आने की चिंता नहीं थी। दर्शन आदि के बाद जब रघुबीर उर्मिला को लेकर बाँध पर आकर खडे हुए तब शाम गहराकर रात में तब्दील हो रही थी। बाँध पर बने एकाध छोटे-मोटे मंदिरों के सामने कुछ पुरुष मंडली बैठी थी जिनमें अधिकांश तो पंडे थे, कुछेक मल्लाह भी थे। थोडी दूर पर गाँजा पीते हुए साधुओं का झुंड भी था। साधुओं के पास ही कुछ लडके ताश खेल रहे थे। पूजा सामग्री आदि बेचने की जो दो-चार दुकानें आस-पास थीं। वे भी समेटी जा रहीं थीं। रघुबीरसिंह ने उर्मिला से कहा,

‘‘आज हम लोग यहीं रुकेंगे कल इलाहाबाद शहर घूमकर फिर चलेंग।

                                

‘‘लेकिन रुकेंगे कहाँ ?"

- उर्मिला ने शंका व्यक्त की।

                               

"तुम चिंता मत करो, मैं कुछ व्यवस्था करता हूँ।"

चारों तरफ़ नज़र दौडाकर रघुबीरसिंह ने कहा,

"यहाँ इस मंदिर के पीछे बाँध से थोडा नीचे शायद एक धर्मशाला है। तुम यहीं रुको मैं पता करके आता हूँ।"

आठ-दस क़दम आगे बढकर रघुबीरसिंह अचानक फिर लौट पडे। धीरे-से पत्नी के कान में कुछ बोले। उर्मिला ने गले की चेन, कान के बुंदे आदि जो कुछ भी आभूषण शरीर पर था, उन्हें उतारकर पति के हवाले कर दिया।

                               

रघुबीरसिंह धर्मशाला का पता लगाने बाँध से नीचे उतरे। उर्मिला वहीं खडी पति का इंतज़ार करने लगी। समय बीतने लगा। आस-पास के पुरुषों की नज़रें उर्मिला पर ठहरने लगीं। उर्मिला कुछ भयभीत हुई। अब तक शहर की तमाम बत्तियाँ टिमटिमा गई थीं। जलती बत्तियों से पता चला कि वहाँ से कुछ दूरी पर बाँध के दाहिनी तरफ कोई मुहल्ला है। सामने एक डेढ किलोमीटर का सुनसान मैदान है। मैदान के उस पार से शहर शुरू होता है । उर्मिला ने बाँध से पीछे मुडकर देखा, पीछे दूर तक घनघोर अँधेरा! इसी अँधेरे के बीच कहीं माँ गंगा की धारा होगी किंतु उस समय कुछ भी अंदाज लगाना मुश्किल हो रहा था। बाँध पर बत्तियाँ नहीं थीं। चिमनी, लैंप, लालटेन का सहारा था।

                               

उर्मिला के मन में भयानक आशंका घर बना रही थी किन्तु उस स्थिति में भी तमाम तरह के तर्क मन में उठ रहे थे जो रघुबीरसिंह को किसी मुसीबत में फँसा हुआ सोचने पर मजबूर कर रहे थे। धोखा होने की प्रबल संभावना के बाद भी उर्मिला का नारी मन रघुबीर सिंह का इंतज़ार करने पर ही अडा रहा। घंटों इंतज़ार के बाद भी रघुबीरसिंह नहीं लौटे। जिस यात्रा की शुरुआत ने उसके खाली आँचल में ख़ुशियाँ भर दी थीं उसका अंत इतना दयनीय और त्रासद होगा, इसका उसे अंदाज़ा भी नहीं था।

                               

उर्मिला जहाँ खडी थी उसके ठीक सामने एक छोटा-सा मंदिर था। वहाँ एक वृद्ध पुजारी बैठे थे। न जाने कैसे उर्मिला को आशा की एक किरण दिखी। वह साहस करके मंदिर में गई और बाबा को प्रणाम करके उनके पास ही बैठ गई। बाबा ने आशीर्वाद की मुद्रा में हाथ उठाया तो उर्मिला रो पडी तथा सारी स्थिति बयान कर दी।

