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होस्टल
होस्टल
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© Harish Sharma

Children

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होस्टल

“...तो फिर ठीक है तुम्हे हॉस्टल भेज देंगें। तुम वहीं रहना।”

मम्मी ने गुड्डू के बालों में कंघी करते हुए कहा तो गुड्डू का मुँह उतर गया। वह लगभग रोने से पहले वाली आवाज धीरे-धीरे निकालने लगा था, इसे हम सिसकियाँ भी कह सकते हैं।

गुड्डू आठ साल का बच्चा था, दूसरी कक्षा में पढ़ता था। वो बाकी सब बच्चों की तरह शरारती, बातूनी, झटपट होमवर्क करने वाला, कार्टून देखने वाला और अपने दोस्तों के साथ लूडो, कैरमबोर्ड और कभी-कभार मिट्टी के खेल खेला करता था।

मसलन मिटटी में गड्ढे खोदते हुए काल्पनिक खेत बनाना, सुरंग खोदना या फिर मिट्टी की ढेरी में एक झंडानुमा लकड़ी गाड़कर अपने दोस्तों के साथ अपना एक किला बना लेना। इसी गुड्डू के मन की और उसके दोस्तों की कहानी अब आपको सुनाएगें।

“अब रोकर मत दिखाओ ..पहले तो कोई बात नहीं मानते ..सारा दिन शरारतें करते रहते हो...तुम्हें सबक सिखाने का यही एक तरीका है कि अब तुम्हें होस्टल भेज दिया जाये। जब सारा काम खुद करना पड़ेगा तब अक्ल आएगी...और समय पर नहीं करोगे तो सजा मिलेगी।”

गुड्डू की मम्मी आज कोई दया दिखने के मूड में नहीं थी।

गुड्डू ने भरी हुई आँखों और उदास चेहरे से अपने डैडी की तरफ देखा। डैडी मेज-कुर्सी पर बैठे अखबार पढ़ने में बिजी थे पर उनके कान गुड्डू और उसकी मम्मी की बातों को भी सुन रहे थे। डैडी ने बिना गुड्डू की तरफ देखे कहा, ”घबराओं नहीं बेटा..मैं भी तेरे साथ ही चलूँगा ...ठीक है..वहाँ दोनों इकठ्ठे रहेंगे और खूब मजे करेंगे।”

“हाँ, ये भी ठीक रहेगा, ले जाना अपने डैडी को साथ में, अब इन्होंने तुम्हें सिर पर चढ़ाया है...तो झेल भी खुद ही लेंगे..पर होस्टल वाले इतने बड़े बच्चे मतलब तुम्हारे पापा को वहाँ रख लेगें..ये पूछना पड़ेगा।” मम्मी ने मुस्कुराते हुए कहा।

डैडी भी मुस्कुराने लगे। गुड्डू को ये बात बिलकुल पसंद नहीं आई और वो और भी खीज गया।

गुड्डू को उम्मीद थी कि कम से कम डैडी हॉस्टल वाली बात पर मम्मी का साथ नहीं देंगे पर ये क्या अब दोनों गुड्डू को डराने में जुट गये थे।

‘बड़ी गलत बात थी ..कोई बच्चे के साथ ऐसे करता है क्या ?...बातों अगर बच्चे शरारत नहीं करेंगे तो और कौन करेगा ...और आज तो सन्डे है छुट्टी का दिन ...क्या हुआ अगर मैं आज देर तक सोता रहा ?......क्या हुआ जो उठते ही अपना मनपसंद कार्टून देखने लगा...जबकि मैंने ब्रश भी कर लिया और दूध भी पूरा पी लिया...सब बच्चे सन्डे वाले दिन ऐसा करते हैं...दोपहर में अगर खेल-कूद कर थोड़ा समय मिला तो नहा भी लेंगे...हफ्ते में छह दिन तो रोज सुबह जल्दी उठकर, नहा धोकर ही स्कूल जाते हैं...और कई बार तो इतनी अच्छी नींद आ रही होती है...इतने अच्छे सपने आ रहे होते हैं...पर बस...मन मार के उठना पड़ता है...कुछ खाने का मन न भी हो तो मम्मी-डैडी बिना कुछ खाए स्कूल नहीं जाने देते। ठीक है कि सुबह खाली पेट नहीं जाना चाहिए...क्लास टीचर ने भी ऐसा ही बताया था कि सुबह का नाश्ता अच्छी सेहत के लिए बहुत जरूरी है पर अगर भूख न हो तो कोई क्या करे। पर हाँ कई बार सुबह के नाश्ते में सेब खाना अच्छा लगता है। डैडी लाकर रखते हैं पर कई बार सेब न हो या लाना भूल जाएँ तो खाओ पराठा।

