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हल्कू का पत्र
हल्कू का पत्र
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© Ravi Verma

Drama Others

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सेवा में,

न्याय जैसी चीज़ को जीवित रखने वाला सुप्रीम कोर्ट

नमस्कार,

हमारा नाम हल्कू पटाखे वाला है। वैसे तो हम कभी कलम और कागज़ का मेल अपने कर कमलों से करवाते नहीं है पर क्या करें हमारी मजबूरी है। वैसे भी मजबूरी में तो चाय वाले को भी प्रधानमंत्री बनाना पड़ता है। इसलिए हमने भी लिखने का ये गलत फैसला ले लिया। आज पहली बार पांचवी कक्षा के बाद हम कुछ पढ़ने की हिम्मत जुटा पाए तो क्या पढ़ते हैं कि आप पटाखे नहीं फोड़ सकते। सुप्रीम वाले कोर्ट जी ये पढ़कर तो हमारी हार्ट बीट शून्य हो गई थी। एकदम नोटबंदी वाली फिलिंग आ गई थी। सोचा जैसे पांचवी कक्षा में रावण जैसे मास्टर की पिटाई से स्कूल छोड़ दिया था। उसी प्रकार से ये तरह-तरह के विज्ञापन के बीच में ख़बर देने वाले समाचार पत्र को भी छोड़ दे। लेकिन तभी हमें “सब पढ़ो, सब बढ़ो” वाली योजना दिखाई पड़ गई। योजना देखकर हमने हमारी टूटी हुई हिम्मत की दीवार पर फिर से उम्मीद की सीमेंट लगाई और आगे पढ़ना शुरु किया। लिखा था कि सिर्फ रात 8 बजे से 10 बजे तक ही पटाखे फोड़ सकते हैं, वो भी कम आवाज़ करने वाले। कैसा मजाक है ये हुजुर। हम तो हर साल सात बजे लक्ष्मी मैय्या को धनवृध्दी वाली एप्लिकेशन देते हैं और आठ बजे से हरिवंश राय बच्चन की मधुशाला का सेवन करते हैं। अब हम मदिरा पान का बहुमूल्य समय छोड़कर पटाखा नहीं फोड़ सकते हैं और इसके लिए हम नेताओं की तरह शर्मिंदा है।

सही बात बताए, हमें तो ये सारी हमारी धर्म पत्नी की साजिश लगती है के साथ मिलकर हमारी मदिरा छुड़वाना चाहती है। हमें गलत मत समझना पर हमें तो आपके सुप्रीम होने पर भी संदेह है। आप मुझे एक बात और बताइए ये कम आवाज़ करने वाले पटाखे क्या होते है। क्या पटाखा जलाकर उसके मुंह पर हाथ रख दें और कहे सुनो बे धीरे से फटो वरना सुप्रीम जी नराज़ हो जाएंगे। अगर आपको ध्वनि प्रदूषण रोकने है तो एक अचूक नुस्खा लिख कर दे रहे हैं। देखिएगा पढ़कर आप भी हमारी पीठ थपथपाएंगे। ध्वनि प्रदूषण रोकना है तो आप सबसे पहले ये समाचार सुनाने के बहाने पटाखे से तेज आवाज़ निकालकर चिल्लाने वाले न्यूज एंकर पर बैन लगा दीजिए। एक दिन तो किसी गोस्वामी की आवाज़ सुनकर हमारी अम्मा का एक और हमारी टीवी के दोनों कान के पर्दे जवाब दे गए। अब देखिए टीवी डिबेट की तरह हम भी मुद्दे से भटक गए। ये विचित्र पत्र हमने हमारी पटाखे की दुकान की वजह से लिखा है। अब आप चाहे दो घंटे पटाखे फोड़ने की इजाज़त दो या रातभर की। बस इतना हो जाए कि हमारे पटाखे बिक जाए। वरना सही बता रहे है सुप्रीम जी हमारी दुकान में मौजूद तमाम रॉकेट को गले में लपेटकर मंगल ग्रह के लिए उड़ जाएंगे। सच बोल रहे है। अच्छे दिनों वाला जुमला मत समझना।

धन्यवाद,

तथ्य जाने बिना आपके हर फैसले का विरोध करने वाला

आपका प्यारा नहीं, बेचारा हल्कू।

पटाखे सुप्रीम कोर्ट मजबूरी कानून

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