                               

गाँव की किसी बेशऊर लडकी (उर्मिला के बारे में रघुबीरसिंह का यही ख़याल था) को घर से सत्तर किलोमीटर दूर रात के अँधेरे में छोड आने के बाद रघुबीरसिंह निश्चिंत थे। उर्मिला के लौट आने की कोई संभावना नहीं थी। मर-खप जाएगी कहीं या पंडों के साथ बैठ कर घाट पर चंदन घिसेगी। क्योंकि रघुबीरसिंह ने पैसे आदि तो दूर शरीर पर के गहने तक उतरवा लिए थे और अपनी इस कामयाबी पर खुश थे। गाँव भर में ख़बर फैला दिये कि बडी भीड थी संगम पर, नदी में उतरी तो साथ पर न जाने डुबकी लेते ही नदी में समा गई या भीड-भाड का फ़ायदा उठाकर कहीं चली गई । बदचलन का क्या भरोसा । मैं अपने स्नान-ध्यान में लगा था, थोडी देर बाद जब मेरा ध्यान गया तो उसका कहीं पता ही नहीं। बहुत खोजा, फिर मन मारकर लौट आया।

                               

किन्तु रघुबीर सिंह की खुशी को गहरा धक्का तब लगा जब दूसरे दिन शाम तक किसी अनहोनी की तरह उर्मिला दरवाज़े पर प्रकट हो गई। रघुबीरसिंह भौचक्के रह गए किंतु , सास अकडकर खडी हो गई। रात कहीं और बिताकर आने के बाद अब उस दुश्चरित्रा का घर में प्रवेश निषिद्ध था।

                               

उर्मिला की अर्धवयस्क चेतना चीत्कार कर उठी, नसें विरोध में तन गर्इं। मन में आया कि, चिल्ला-चिल्ला कर कहे कि अगर दंड देना ही है तो अपने बेटे को दो जो मुझे असहाय छोडकर भाग आया था। पूछे कि, उस समय आप लोगों का स्वाभिमान कहाँ चला गया था ? वह तो भला हो पुजारी बाबा का, जो आज मैं सकुशल आपके दरवाजे पर खडी हूँ। किंतु वह चुप रह गई। जानती है, यहाँ सब उसे घर से निकालने पर ही तुले हैं जो वह नहीं होने देगी। पहले थोडा रोष, थोडा अधिकार दिखाने के बाद अंत में तमाम तरह की बिनती के बाद भी उर्मिला के लिए घर का दरवाज़ा नहीं खुला।

                               

उर्मिला उस समय की ग्रामीण महिलाओं की तरह ही डर, भय, लज्जा, संकोच से लबालब भरी होकर भी अपनी आंतरिक चुभन और कसक के कारण उन सबसे थोडी अलग साबित होती थी। डर, भय, लाज को त्याग अन्याय के विरोध में खडी होने का साहस था उसमें। पूरी रात उसने भौंकते कुत्तों के बीच बाहर बैठ कर बिता दी किंतु अडोस-पडोस से आश्रय माँगने नहीं गई।

                               

दूसरे दिन सुबह रघुबीरसिंह की काकी अपनी जेठानी को भला-बुरा सुनाती हुई उर्मिला को अपन घर ले जाने आई। उर्मिला ने प्रतिकार किया,

"अगर घर में प्रवेश दिलाना ही है तो इस घर में दिलाओ जहाँ मैं ब्याह कर आई हूँ, कहीं और मैं नहीं जाऊँगी।'

किंतु , जब उसके काका ससुर भी उसे समझाने लगे तब वह कुछ नहीं बोल पाई और उनका सम्मान करती हुई उनके घर चली गई।

                               