ऐसा नहीं कि मुझे पराठे अच्छे नहीं लगते पर जब भूख न हो तो बच्चा खाए कैसे। फिर मुझे मजबूरी में मम्मी के दिए पराठे सीढ़ियों के नीचे वाले बाक्स में या रद्दी अख़बारों की टोकरी में या फिर डबल बैड के गद्दे के नीचे छुपाने पड़ते हैं ताकि जब शाम को गौशाला वाला गली से निकले तो मैं चुपके से उसकी चारा इकट्ठी करने वाली गाड़ी में डाल सकूँ। अब आज सुबह जाने कहा से अखबार की रद्दी खरीदने वाला आ गया और मम्मी रद्दी निकालने लगी और मेरी पोल खुल गयी। उसमे आलू वाले पराठे गोल किये और सूखे हुए मिले। मैं अभी सो ही रहा था | मम्मी ने न जाने डैडी को क्या-क्या शिकायत लगाई होगी मेरी। पहले तो कुछ कहा नहीं, अब नहा कर मम्मी से कंघी करवाने बैठा तो ‘होस्टल ‘ वाली सजा सुना दी।” गुड्डू घर के बगीचे में बैठा सोच रहा था।

तभी दरवाजे पर डोरबैल बजी। गुड्डू को मालूम था कौन होगा। उसके दरवाजा खोलने से पहले ही मुन्नू की आवाज आ चुकी थी।

“गुड्डू ...गुड्डू ...गुड्डू ...”मुन्नू ने पुकारा था।

“आ रहा हूँ...” गुड्डू ने कहते हुए दरवाजा खोला। मुन्नू और राजन दोनों ही आ गये थे। दोनों ही गुड्डू के पक्के दोस्त थे। राजन तीसरी क्लास में पढ़ता था और मुन्नू, गुड्डू के ही स्कूल में दूसरी कक्षा में। बस, दोनों का सेक्शन अलग था। सबके घर एक ही गली में थे। गुड्डू के घर में खुला बगीचा था इसलिए सब दोस्त, जब भी छुट्टी होती या फिर स्कूल से आकर शाम को खेला करते।

अब तीनों बच्चे नीम के पेड़ के नीचे लगी बेंच पर बैठ गये थे।

‘अक्कड बक्कड बम्बे बो

अस्सी नब्बे पूरे सौ

सौ में लगा धागा

चोर निकल के भागा ...., चलो आज यही से शुरू किया जाये।” राजन ने कहा।

राजन दोनों बच्चों से ज्यादा तंदरुस्त और बड़ा था। मुन्नू और गुड्डू दोनों एक जैसे कद और पतले शरीर वाले बच्चे थे। शायद इस कारण राजन का हुकूम ज्यादा चलता था और मर्जी भी पर जब कोई उदास या खीझ कर बैठ जाता तो किसी की मर्जी न चलती। वे या तो खेलते या लड़ते। लड़ाई-झगड़े में एक-दूसरे से कट्टी हो जाती, रूठ कर सब अपने-अपने घर चले जाते मगर अगले दिन फिर वही सब इकठ्ठे होते और खेलते। उनका साथ और एक-दूसरे से मिलकर खेलने का आनन्द ही उन्हें दोबारा इकठ्ठे कर देता। स्कूल, घर या टीवी कार्टून की कोई भी घटना या बात हो वो उस पर घंटों बात कर सकते थे। उनकी इन बातों को पूरे मन से सुनने वाले और उन पर किसी नतीजे तक पहुचने वाले तर्क भी इन्हीं बच्चों के पास थे। वो एक-दूसरे के पूरक थे शायद।

राजन की बात सुनकर मुन्नू भी खुश हो गया लेकिन गुड्डू के मन में अभी भी ‘होस्टल ‘ वाली बात अटकी थी और वो उसे अपने इन दोस्तों के साथ बाँटना चाहता था। गुड्डू ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। उसने सिर्फ ‘हूँ‘ कहकर उदास चेहरा बना लिया।

