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कश्मकश
कश्मकश
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© Rakesh Kumar Nanda

Inspirational

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ये कहानी है एक ही शहर में रहने वाले नौ लोगों की, जो अलग अलग परिस्थितियों में अपनी ज़िन्दगी जी रहे हैं। जिंदगी को देखने का सबका अपना अपना अलग नज़रिया है, इसलिए इनकी जिंदगी की समस्याएँ भी अलग अलग है। एक दिन शहर में एक धार्मिक संस्था "संकल्प" द्वारा, एक अंतर्जातीय विवाह में एक दलित समुदाय द्वारा एक हिन्दु युवक की हत्या के विरोध में, एक दिन के " शहर बंद" का आह्वाहन किया जाता है। वैसे तो हर आम आदमी क लिए "बंद" एक मुसीबत से भरा दिन होता है, पर उस दिन बंद के दौरान ये नौ लोग ऐसी परिस्थिति में पड़ते हैं जिससे इनकी जिंदगी हर तरह से बदल जाती है। किसी की जिंदगी के प्रति उसकी सोच बदल जाती है तो किसी को उसकी जिंदगी की समस्या का हल मिल जाता है।

 

कहते हैं के इंसानियत की कोई धर्म कोई सरहद नहीं होती। जो इन्सान अपने अन्दर की इंसानियत को खोज लेता है उस दिन वो बाकी लोगों से काफी ऊपर उठ जाता है। वही आदमी ही सही मायने में ज़िन्दगी को अपनी शर्तों पे जी पाता है। ऐसी ही कहानी है अशोक प्रसाद की। अशोक प्रसाद और शमीम मल्लिक का आपस में रिश्ता मजदूर और मालिक का है। अशोक प्रसाद एक गरीब देहाड़ी मजदूर है, 150 रूपय प्रतिदिन की मजदूरी पे उसका घर चलता है। धर्म से कट्टर ब्राह्मण। चार बेटी और एक बेटे के पिता अशोक को अपना घर चलाने क लिए दिन रात एक एक पैसा जोड़ना पड़ता है। गरीबी का आलम ये है के आजकल के आधुनिक युग में भी उस के घर में टेलिविजन नहीं है।े अशोक प्रसाद का भगवान पे बहुत भरोसा है।

 

शमीम मल्लिक उस प्लांट का हेड ऑफिसर है जहाँ अशोक प्रसाद काम करता है। शमीम हमेशा अपनी ज़िन्दगी में आगे बढ़ना चाहता है। वो प्रमोशन लेकर प्लांट का चीफ डायरेक्टर बनना चाहता है। इसीलिए वो खुद दिन रत मेहनत करता है और अपने मजदूरों से भी बुरी तरह मेहनत करवाता है। इस कारण मजदूरों के दिल में उनके लिए गुस्सा है, खासकर अशोक के दिल में क्यों की उसका और शमीम का मजहब भी अलग है। अशोक कट्टर ब्राह्मण है और शमीम मुस्लिम। "बंद" वाले दिन अधिकांश मजदूर काम पे नहीं जाते, पर अशोक को काम पे जाना होता है क्यों की वो दिन भर में जितना कमाता है उसी से उसका घर चलता है। शमीम के प्रमोशन के लिए प्लांट के मेनेजमेंट की और से कुछ बड़े ऑफिसर उसका काम देखने आने वाले होते हैं इसलिए उसे भी उस दिन प्लांट जाना पड़ता है।

 प्लांट से कुछ दूर आगे शमीम की कार खराब हो जाती है। "बंद" होने की वजह से उसे कोई सवारी गाड़ी भी नहीं मिलती है। अशोक भी उसी रास्ते से अपने पुराने स्कूटर पे जा रहा होता है। समय का खेल ऐसा होता है के प्रमोशन के चक्कर में शमीम को ना चाहते हुए भी अपने मजदूर से मदद लेनी पड़ती है। चूँकि बंद के वजह से ज्यादा लोग काम पे नहीं आते इसीलिए शमीम को इस बात का संतोष रहता है के उसे उसके मजदूर क साथ कोई देखेगा नहीं। अशोक भी ना चाहते हुए शमीम को अपने स्कूटर पे बिठा लेता है।