उर्मिला रघुबीरसिंह के दूसरे विवाह को रोक नहीं पाई। दिन-दिन भर खटते हुए और रात-रात भर जगकर उलझे विचारों को सुलझाते हुए उर्मिला ने दो वर्ष और बिता दिए। वह काली भयानक रात, जब रघुबीरसिंह का दूसरा विवाह हुआ, न जाने कैसे उर्मिला की हर रात में मिल जाती। न सिर्फ़ इन बीतती रातों में बल्कि उर्मिला के विवाह की रात में भी। वैसे ही वेद मंत्रों के बीच पवित्र वचनों को दोहराया होगा रघुबीरसिंह ने ! वैसे ही फेरे.... सिंदूरदान.... उर्मिला अपमान से तिलमिला जाती। आक्रोश में उठकर बिस्तर पर बैठती किंतु फिर स्वयं ही संयत होकर आसानी से न आने वाली नींद का इंतज़ार करती। सोचती, क्यों पडी है यहाँ ? क्या अब भी उसे उम्मीद है कि रघुबीरसिंह अपने रूखेपन पर पछताकर किसी दिन आएगा और अपनी गलती स्वीकार करेगा। सिर्फ इस एक वाक्य को रघुबीरसिंह के मुख से सुनने की इतनी ललक ! क्या रघुबीरसिंह के ग़लती स्वीकार कर लेने भर से वह उसे माफ़ कर देगी। उर्मिला की आँखों में रघुबीरसिंह का इंतज़ार ठहर-सा गया है।

                               

पिता कई बार लेने आए पर वह नहीं गई। कुछ है जो उसे यहाँ रोकता है। शायद कुछ स्वप्न, कुछ इच्छाएँ, कुछ उम्मीदें और सबसे बढकर शायद उसका अपना स्वाभिमान।

                               

इन बीते सालों ने उसकी तमाम इच्छाओं को निगल लिया। कई-कई दिन तक वह सिर में कंघी नहीं करती थी , शीशा नहीं देखती थी, सिंदूर काजल को याद नहीं करती थी । अव्वल दर्जे की देहाती तथा दकियानूसी पंरपराओं में जकडी महिलाओं के बीच थोडी सजग, संवेदनशील उर्मिला ‘पगली’ की उपाधि से विभूषित हो गई। कब और कैसे यह उपनाम चिपका, यह तो उसे ठीक-ठीक याद नहीं किंतु अब वह बडों के लिए सिर्फ ‘पगली’ और छोटों के लिए ‘पगली काकी’ को गई थी।

                               

घर के सामने मीठे पानी का एक कुआँ था। आधा गाँव उसी कुएँ के सहारे अपनी प्यास बुझाता था। उर्मिला भी सुबह-शाम पानी लेने कुएँ पर जाती थी। जब कुएँ पर अधिक भीड रहती तब वह पास ही पीपल के पेड के नीचे बैठ जाती। इस बीच अगर बिहारी कुएँ पर होता तो उर्मिला की बाल्टियों को भर देता। उर्मिला पानी खींचने के झंझट से बच जाती। यह सिलसिला उर्मिला के रिक्त और भावशून्य चेहरे के साथ वर्षों से चलता रहा था। किंतु एक दिन, उर्मिला जब कुएँ से पानी खींच रही थी, बिहारी भी वहाँ आ गया और उसके हाथ से रस्सी पकड कर पानी खींचने लगा। उर्मिला ने बिहारी को देखा। उसकी आँखों में गहरा अपनापन देखकर उर्मिला के शरीर में अज़ीब -सा रोमांच उठा और न जाने कैसे ....उसकी रिक्त आँखे बोलने -सी लगीं। उसे आश्चर्य हुआ कि इतने दिनों से पत्थर बना उसका दिल आज मोम की तरह पिघल क्यों रहा है ? वर्षों से सदा एक ही ऱ़फ्तार में चलने वाली साँस इतनी गहरी होकर हृदय में मीठी टीस क्यों छोड रही है ? बाल्टी भर गई थी। उर्मिला ने एक बार फिर बिहारी को देखा, बाल्टी उठाई और चुपचाप घर आ गई।

                               

अब उसका पोर-पोर एक अजीब तरह के मिठास में डूबा रहता था। वर्षों से कोने में बंद पडी उपेक्षित शृंगार पिटारी खुल गई तथा तेल, कंघी, बिंदी, काजल आदि निकलने लगे। काकी सास तिरछी नज़र से देख कर मुस्कुरा देती। उर्मिला लज्जा से धँस जाती। शृंगार पिटारी को फिर से कोने में पटक कर अपना रूप बिगाड कर सपाट चेहरे में रहने की सोचती। किंतु वह जितना पीछे जाना चाहती, हृदय में धधकती आग उसे उतना ही आगे खींचती।

