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"चिड़िया" कहानी
"चिड़िया" कहानी
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© Sajida Akram

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काहे को ब्याही बिदेस,

मोहे बाबुल, मैं तो तेरे,

पिजंरे की चिड़िया '

"सभी मेहमान जा चुके है, मैं घर के वन्दनवारों को देखता हूँ ।वो भी शायद मेहमानों की चिल्लापों,उधम से राहत पाकर ख़ामोशी से आरामफरमा रहे हैं।

घर का एक-एक कोना मेरे मन की तरह सूना-सूना हो गया है, कानों में अभी तक विदाई का रोना गूंज रहा है, कैसी रीति-नीति है, इस जीवन में जिसे सहेजे वही छूट जाता है ,अपना कुछ नहीं सब नशवर, क्षणिक......!

'सारी बातें एक सपने सी लगती है, मैं अंदर कमरे जाता हूँ, तो लगता है जैसे कौने में रखे स्टूल पर जूते के ख़ाली डिब्बे घास-पूस जमाकर वो चिड़िया का एक नन्हा सा बच्चे को रखे बैठी है।

मुझे याद आता है वो वक़्त... जब वो पुकारती ...पापा देखो ...पापा देखो पापा की ओर दोनों हथेलियों पर नन्हा बिना पंख का नंगा चिड़िया का बच्चा जो ठीक से अपने पैरों पर बैठ भी नहीं पा रहा था अपनी दोनों भुजाओं को टीका कर बैठा था।

अरे, ये कहाँ से ले आईं, उसने आंखों मेंं चमक लाकर अपनी धवल दंतपंक्ति खोलकर पड़ोसन के घर की ओर इशारा किया ....आंटी के घर से ।

'...पता है ,पापा' आंटी के घर में बिजली के मीटर पर चिड़िया का घोंसला है उसमें तीन-चार बच्चे हैं ,वहीं से गिर गया था।

"चल वापस रख दे ,नहीं तो मर जाएगा बेचारा ,मैनें थोड़ा सा डाँँटते हुए कहा,उसने कोशिश कर के बच्चे को घोंसले में रख दिया ।

शाम को ऑफिस से लोटा ,तो कमरे के कौने में स्टूल पर डिब्बे में घास -पूस रखकर उसी बच्चे को लिए चिमटी में चावल का दाना फंसा कर चुगा रही थी ,मेरी आहट पा कर मुस्कुरा कर 'देखो पापा, 'उसकी आंखों में चमक थीं । वो ज्यों ही बच्चे को थोड़ा हिलाती ,वो चीं-चीं करके मुँँह.फाड़ देता ,वो झट से चिमटी से उसके हलक में डाल देती थी।

"पगली उसके गले में लग जाएगी ।

नहीं में इसे सुबह से खिला रही हूं, मैं उसकी युक्ति को और चिड़िया के बच्चे के प्रति इस मोह को देखकर मुस्कुरा उठा।

अनायास ही न जाने कैसा भाव उभर आया था ,अब देखो कितनी जल्दी बड़ी होती हैं , लड़कियां ..।

देखना एक दिन ये भी फुर्र से उड़ जाएगी, तब अनायास ही उसके आंसू भर आए ,उसने चिड़िया के बच्चे को छोड़ मेरे सीने पर हौले से घूंसे मार दिए ,पापा अबकी बार ऐसे बोले तो न मुझसे बुरा कोई नहीं होगा । मैं कहीं नहीं जा रही आप लोगों को छोड़ कर,

फिर किचन में जाकर सुबक-सुबक कर रोने लगी अपनी माँ से लिपट कर मैं भी उसे चुप कराने किचन में चला गया ।

'चिड़िया के बच्चे को बढ़ा होते देखते हुए मैं उसे भी बढ़ा होता देख रहा था ,समय पर खाना-पानी का ध्यान रख रही थी,सम्पूर्ण नारी के गुण दिख रहे थे , मैं मन में ईश्वर की अनुपम लीला को देखकर भाव-विभोर हो उठता, ईश्वर भी कैसा कलाकार हैं स्वतः ही सबको अपनी ज़िम्मेदारी निभाना सिखा देता है।

उसका गोल -मटोल सलोना सा चेहरा बड़ी-बड़ी चमकदार आंखें और तीर -कमान सी भोहों....।

वो कई बार कहती ,भोहों को छूकर पापा देखो में आप पर ही गई हूँ ,मैं उसके भोलेपन पर गदगद हो जाता ।

मैं ईश्वर को धन्यवाद देता हैं तुने मुझे बेटी दी है कितना सुखद होता है ,फिर आक्रोश आता उन लोगों पर जो बेटे के चक्कर में भ्रुण हत्या करते है ।

बेटी ईश्वर की असीम कृति होती है।

बेटी ही लक्ष्मी, पार्वती, दुर्गा, और मरियम होती है,

मैनें देखा तो चिड़िया के बच्चे को बाहर कमरे में लाकर ज़मीन पर दाना फैला कर उसे चुगते हुए देख रही थी ।

बच्चा अब काफी बढ़ा हो गया था सो चीं-चीं करते पंख फड़फड़ाते ख़ुद ही दाना चुग रहा था।हम दोनों पति-पत्नी अखबार पढ़ रहे थे ,मैनें अनायास ही फुर्र से आवाज़ सुनी ।

चिड़िया का बच्चा कमरे से निकल कर बिजली के तार पर जा बैठा था, "पापा-पापा मेरा बच्चा पकडो उसे, मैं भी बेहताशा बाहर भागा हुर्र-हुर्र कर उसे उड़ना चाह सोचा जमीन पर आ गिर जाएगा तो पकड़ लूंगा ।

मगर वो तै पूंछ ऊपर नीचे कर दूर कहीं उड़ गया ,हम सब मुंह लटकाए हताश से अंदर आ गए ।

पापा मेरा बच्चा ,कैसे उड़ गया ,मैनें उसे पाला था कैसे उड़ गया बेटी चिड़िया ऐसे ही उड़ जाती है बड़े हो कर ,देखना तु भी ऐसे ही एक दिन हमको अकेला छोड़ कर, हमने भी तो तुझे पाल पोस कर बढ़ा किया है, वो आंसुओं का सैलाब लिए पापा के सीने से लिपट गई........

जैसे अभी दो दिन पहले अपनी बिदाई पर रोई थी वैसे ही, पीछे न जाने कब पत्नी आकर खड़ी हो गई और मुझसे बोली आंखों में आंसू भरकर "अपनी चिड़िया"भी उड़ गई......।

बेटी पिता मायका रीत

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