 शमीम को ऑफिस छोड़ने के बाद अशोक के मन में घृणा भाव उत्पन्न होता है के उसने एक मुस्लिम को अपने स्कूटर पे बिठाया जो गोमांस खाते हैं। इसलिए प्लांट पहुँच के अशोक अपने स्कूटर को शुद्ध करने के लिए उसे पानी से धो डालता है। उधर मेनेजमेंट के लोग अपनी तसल्ली के लिए अनाधिकारिक रूप से एक बार प्लांट साईट जा कर शमीम के काम को अपनी आँखों से देखना चाहते हैं इसलिए शमीम उनको प्लांट साईट पे ले जाता है। बंद के वजह से कोई मजदूर काम पे नहीं आया होता है। अशोक वहां अकेले काम कर रहा होता है। शमीम वहां पहुँच के अशोक को एक मशीन चलने को कहता है और खुद मेनेजमेंट के लोगों को उस मशीन के बारे बताने लगता है। तभी वो देखता है के ऊपर से कोई भारी माल अशोक के ऊपर गिरने वाला होता है। वो अशोक को धक्का दे के उसे वहां से हटा देता है पर वो भारी माल शमीम के पैरों में गिर जाता है। अशोक के मन में एक झटका लगता है के जिस आदमी को वो पसंद नहीं करता था उसी आदमी ने आज उसकी जान बचाई थी। शमीम का पैर बुरी तरह घायल हो गया होता है। उसके पैर से खून निकल रहा होता है। अशोक मेनेजमेंट के लोगों को एम्बुलेंस बुलाने को कहता है। चूँकि ये एक अनाधिकारिक आगमन था इस वजह से मेनेजमेंट के लोग इस हादसे से डर जाते हैं। उन्हें लगता है के वो लोग फंस गये हैं इसलिए वो लोग अशोक को भी पैसों का लालच दे कर उसे वहां से भाग जाने को कहते हैं। पर अशोक का इमान उसे वहां से जाने नहीं देता। शमीम दर्द से कराह रहा होता है। मेनेजमेंट के लोग डर से उसे उसी हाल में छोड़ के चले जाते हैं। प्लांट क साईट बोर्ड पे एम्बुलेंस का नंबर लिखा होता है पर अनपढ़ होने की वजह से अशोक उस बोर्ड पे लिखा नंबर पढ़ नहीं पाता। कोई चारा न पाकर अशोक माल उठाने की हाथ गाड़ी ले के आता है। उसमे वो शमीम को लेटा कर खुद हाथ गाड़ी खिंच के शमीम को प्लांट में स्थित प्राथमिक चिकित्सालय पहुंचता है। वहां से शमीम को एम्बुलेंस की मदद से अस्पताल पहुँचाया जाता है। इस वक़्त तक अशोक के मन में हिन्दू मुस्लिम जैसी कोई भावना शेष नहीं रहती। डॉक्टर बताते हैं के अशोक समय रहते अगर शमीम को अस्पताल नहीं पहुंचाता तो गहरे घाव की वजह से अगर पैर में जहर फ़ैल जाता तो पैर काटना पड़ सकता था। अशोक को ये जानकर गहरा सुकून मिलता है। तभी उसका ध्यान अपने खून से सने कपड़ो में जाता है। उसका जनेउ जो ब्राह्मण का प्रतीक चिन्ह होता है उसमे भी खून लगा होता है वो भी मुस्लिम का। उसी मुस्लिम का जिसने उसके बच्चों को आज अनाथ होने से बचाया था। ये सोचते सोचते वो अस्पताल के दीवार पे लिखे महाभारत के एक श्लोक पर जाता है- " कर्मण्ये वाधिकारस्ते माँ फलेषु कदाचन...."एक ब्राह्मण होकर भी वो गीता के इस पवित्र बात को अपनी निजी ज़िन्दगी में भूल चुका था। इस तरह अशोक का अपने जिंदगी और अपने बॉस के प्रति नजरिया बदल जाता है। शमीम को भी होश आने के बाद लगता है जिन मजदूरों के प्रति वो इतना कठोर व्यवहार करता था उसी में से एक ने आज उसे एक नई जिंदगी दी। वो मन में ठान लेता है के वो अब से मजदूरों पे काम का दवाब नहीं डालेगा और उनके हर त्यौहार में शामिल होगा। उनके साथ उनका बन के रहेगा।

