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एक चिट्ठी सैनिकों के नाम
एक चिट्ठी सैनिकों के नाम
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© Kalpana Dixit

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प्रिय सैनिकों !

बहुत दूर हो हमसे न ! इसीलिए आज कजरी गुनगुनाते हुए तुम सबकी बहुत याद आने लगी। मन में उठता हूक सम्भालकर पूरी चिट्ठी पढ़ लेना ! कुछ बूँदें ढरकें तो आज़ाद कर देना सैलाब को ! नागपंचमी में मेंहदी रचने की सोचे मन की हरीतिमा छोटी-छोटी पत्तियाँ बन बैठी, समय के सिल-बट्टे में टूक-टूक होने लगा मन ! साँस महकने लगी और अर्क शब्दों में सहेजते हुए तुम सबको चिट्ठी लिखने लगे !

घर की चिंता बिल्कुल न करिएगा। सीमा के प्रहरी ! हम सब सम्भाल लेते हैं। किसी को अकेला रहने ही नहीं देते। सावन में धानी चादर बिछी है धरती पर, अम्मा मुँह पोछने के बहाने अंचरा सूंघकर तुमको पा लेती हैं पल भर में। बिछोह का रंग नहीं चढ़ने देतीं मन पर ! घर बहुत सुकून में है, तुम सब जागते जो रहते हो।

बारी-बारी से ! तुम सबकी पत्नियां भर-भर बाँह चूड़ी पहने, लम्बी माँग में दूर तक सिंदूर भरे, तुम्हारी सलामती के भाव जगाए रहती हैं अहर्निश ! बच्चे तुम सबके बहुत जिम्मेदार हैं, बेटियां पुरखिन बनी, घर से बाहर तक, सब सम्भालती रहती हैं। और बेटे माँ का हाथ बंटाते,माथा सहलाते रहते हैं। गाँव जवार की बहनें मन की डोर हवा में उछालकर राखी की सौगात भेज रही हैं। लोफर उद्दंड भाई भी तुम्हें महसूस करते हुए सुधरने का प्रण लेते रहते हैं। गाँव और बगिया में तुम्हारा जिक्र गूँजता रहता है। बाज़ार की भीड़ में तुम्हारे चलने भरके रास्ते सूनेपन में शून्य सहेजे हैं, यह शून्य अविभाज्य है न ! तुम सब अपनों से दूर हो, लेकिन तुम्हारे एहसासों की चरण-पादुका से ही समग्र संचालित है। अच्छा, जो मराठी, राजस्थानी, पंजाबी मेरी भाषा न बूझ पाएं वे भावों के रस से काम चलाएं ! भाषा बाह्य परत है, भाव ही एक है न ! तो क्या कह रहे थे हम, अरे हाँ, घर-परिवार, गाँव-जवार की चिंता न करना, निश्चिंत रहना।

गुड़िया कय पापा घर कय चिंता भुला दीं,

भारत कय लाल हईं सबके बता दीं।

अच्छा,अपना हाल कहो सब ! आपस में मौजमस्ती होती रहती है न ? हर पल को खूब उत्साह से जी लेना भरपूर ! खाना जो भी, जैसा भी, मिले भर पेट खाया करना। नियमित स्वास्थ्य जाँच कराते रहना। बहुत रकम-रकम की बीमारी होने लगी है अब। हरदम वर्दी कसे रहने में अफ़नाना नहीं। देश का दायित्व है न ! पंच तत्त्वों के साथ में ही मेरा आशीष और स्नेह समाहित है। भोर की पहली किरिन में ही हम चूम लेते हैं तुम्हारा माथा। हवा के झोंके में ही सिर सहलाते हैं तुम्हारा। सोकर उठते ही जो पहला कदम तुम धरती पर धरते हो, वहीं अंचरा पसारे हैं हम। मूड़ ऊपर उठाकर ताक लेना, घर भर की आँख का व्यापक आकाश, यह सूना आसमान नहीं, उम्मीदों के तारों से भरी, नीले सपनों को आकार देने में जुटी अंतर्दृष्टि है हमारी। घूँट भर पानी से गला सींचकर स्नेह-रस का स्वाद बताना। हम तुम सबको बहुत याद करते हैं। अपने सुकून की वजहों में तुम्हें ही पाते हैं। आत्मा की टीस के सहारे तुम तक पहुंच जाते हैं। पूरे देश का खयाल रखने में मुस्तैद हो न, अपना खयाल रखना।

यह कजरी हरेराम त्रिपाठी ‘चेतन’ जी ने लिखी है, हम यही गुनगुना रहे थे आज…..

पौरुष गरमी मांगे बर्फीला मैदान पिया !

राख आन पिया !

तू बनजा मृत्युंजय जा कारगिल के सीवान पिया !

राख आन पिया !

जाके आग-लपट फैलाद,

शत्रु-तन लोहा गरम गलाद,

मेटाद$ खुरचालू के नाम आ निशान पिया !

पहचान पिया !

कर जा द्रास में प्रान-उगाही,

काल के लाल सियाही चाहीं,

पसरले आँख बा इतिहासो आ दूनो कान पिया !

राख ध्यान पिया !

मरी आ मारी उहाँ जवानी,

मिशाइल अब ना संजम मानी,

बनी गुरुद्वारा गुरु के डेरा गाजीखान पिया !

कर ऐलान पिया !

सजग हो राष्ट्रगान तू गइह,

बा गुमान पिया !

ईत मातृभूमि के जगिह,

लड़ाई से कबहूँ मत भगिह,

सोनहुला अच्छरि में लिखाई बलिदान पिया !

देश-मान पिया !

पौरुष गरमी मांगे बर्फीला मैदान पिया !

राख आन पिया !

जय हिंद !

सैनिक चिठ्ठी आन-बाण-शान पत्नियाँ मांग सिंदूर रखवाली

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