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क्रिकेट
क्रिकेट
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© Siniwali Sharma

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आइये चलते हैं ३२ साल पहले जब भारत के गाँवों  में क्रिकेट अपनी पैठ बना रहा था। ठीक उसी समय कपिलदेव की अगुआई में भारत ने क्रिकेट का विश्व कप जीता था। और इस जीत ने क्रिकेट को इतना लोकप्रिय बना

दिया कि यह खेल छोटे छोटे गाँवों में पहुँच गया। तो चलते हैं उस छोटे गाँव में जहाँ क्रिकेट खेलने की तैयारी हो

रही है।

सातों की टोली, जिनमें बिछवा, नाथो, घुट्टर, लोढिया, राजो, नगिनिया और पप्पू हैं। आज सब मिलकर उस

खाली खेत को देख आए जहाँ कल से क्रिकेट खेलना है।

सबसे खास बात इस टोली की यह है कि सभी क्रिकेट को बस एक खेल समझते हैं, जिसमें बैट से बॅाल को जोर

से मार कर दूर फेंका जाता है फिर बॅाल के आने तक जल्दी जल्दी दौड़ कर रन बनाया जाता है। बेरा मौका

चौका छक्का लग गया तो बड़ी बात है, नहीं तो बस इस खेल में आउट ही हुआ जाता है। बस इनकी जानकारी में

इस खेल में और कोई नियम कानून या कुछ और नहीं होता।

बिछवा और नाथो गाहे बगाहे चौका-छक्का मार लेते हैं। मौजे वाले गेंद को काठ वाले बैट से इतनी जोर से मारते

हैं कि गेंद सांय से ऊपर जाकर शीशम के गाछ को छूकर नीचे गिरती और हो जाता चौका-छक्का। ये दोनों ही

अपनी टीम के शान समझे जाते हैं।

सात सदस्यों की इस टीम का क्रिकेट आज परती खेत में ही शुरू हो गया। पाँच-छह ईंट खड़ा करके विकेट बना।

काठ वाला बैट और मौजे को सिलकर बनाया गया गेंद। इसके अलावा इनके क्रिकेट के लिए और कुछ जरूरी

नहीं है।

बिछवा और नाथो, सबसे पहले उतरे और लोढिया की बौलिंग पर जमकर खेलने लगे। बॅाल को जैसे ही मारते

कि दो चार रन तो ऐसे ही मिल जाता। कभी हवा में तैरती गेंद इतनी ऊँची उछल जाती और शीशम के गाछ को

छूकर दूर गिरती और ये छक्का हो जाता।

लोढिया गेंद फेंकते-फेंकते पस्त हो गया। नगिनिया और बिछवा दौड़ दौड़ कर गेंद लाते लाते जनवरी के महीने

में भी पसीने पसीने हो रहे थे। बिछवा और नाथो, सबको कीड़ा मकोड़ा की तरह समझ रहे थे और विजयी

मुस्कान बिखेर रहे थे, जैसे अपने बैट के चौकों छक्कों से सबको मसल देंगे।

खेल रोमांचक दौर में पहुँच गया था। अगल बगल खेत में पटवन करने वाले पीरो चा, काका, दादा और दो चार

लोग अपना मन बहलाने और प्रोत्साहन देने आर पर आकर बैठ गए।

जैसे जैसे दो चार लोग जमा होने लगे, बिछवा और नाथो और जोश में आकर खेलने लगे और लोढिया के हर गेंद

को रुई की तरह धुनने लगे।

ये सब देख कर बच्चू बाबू अपने कमर में गमछा बाँधते हुए बोले, तोरी माय-- कमाल का खेलता हय-- हम तो

आज तक तुम दोनों को बुड़बक ही बुझते रहे--हें--हें-- -फिर इ, उ पत्थर के पार-- मार-- मार-- खूब धुनो--

मजा आ गया, इसको कहते हैं किरकेट ! बोल कर जोर से थपड़ी पारने लगे। उधर लोढिया अपनी धुनाई पर

