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शायद कोई नहीं
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© Sushil Kumar Bhardwaj

Classics

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जब वाराणसी जंक्शन पहुंचा तो पता चला कि हावड़ा –हरिद्वार कुंभ एक्सप्रेस प्लेटफोर्म न० 5 पर आ रही है. समय से आधे घंटे की देरी से गाड़ी चल रही थी और भारतीय रेलवे को आधा घंटे के लिए विलम्ब कहना सही नहीं होगा क्योंकि बहुत सारी गाडियां तो पांच –छह घंटे भी लेट चलती हैं. खैर, करने के लिए कुछ था नहीं तो पांच नम्बर वाले प्लेटफोर्म पर पहुंच मोबाइल इन्टरनेट में कुछ-कुछ सर्च करने लगा. अचानक याद आई कि यहां तो रेलवे का वाई–फाई फ्री है तो अपना डाटा क्यों खर्च करूँ? मुफ्त के माल का जो मज़ा है वो अपने पैसे का कहां? और जब वाई–फाई कनेक्ट किया तो स्पीड देखकर दिल ही नहीं खुश हुआ बल्कि उसमें ऐसा डूबा कि आसपास के हलचल और शोरशराबे से दूर अलग दुनियां में खो गया. वो तो भला हो उस लड़के का जिसने आकर पूछा कि- “भाई साब! कुंभ एक्सप्रेस मुगलसराय जाती है क्या?” लगा जैसे नींद से किसी ने जगा दिया हो. उसे जबाब देते हुए कहा– “हां, जाती तो है लेकिन आए तब ना”. और बोलते बोलते जब नज़र सात नम्बर प्लेटफोर्म पर नज़र पड़ी तो चौंक गया, सामने कुंभ एक्सप्रेस खड़ी थी. हडबडा कर तेजी से सात नम्बर की ओर भागा यह सोचते हुए कि इन्डियन रेलवे की साईट भी गलत जानकारी देती है, लिखा है पांच और आई है सात पर. घोषणा की तो बात ही जुदा है कभी भी पलट जाती है.

किसी तरह तेजी से अपने बर्थ पर पहुंचा तो देखा एक लड़का सामने की बर्थ पर लेटकर कुछ पढ़ रहा था. अगल –बगल खाली–खाली सा था. शुक्र हो भगवान का, वर्ना यूपी और बिहार वाले कुछ लोग तो टिकट लेंगें जनरल डिब्बे का और कोशिश रहती है कम से कम स्लीपर में आराम से जाने की. वैसे तो कमोबेश सब-जगह कुछ न कुछ गडबडी रहती ही है, लेकिन जहां से मुगलसराय का क्षेत्र शुरू होता है वहां से तो कहानी ही निराली हो जाती है. खासकर बक्सर और झाझा के बीच दानापुर कंट्रोलर जिस गाड़ी के यात्री को अपनी लेट–लतीफी से रूला न दे वही काफी है. खैर, मैं थोड़ा आराम करने के गरज से सो गया. मुगलसराय में नींद खुली तो देखा कि सामने की बर्थ भी खाली हो चुकी है. लेकिन बर्थ पर खिड़की की ओर, कोने में कुछ दबी हुई थी. जिज्ञासा से लपका तो एक खूबसूरत डायरी हाथ लगी. पहले तो काफी संकोच हुआ, फिर लगा कि शायद ये डायरी उसी लड़के की हो जो यहां सोया था और किसी स्टेशन पर उतर चुका है. डायरी निहायत ही सुन्दर और नई थी, कहीं भी नाम-पता नहीं लिखा हुआ था. कुछ पन्नों को छोड़ पूरी डायरी कोरी थी. क्योंकर तो डायरी के पन्नों को पढ़ने लगा यह जानते हुए भी कि किसी की डायरी कभी नहीं पढनी चाहिए, उसमें उसकी निजी जिंदगी हो सकती हैं. पढ़ते हुए दंग रह गया कि वह डायरी नहीं बल्कि एक पत्र था जो इस कुछ इस प्रकार था.