 कभी कभी छोटी छोटी उलझनें भी बड़ी बड़ी मंजिलों का रास्ता खोल देती है। जिन्हें हम छोटा समझते है वो हमें जिंदगी की राह दिखा जाते हैं। ऐसी ही कुछ दास्ताँ है ऑटोरिक्शा चालक नारायण और उसके ऑटो में जाने वाले एक स्चूली बच्चे तरुण की। नारायण तीस साल का नौजवान है जिसने दुसरे जात की लड़की से प्रेम विवाह किया था, इसलिए मजबूरन उसे अपना घर छोड़ना पड़ा। जब उसे बेटा हुआ और उसकी जिम्मेदारी बढ़ी तो उसने एक ऑटोरिक्शा किराये में ले कर चलाना शुरू किया। पर दिन भर ऑटो चला के भी वो इतना नहीं कमा पाता के मालिक को उसका हिस्सा दे कर भी वो अपने परिवार के लिए ज्यादा कुछ बचा सके। अब तो उसकी पत्नी भी कभी कभी उसपे झल्लाने लगती है। वो अपने बेटे की छोटी छोटी जरूरतें भी पूरी नहीं कर पाता। दूसरी तरफ तरुण के पिताजी बैंक में मेनेजर थे तो तरुण की हर ख्वाहिश पल भर में पुरी हो जाती थी। नारायण ये सब देख कर दुखी होता था के वो अपने बेटे के लिए कुछ नहीं कर पा रहा।

 बंद वाले दिन नारायण के बेटे का जन्मदिन होता है। वो अपने पिता से उपहार में तीन सौ रूपये की खिलौना हेलिकॉप्टर मांगता है जो उसने कुछ दिन पहले एक बड़े से दुकान में देखा था। तब उसके पिता ने उससे वादा किया था के वो उसके जन्मदिन पे उसे ये हेलिकॉप्टर उपहार में देंगे। बंद वाले दिन जहाँ सभी ऑटो वाले मनमाना किराया वसूल करते हैं वहीँ नारायण दिन भर में सिर्फ तीन सौ रूपए ही जमा कर पाता है जिसमे से दो सौ रुपये उसे उसके मालिक को देने होंगे। सौ रूपये में वो अपने बेटे के लिए क्या लेगा ये सोच सोच के अपने मन में तरुण को अगवा कर उसके परिवार से फिरौती वसूलने की सोचता है।

 दोपहर में छुट्टी के वक़्त नारायण तरुण को उसके स्कूल से लेने जाता है और मन ही मन अपने सोचे हुए प्लान को अंजाम देने की सोचता है। तरुण को ले कर वो नियत रास्ते से अलग रास्ते में निकल जाता है। तरुण को नारायण के इस बात पर संदेह होने से नारायण उसे बताता है के बंद होने की वजह से उसने ये छोटा रास्ता लिया है क्योंकि हो सकता है के लम्बा रास्ता बंद की वजह से जाम हो। तरुण को लेकर वो काफी दूर निकल जाता है। पर उसे ऐसी कोई जगह नहीं मिलती जहाँ वो तरुण को छिपा के रख सके। देर होने की वजह से तरुण को भूख लगने लगती है। वो नारायण को तंग करने लगता है के वो उसके खाने के लिए कुछ ले के आये।। नारायण परेशान होकर उसे थोडा झिड़क देता है, पर बाद में अपने गुस्से को संभालता है। अब तक नारायण तरुण को ले कर शहर से लगभग बाहर आ चूका होता है। काफी दूर जाने के बाद उसे एक चाय की दुकान दिखती है। वहां वो तरुण के लिए कुछ लेने को रुकता है। वहां पहले से ही कुछ बदमाश लोग रहते हैं। उनमे से एक की नज़र तरुण के गले की चैन पे पड़ती है। वो तरुण को देख कर समझ जाते हैं के वो एक अमीर परिवार से ताल्लुक रखता है। सुनसान जगह देख कर वो लोग नारायण को वहीँ मारकर तरुण को अगवा करने की सोचते हैं। उनमे से एक आदमी छुरी ले के नारायण को मारने आगे बढ़ता है। तरुण ये देख लेता है। जैसे ही वो आदमी नारायण को मारने आगे बढ़ता है तरुण उस आदमी के हाथ में काट लेता है। वो आदमी तरुण को जोर से थप्पड़ मारता है। तरुण ज़मीन पे गिर जाता है। उसे चोट लग जाती है। नारायण ये देख कर सहम जाता है। अभी कुछ देर पहले वो जिस बच्चे को हानि पहुँचाने की सोच रहा था उसी बच्चे ने उसकी जान बचायी। बात सही है के अगर आप किसी को धोखा देने में सफल होते हैं तो इस बात का जश्न न मनाये बल्कि ये सोचे के जिसे आपने धोखा दिया उस आदमी को आप पे कितना बिस्वास था।

