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© Shiva Aithal

Inspirational

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मुझे स्पष्ट याद है जब मैं  नवींं कक्षा में था. मेरे गाँव की सारी पाठशालाऐं अपना वार्षिक दिवस मनाते थे, और मेरी पाठशाला में भी ये रिवाज पाला जाता था. जितनी तैयारियाँ इन दिनों में नौटंकी और खेल ख़ुद में अव्वल आने हेतु होता था, उतना अगर पढ़ाई में होता तो आज देश की तस्वीर कुछ और होती. ख़ैर हमें भी मज़ा आता इन दिनों में. बचपन से मेरा कद छोटा था और आवाज़ में बच्चों सा धीमापन. मेरे मित्रों की टोली को अगर कोई दूर से देखें तो सारे एक सामान, मानो एक ही साँचे से निकाले गऐ हो, जिस कारण नाटक और संगीत से मैं और मेरे मित्रों स्व-घोषित विरोधी पक्ष थे.  हमें खेल-कूद में बड़ी रूचि थी पर क्या करें, कहते है न जहाँ कुत्ता होता है वहाँ नेकी का फरिश्ता नहीं आता, हम छोटी कद वालों को कभी टीम में जगह ही नहीं थी. यह कमबख़्त ऊँचाई कभी हमारी सहेली थी ही नहीं. स्पोर्ट्स वालों को पता नहीं ऊँचे कद वालों से क्या प्रीत थी और है, लम्बे कद वालों को हर खेल में शामिल किया जाता था. पूरी कक्षा लम्बों से भरी पड़ी थी. कक्षा के सारे कलंदर यूँ ही अमिताभ के दीवाने न था.  इस वर्ष मैंने तय कर ही लिया था की चाहे कुछ भी हो एक खेल में तो मैं हिस्सा लूँगा ही. आज तक मुझे कोई भी क्षेत्र में कोई भी तरह का पुरस्कार नहीं मिला था. खेल कूद वाले मास्टरजी के आगे पीछे घूम कर, आखिर एक खेल में नाम दाल ही दिया. आखिर ख़िदमत में ही अज़मत है. खेल था “बोरी-दौड़” शर्त यह थी की अपनी बोरी ख़ुद लाना है. क्लास के अव्वल खिलाड़ी हँसे, कहने लगे की इस खेल को कोई भी अंतरराष्ट्रीय दर्ज़ा नहीं है. आज मेरे अपने बच्चों को देखता हूँ तो लगता है की उस समय मेरी माँ होती तो दौड़ कर माँ से कहता, पर वह तो कब की चल बसी थी. तो नैसर्गिक रूप से दौड़ कर पिताजी के पास गया और उन्हें जब यह बात मैंने बताई तो पिताजी ने प्रोत्साहन कर, होटल में से एक अच्छी सी शक्कर की गोनी मुझे लाकर दी. उन दिनों यह सुतली से बनी गोनी बड़ी महँगी होती थी और उसे सम्हाल कर रखी जाती थी. ख़राब होने पर उसका पाँवड़ा (door mat) बनाया जाता था.  अभी रेस शुरू होने में तीन दिन बचे थे, आख़िरी दिन ये स्पर्धा राखी गयी थी. पिताजी ने तीन दिन हर रोज मुझे हमारे घर के छत पर मुझे गोनी में उतार कर, अभ्यास कराया की कैसे इसे पकड़ते है, कैसे इसे ऊपर खींचते हुऐ छलाँग लगाकर आगे बढ़ते है. पिताजी संग यह सीखते हुऐ बड़ा मज़ा आता था. रेस का दिन उजड़ा. थोड़ी लज्जा और पूरी गोनी मैं छुप छुपा कर  पाठशाला के खेल के मैं दान पर लेकर आया था. रेस शुरू हुई. कोई सस्पेंस नहीं, सरल-सरल मैं  आगे दौड़ा और पिताजी के श्रम रंग लाये. मैं रेस में पहला आया. मास्टरजी ने मेरा नाम लिख लिया और खेल बर्ख़ास्त कर चले गया. मेरी ख़ुशी सातवें आसमान पर थी. घर आ कर पिताजी को यह ख़ुशख़बरी सुनाई तो वे भी बड़े ख़ुश हो गऐ और मुझे बगल के काँच की अलमारी में रखा एक पेड़ा (पिताजी होटल चलाते थे) हाथ में थमा दिया. वाह क्या समय था.       