                                                              लखनऊ

                                              22-04-2016

मेरी प्यारी,

सबसे पहले तो मैं तुमसे माफ़ी माँग रहा हूं कि मैंने तुम्हें ‘प्यारी’ कहा लेकिन दुर्भाग्य है कि पत्र लिखने में कोई ना कोई संबोधन देना ही होता है, और ‘मेरी’? वो तो तुम अब मेरी होकर भी मेरी नहीं हो. खैर यूं तो पत्र लिखना मेरी आदत भी नहीं है, अब तो इसका चलन भी कम होता जा रहा है. लोग मेल, मैसेज, व्हाट्स-अप्प, या किसी सोशल मीडिया या डायरेक्ट मोबाइल से अपनी बात कह लेते हैं. लेकिन लिख रहा हूं क्योंकि मेरा दिल कहता है कि शायद तुम मेरे मोबाइल कॉल को देखते ही रिसीव करने की बजाय काट देना ज़्यादा पसंद करोगी. कारण भी शायद वाजिब ही है. तुम्हें मुझसे मतलब ही क्या है? दुनिया ही जब स्वार्थी है तो तुम्हें ही दोष क्यों दूँ? वैसे भी जब विश्वास ही खत्म हो गया तो बचा ही क्या? यदि तुमने कॉल रिसीव भी कर ली तो तुम मोबाइल पर ही झगडा शुरू न कर दोगी या फिर उसी कॉल को साक्ष्य बनाकर थाने में मेरे खिलाफ कोई झूठी रपट न लिखवा दोगी इसकी क्या गारंटी है? और सबसे बड़ी बात कि जब तुम्हें यह पत्र मिले तो शायद तुम अलग मिज़ाज में रहो, तुम्हारी सोच थोड़ी बदल रही हो, शायद तुम्हारे दिल में मेरे लिए इतनी भी जगह बची हो कि सबके सामने ना सही कम से कम घर के एकांत कोने में ही सही, जीवन के एकांत पलों में मेरे लिखे शब्दों को पढ़ने की इच्छा हो. शायद तुम्हें एहसास हो कि तुमने मेरे साथ जिंदगी के कुछ पल बिताए थे. मेरे नाम को तुमने कभी गर्व से पति का नाम माना था. मेरे नाम का सिंदूर तुम अपने माँग में सजाकर सुहागन और सौभाग्यवती होने का आशीष सबों से लेती रही. सिंदूर शब्द से तो अब हंसी आती है. सिंदूर के बगैर लड़की अविवाहित मानी जाती है. भारतीय सभ्यता –संस्कृति में इसके महत्व या पवित्रता का हीं बखान नहीं है बल्कि इसका वैज्ञानिक कारण भी बताया गया है. लेकिन पति के मरने के बाद हिंदू धर्म में औरत के माथे से सिंदूर को पहले मिटाया जाता है. हो सकता है यह सब किसी मनुवादी का शुरू किया कर्मकांड हो, जो औरतों को गुलामी के बंधन में अदृश्य रूप से बांधना चाहता हो. खैर, जो कुछ भी हो लेकिन उस दिन जब तुम अदालत में बिना सिंदूर के आई थी तो मुझे झटका सा लगा. सच है कि मैं ज़िन्दा हूं, कानून की नज़र में तुम्हारा पति हूं. लेकिन तुमने मुझे ज़िन्दा रहते ही मार दिया. मेरे होंठों पर हंसी थिरक गई- तुम ईमानदार तो हो. जब असल ज़िन्दगी में मैं तुम्हारा कोई हूं ही नहीं तो तुम मेरे नाम का सिंदूर क्यों ढोती रहो? आजकल की लड़कियां तो यूं भी सिंदूर को शायद मज़बूरी में लगाती है, शायद सुंदरता कम हो जाने का डर रहता है. थोड़ी छूट मिल जाए तो सिंदूर की रेखा छोटी करने या बाल में छिपाने की बजाय लगाना ही छोड़ दे. वैसी स्थिति में तुम्हारे लिए तो यह बिल्कुल ही सही नहीं है.

