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आसमां चादर,जमीं बिस्तरा
आसमां चादर,जमीं बिस्तरा
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© Avinash Mishra

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हम फकीरों का सारा जहां है आशियां| खाली हाथ ही निकल पड़े| जहां रात हुई वहीं सो फुटपाथ पर गए| खाना मिला तो ठीक, वरना एक रात भूखा सोने में बिगड़ता क्या है| मैं हू घनश्याम| वैसे लोग फकीरा के नाम से बुलाते हैं| मैं हमेशा से ऐसा नहीं था| मेरा भी हंसता-खेलता परिवार था| पत्नी और छह साल का बेटा था| गरीब था पर जिंदगी हंसी- खुशी से चल रही थी| एक दिन अचानक एक ऐसा तूफान आया कि मेरे आशियां का तिनका-तिनका बिखर गया| मेरी पत्नी बेटे को स्कूल छोड़ने जा रही थी| अचानक एक तेज रफ्तार बस आई और उनको हमेशा के लिए मुझसे छीन कर चली गई| तबसे हर किसी को कहता हूं कि गाड़ी तेज मत चलाओ पर सब मेरी बात हंसी में टाल जाते हैं| वे कहते हैं कि बाबा अपनी फिलोसफी छोड़ो| तेज रफ्तार जिंदगी का मजा लो| अब मैं उन्हें क्या बताउं कि रोज रात को जब जमीं को बिस्तरा और आसमां को चादर बनाकर सोता हूं तो ऐसी सांसों की डोर को तेज रफ्तार की वजह से कटते देखता हूं| 

सीख रफ़्तार

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