                               

उर्मिला सोचती, बिहारी बाल्टियाँ ही तो भरता है और वह उसे नज़र भर देख लेती है। बस इतने भर से उसमें इतना परिवर्तन कैसे आ गया है। उसकी नीरस दिनचर्या इतनी बदल कैसे गई। उर्मिला के मन में युद्ध चल रहा है, जिसमें वह हार रही है। वह हारना ही तो नहीं चाहती। कह देगी बिहारी से, नहीं भरा करे उसकी बाल्टी। क्या समझ रखा है उसने ? पति द्वारा छोडी गई औरत इतनी भी कमज़ोर नहीं होती कि हर कोई हमदर्दी दिखाकर भुनाना चाहे।

                               

उलझ गई है उर्मिला। इस स्थिति से दूर रहने का वह जितना प्रयास करती उतना ही उसकी गिऱ़फ्त में फँसती जा रही थी।

                               

उर्मिला में आए इस बदलाव को टटोलने के लिए घर में भी खुसर-फुसर शुरु हो गई थी। रघुबीरसिंह भी, जिसे उर्मिला की किसी भी इच्छा, किसी भी भावना, किसी भी चाह की कभी कोई परवाह नहीं रही, उसकी अनुराग भरी नज़रों की जिसने सिरे से उपेक्षा की, पग-पग टूटती उर्मिला को देखते हुए भी जिसने अनदेखा किया, अब उसके हृदय में उमडने वाली इस बारीक लहर के प्रति सचेत हो गया था।

                               

एक शाम जब उर्मिला खाली बाल्टी लिए पीपल के पेड के नीचे बैठी थी, रघुबीरसिंह धडधडाते हुए वहाँ पहुँच गया। देखते ही उर्मिला का दिल धक-सा हो गया। वह अपनी जगह से उठ कर खडी हो गई। रघुबीरसिंह गरजा,

‘‘क्यों, डरकर खडी क्यों हो गई ? चोरी पकडी गई इसलिए ?"

उर्मिला को शब्द तीर की तरह चुभे किंतु दर्द को अंदर ही अंदर पीते हुए बडी निडर आवाज़ में उसने पूछा,

‘‘कैसी चोरी ?”

                               

‘‘खाली बाल्टी लिए यार के इंतज़ार में बैठी हो, पूछ रही हो कैसी चोरी !"

                               

‘‘खबरदार, ज़बान सँभालकर बात करो। मैं किसी का भी इंतज़ार करूँ, तुमसे मतलब ?”

रघुबीरसिंह को उर्मिला के इस तेवर की उम्मीद नहीं थी। स्तब्ध रह गए। आवाज़ धीमी हो गई। बोले,

"मुझे तुमसे कुछ मतलब नहीं है, किंतु ध्यान से सुन लो, यहाँ आँख लडाई नहीं चलेगी। जीते जी मैं अपने घर-परिवार की बदनामी नहीं होने दूँगा।"

                               

उर्मिला फुफकार उठी,

"चुप्प, मैं कहती हूँ बिलकुल चुप्प !... बदनामी की फ़िक्र तुम्हें हो गई ? तुम्हें ?.... गिद्धों के बीच जब मुझे छोड आए थे तब नहीं हुई तुम्हारी बदनामी ? सालों से दूसरों के घर की चाकरी कर रही हूँ , तब नहीं होती तुम्हारी बदनामी ?... तुम कौन होते हो मुझे रोकने वाले ? छोड चुके हो मुझे। दूसरी शादी कर चुके हो। किस रिश्ते से अधिकार जमा रहे हो ? मैं क्या करती हूँ, क्या नहीं करती हूँ, इसका हिसाब तुम रखोगे ? तुम... ? मुझमें क्या सोचने समझने की शक्ति नहीं है ?”