लाज से पानी पानी हो रहा था। फिर भी इस ओभर में अभी भी दो गेंद बचा था। उसने काँपते पैर से फिर गेंद

फेंका-- और इस बार फिर उ पतितवा के झाड़ी के पार करता हुआ गेंद-- चार रन।

अब पीरो चा से रहा नहीं गया, खड़े होकर बोले, धय बेकार-- एकरा से गेंद करवाते हो-- इ लिखलिख दुबरका से

तो अपना देह संभरता नहीं-- किसी और को उतारो।

नाथो विजयी दृष्टि से सबको देख तो रहा था जैसे आँखों से युद्ध की घोषणा कर रहा हो, कि अगर कोई है तो आ

जाओ, हम किसी से तनियो नहीं डरते हैं।

लेकिन मन ही मन उसके अंदर ये भी डर था कि कहीं पप्पूआ गेंद फेंकने उतर न जाए। पिछले पाँच छह बार से

उसके साथ खेल रहा है। उसकी बॅालिंग धाँसू होती है। शहर से दांव-पेंच सीख कर आया होगा, तभी तो अच्छा

गेंद फेंकता है। लेकिन आज जो उसने रन बनाया था तो इससे उसकी हिम्मत भी बढ़ गई थी, ऊपर से आज

मंगल है और उसने हनुमान चालीसा पढ़ा है, आज तो बजरंग वली भी साथ हैं। आ जाए पप्पू मैदान में-- उसको

भी धुन देंगे।

इधर पप्पू, लोढिया की दुर्दशा देख कर पहले से ही डर गया था पर चारा भी तो कुछ और नहीं था। शहर से

आया था तो अपने आप को श्रेष्ठ साबित करना मजबूरी थी।

नरेश दा बोले, आ बेटा आ-- अब तो तुम्हीं पर आशा टिकी है-- तब से ये दोनों बहुत छाती फुलैले है।

पर सच्चाई तो यह थी कि पप्पू को वास्तव में बॅालिंग का कुछ खास अता-पता नहीं था बस अंदाजी टक्कर गेंद फेंक

देता था और संयोगवश बॅालिंग भी सही हो जाती थी।

पप्पू ने मन ही मन भगवान का नाम लिया, अपने छोटे कद और मरियल शरीर से बिरनी की तरह उड़ते हुए गेंद

फेंका और ये-- आउट !!! पहली ही गेंद पर आउट। तो दस-बारह दर्शक जितनी जोर से ताली बजा सकते थे

बजाने लगे पर ठहाका उससे भी अधिक जोर का लगा। सब आपस में बतियाने लगे कि लगता है प्रकाश दा शहर

में इसके ऊपर खूब खरचा करते हैं, ध्यान देते हैं तभी तो इतने कम उमर में भी बॅालिंग बहुत अच्छा करता है।

जब इस टीम की थोड़ी बहुत तारीफ होने लगी तो सब सदस्यों ने मिलकर सोचा कि दम है हममें, तभी तो सब

बड़ाई कर रहे हैं-- तो क्यों नहीं बगल वाले गाँव श्यामपुर से मैच खेला जाए।

कहीं गाहे बगाहे जीत गए तो चारों उंगलियां घी में। श्यामपुर को हराना मतलब आसपास के गाँवों  में भी धाक

जम जाना। और कहीं हार गये तो क्या होगा ! अरे भाई, खेल में सब टीम जीत तो नहीं सकती न-- एक न एक

को तो हारना ही है-- तो इसमें लाज की क्या बात है।

सभी अपना अपना माथा हिलाकर सहमत हो गए। टीम में जितने सदस्य कम हो रहे थे उतने बच्चों को शामिल

कर लिया गया जिससे टीम बारह लोगों का हो गया। जितनी संख्या की जरूरत थी, उसे तो पूरा कर लिया गया

पर सभी जानते थे कि खेल तो तीन चार लोगों के ही भरोसे होगा। पर असली समस्या थी, बैट। इस काठ वाले