उस रात बिस्तर पर पड़ा-पड़ा मैं विचार कर रहा था की कल इनाम वितरित करने का प्रोग्राम था. मैंने पूरी मानसिक तयारी कर ली थी की कैसे इसे लिया जाऐ, बड़ी घबराहट हो रही थी, मैं जीवन में इसके पहले कभी मंच पर नहीं गया था. रात भर मानसिक रूप से अभ्यास करता रहा, की कैसे स्टेज पर जाऊँगा, कैसे इनाम लूँगा, प्रमुख अथिथि को मैं क्या करूँ, नमस्कार या नहीं-नहीं हाथ मिलाना अच्छा रहेगा, फिर पलट कर सारे मित्रों को कमर से झुक कर अभिवादन करूँगा. बस यह सोचते सोचते कभ नींद आ गई पता ही नहीं चला.  सुबह उजड़ी और जब मैं स्कूल की ओर निकला तो पिताजी ने सर पर हाथ फिरा कर आशीर्वाद दिया और हँस कर कहा अच्छे से ले आना अपना इनाम, मैं  उल्टा हँस कर अपनी गर्दन हाँ स्वरूपी हिला कई दौड़ पड़ा अपनी साईकिल की ओर.  स्कूल में मैंने ने अपने दोस्तों से छुप कर, मंच के सामने वाली शतरंजी पर एक जगह खोजी. माइक से लगी वायर को नापते हुऐ , स्पीकर को ढूँढ कर उसके नज़दीक जा बैठा. अरे भाई मेरा पुकारा नाम तो मुझे सुने आना चाहिऐ ना, उस क्षण को मैं विलिप्त होने नहीं देने वाला था. कार्यक्रम शुरू हुआ, बहुत सारे लोगों ने बहुत साड़ी भाषणबाजी की और मैं उतावला प्राणी सभी भाषण सुन रहा था, सुनने में कितना मज़ा है यह शायद मेरे जीवन का पहला अनुभव था.  बड़ी अच्छी अच्छी बातें कही जा रही थी, “प्रोत्साहन” इस विषय पर तो बड़े बड़े वक्तव्य किये गऐ , मुझे लग रहा था की सारी बातें मेरे लिऐ ही थी, बड़ा अच्छा लग रहा था. मैंने इतने चाव से इसके पहले कभी किसी का भाषण नहीं सुना था, बस दूर पीछे अपने आवारा मित्रों संग हुल्लड़जी में मग्न रहता था, कितना व्यर्थ, छे !!! मैं तब जानता नहीं था की मैं  कितना गलत था. मित्र ही सही थे. ख़ैर सारे भाषण समाप्त हुऐ. अब समय था इनाम घोषित करने का. मेरी साँसें फूल रही थी. धड़कने काफ़ी तेज़ हो गयी थी. अब मेरा नाम कभी भी पुकारा जा सकता था. पहले व्यक्तिगत इनाम दिए गये, बाद में टीम वाले इनाम, अब कक्षा में अव्वल आने वालों का सिलसिला शुरू हुआ. मेरा नाम ही नहीं लिया जा रहा था. कुछ गड़बड़ है-मैंने सोचा. अरे “गोनी दौड़” में अव्वल मैं आया था, वोह भी बिना कोई सही स्पर्धा के, सारे काफी पीछे थे, पिताजी की ट्रेनिंग जो थी, और अगर इनाम नहीं ले गया घर तो पिताजी को क्या मुँह दिखाऊँगा, नहीं नहीं मुझे मेरा ईनाम चाहिऐ भाई. मैं उठा ,मैं थोड़ा (थोड़ा क्या बहोत) विचलित हो गया, शुक्र है उपरवाले ने बच्चों को बीपी जैसी कोई बीमारी नहीं दी, वरना तब ही हो जाती शायद.  मैंने फिर भी सोचा मास्टरजी से कोई गलती हो गयी शायद, सारों के नाम तो लिए गये सिर्फ़ मेरा क्यों नहीं.  मैं मास्टरजी के पास गया, कहा “सर मेरा नाम नहीं लिया गया, मैं फर्स्ट आया था”. मास्टरजी शायद मंच के व्यवस्थापन में काफ़ी परेशान थे, किसी दुसरे का गुस्सा मुझ पर निकाते हुऐ और मेरी ओर देखते हुऐ कह गये “चने भी चबाओ और शहनाई भी बजाओ, बस इस पूरे पाठशाला में मैं ही एक हूँ मरने के लिऐ  – और छोटू तू क्यों आया रे यहाँ, जा जा कर शतरंजी पर बैठ”. मैं हकलाते हुऐ बोला “सर मेरा इनाम, मेरा नाम..........” मास्टरजी गुर्राऐ “ओये कौन सा इनाम और किसका नाम” मैं  बोला “सर वो गोनी दौड़ में मैं अव्वल आया था” मास्टर “तो?? कौन सा तीर मर डाला, वह भी कोई खेल है? देखा है कभी टीवी पर गोनी में छलाँग मरते हुऐ किसी को ?? चलो भागो, गोनी रेस बोले गोनी रेस!!”