 अब नारायण की सोच बदल गयी थी। उसके मन का पछतावा उसके मन की मुक्ति का मार्ग खोल देता है। वो उन बदमाशों से मुकाबला करता है और चोटिल तरुण को वहां से बचा के ले भागता है। वो एक दवाखाने में तरुण की मरहम पट्टी करवाता है। उसमे साठ रूपए खर्च हो जाते हैं। अब उसके पास सिर्फ दो सौ चालीस रूपए बचते हैं। अब वो सोचता है के वो अपने बेटे के लिए खिलौना हेलीकाप्टर कैसे लेगा? आगे जाकर नारायण की ऑटोरिक्शा ख़राब हो जाती है। वो तरुण को ऑटो में बिठा कर मैकेनिक ढूंढने निकलता है। बंद की वजह से उसे बहुत मुश्किल मैकेनिक मिलता है। उसे लेकर जब नारायण ऑटो के पास पहुँचता है तो वहाँ तरुण को ना पाकर वो घबरा जाता है। तभी तरुण पीछे झाड़ियों से बाहर निकलता है। नारायण के पूछने पर वो बताता है कि वो टॉयलेट करने गया था। ये सुनकर नारायण के जान में जान आती है। ऑटो ठीक करने में सौ रूपए और खर्च हो जाते हैं। अब नारायण अपने बेटे के लिए उपहार लेने की आशा छोड़ देता है, पर उसके दिल में इस बात की ख़ुशी होती है कि उसने तरुण को बचा लिया। वो तरुण को घर छोड़ने निकल पड़ता है।

 सुना है के जोड़ियाँ उपरवाला बनाता है, पर उनमे से कितनी जोड़ियाँ सफल हो पाती है? पर इन्सान खुद जमीन पे ऐसी बेमेल जोड़ियाँ बना लेता है जो सफल ही नहीं होती बल्कि लोगों के लिए एक मिसाल भी बन जाती है। ऐसी ही एक बेमेल जोड़ी है विशाल और अनीशा की। दोनों पडोसी हैं, दोनों एक ही कॉलेज में पढ़ते हैं, पर दोनों में अभी तक दोस्ती नहीं हुई। क्यों? क्योंकि जहाँ विशाल देखने में स्मार्ट, हर वक़्त लड़कियों से घिरा रहने वाला लड़का है वहीँ अनीशा इस के ठीक उलट आँखों पर चश्मा डाले, दिन भर किताबों में डूबी रहने वाली, मोटी और बोरिंग लड़की है। सामान्यत: आजकल के जवान लड़के इस तरह की लड़कियों से दूर भागते हैं। पर अनीशा के भी अरमान हैं के कोई उससे प्यार करे। माँ के गुजर जाने के बाद वो बिलकुल तनहा हो गयी है। पिता शमीम मल्लिक दिन भर अपने प्लांट के काम में व्यस्त रहते हैं। अनीशा अपने दिल की बात करे भी तो किस से? इसलिए उसने अपना मन किताबों में लगाना शुरू कर दिया। किताबों से ही प्यार करने लगी। पर किताबों के सहारे जिंदगी तो नहीं कट सकती? और इस उम्र में दिल को भी एक साथी चाहिए होता है। वो पड़ोस में रहने वाले विशाल से काफी आकर्षित रहती है। वो कभी कभी छुप कर विशाल को उसके जिम में कसरत करते देखती है। उसके गठीले बदन को देख मन ही मन आंहे भरती है। अनीशा वो सारी हरकतें करती है जो एक लड़का एक लड़की को देखने के लिए, उसके करीब जाने के लिए करता है।