बैट से अपने मैदान तक तो ठीक है पर दूसरे गाँव के साथ मैच खेलना अच्छा नहीं लगेगा।

घुट्टर जो टीम का सदस्य तो था पर योग्यता के अभाववस थोड़ा सा उपेक्षित रहता था, उसे आज बड़ी मुश्किल

से अपनी धाक जमाने का मौका मिला। हकलाते हुए बोला, ब-- ब-- बस्स-- इतनी सी बात-- अ-- और हवा टाइट

हो गई-- आ-- आजकल तो BDM बैट का जमाना है। मेरे पास है तो नहीं पर मेरे नानीघर में दद्दा के पास है।

थोड़ा अकड़ते हुए बोला, अ-- अगर आ-- आज से छह दिन बाद मैच रखो तो मैं इंतजाम कर सकता हूँ-- सोच लो।

फिर थोड़ी देर रुक सबका मुँह देखते हुए बोला, मैं परसों अपने नानीघर जा रहा हूँ-- कोई न कोई जुगत लगा कर

मैं ठीक मैच वाले दिन भोरे भोर BDM बैट लेकर आ जाऊँगा। ये कहते कहते घुट्टर के चेहरे पर एक खास

किस्म का भाव आ गया।

सभी सदस्यों ने कानों से सुन आँखों ही आँखों में सबसे भौंहें उचकाकर पूछा फिर सबकी सहमति बनी और

निर्णय हुआ कि ठीक आज से छह दिन बाद श्यामपुर से मैच खेला जाए, घुट्टर को बैट लाने की जिम्मेदारी मिली।

और सब अपने काठ वाले बैट और मौजे वाले गेंद से मैच के लिए प्रेक्टिस करने लगे ताकि श्यामपुर से मैच किसी

भी हाल में जीता जा सके।

इन सभी के जीवन का यह पहला मैच था। किसी ने दादी, माँ, दीदी से चवन्नी अठन्नी घिघियाते हुए तो किसी ने

चिरौरी करते हुए माँगा। जो चिरौरी करना अपनी हेठी समझते थे वे घर से धनिया, मकई चुराकर साव जी के

यहाँ बेच कर कुछ पैसे जमा किये। किसी ने बाबू जी के बटुए से एकाध टका उड़ाया और इस तरह चंदा इकट्ठा

करके कार्क बॅाल खरीदा गया। घुट्टर जो बैट लेकर आने वाला था उसके साथ वो मौजे वाली गेंद अच्छी नहीं

लगती-- इंतजाम तो जरूरी ही था।

ठीक छठे दिन टीम के सभी सदस्य एकदम भोर में उठ गए। उस कंपकंपाती ठंड में थरथराते हुए, दाँत

किटकिटाते हुए नहा कर तैयार हो गए। ठंड से दोनों हथेलियों को आपस में रगड़ते हुए थरथराते हुए कोई

हनुमान चालीसा तो कोई दुर्गा जी का मंत्र तो कोई भोले बाबा, जो जिसके आराध्य हैं उनकी पूजा कर रहे थे

और जिन्हें पूजापाठ से कोई मतलब नहीं था वो भी आज " जैही विधि प्रभु प्रसन्न मन होई " कर रहा था।

पप्पू ने जीत जाने पर एक रुपये का प्रसाद कबूला। नाथो और राजो के घर की स्थिति उतनी अच्छी नहीं थी,

उन्होंने शंकर जी को एक एक लोटा जल ही कबूला।

जिस मैदान में खेल होने वाला था, वो श्यामपुर में था। कपिलदेव इलेवन टीम के सदस्य तैयारी के साथ वहाँ

पहुँच तो गए पर वहाँ पहुँचते ही सबका करेजा धौंकनी की तरह चलने लगा। मैदान जब श्यामपुर का था तो

दर्शक भी उसी गाँव के अधिक थे। जिधर के दर्शक ज्यादा होते हैं हौसला भी तो उधर ही अधिक बढ़ाया जाता

है।

मन ही मन सब इस बात से भी परेशान थे कि घुट्टर का बैट लेकर आने का समय हो रहा था पर अभी तक वो

