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शोर
शोर
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© Dr.Purnima Rai

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"हैलो मैडम ! हाय मैम !नमस्कार दीदी !कैसे हैं आप ?दीपावली की शुभकामनाएं !दीवाली की सपरिवार ढेरों बधाइयाँ !यह दीवाली आपकी जिन्दगी में खुशियाँ और बहार लेकर आये।आप तन-मन से स्वस्थ एवं निरोग रहें। लक्ष्मी माँ की आप पर अपार कृपा बनी रहे।" कितनी खुश थी चंचला !फेसबुक, वात्सैप पर आये दीपावली के ढेरों मैसेज एवं टैग की गई दीवाली की बधाई से लबालब पोस्ट पढ़ते-पढ़ते कभी हँस पढ़ती ,कभी रिप्लाई में आपको भी मुबारक लिख देती। इतना प्यार व स्नेह पाकर मंत्रमुग्ध सी हो गई चंचला ! मैं ७०%लोगों को जानती हूँ। ३०% मुझे जानते होंगें, शायद ! पर फिर भी कुछ पल प्रतिदिन नेट की दुनिया में बिताना अच्छा लगता है। है न ! दिल से निकली आवाज़ को सुनती है। अरे, यहाँ तो सारा दिन कब निकल जायेगा, पता भी नहीं चलेगा। लैपटाप से नजर हटी तो बिस्तर के पास सटे मेज पर पड़ी तस्वीर पर जा अटकी।ओह,आप तो हमें यूँही देखते रहियेगा।

एक लंबी साँस भरते हुये चंचला अलमारी खोलती है, लाल जोड़ा झटके से नीचे गिर जाता है। तस्वीर को साड़ी दिखाती है। आज यह पहनूँगी। बोलो तो, कैसी लगूँगी। बोलो ना। बच्चों की तरह बार-बार जिद्द करती हुयी तस्वीर से लिपट कर रो पड़ती है। बोलते क्यों नहीं, चुप क्यों हो ? लोहड़ी पर मायके छोड़ कर गये थे, यह कहकर कि "युद्ध समाप्त होते ही दीवाली पर आऊँगा लेने।" देखो ,आज दीवाली है, हमारी शादी की पाँचवीं सालगिरह भी है, जल्दी से आ जाओ। मैं अब दीवाली तुम्हारे साथ ही मनाऊँगी। सफेद साड़ी में लिपटी चंचला भारत माँ के वीर सपूत दिनेश के नाम का एक दीया जलाती है। अपने बूढ़े अन्धे पिता की लाठी की आवाज़ सुनकर आँसू पोंछती हुयी कहती है, पिता जी दीवाली मुबारक हो ! आतिशबाजी के शोरगुल में चंचला के मन का शोर मंद हो जाता है।

कहानी सैनिक दीपावली लोहड़ी विधवा लालजोड़ा शोर

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