 विशाल को पसंद करने के लिए अनीशा के पास कई कारण हैं। विशाल देखने में अच्छा है, नेकदिल है, सबकी मदद को तैयार रहता है। पर विशाल के पास अनीशा को पसंद करने के लिए एक भी वजह नहीं है। ऊपर से एक और समस्या- विशाल की प्रेमिका कामिनी। अपने नाम की तरह कामिनी देखने में भी काफी खुबसूरत थी। अनीशा भी उसी की तरह दिखना चाहती थी पर उसे पता था के ये मुमकिन नहीं है। इसलिए अनीशा अपने दिल की सारी बात अपनी सहेली सुमन को बताती है। सुमन सब कुछ सुन के अनीशा को सुझाव देती है के जो दिखता है वही बिकता है, और अनीशा के पास तो दिखाने के लिए बहुत कुछ से भी बहुत ज्यादा है। दरअसल सुमन ने अंगप्रदर्शन के जरिये लडको को अपनी ओर रिझाने की बात कही। भोली भाली अनीशा सुमन की बातों में आ जाती है। सुमन अनीशा को ब्यूटी पार्लर ले जा कर उसका मेकओवर करती है और न चाहते हुए भी अनीशा को छोटे कपडे पहनवाती है। अनीशा ये सब कुछ डर डर के कर रही थी सिर्फ और सिर्फ विशाल का ध्यान पाने के लिए। कॉलेज पहुँचने पर अनीशा को इस रूप में देख कर सभी उसका मजाक उड़ाते हैं। अनीशा ये सब बर्दास्त नहीं कर पाती और रोने लगती है। तभी विशाल वहां आता है और उसका मजाक उड़ा रहे लोगों को वहां से भगा देता है। वो अनीशा को एक सलाह देता है कि किसी दुसरे की बात में आ के ऐसा काम नहीं करना चाहिए जिसकी इजाजत हमे हमारा दिल नहीं देता, चाहे ये काम अनजाने में ही क्यों न किया गया हो। विशाल से थोडा ध्यान पाकर अनीशा अपने सारे गम भूल जाती है और विशाल को पहले से ज्यादा चाहने लगती है।

 बंद वाले दिन कॉलेज बंद रहता है। अनीशा पढाई में लगी रहती है और छुट्टी का दिन पाकर विशाल भी जिम में कुछ देर बिताने की सोचता है। अनीशा का मन पढाई में नहीं लगता। उसे विशाल की बातें याद आने लगती है। वो अपने कमरे की खिड़की में लगी दूरबीन से विशाल के घर में ताक - झांक करने लगती है। अब तो ये उसकी आदत बन चुकी होती है। विशाल अपने जिम में तेज आवाज़ में संगीत सुनते हुए कसरत कर रहा होता है। दूरबीन से देखते वक़्त अचानक अनीशा की नज़र बगल के कमरे में बिस्तर पे पड़ी विशाल की माँ पे जाती है। शायद उन्हें सिने में तेज दर्द हो रहा होता है, वो विशाल को मदद के लिए पुकार भी रही होती है पर संगीत तेज आवाज़ में विशाल कुछ सुन नहीं पाती। अनीशा को समझ में नहीं आता कि वो उनकी मदद कैसे करे? वो विशाल के सामने जाने से झिझक महसूस करती है क्योंकि वो मन ही मन विशाल को चाहती है। इसलिए वो उससे बात तक करने से शर्माती है। अत: वो अपनी सहेली सुमन को फ़ोन कर सारी बात बताती है। वो सुमन को कहती है के वो विशाल को फ़ोन कर के उसे उसकी माँ के बारे बताये। सुमन अनीशा को ये कहते हुए मना कर देती है के अगर विशाल उससे ये पूछेगा के उसे ये सब कैसे पता तो वो उसे क्या बोलेगी? वो अगर सच बोलेगी तो विशाल को पता चल जायगा के अनीशा उसके घर में दूरबीन से ताक झांक करती है। अनीशा अब परेशान हो जाती है। उसे विशाल के सामने जाने की हिम्मत नहीं हो रही होती है। उधर विशाल की माँ की तबियत धीरे धीरे बिगडती जा रही थी। कोई रास्ता ना देख अनीशा उनकी मदद करने की सोचती है और एक पल के लिए विशाल के लिए अपने प्यार को भूल जाती है।