आया नहीं था। रेलवे लाइन थोड़ी दूर से ही गुजरती थी, किसी रेलगाड़ी की आवाज आते ही सभी एक दूसरे का

मुँह ताकने लगते कि लगता है इसी गाड़ी से घुट्टर बैट लेकर आता होगा। बैट अब आई कि तब आई-- पर, बैट

नहीं आई। मैच अब शुरु होने ही वाला था, इधर सब तिलमिला उठे। गुस्सा तो बोलकर जता नहीं सकते थे तो

एक दूसरे के कानों में फुसफुसा कर तय कर लिया कि आने दो स्साले को-- नानी याद दिला देंगे।

मैच की तारीख तय करते समय ही श्यामपुर टीम ने तय कर दिया था कि सभी खिलाड़ियों की उम्र पन्द्रह बरस

से अधिक नहीं होगी।

श्यामपुर के खिलाड़ी अधिकतर पंद्रह बरस के ऊपर के थे, जो अठारह उन्नीस के थे वो दाढी मूँछ मूड़कर चार

पाँच साल उमर को चकमा देकर मैदान में उतरने की तैयारी में थे।

नाथो और बिछवा, जो देह दशा से लंबे चौड़े थे और सोलह का होकर भी अठारह बीस के लगते थे। इन दोनों

को देखकर विरोधी टीम का सदस्य दिनेश आकर बोला, इ जुआल पकठाल खिलाड़ी नहीं खेलेगा।

इ बात किसको कह रहे हो-- अपने तो दाढ़ी मूँछ मुड़ा कर आ गए हो। इन दोनों की उम्र थोड़े ही अधिक है ?

केवल देह दशा से बड़ा लगता है। अपने हाथ का इ चीज नहीं है।

उधर से श्यामपुर टीम का खिलाड़ी जगदा, लोग इसे महाराणा भी कहते हैं, सनसनाता हुआ बोला, का कहते हो

! इ सोलह साल का ! और मुँह बिचका कर हे हे करने लगा। इ बच्चा है ! देख कर तो बच्चे का बाप लगता है।

इस बात बतंगड़ में माहौल धीरे धीरे गरमाने लगा। बकझक से बात झगड़े पर आ गई। इसी बीच अंपायर ने

आकर मामला संभाला। जो शहर के किसी प्राइवेट स्कूल में शारीरिक प्रशिक्षण के शिक्षक थे, पर दुर्भाग्य से

श्यामपुर के निकले। कपिलदेव इलेवन टीम वालों की भी लाचारी थी कि इनकी बात माननी ही थी नहीं तो

खेल शुरू होने से पहले ही खत्म हो जाता और इनका मैच खेलने का सपना धरा रह जाता।

इस तरह खेल से बिछवा और नाथो को बाहर कर दिया गया। इन दोनों के छँट जाने के बाद अब तो सारा

दारोमदार पप्पू की बॅालिंग पर ही रह गया। उधर श्यामपुर की टीम में अधिकतर खिलाड़ी सोलह से उन्नीस के

बीच के थे।

इस तरह मैच अपने तय समय से आधा घंटे बाद शुरू हो पाया। टॅास श्यामपुर की टीम ने जीता और पहले

बल्लेबाजी करने का फैसला किया। मुन्ना और हीरा को सबसे पहले मैदान में उतारा गया। लोढिया की बॅालिंग

पर रन पर रन दोनों ठोके जा रहे थे और अभी तो महाराणा का उतरना बाकी ही था।

मैच देख कर तो लगता था कि एकतरफा मैच ही होगा। कपिलदेव इलेवन टीम के सभी खिलाड़ियों और उस

गाँव के जो दो चार दर्शक आए थे अब उन सबों की उम्मीद पप्पू की गेंदबाजी पर टिकी थी।

दुबला पतला मरियल सा चौदह वर्ष का पप्पू टीम की दुर्गति देख कर भीतर ही भीतर नरभसा रहा था पर

अपनी टीम का हीरो तो अब वही बचा था। उसका करेजा धड़धड़ा रहा था एकदम रेल के इंजन की तरह और