“नहीं अगर तुम्हारा मन ‘अक्कड बक्कड‘ खेलने का नहीं है तो हम कैरम बोर्ड खेल लेते हैं, कल ये राजन बहुत हीरो बन रहा था जीतकर..आज इसी हराकर रानी तो मैं ही जीतूंगा।” मुन्नू ने अकड़ते हुए कहा।

“जादा उछलो नहीं, कल लगातार तीन गेम खेले थे, एक भी तुम जीत नहीं पाए ...बात करते हो रानी जीतने की ..आज भी लगा लेना जोर..क्यों गुड्डू हो जाये फिर खेल शुरू।” राजन कल की जीत से पूरे उत्साह में था |

“राजन, ये ‘होस्टल ‘ में बहुत ज्यादा डिसिप्लिन होता है क्या ?” गुड्डू ने एकदम से राजन की तरफ देखकर पूछा।

राजन और मुन्नू दोनों ही के लिए ये प्रश्न एक नयी पहेली जैसा था। दोनों इस पहेली के लिए तैयार भी नहीं थे, वे तो कैरम बोर्ड और अक्कड़-बक्कड़ की कल्पनाओं में खोये थे लेकिन गुड्डू की ये होस्टल वाली पहेली ने उन्हें केवल हैरान कर दिया।

“ज्यादा तो नहीं पता...मगर वो एक फिल्म है न आमिर खान वाली...यार क्या नाम है उसका ..जिसमें वो बच्चे को उसके पापा होस्टल छोड़ आते हैं और बच्चा होस्टल जाते वक्त बहुत रोता है...क्या नाम था ...” राजन कहते हुए सोचने लगा।

“तारे जमीन पर , अभी तीन दिन पहले ही तो टी.वी. पर आ रही थी ...उसमे वो बच्चा पढ़ाई में अच्छा नहीं होता, उसका सारा होमवर्क और नोटबुक का काम भी पूरा नहीं होता और हाँ उसे सब टीचर से डाँट भी पड़ती है। उसकी मम्मी बहुत अच्छी होती है...है न ..”

मुन्नू ने जैसे सारी कहानी याद कर रखी हो।

“हाँ हाँ ..वही..तारे जमीन पर..फिर बच्चे के पापा को जब बच्चे की स्कूल रिपोर्ट मिलती है तो उसके पापा उसे अच्छा बच्चा बनाने के लिए होस्टल भेज देते हैं..और हाँ वो बच्चा बहुत मिन्नत करता है की उसे होस्टल मत भेजो ...उसकी मम्मी भी कहती है ..पर पापा बहुत सख्त होते हैं और उसका एडमिशन होस्टल में करवा देते हैं।” राजन ने मुँह बनाते हुए कहा।

“लेकिन यार मेरे घर में मुझे मम्मी ही होस्टल भेजने को कह रही है, मेरे डैडी ने तो कभी नहीं कहा ...।” गुड्डू उदास सी आवाज में बोला।

“क्यों, तुम्हें होस्टल भेजने की क्या जरूरत ..तुम तो हर बार फर्स्ट आते हो ..हॉस्टल तो जो बेड बॉय होते हैं, स्कूल का काम पूरा नहीं करते..अपने मम्मी-पापा को तंग करते हैं, उन बच्चों के लिए होता हैष” मुन्नू ने अपना तर्क रखा।

“मेरे मम्मी का कहना है कि मैं उन्हें बहुत तंग परेशान करता हूँ..शायद इसीलिए वो मुझे बार-बार होस्टल भेजने के लिए कह देती है।” गुड्डू ने कहा।

“मेरी बुआ का लड़का है सोनू, वो भी होस्टल में ही पढता है, कभी-कभार बस छुट्टियों में घर आता है, बहुत होशियार है ...फटाफट अंग्रेजी बोलता है ...कितनी पोइम उसे याद हैं...वो कहता कि वो होस्टल में बहुत से खेल खेलता है, वहाँ एक बड़ा प्ले ग्राउंड भी है। उन्हें हर महीने पिकनिक पर भी ले जाते हैं।” राजन ने जैसे कुछ अच्छी बात कही।