 वो सोचती है कि क्या किया जाये? अगर दरवाजे की घंटी भी बजाई जाये तो भी विशाल उसे सुन नहीं पाएगा। इसलिए वो विशाल के जिम की खिड़की पे पत्थर फेंकती है। पत्थर से खिड़की का कांच टूटता है और ये देखने के लिए के बाहर कौन है वो संगीत बंद कर देता है। तभी उसकी माँ की आवाज़ उसके कानों में पड़ती है। वो बदहवास हो के उनकी तरफ भागता है। अनीशा अपने कमरे से ये सब देख रही होती है। विशाल को अपनी माँ को अस्पताल पहुँचाने के लिए कोई सवारी नहीं मिलती। विशाल कामिनी को फ़ोन कर उसे अपनी कार लाने को कहता है पर कामिनी बंद के वजह से घर से बाहर निकलने से डरती है और विशाल को कहती है के वो अपने किसी और दोस्त को बुला ले, वो नहीं आ पाएगी। विशाल गुस्से और परेशानी से पागल होने लगता है। अनीशा ये सुनिश्चित करती है के भले उसे विशाल का प्यार मिले या न मिले पर वो हिम्मत दिखाएगी। वो विशाल की मदद करेगी और उसकी माँ को कुछ नहीं होने देगी। क्योंकि माँ के नहीं होने का दर्द उसे पता था। वो विशाल के घर जाती है और उसे सब सच बता देती है कि उसने दूरबीन से सब देखा। ये सब सुन के विशाल भी थोड़ी देर के लिए चौंक जाता है। विशाल उसे सारी बात बताता है। अनीशा कहती है के उसके पास उसके पापा की पुरानी कार है पर एक समस्या ये है के कार के एक बार चालू हो जाने के बाद उसे किसी भी जगह बंद नहीं करना है क्योंकि एक बार बंद होने के बाद ये फिर दोबारा चालू नहीं होगी। विशाल कहता है के वो इस बात का ध्यान रखेगा। वो लोग विशाल की माँ को ले के निकलने वाले ही होते हैं के तभी अनीशा को एक फ़ोन आता है और उसे अपने पिता शमीम मल्लिक के घायल होने की सुचना मिलती है। अनीशा थोड़ी देर के लिए सदमे में चली जाती है। पर डॉक्टर बताते है के शमीम अभी बेहोश है पर खतरे से बाहर है। अनीशा खुद को संभालती है और पक्के इरादे के साथ विशाल की माँ को ले के निकल पड़ती है। विशाल भी अनीशा के इस फैसले की मन ही मन तारीफ करता है।

 रास्ते में पता चलता है के कार में पेट्रोल कम है और बंद की वजह से पेट्रोल पंप भी बंद रहते हैं। तभी रास्ते में आगे "संकल्प" संस्था के कुछ लोग बंद करवाने के लिए रास्ता जाम किये रहते हैं। वो लोग विशाल को वापस लौट जाने को कहते हैं। अनीशा विशाल को कहती है कि वो कार बंद न करे और वो खुद उन लोगों से बात करने चल पड़ती है। उन लोगों की भीड़ में से एक लड़का वो भी था जिसकी सड़क दुर्घटना में कभी अनीशा ने मदद की थी। वो अनीशा को पहचान लेता है और अपने लोगों को समझाता है के वो लोग अनीशा को आगे जाने दे। अनीशा भी उन्हें समझाती है कि हमलोग एक ही समाज में रहते है ऐसे बंद रास्ता जाम कर के हम अपने ही लोगों की परेशानी बढ़ाते हैं। अनीशा की बात का उनपे असर होता है और वो लोग रास्ता जाम हटा लेते हैं। विशाल ये सब देख रहा होता है और अनीशा की सादगी और नेकदिली देख उसे पसंद करने लगता है। तब तक कार में पेट्रोल ख़त्म हो जाता है और सब परेशान हो जाते हैं। तब अनीशा की बातों से प्रभावित "संकल्प" संस्था वाले अनीशा को अपनी कार मदद के लिए दे देते हैं। अनीशा विशाल की माँ को समय पे अस्पताल पहुंचा देती है। जब विशाल की माँ होश में आती है तो विशाल से अनीशा के बारे में सुन के अनीशा से प्रभावित होती है। वहीँ विशाल अनीशा के रूप में अपने लिए सही लड़की चुन चुका होता है।