मुँह भी सूख रहा था। पर सबके सामने हिम्मत भी तो नहीं हार सकता था। अब तो एक ही आसरा बचा था।

भोरे भोर बजरंग वली को प्रसाद कबूला था और दिन भी सनीचर है, किसी न किसी तरह तो वो लाज रख ही

लेंगे।

बिछवा, नाथो और सभी पप्पू का मुँह देख कर सब समझ रहे थे पर जानते थे कि उत्साह बहुत बड़ी चीज होती

है और समय पर काम भी कर जाती है।

नाथो, पप्पू की पीठ ठोकते हुए बोला, डरने की कोई बात नहीं है-- इ स्साला सब हवा में बैट भाँज रहा है-- अभी

तो उसको पता ही नहीं है कि पप्पू की बॅालिंग क्या होती है !

राजो ने भी सोचा हौसला बढ़ाने के अलावा कोई उपाय नहीं है तो उसने भी इसी तरीके से प्रोत्साहन देना शुरू

कर दिया। बरगाही-- मैट्रिक में दो बार लटक चुका है-- और दाढ़ी मूँछ छिलवा कर चकमा देता है-- अभी पता चल

जाएगा स्साले को। पीठ ठोकते हुए, जा-- मजा चखा दे।

पप्पू बेचारा तो अपनी दुर्गति समझ ही रहा था। किसी तरह देह खींच कर तैयार हुआ। कपिलदेव इलेवन टीम ने

जोरदार तालियों से उसका स्वागत किया।

पप्पू आज तक मौजे वाले गेंद से ही खेला था। आज पहली बार कॅारकेट बॅाल हाथ में लिया था, बहुत भारी लगा

उसे। इस बॅाल को लेते ही वह नरभस तो पहले से ही था और हड़बड़ा गया कि कैसे बॅालिंग करेगा। पर करना

तो था ही। बजरंग वली को याद करते हुए काँपते पैरों से दौड़ते हुए गेंद फेंका।

और गेंद यहाँ गिरी, वहाँ गिरी, कहाँ गिरी, क्या पता कहाँ गिरी-- -- -जब तक पप्पू कुछ समझ पाता अंपायर ने

नो बॉल कह दिया।

अंय, ये नो बॉल क्या होता है-- पहले तो कभी नहीं सुना। बजरंग टीम के खिलाड़ियों के कान खड़े हो गए। अपने

में फुसफुसा कर बोलने लगे, लगता है इ लोग कोई नई चाल चल रहा है-- बुड़बक समझते हैं-- नो बॉल दस बॅाल

से क्या होगा-- हम मान नहीं देंगे।

तब तक दर्शकों के बीच में से किसी ने कहा, एक गेंद से क्या होता है पप्पू-- फेंक बेटा फेंक-- जोर लगा कर फेंक--

सब ठीक हो जाएगा।

पप्पू ने फिर हिम्मत बटोर कर गेंद फेंका और इस पर दो रन बना। अब उसका मन तो और घबराने लगा कि

कहाँ फँस गए। इतने लोगों के बीच कितनी बेइज्जती हो रही है। हम पहले ही कहते थे इस मैच वैच के चक्कर में

मत पड़ो-- लेकिन नहीं-- बड़ा जोश चढ़ा था-- तो भोगो-- सबके बीच तमाशा तो हम बन रहे हैं। आदमियों पर

गुस्साते गुस्साते अब भगवान पर भी गरमाने लगा। बेकार ही प्रसाद कबूला, देवी देवता कुछ नहीं करते। इ सब

गोइठा में घी ढारने जैसा है।

अब तो बस किसी तरह ये ओभर पूरा हो जाए, बस्स ! मन में चल रहे इसी अंतर्द्वंद्व के साथ वह गेंद फेंकता

जाता और उधर श्यामपुर टीम रन बनाती जाती।

पप्पू की धुनाई देख कर दर्शक आपस में कानाफूसी करने लगे-- बेकार गेंद फेंकता है-- हम तो पहले से ही समझते

थे। शहर के ऊपरी तामझाम का असर है-- भीतर से कुछ दम नहीं है। इसी पर कपिलदेव इलेवन टीम टिका है--

देख लिया इस टीम की औकात। इतने सारे लोगों के एक एक शब्द उसके माथे पर चौके छक्के की तरह लग रहे

थे।

ओभर का पाँचवीं गेंद जैसे ही फेंका कि अचानक महाराणा की चौड़ी छाती से हरहराता हुआ खून निकलने

लगा। पप्पू खून देख कर और डर गया।

सभी कहने लगे, ये क्या हुआ-- इ खून कैसे !