उर्मिला के चेहरे का रंग हाव-भाव सब कुछ बदल गया। आक्रोश में वह तमतमा रही थी। रघुबीरसिंह भौचक्के खडे उर्मिला को बस देखते रह गए थे। उर्मिला चीखी,

‘‘देख क्या रहे हो, जाओ अपनी बहुरिया के संग रंगरलियाँ मनाओ। मेरी चिंता छोड दो। तुम जैसी बद्जात नहीं हूँ मैं । अच्छे-बुरे की समझ है मुझमें।"

उर्मिला क्रोध में काँप रही थी। रघुबीरसिंह का चेहरा अपमान से झुक गया था। चारों तरफ देखकर वह आश्वस्त हुए कि इस स्थिति में उन्हें कोई देख तो नहीं रहा है। फिर एक क्रूर नज़र उर्मिला पर डालकर वहाँ से चले गए।

                               

उर्मिला फिर उसी स्थान पर बैठ गई। पेड़ पर बैठे कौवे काँव-काँव का शोर मचा रहे थे किंतु उर्मिला के मन में उठा तूफ़ान कौवों के शोर से कई गुना अधिक था। वह उसी तूफ़ान में डूबती-उतराती बैठी रही। होश उसे तब आया जब बिहारी ने उसकी बाल्टियों को भर कर उसके सामने रख दिया। उर्मिला हडबडाकर खडी हो गई। बीते पल से निकलना इतना आसान नहीं था। बेजान हाथों से बाल्टी उठाकर वह घर आ गई।

                               

रात आधी से अधिक बीत चुकी थी किं तु, रघुबीरसिंह बिस्तर पर करवटें ही बदल रहे थे। अपमान का दंश उन्हें सोने नहीं दे रहा था। एक मामूली-सी औरत उनको इस तरह जवाब दे ! औकात क्या है उसकी ?लेकिन ज़रा ज़बान तो देखो, कैंची की तरह तेज़ ! उनके सीने पर चढकर उनकी आँखों के सामने वह दूसरे से इश्क लडाएगी और रघुबीर सिंह बैठे तमाशा देखेंगे। ऐसा नहीं होगा।

                               

वातावरण में गर्मी नहीं थी किंतु, रघुबीरसिंह पसीने से लथपथ हो गए। उर्मिला ने जो विष दिया था वह चढता ही जा रहा था। उधर उर्मिला उस रात वर्षों बाद सुख की नींद सोई।

                               

एक दिन उर्मिला जब घर के कामों से निपट कर कंघी कर रही थी, तब उसकी काकी सास ने आकर बताया कि रघुबीर ने आज बिहारी को बहुत मारा। बिहारी उठ नहीं पा रहा है। लगता है कि उसके पैर टूट गए। उर्मिला के हाथ से कंघी गिर गई। रघुबीरसिंह चुप नहीं बैठेंगे, इसका पूर्वाभास था उसे किन्तु , इस प्रकार बदला लेंगे यह तो उसने सोचा ही नहीं था। दो बाल्टी पानी भर देने की ये सज़ा मिली बिहारी को !

                               

अब उर्मिला ने कुएँ पर जाना बंद कर दिया। उडती ख़बरें उसके पास तक पहुँचती-बिहारी को अस्पताल ले जाया गया, घर वाले थाना-पुलिस करना चाहते थे किंतु बिहारी ने मना कर दिया। बिहारी का एक पैर आधा काटना पडा, बिहारी रघुबीरसिंह के घर चोरी के इरादे से घुसा था इसलिए रघुबीरसिंह ने उसे मारा, आदि-आदि।

                               

उर्मिला को फिर एक लंबे मौन और उदासी ने घेर लिया। अब उसका मन यहाँ नहीं लग रहा था, उसने गाँव छोड देने का निश्चय किया।

                               

एक दिन जेठ की तपती दोपहर में जब घर के सब लोग झपकियाँ ले रहे थे, उर्मिला किसी काम के बहाने बाहर निकली। कुएँ के पास आकर क्षण भर को ठिठकी। पीपल के पेड और कुएँ को उसने नज़र भरकर देखा। बिहारी की याद आई, देखने की इच्छा भी हुई| किंतु मन मसोसकर वह आगे बढ गई।

 

                               