आशा करता हूं कि तुम खुश होगी, बहुत खुश होगी, अपने नए पति को पाकर. आश्चर्य है ना? तुम मुझसे छिपाकर शादी कर ली, लेकिन देखो संयोग ऐसा कि मुझे खबर मिल ही गई. मुझे कभी कभी हंसी भी आती है. मुझे लगता था कि तुम्हारी दूसरी शादी नहीं होगी क्योंकि आज हम जिस समाज में रह रहे हैं वहां एक बार लड़की की शादी करवाने में माता-पिता को पसीने छूट जाते हैं. चप्पल की एडियां घिस जाती हैं. दस बार लड़की देखने आते हैं. एक से एक सवाल पूछे जाते हैं गोया नौकरी मिलने जा रही हो? हां, ये तो होता ही है. आजकल पढ़ी-लिखी ही नहीं नौकरी करने वाली लड़की की ही तलाश अधिक रहती है. बाबजूद इसके सुंदर न हुई तो भी बाबूजी के घर बैठी रहो और दहेज में मोटी रकम नहीं दे सकते, चार चक्के की एक गाड़ी नहीं दे सकते तो भी अगले लड़के के इंतज़ार में बैठी रहो. वैसे में तुम जैसी मोटी लड़की से जल्दी शादी करने के लिए कौन तैयार होगा?- जिसकी पहले शादी ही नहीं हो चुकी हो बल्कि कुछ और भी खामियां हों. लेकिन खुशी है कि तुम्हारी शादी हो गई. हां, रुपए और शक्ति में बहुत दम होता है. किसी को भी ख़रीदा जा सकता है. धौंस जमाकर, घर-जमाई बनाकर किसी कमज़ोर को ज़रूर रखा जा सकता है. लेकिन शायद तुम कभी अपने दिल से भुला नहीं पाओगी कि मैं तुम्हारा पहला पति हूं, जिसके साथ तुमने जीवन में पहली बार अग्नि के फेरे लिए थे. तुम जिस किसी भी मनोभाव से आई लेकिन सत्य यही है कि विवाह संस्कार के बाद मेरा ही घर तुम्हारा पहला ससुराल बना. तुमने खुशी या गम के जो भी पल मेरे साथ बिताए, वह इतिहास बन चुका है जो किसी के कहने या ना कहने से मिट नहीं सकता. वह समय रेखा पर दर्ज हो चुका है.

जानती हो जब तुम्हारा फोटो और बायोडाटा मेरे पास आया था, मैंने एक बार भी नहीं देखा. क्यों? क्योंकि मुझे अपने घर वालों पर विश्वास था कि वे अपने बहू के रूप में जिसे भी चुनेंगें वह मेरे योग्य ही होगी. दूसरी बात, मैं फोटो देखकर ही क्या करता जब फैसला बड़ो को ही करना था. आधुनिकता के रंग से दूर हमारा परिवार रूढ़िवादी ही है. तीसरी बात कि मैं लड़कियों के मामले में इतना संवेदनशील रहा हूं कि किसी लड़की की तस्वीर देखकर न कह देना मेरे वश की बात न थी. खैर, जब तुम्हारे साथ मेरी शादी लगभग पक्की हो गई तो पहली बार रात के कोई बारह बजे के बाद चोरी-छुपे गोदरेज से तुम्हारी तस्वीर निकाल कर थोड़ी देर के लिए देखता रहा. तस्वीर में तुम कितनी दुबली-पतली और सुन्दर लग रही थी. तुम्हारे होठों पर फैली मुस्कुराहट देखकर मैं झेंप गया. लगा जैसे तुम कह रही हो – “ओय पगले, अपनी होने वाली पत्नी को भी कोई इस तरह चोरी–छिपे देखता है क्या? ज़माना बदल गया है.” और मैं तेज़ी से तस्वीर को ज्यों का त्यों रख दिया ताकि कोई जग ना जाए और मेरी चोरी पकड़ी जाए.