. मेरे सर पर यह सुनते ही आसमान टूट पड़ा . जीत कर भी हार जाना किसे कहते है कोई उस वक़्त  मुझमे समाँ के महसूस करे तो उसे समझे. मैं रोता नहीं था पर आँखों से आँसू न जाने कैसे बिना रुके बह रहे थे. सोच रहा था घर कैसे जाऊँ. पिताजी को मुँह कैसे दिखाऊँ. बड़े भारी क़दमों से जब मैं घर पहुँचा तो पिताजी खाना खा कर हाथ धो रहे थे, उन्होंने पूछा “क्यों चैम्पियन कैसी रही??” मैं दौड़ता हुआ उनके करीब गया और अपने दोनों हाथ उनके कमर को लपेट कर, उनके पेट में अपने मुँह छुपा कर ज़ोर ज़ोर से रोने लगा. पिताजी को पहले लगा कि मुझे कोई शारीरिक दर्द पहुँचा है, क्यों कि मैं कभी इस तरह से रोया नहीं था. पूछताछ के पश्चात् जब मामला साफ़ हुआ, तो पिताजी ज़ोर से हँस पड़े, मैं  फिर अचंभित हो गया, मैंने सोचा था पिताजी नाराज़ हो जायेंगे, पर यह तो गड़बड़ हो गयी. मैं  आँसू  पोंछते हुऐ, सिसकियाँ भरते हुऐ उन्हें ताक रहा था. उन्होंने अपनी धोती से मेरे आँसू पोछे और पूछा एक कहानी सुनेगा? मैं सिर्फ़ उन्हें देख रहा था.  पिताजी ने उस दिन मुझे अल्फ्रेड नोबेल की कहानी सुनाई की कैसे उन्होंने पहाड़ों को तोड़ने वाले विस्फोटक पदार्थ डायनामाइट की खोज की और भरपूर प्रसिद्धि  प्राप्त की. कैसे उन विस्फोटों से बड़े बड़े दुर्घटनाऐं और मौतें हुईं, पिताजी ने बताया की और कैसे उनके मरने की झूटी ख़बर एक पत्रिका ने “मौत के सौदागर की मौत” नाम से प्रसिद्द की. अल्फ्रेड नोबेल इस बात से इतने विचलित हुऐ कि  उन्होंने अपने सारे जीवन भर कमाई धन राशि का उपयोग एक trust स्थापित करने में किया, जिससे प्रति वर्ष  अलग अलग क्षेत्र एवं  विश्वशांति के क्षेत्रों में सर्वोत्तम कार्य करनेवालों को पुरस्कार दिया जाता है. ये पुरस्कार “नोबेल पुरस्कार” कहलाते हैं. और कैसे नोबेल पुरस्कार का देना आरंभ हुआ है. तो पिताजी ने कहा “दुनिया में पुरस्कार तो सिर्फ़ एक ही है और वोह है नोबेल बाक़ी तो सारे सेम है, फिर तुझे स्कूल में मिले या मुझ से. एक बात और  जिसे कोई पुरस्कार नहीं मिलता उन्होंने दूसरों को पुरस्कार देना चाहिऐ. और पता है तुझे मुझे भी आज तक कोई पुरस्कार नहीं मिला है, तो कोई बात नहीं हम दोनों आज से मित्र हुऐ और आज तुझे मैं पुरस्कार देता हूँ” यह कह उन्होंने अमर चित्र कथा के पाँच पुस्तक भेंट किये. मेरे पास इसके पहले सिर्फ़ पाँच ही जमा थे, जो मैं  बार बार पढ़ता था. मेरा खजाना और ख़ुशी दुगनी हो गयी थी, एक सेकंड में मेरी नाराजगी छू  मंतर हुई. पिताजी उस दिन बहोत कुछ सिखा गये.  