शाम तक पूरे गाँव में उर्मिला के घर से ग़ायब होने की ख़बर फैल गई। आस-पास खोजा गया। कुएँ, तालाब में झाँका गया पर उर्मिला नहीं मिली। रघुबीरसिंह खुश थे। अन्य किसी को भी अधिक खोजबीन करने की जरूरत महसूस नहीं हुई। दो-चार महीने बाद कहीं से ख़बर आई कि उर्मिला अपनी बडी बहन के घर चली गई है। फिर कुछ सालों बाद ख़बर आई कि उर्मिला ने कुएँ में छलाँग लगा दी।

                               

‘‘सती थी उर्मिला सती !

                             

‘‘कहते हैं जीजा की नीयत ठीक नहीं थी। जान दे दी उर्मिला ने किंतु इ़़ज्ज़त पर आँच नहीं आने दी।"

                               

"कुल बहू थी कुल की परंपरा को निभाया।"

                               

‘‘पति ने छोड दिया किंतु वह पतिव्रता ही बनी रही।“

                              

 ‘‘अमर हो गई।"

                               

‘‘देवी हो गई।"

                               

जितने लोग उतनी बातें।

                              

पतिव्रता, देवी आदि शब्द सुन-सुनकर रघुबीरसिंह को ख़ानदान का नाम अमर कर देने की युक्ति सूझी। प्रचार शुरू हुआ कि उर्मिला रघुबीरसिंह समेत परिवार के अन्य सदस्यों के सपने में आती है। परिवार की तमाम मुसीबतें दूर हो रही हैं। रघुबीर की माँ को स्वप्न आया कि उर्मिला पीपल के पेड के नीचे वास करना चाहती है। रघुबीरसिंह जुट गए इच्छा पूर्ति करने में। पेड के नीचे चबूतरा बनना शुरू हुआ। चबूतरे पर बडे-बडे अक्षरों में लिखवाया गया, ‘‘सेठ रतनसिंह के बेटे रघुबीरसिंह की पत्नी देवी उर्मिला उर्फ़ “पगली काकी का चऊरा”।

                               

रघुबीरसिंह ने ज़माना देखा था। जानते थे लोग भूलते जल्दी हैं। उनकी करतूतें भी भुला दी जाएँगी। धीरे-धीरे चबूतरे की पूजा शुरू हो जाएगी और उसी के साथ ख़ानदान का नाम कई पुश्तों तक अमर हो जाएगा। रघुबीरसिंह ने दूर की कौडी खेली थी। दुखों से भरे इस संसार में पेड, पाथर, चउरा पूजकर अपने मन को हल्का करने वालों की कमी नहीं है।

                               

धीरे-धीरे उर्मिला उर्फ़ पगली काकी की कृपा से मनौतियाँ पूरी होने की बात दूर-दूर के गाँवों में फैल गई। शाम होते-होते चबूतरा टिमटिमाते दीयों से सज जाता। जिसकी मन्नत जितनी गहरी होती उसके दीये में उतना ही अधिक तेल भरा होता। अब सप्ताह में एक दिन वहाँ मेला भी लगने लगा। चबूतरे की साफ़-सफ़ाई, नियमित पुजारी की व्यवस्था आदि सब रघुबीरसिंह बडे मन से करते थे।

                               

बिहारी बैसाखी के सहारे पूरे गाँव में घूमता था किंतु पीपल के पेड के नीचे वह कभी नहीं आया। न आए बिहारी, क्या फ़र्क पडता है ? रघुबीरसिंह तो अमर हो रहे थे। चबूतरा बनवाकर, मेला लगवाकर पत्नी के प्रति जो समर्पण भाव दिखाया था, गाँव में उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा हो रही थी। अपने जीवन काल में कुछ भी न कर पाने वाली उर्मिला उर्फ़ पगली काकी की शक्ति दिन-प्रतिदिन बढ रही थी। अब तो रघुबीर सिंह को भी दुनिया छोडे साठ-सत्तर साल हो गए किंतु चबूतरा आज भी जगमगा रहा है और उनके ख़ानदान का दबदबा भी क़ायम है।

                                                               

                                                               

                                                              

 

 

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