याद है जिस दिन हमलोगों की पहली मुलाकात हुई थी मैं कितनी जल्दबाज़ी में था? एक तो तुम अपरिचित, ऊपर से घरवालों के सामने तुमसे बात करना. सच पूछो तो, मैं बहुत नर्वस था. जल्दी से भाग जाना चाहता था, और मैं कुछ काम का बहाना करके भाग भी गया. कह नहीं सकता ऐसा सबके साथ होता है या सिर्फ मेरे साथ हुआ. पर एक बात अभी तक याद है – वो मुलाकात थी बहुत ही खास और मज़ेदार, भले ही वह कुछ ही घंटो की क्यों न रही? राज़ की बात बताऊँ – फोटो के विपरीत तुम्हारे विशालकाय शरीर को देखकर थोड़ी देर के लिए मैं सहम गया. तुम्हें नकार देने के गरज से मैंने सोचने के लिए मोहलत चाही, लेकिन दोनों तरफ के घरवालों को इतनी जल्दबाज़ी थी कि कुछ ही घंटे में अंगूठी पहनाने की रस्म अदायगी हो गई. मेरे भाई- बहन भी थोड़े नाखुश थे, फिर सभी ये सोचकर सहमत हो गए कि शरीर का क्या है इंसान बेहतर होना चाहिए, जो शांति से घर को चला सके, खाते –पीते घराने के लोग तो थोड़े ऐसे होते ही हैं, फिर अच्छे घराने से जुड़ने से संस्कार भी अच्छे होते हैं. मैं भी तभी से तुम्हें मन में बिठाने की कोशिश करने लगा. तुम्हारी बातें याद आती तो मैं गुदगुदा उठता. तुमसे बात करने के गरज से जब घुमा फिरा कर अपनी बहन से पूछा कि –“उसका नम्बर लिया था?” तो उसका जबाब मिला –“नहीं”. मैंने माथा ठोकते हुए कहा –“धन्य हो प्रभु!”

अलबत्ता मेरे घरवालों के पास तुम्हारे माता –पिता का फोन नम्बर था जो कि अक्सर बात भी किया करते थे पर मैं मनमसोस कर रह जाता था. अब मैं कैसे बेशर्म की तरह कहता कि मैं तुमसे बात करने के लिए बावला हुआ जा रहा हूं? लेकिन थोड़ा गुस्सा तुम पर भी आता था कि मेरा नम्बर तो तुम्हारे घर के सभी लोगों के पास है तो फिर तुम क्यों नहीं कॉल करती? लेकिन जब रामनवमी के दिन तुम्हारे घर वालों ने मुझे बधाई देने के बहाने कॉल किया और तुमसे बात करने के लिए कहा तो मैं बहुत खुश हुआ. संयोग से उस वक्त मैं कमरे में अकेला था और हिम्मत जुटाकर तुम्हें रामनवमी के मुबारकबाद देने के बाद पूछा कि –“आप कैसी हैं?” तो तुम बोली –“हां...हां मैं ठीक हूं और आशा करती हूं कि उपर वाले की दया से आप भी ठीक ही होंगें .. अब फोन रखती हूं...” और मैं कुछ आगे कह पाता उससे पहले ही फोन डिस्कनेक्ट हो गया .और मैं यह सोच कर शांत पड़ गया कि जरूर घर वाले भी वहीं बैठे होंगें. भारतीय संस्कृति में अभी भी कुछ शर्म-हया शेष है. फिर कभी शादी के दिन तक हमलोगों की कोई बातचीत नहीं हुई. शादी के बाद भी मुझे ही पहल करनी पड़ी – जब थोड़ा बेशर्म होते हुए तुम्हारी छोटी बहन को इशारे–इशारे में तुम्हें बुलाने को कहा और जब तुम आई तो मैंने तुम्हें शादी की मुबारकबाद दी.

हमलोगों की शादी रात भर के बाजे- बारात और विधि-विधान के बाद संपन्न हो गई तो मैं सोचने लगा– “ओ तेरी... मेरी शादी हो गई. मैं अब अकेला नहीं रहा. समाज ने अब मुझे पति जैसा ज़िम्मेदार आदमी बना दिया, लेकिन मुझ में कोई परिवर्तन तो दिखता ही नहीं?” मैं भी कितना भोला था ना?