“अच्छा ..सच ..ऐसा भी होस्टल होता है क्या ..?” गुड्डू ने हैरान होकर कहा, जैसे किसी ने उसके डरे हुए दिल को कोई उमंग दी हो।

“पर फिल्म में तो होस्टल बड़ा अजीब है, सबको बेल बजने पर उठाना पड़ता है..मम्मी-पापा नहीं उठाते..और बच्चे नहाते वक्त भी अपनी मम्मी को याद करके कितना रोते हैं, मैंने तो उस फिल्म में ऐसे ही देखा था।” गुड्डू का उत्साह एकदम फिर जाता रहा जब उसे फिल्म के कुछ सीन याद आये।

“पर अगर तुम होस्टल चले जाओगे तो हम सब इकठ्ठे होकर खेलेंगे कैसे ..ये राजन तो मेरे साथ ऐसे ही लड़ता रहता है, इसके साथ तो मेरा बिलकुल मन नही लगेगा।” मुन्नू ने थोड़ा चिंतित होते हुए कहा।

“अरे नहीं यार मुन्नू ..मुझे माफ़ कर दो ..मैं तुम्हारे साथ कभी नहीं लडूंगा, तुम चाहो तो मैं तुम्हें कैरम बोर्ड में जीती हुई रानी भी दे दूंगा। देखो अगर गुड्डू होस्टल चला गया और तुम भी मेरे साथ खेलना बंद कर दोगे तो मैं बिलकुल अकेला रह जाऊँगा।” राजन ने एकदम से सारे हथियार डाल दिए थे।

असल में मोहल्ले में बाकी सभी बच्चे इन तीनों से बहुत ज्यादा बड़े थे,उ नके साथ राजन जब भी खेलने जाता तो उसे बस फील्डिंग और बाल उठाने का काम करवाते थे, कई बार उसे झिड़क भी देते इसलिए राजन को इस तिकड़ी का ही सहारा था।

“हम सब आंटी से कहेंगें कि गुड्डू को होस्टल मत भेजिए ,वहाँ सब बच्चे बाथरूम में रोया करते हैं और अपनी मम्मी को याद करते हैं...शायद ये बात आंटी को न पता हो। गुड्डू भी अगर जायेगा तो बाथरूम में जाकर नहाते हुए रोयेगा और अपनी मम्मी को याद करेगा...और गुड्डू के डैडी थोड़ी न होस्टल की जिद कर रहे हैं ...है न गुड्डू।”

“ हाँ डैडी ने तो हॉस्टल की बात कभी नहीं की, न जाने मम्मी को क्यों जिद है मुझे होस्टल भेजने की।.....शायद मैं मम्मी को ज्यादा परेशान करता हूँ ...उनका बनाया खाना इधर-उधर छिपाया करता हूँ ...इससे वो नाराज है ...गलती तो मेरी ही है ...मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए ...मम्मी की बात माननी चाहिए। मैं आज रात को मम्मी को सॉरी कहूँगा। जब रात को वो मुझे परी वाली कहानी सुनाएगी और पहेलियाँ पूछ रही होगीं तो मैं उनसे रिक्वेस्ट करूँगा कि वो मुझे माफ़ कर दें अब मैं कोई जिद नहीं करूँगा ..और अगर मुझे होस्टल भेज दिया तो राजन और मुन्नू किसके साथ खेलेंगें। दोनों की आपस में नहीं बनती। दोनों आपस में लड़ेगें अगर मैं नहीं रहूँगा ...और लड़ना कोई अच्छी बात थोड़े है..हमारी क्लास टीचर ने भी ऐसा बताया है इसलिए मुझे होस्टल न भेजा जाये।” गुड्डू ने खड़े होकर अपनी राय रखी।

सब बच्चों को पूरा विश्वास था कि वे गुड्डू के होस्टल जाने वाले प्लान को रद्द करवा देंगे। सब बगीचे के बने घास के मैदान में खेलने लगे।

गुड्डू की मम्मी बगीचे के एक कोने में बैठी सब बातें सुन रही थी, वो अन्दर आई और गुड्डू के डैडी को सब बातें बताते हुए खूब हँसी। गुड्डू के पापा भी हँसने लगे।

जिद डर याद होस्टल

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