ज्यों ज्यों मैं बड़ा होता गया, मैंने बहोत सारे पुरस्कार पाऐ , पर हमेशा उनके बारे में सोचता रहता जिन्हें नहीं मिले और थोड़ा उदास होता. मेरे मित्रों को अगर कुछ मिलता तो मन ख़ुश हो उठता, यह पिताजी की सीख थी. वे कहते थे दोस्तों के उपलब्धियों में ख़ुश  होना सच्चा पारितोषिक है, दिलेरी है, ये कायरों का काम नहीं, इसे जिगर लगता है, तभी तो दोस्त जिगरी होता है. पहली बार जब मेरे प्रिय मित्र प्रसन्ना भरने को १९९३ में माइक्रोबायोलॉजी के पद्वियुत्तर अभ्यासक्रम में मराठवाड़ा विश्वविध्यालय का गोल्ड मैं डल मिला तो कुछ “गोनी रेस” समान किस्सा हुआ. नाम मात्र का यूनिवर्सिटी गोल्ड मैं डल डिक्लेअर किया गया और हाथ में सिर्फ़ एक सर्टिफिकेट थमाया गया. बाकी विषयों में जिन विध्यार्थ्यों ने गोल्ड मैं डल पाया, उनके गले में सुवर्ण पदक लटक रहे थे, पर माइक्रोबायोलॉजी में का प्रथम प्रसन्ना सिर्फ़ नाममात्र का प्रसन्न था. तहकीकात पर पता चला की सुवर्ण पदक अगर कोई स्पोंसर करें तो ही दिया जाता है, यूनिवर्सिटी उसका खर्चा स्वयं नहीं करती. १९९४ में महाराष्ट्र के नांदेड शहर में स्वामी रामानंद तीर्थ मराठवाडा यूनिवर्सिटी सथापित हुई. यहाँ पर भी यही व्यथा, माइक्रोबायोलॉजी में यूनिवर्सिटी प्रथम आने वाले को कोई पदक नहीं. पता चला कुछ One-Time राशि है जो अगर कोई भर दे तो उसके कहे नाम पर हमेशा के लिऐ उस विषय में सुवर्ण पदक दिया जा सकता है.  प्रायोजित राशी वैसे बड़ी थी, मेरे दो महीने के पगार बराबर, मैंने हिसाब लगाया था की अगर कुछ 15 लोग मिलकर योगदान दें तो काम बन जाये, विषय में सारे विद्यापीठ में तीस के ऊपर इस विषय के प्राध्यापक थे. मैंने और मेरे कुछ सहकारी सीनियर मित्रों ने कोशिश की इस योजना को अंजाम देने की पर दूध बिना गरम किऐ हर कोई मलाई चाहता था. बात नहीं बनी. पिताजी २०१० में चल बसे. उनका पूरा जीवन उन्होंने धोती कुरते पर निकाला और लोगों को, परिवार वालों को और समाज को देने के सिवा कुछ नहीं किया, यथा शक्ति उनसे जो बनता वो देते थे. नहीं था तो नहीं है कहा, जब कोई माँगे तो हाथ की रोटी भी उसे दे दी. वे हमेशा कहते थे इंसान की हर ज़रुरत सिर्फ़ मुठ्ठी भर है, फिर चाहे वो भूक में खाना हो, प्यास में पानी हो, जरूरत में पैसा हो या बेटी की शादी में सोना हो, सभी मुठ्ठी भर ही लगती है, उसके ऊपर की हर मात्रा लालच होती है. उनके पश्चात् मैंने २०११ से अपने पगार में से पैसा जमा कर यूनिवर्सिटी में यह रकक्म स्वयं भर दी, और पिताजी के नाम सुवन पदक का प्रायोजक बन गया.  उस वर्ष से हमेशा के लिए पूरे यूनिवर्सिटी में प्रथम आये बी. एस्सी के विद्यार्थी को यह सुवर्ण पदक माइक्रोबायोलॉजी में मिलता है. २०१४ का वर्ष मेरे लिऐ कुछ बहोत ख़ास रहा. मेरे ही एक विद्यार्थिनी पद्मजा गोर को ये पदक मिला. “गोनी रेस” अब ख़त्म हो चुके है. परिथोशिक वितरण किन्तु अबभी शुरू है. पिताजी ज़रूर यह ऊपर से देख स्मिथ हास्य के साथ यह सोच रहे होंगे की ‘उस पर मेरा नाम क्यों डाला??’ जिस पर मैं सिर्फ़ एक स्मिथ हास्य उन्हें वापिस देता हूँ जिसे वे और आप सभी भलीभाँति समझते है.          

जिसे कोई पुरस्कार नहीं मिलता उन्होंने दूसरों को पुरस्कार देना .

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