भीषण गर्मी में शादी के बाद जब तुम मेरे घर आई तो तुम कुछ परेशान लगी. मुझे लगा गर्मी से परेशान होगी. रात में जब तुम खिड़की के पास खड़ी हो रो रही थी तो मैं कुछ समझ नहीं पाया. और जब मैंने कारण जानना चाहा तब भी कुछ नहीं बताई और मध्य –रात्रि में बोली कि तुम्हें बेचैनी महसूस हो रही है? मेरे लिए वो संकट की घड़ी थी कि इतनी रात में क्या संभव है? लेकिन जब तुमने बताया कि तुम्हारे पास दवाई है तो तुम्हें दवाई ले लेने को कहा और तुम्हारे दवाई लेकर सो जाने के बाद मुझे शांति मिली. मैंने कभी ये जानने की कोशिश नहीं की कि तुम्हें प्रॉब्लम क्या है? और ये दवाइयां तुम अपने पास क्यों रखती हो? जानती हो क्यों? क्योंकि मैं तुम्हें स्पेस देना चाहता था. चाहता था कि तुम खुल सको, तुम्हें पराये घर का एहसास न हो? किसी भी आदमी के लिए नए जगह पर खुद को तुरंत ढाल लेना इतना आसान नहीं होता है. याद है - रिशेप्सन के दिन तुम गजब के पूरे दिन सोई रही. मेहमान आने लगे थे और तुम्हें सोने से फुर्सत नहीं थी. पहली बार मुझे तुम पर गुस्सा आया था, क्योंकि मुझे समाज के सामने अपनी बेईज्ज़ती का अहसास हो रहा था. और मेरे झुंझलाहट के उस पल में जब तुमने कहा कि अधिक टैबलेट ले ली, इस वजह से अधिक नींद आ रही है. तब मैं शांत हो गया लेकिन फिर भी मैंने यह नहीं जानना चाहा कि तुम किस चीज की दवाई ले रही हो? मैं बस इतना सोचा कि –मनुष्य के शरीर का क्या भरोसा? कुछ हुआ होगा जिसकी दवा ले रही होगी. कभी तुम्हारे पिछले जीवन के बारे में भी नहीं जानना चाहा क्योंकि मुझे लगता था कि मनुष्य को बगैर पीछे मुड़े शांतिपूर्वक आगे बढ़ना चाहिए. संभव है गड़े मुर्दे उखाड़ने से कोई अप्रिय जानकारी मिल जाए जो कि रिश्ते में दरार डाल दे. फिर हमलोगों का जीवन शांति से गुज़रने लगा. मुझे लगता है हमलोग धीरे धीरे एक दूसरे को समझने लगे थे. उसी दरम्यान एक दिन जब मैं शहर से बाहर था, तुम अपने पिताजी को बुला लिया और माँ से मिलने की बात कह मेरे घरवालों को मना कर बिना मुहूर्त निकलवाए ही अपने घर चली गई. मैंने जो मोबाइल तुम्हें गिफ्ट किया था उसे भी तुम छोड़ कर चली गई और हमलोगों के बातचीत का एक जरिया भी खत्म हो गया. जब कभी तुम्हारे पिताजी के नम्बर पर कॉल किया पता चला –तुम सोई हुई हो. मुझे अब तुम्हारे सोने की बीमारी से चिढ़ होने लगी थी. इसी बीच तुम्हारी छोटी बहन का फोन आया तो मैंने मज़ाक मज़ाक में ही तुम्हारे सोने की बात छेड़ दी लेकिन जो जबाब मिला वह मेरे लिए किसी सदमें से कम ना था. मुझे काटो तो खून नहीं. मेरी जगह कोई भी होता तो शायद यही होता. बस तुम महसूस कर सकती हो कि किसी नौकरीपेशा युवा पर क्या बीतेगा जब उसे पता चलेगा कि उसकी पत्नी पागल है, जिसका आठ वर्षों से इलाज चल रहा है और वह दवाई खाते हुए ही नियंत्रण में रह सकती है. जिससे आप घर चलाने की उम्मीद नहीं कर सकते हैं. उसमें भी जब मैंने तुम्हारे पिता से सच जानना चाहा तो कुछ बताने की बजाय उन्होंने कहा –“क्या किसी डॉक्टर ने लिख कर दिया है?” और तुम्हारे बहन के साथ उसके बाद क्या बर्ताव हुआ उसके बारे में मुझसे बेहतर तुम्हीं जानती हो.