 क्या कभी ऐसा हुआ के शेर ने शिकार करने की कोशिश की हो और खुद शिकार ने उसी का शिकार कर लिया हो? रसिकलाल मेहता के साथ नेहा ने कुछ ऐसा ही किया। दरअसल नेहा एक मध्यमवर्गीय परिवार की लड़की थी जो रसिकलाल मेहता के गहनों की दुकान में सेल्स गर्ल का काम करती थी। अपने नाम की तरह रसिकलाल एक रंगीन मिजाज आदमी था। वो अपनी दुकान में सिर्फ लड़कियों को ही काम पे रखता था। दुकान में काम करनेवाली या तो लड़कियां थी या कम उम्र की गृहिणियां जो रसिकलाल के यहाँ इसलिए काम करती है ताकि उनका घर चल सके। इनमे से कुछ रसिकलाल की गन्दी नियत का शिकार हो चुकी होती हैं। जो लोग उसके इस काम में मजबूरी के वजह से साथ देने लगी वो उनकी तनख्वाह बढ़ा देता था पर जो इसका विरोध करती वो उनपे चोरी का इल्जाम लगा के नौकरी से निकाल देता था। इन सभी लड़कियों में नेहा सबसे सुन्दर थी। रसिकलाल की बुरी नजर काफी दिनों से उसपर थी। नेहा भी रसिकलाल के मिजाज़ से वाकिफ थी पर अपना घर चलाने के लिए उसकी गन्दी नज़रों को खुद को छु जाने देती थी। पर उसने मन में ये ठान रखा था कि मज़बूरी के लिए कभी भी अपने इज्जत का सौदा नहीं करेगी।

 रसिकलाल को जिस सुनहरे मौके का इंतजार था, बंद उसके लिए वो मौका लेकर आया। बंद वाले दिन वो अपने सारे कर्मचारियों को छुट्टी दे देता है पर सिर्फ नेहा को बाद में फोन करके ये कह के बुला लेता है कि उसके काम के हिसाब में कुछ गलती पाई गयी और उसे आज ही दुकान आ कर हिसाब ठीक करना होगा। नेहा आने से मना करती है तो रसिकलाल कहता है दुकान बाज़ार में काफी अन्दर है और दोपहर तक बंद का असर कम होने लगता है तो दुकान खुली होने से भी बंद का इस पे कोई असर नहीं पड़ेगा। नेहा को ना चाहते हुए भी दुकान जाना पड़ता है। रसिकलाल मेहता ने अपने दुकान में अपने कर्मचारियों की नियमित उपस्थिति दर्ज करने के लिए एक इलेक्ट्रॉनिक पंचिंग मशीन लगा रखा था, जिसपे कर्मचारियों के ऊँगली की छाप से उनकी उपस्थिति दर्ज होती थी। बंद वाले दिन जब नेहा दुकान गयी तो रसिकलाल ने उसे पंचिंग कर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने से मना कर दिया, क्योंकि उस दिन दुकान अधिकारिक रूप से नहीं खोली गयी थी। इस से रसिकलाल का ये फायदा होता के अगर वो नेहा के साथ कुछ गलत करता तो ये बोल के बच सकता था कि नेहा तो उस दिन दुकान आयी ही नहीं थी।

 रसिकलाल शुरू से ही नेहा को अपने जाल में फंसने के लिए उसकी खातिरदारी शुरू कर देता है। वो नेहा के लिए आइसक्रीम मंगाता है, उसके पहने कपड़ो की तारीफ करता है। काम करते वक़्त वो लगातार नेहा को घूरता रहता है। ये सब बात नेहा अपने कान में लगे ब्लूटूथ डिवाइस के जरिये अपने बॉयफ्रेंड प्रवीण को बताते रहती है, जो उसे दुकान छोड़ने आया था और नेहा की सुरक्षा के लिए दुकान से थोड़ी ही दूर पे खड़ा रहता है। जैसे जैसे समय बिताता है रसिकलाल का हौसला भी बढ़ता जाता है। अब वो कुछ कुछ बहाने से नेहा को छुने की कोशिश करने लगता है। नेहा भी किसी तरह खुद को बचाने में लगी रहती है। थोड़ी देर बाद भोजन अवकाश का समय हो जाता है और रसिकलाल दुकान का शटर गिरा देता है। रसिकलाल इसी मौके की तलाश में था। अब वो नेहा से बिलकुल सट के बैठ जाता है। नेहा के माथे से पसीना छुटने लगता है। जब रसिकलाल नेहा को छुने की कोशिश करता है तो नेहा इसका विरोध करती है। ये सब बात प्रवीण ब्लूटूथ से सुन लेता है और नेहा को बचाने चल पड़ता है। वो दुकान के शटर पे जोर से आवाज़ करता है जिससे रसिकलाल घबरा जाता है। उसके पूछने पर कि कौन है प्रवीण कहता है कि वो बगल का एक दुकानदार है और उसे हज़ार रूपए के छुट्टे चाहिए। रसिकलाल ये कह के उसे भगाने की कोशिश करता है कि वो अभी खाना खा रहा है बाद में आ के वो छुट्टे ले जाये। रसिकलाल नेहा को धमकाता है कि अगर उसने शोर मचाने  की कोशिश की तो वो उसे मार डालेगा। नेहा समझ जाती है कि प्रवीण आ गया है।