अंपायर गला फाड़कर चिल्लाया, फर्स्ट एड बॅाक्स !

फर्स्ट -- -- --एड -- -- -बॅाक्स-- -- - ! अंग्रेजी के तीन शब्द ! वो भी एक साथ, ये क्रिकेट का कौन सा नियम है, इ तो

कभी सुने ही नहीं थे। अब क्या करें ! हम तो पहले ही कहते थे, हमको इ मैच वैच अच्छा नहीं लगता है-- पर

मेरी तो कोई सुनता ही नहीं। अब पता नहीं इस अंग्रेजी वाले नियम के हिसाब से और क्या दुर्गति होनी बाकी है

। महाराणा के खून से अधिक पप्पू को पसीना आ रहा था।

तब तक एक बड़ा सा प्लास्टिक का डब्बा लेकर एक लड़का दौड़ता हुआ आया, आते ही उससे दवाई निकाल कर

अंपायर महाराणा को लगाने लगे पर महाराणा तो तमतमाने लगा।

इ तो सरासर बेईमानी है, हारने लगे तो इस पर उतर आये। श्यामपुर टीम के खिलाड़ी भी मैदान में जमा होने

लगे और महाराणा की बातों को सुनकर उनमें एकता के भाव कुछ ज्यादा ही आ गये। सभी गालियों का

शब्दकोश खाली करने लगे। साले-- तोरी माय-- बरगाही-- देख लेंगे-- बता देंगे और न जाने क्या क्या।

बेचारा सा, मरियल सा पप्पू अब तो और अधिक डर गया। पर बिछवा और नाथो माजरा समझते ही उसके

बगल में आकर खड़े हो गए।

माहौल थोड़ा और गरम होता तो शायद बात बढ़ जाती पर अंपायर बीच में बोल उठा, अरे महाराणा खेल में

इतने मगन हो जाते हो कि गले से रुद्राक्ष की माला उतारना ही भूल गए। वही गड़ गया है, बस थोड़ी सी चोट हैं

और पीठ ठोकते हुए महाराणा को खेलने के लिए खड़ा किया।

अपने देह से गरदा झाड़कर महाराणा फिर से खड़ा हो गया और वह पहले से अधिक आक्रामक हो गया, अपनी

चोट का बदला लेने के लिए।

ओभर शुरू होने से पहले पैरों की सुरक्षा के लिए दोनों पैरों में गमछा बाँध कर पैड तैयार किया गया और माथे

पर मुरेठा बाँध कर हेलमेट बनाया गया। पर इस कंपकंपाती ठंड में अपनी कमीज उतार सिर्फ गंजी ही रहने

दिया और माला उतार कर जेब में रख लिया।

ठीक किसी सिनेमा के हीरो की तरह महाराणा लग रहा था।फिल्मी स्टाइल में झुक कर अपने बैट को उठा सूर्य

भगवान को आँखें उठा कर देखा।

उसके इस अंदाज को देखकर पप्पू के अंदर डर और बढ़ गया पर जब उसे भरोसा हुआ कि उसके गेंद ने ही उसकी

ये दशा कर दी है तो उसकी हिम्मत भी बढ़ गई। मन ही मन बजरंग वली से कोसने के लिए माफी मांगी और

पूरी ताकत जमा कर तैयार हो गया। और इस बार फिर बिरनी की तरह उड़ते हुए गेंद फेंका-- -- -।

दर्शक समझने लगे थे एकतरफा मैच हो रहा है। उन्हें अब लगने लगा था कि बराबर की टक्कर होने की संभावना