हतोत्साहित हो मैंने तुम्हें तलाक देने का मन बना लिया. लेकिन जब सुप्रीम कोर्ट का एक निर्णय देखा कि मानसिक रोग की वजह से किसी को तलाक नहीं दिया जा सकता तो लगा जीवन में अंधेरे के सिवा कुछ भी शेष नहीं. मेरे जीवन का वह सबसे बड़ा त्रासद पल बन गया. मैंने भारत सरकार की नौकरी तक मानसिक तनाव में छोड़ दी. निराशा के गर्त में समाता चला गया. मुझे कोई सहारा देने वाला नहीं था, घर के लोग खुद सदमें में थे. लगा खुद पागल हो गया हूं. लेकिन थोड़े भटकाव के बाद मैंने फिर से खुद को संभालना शुरू किया. खुद से संवाद किया. जीवन के अर्थों को समझा. नियति को ही सब कुछ मानकर तुम्हें फिर से अपनाने का फैसला किया. लेकिन तब तक तुमसे संवाद का सारा ज़रिया बंद हो चुका था .

और एक दिन जब तुम्हारे तरफ से कुछ आया भी तो अदालत का एक नोटिस. तुमने खुद से तलाक के लिए अपील की थी. मैं चाहता था कि तुम जैसी भी वापस आ जाओ. साथ ही साथ मेरे ऊपर सामाजिक दबाब भी था. फिर मैंने अदालत में भी कहा –“तुम्हारी खुशी में ही हमारी खुशी है.” लेकिन तुम तलाक पर ही अड़ी रही. फिर तुमने अदालत में आना ही बंद कर दिया. लम्बे समय तक तो मुझे ये भी नहीं पता नहीं चला कि तुम ज़िन्दा भी हो या मर चुकी हो? बस मैं अदालत में हर तारीक को हाज़िर होता रहा. केस जारी रहा? पता नहीं चला कि तुम्हारे आने के बाद मैंने ज़िन्दगी में क्या-क्या खोया? फिर भी तुम्हारे प्रति एक सहानुभूति थी.

आज जब अदालत में मुकदमा समाप्त हो गया है तो लग रहा है कि एक नई सुबह हो गई है. वर्षों से जिस मानसिक संघर्ष से जूझ रहा था वह समाप्त हो गया है. कौन जीता? कौन हारा? पता नहीं. लेकिन शायद सबकुछ अच्छा हो गया है या हो जाएगा. किसी ने सच ही कहा है –“यदि आप पूरी ज़िन्दगी एक ही मोमबत्ती के सहारे नहीं बिता सकते तो आपको क्यों लगता है कि आपकी ज़िन्दगी किसी एक के प्यार के सहारे ही गुज़र जाएगी?” अब तुम मेरी पत्नी नहीं हो. जैसे शादी के बाद अचानक मेरी ज़िम्मेवारी तुम्हारे प्रति बढ़ गई थी, ठीक वैसे ही आज मैं तुमसे पूर्णतः भारमुक्त हो गया. मन में काफी हलचल मची थी कि जीवन के किसी मोड़ पर अगर जो तुम फिर मिल गई तो मैं तुमसे कैसे बात करूँगा? क्या सम्बोधन होगा? यह जानते हुए भी कि अब तुम मेरी कोई नहीं हो, तो मेरी भावनाएँ कैसी होगी? और भी ऐसी ही बहुत सी बातें जिनका शायद कोई मतलब भी नहीं. खैर अब विशेष में क्या कहूँ? कहने का अधिकार भी तो शायद नहीं है. बस इतना ही कि जहां भी रहो खुश रहो.

                                                  तुम्हारा

                                              शायद कोई नहीं.

 

जब तक पत्र पढ़ना खत्म हुआ गाड़ी पटना जंक्शन पहुंच चुकी थी. लोग उतरने की तैयारी कर रहे थे और मैं डायरी के बारे में सोच रहा था. गाड़ी ज्योंहि प्लेटफोर्म के करीब पहुंची मैंने तेज़ी से अपना बैग उठाया, उसमें डायरी को रखा और भीड़ के साथ नीचे उतर गया. उस भीड़ से जूझते हुए, दिमाग में उठते सवालों के बीच घर चला आया. समय के साथ अपने काम में मशगूल हो गया जबकि वो डायरी आज भी सुरक्षित मेरे पास है.

 

 

Sushil Kumar Bhardwaj शायद कोई नहीं सुशील कुमार भारद्वाज

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