 अब रसिकलाल नेहा को शादी का प्रलोभन देता है कि अगर वो मान जाएगी तो वो उससे शादी कर लेगा। इससे उसकी इज्जत भी रह जायगी और वो पुरी दुकान की मालकिन बन जाएगी। नेहा फिर भी नहीं मानती तो रसिकलाल अब उससे जबरदस्ती करना शुरू करता है। वो नेहा का मुंह दबाने लगता है। नेहा हाथ पांव मारने लगती है और रोने लगती है। तभी शटर में फिर जोर की आवाज़ होती है। प्रवीण रसिकलाल को आवाज़ लगा के पूछता है  उसका खाना हो गया या नहीं, क्योंकि उसके ग्राहक उसका दुकान में इंतजार कर रहे हैं। रसिकलाल ये सुन के भड़क जाता है और प्रवीण को कहता है कि उसके पास छुट्टे नहीं है और वो वहां से चला जाये उसे तंग ना करे। अब रसिकलाल के हाथ नेहा के वस्त्रों तक पहुँच जाते हैं। नेहा अब प्रवीण का नाम ले के उसे मदद के लिए पुकारने लगती है। प्रवीण अब जोर जोर से शटर खटखटाने लगता है। रसिकलाल समझ जाता है के बाहर नेहा का बॉयफ्रेंड है। वो उसे मारने के लिए लोहे का रॉड हाथ में ले के शटर खोलता है।जैसे ही वो शटर खोलता है प्रवीण रसिकलाल के सिर पे देशी कट्टा तान देता है। रसिकलाल घबरा जाता है और उसके हाथ से रॉड छुट जाता है।

 दुकान के अन्दर दाखिल हो के प्रवीण नेहा को शटर बंद करने को कहता है। मौत को सामने देख रसिकलाल के हाथ पांव फूल जाते हैं। अब वो नेहा को बहन कह के माफ़ी मांगने लगता है। वो प्रवीण को भी धन का लालच देता है। तभी प्रवीण के दिमाग में एक तरकीब आती है। वो पिस्तौल की नोंक पे रसिकलाल के दुकान से सारा नकद लूट लेता है। अब रसिकलाल नेहा के ऊपर इस लूट का इलज़ाम भी नहीं लगा सकता क्योंकि उसने पहले ही नेहा को उपस्थिति दर्ज करने से मना कर दिया था। नेहा और प्रवीण दुकान का सारा नकद लूट कर रसिकलाल को उसी के दुकान में बंद कर, शटर को बाहर से बंद कर के भाग जाते हैं। रास्ते में उन्हें वही ऑटो वाला नारायण मिल जाता है जो अभी अभी तरुण को उसके घर छोड़ के आ रहा होता है। दोनों उसके ऑटो में बैठ जाते हें। नेहा रसिकलाल के दुकान से लूटा हुआ सारा नकद दुकान में काम करने वाली अन्य लड़कियों में थोडा थोडा बाँट देती है ताकि उनको रसिकलाल जैसे आदमी के पास काम ना करना पड़े। दिन ख़त्म होते होते नारायण को भी इतनी लम्बी दुरी का भाडा मिल जाता है। नेहा नारायण को उसकी मदद के लिए खुशी से पांच सौ रूपए देती है।

 शाम हो चुकी होती है। बंद का समय ख़त्म हो चुका होता है। बाज़ार की दुकाने खुल रही होती है। ऐसा लगता है मानो हर किसी के जीवन में एक नए रस का संचार हो रहा हो। नारायण भी अब संतुष्ट मन से अपने बेटे के लिए उपहार लेने निकल पड़ता है। ये शाम कुछ खास होती है क्योंकि इस शाम ने आज हर किसी की जिंदगी की दशा और दिशा बदल के रख दी थी। जिस प्रेम के विरोध में इस बंद का आह्वाहन किया गया था दिन ख़तम होते होते ये बंद सभी के दिलों में प्रेम का ही प्रसार कर गया। खैर अंत भला तो सब भला।

 

 

                                             

कश्मकश " शहर बंद"

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