बढ़ गई है। इस से उनकी उत्सुकता कुछ बढ़ गई।

सबको लग रहा था कि इस बार हो न हो महाराणा आउट हो जाएगा तो श्यामपुर टीम के समर्थकों को लग

रहा था, गुस्से में महाराणा छक्का जरूर लगायेगा। सभी अनुमान लगा ही रहे थे कि, ये क्या -- -- -इस बार तो

टीम की शान, महाराणा तो पूरी तरह आउट हो गया, क्योंकि इसबार गेंद उसके कपाड़ से जा टकराई।

महाराणा तो बीच मैदान में ही अपना माथा पकड़ कर बैठ गया और ये देखते ही सारे दर्शक खड़े हो गए। दो

चार ने कहा, इ तो खेलने के बहाने दुश्मनी निकाल रहा है-- एक रत्ती का तो है और-- । फिर किसी ने एकदम

गुस्साये हुए कहा, अरे मुँह क्या ताक रहे हो-- पकड़ के मारो साले को-- -- -।

दर्शक की भीड़ हल्ला करते हुए मैदान पर उतरने लगी, जैसे आदमियों की बाढ़ हो। जिसे बैट मिला वो बैट से,

जिसे विकेट मिला वो विकेट से ही कपिलदेव इलेवन टीम वालों की धुलाई शुरु कर दी। लोढ़ी, नगिनिया और

जो कुछ दर्शक कपिलदेव इलेवन टीम के समर्थक थे, वे भी अपनी बहादुरी दिखा रहे थे पर संख्या में कम होने के

कारण लात घूसा ही ज्यादा खा रहे थे। एक एक को पाँच पाँच मिलकर मार रहे थे। किसी ने पप्पू को उठा कर

पटक दिया।

कुछ ही देर में खेल का मैदान कुरुक्षेत्र में बदल गया। सभी ईश्वर के दिए अस्त्र का धूआंधार उपयोग कर रहे थे कि

भीड़ में से कोई अपनी फूलती सांस के साथ चिल्लाया, " अरे-- -- -अरे, रुको-- -- -रुको, ये क्या कर दिया-- -- -ये तो

पीरो चा को ही-- -- -- !"

" अंय, पीरो चा !" किसी ने आश्चर्य करते हुए कहा। पीरो चा दोनों गाँवों के लिए सम्मानित व्यक्ति थे।

पीरो चा-- -- -पीरो चा, यह आवाज जैसे जैसे शांति दूत बनकर भीड़ में बढ़ती जा रही थी वैसे वैसे भीड़ फूलती

सांसों के साथ शांत होती जा रही थी।पीरो चा देह का गरदा झाड़ कर लड़खड़ाते हुए खड़े हो गये।उनके माथे से

खून बह रहा था, कराहते हुए बोले, " ई क्या कर लिया खेल खेल में कुश्ती-- -- -!" महाराणा की ओर देखते हुए,

" गलती इसकी भी है-- -- - ऐसे गेंद पर बचना चाहिए न कि छाती तान कर खड़े हो गये।" फिर पप्पू की ओर

देखते हुए, " तुमको भी जरा ढंग से गेंद फेकना चाहिए !" " कोई बात नहीं -- -- -फिर से खेल शुरू करो ", पीरो

चा बोले।

अम्पायर बोला, "पर चचा पहले आपका मलहम पट्टी -- -- -- ।"

" अब इलाज वाला बक्सा मत मँगा लेना-- -- -ई सब थोड़ा बहुत तो होता रहता है-- -- -ई लोग प्रेम से खेलेगा

वही मेरा ईलाज है-- -- -इस खून को तो बस गमछा से पोछ लेंगे और यहीं बैठकर खेल देखेंगे ", पीरो चा बोले।

पीरो चा मैदान से बाहर जाने लगे उनके पीछे भीड़ थी।जो अभी लड़ रहे थे मिलकर खेल देखने के लिए तैयार

थे। मैच शुरू ही होने वाला था कि सबने देखा घुट्टर BDM का बैट लहराते हुए मैदान में घुस रहा था

 

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