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दुखी होने का अधिकार
दुखी होने का अधिकार
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© Babita Komal

Drama

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“पापा ने कितनी मुश्किल से विवान के कॉलेज में दाखिले के लिए फीस जुटाई थी। कितने खुश थे वे ! अब कोई ऐसा कार्य नहीं था जिसमें एक मुश्त पैसे लगने वाले थे। अचानक से ही यह ! मेरी शादी में लिए कर्जे का भार तो अभी तक सिर से उतरा ही नहीं है कि फिर से कर्जे की यह मोटी मार। किसने दिया होगा इस बार उन्हें इतना पैसा। साहूकार ने ब्याज की दर दुगनी कर दी होगी। या फिर हो सकता है पापा ने मम्मी के गहने बेचे हो। मुझे पता भी कैसे चलेगा। मम्मी-पापा मुझे यह सब कभी नहीं बतायेंगे। पूछूंगी तब भी नहीं। जिद करुंगी तो एक ही बात कहेंगे-

“तुम अपने घर में खुश रहो, अब उस घर में क्या होता है उससे कोई लेना-देना मत रखो।”

देह पर सजता एक-एक आभूषण और भारी-भरकम साङी पर उभरा जरी-गोटे का काम उसकी नाजुक देह के साथ उसकी आत्मा को भी छलनी कर रहा था। सोलह श्रृंगार करके उसे अभी बाहर जाना था। उसके विवाह को दस महीने ही तो हुए थे अभी। कितने लाङ-प्यार से उसके मम्मी-पापा ने उसे विदा किया था। ससुराल भी तो बहुत अच्छा मिला था उसे।

ममता की छाँव में रखने वाली सासू माँ और स्नेहिल आशिर्वाद देने वाले ससुर। अधिक दिखावा के साथ उसका विवाह नहीं हुआ था। दोनों ही परिवार ऐसा नहीं चाहते थे, फिर भी जितना भी हुआ वह भी प्राइवेट कम्पनी में इंजीनियर के पद पर कार्यरत उसके पापा के लिए कम नहीं था।

समय पंख लगाकर उड़ रहा था। नियत को किंतु उसकी खुशी मंजूर नहीं थी तभी तो यह भयावह हादसा हो गया।

इससे अधिक विभा सोच नहीं पाई थी। उसे बुलाने उसकी ननद काव्या आ गई थी। सजी-सँवरी विभा को उदास देखकर उसकी भी आँखें भर आई थी। अपने आँसुओं की धार को आँखों के भीतर दफन करके पहले से ही सिर पर रखे आँचल को थोङा और नीचे तक खींचकर काव्या, विभा को अपने साथ बाहर ले गई थी। बाहर रिश्तेदारों की भीङ थी।

उसके पापा भी उसी भीङ में हाथ में लिफाफे लिए जयपुर वाली ताईजी के निर्देशानुसार सबको लिफाफे दे रहे थे। रंग बिरंगे लिफाफे।

विभा को समझते देर नहीं लगी कि ये रंग सौ, दौ सौ और पाँच सो रुपए के प्रतीक है। उसका जिससे जितना करीब का रिश्ता है पापा की तरफ से दिये जाने वाले लिफाफे की कीमत भी उतनी ही अधिक है।

ताईजी उन्हें भी लिफाफे दिलवा रही थी जो उसके विवाह में भी नहीं आए थे। आधे से अधिक चेहरे उसके लिए नए थे। शादी-ब्याह में दूर के रिश्तेदार आए या न आए किंतु ऐसे मौकों पर वे जरुरी काम छोङकर भी आते हैं।

यूँ भी जो हुआ वह अनहोनी थी। न होने वाला कार्य हो जाए तो संवेदनाएँ प्रकट करने वालों की संख्या में इजाफा हो ही जाता है।

कितनी खुश थी विभा। आने वाले कल उसके नए पापा का जन्मदिन था। वह इसी सम्बोधन से ही तो पुकारती थी अपने ससुरजी को। कमलेश के साथ जाकर वह कितने सारे कपङे खरीद कर लाई थी। इस कार्य में उसकी नई मम्मी भी उसका पूरा साथ दे रही थी। रात बारह बजे केक कटवाने का पूरा इंजताम करके विभा अपने कमरे में कमलेश के साथ बारह बजने का इंतजार कर रही थी।

तभी नई मम्मी की चीख घर की चहारदीवारी को चीरकर बाहर निकलने लगी थी। दोनों दौङकर उनके कमरे में पहुँचे तो सब कुछ खत्म हुआ सा प्रतीत हुआ था। नए पापा फर्श पर पङे थे। मुँह से झाग निकल रहे थे और आँखे फटी थी। आनन-फानन में अस्पताल में पहुँचे तो डॉक्टर ने मृत घोषित करके कहा था-

“इनका शायद हार्ट फेल हुआ है, आप पोस्टमार्टम के बाद बॉडी ले जा सकते हैं।”

ऐसे कैसे साँस लेता हुआ इंसान शव में तब्दील हो जाता है! नई मम्मी, नए पापा को झकझोर कर उठाने का प्रयास कर रही थी। सब खत्म हो गया था।

समय किंतु कभी किसी के लिए नहीं रुकता। आज उस बात को पूरे तेरह दिन हो गए थे।

कमलेश के सिर के ऊपर पापा की जिम्मेदारी डालने पूरा शहर आया था। उनकी पगङी कमलेश को पहनाई जा रही थी जिसके मायने सदियों पहले कदाचित् अधिकार एवं कर्त्यव स्थानांतरण से रहा होगा।

आज तो कोई पगङी पहनता ही नहीं। परम्परा के निर्वाह के लिए बाजार से सफेद पगङी मँगवाकर पहना दी जाती है। दुकानों में यह बिकती ही आज के दिन काम में लेने के लिए है। उसे भी भारी भरकम कपङों में रिश्तेदारों के बीच बैठने में शर्म आ रही थी।

ऐसे ही तैयार होकर तो रिश्तेदारों के बीच वह अपने विवाह के समय बैठा था। तब कितना खुश था वह। खुशी में सबके बीच में विशिष्ट होने का अनुभव खुशियों को चार गुणा बढ़ा देता है किंतु दुःख में विशिष्ट होने का अनुभव कैसे खून के आँसू रुलाता है, उसका उसे अभी अहसास हो रहा था।

मम्मी चुपचाप कमरे के भीतर बैठी थी। उन्हें अभी मातम बनाने का भी अधिकार नहीं था। वे वहीं से इस बात का ध्यान रख रही थी कि सब कुछ अच्छे से हो रहा है या नहीं। जैसे यह मृत्युपरांत की जाने वाली रस्म पगङी का दस्तुर (टीका) न होकर विवाह के समय किया जाने समारोह तीलक (टीका) हो।

आयोजनों के नाम एवं उन्हें करने का तरीका एक होने से वे एक जैसी खुशी और दुःख नहीं दे पाते। क्यों फिर बुजुर्गों ने खुशी और दुख के अवसरों को एक जैसा नाम दिया।

क्यों यह बाध्यता कर दी कि पगङी के दस्तुर की रस्म के समय बेटे-बहू को सजधज कर पूरी समाज के सामने बैठना होगा। क्यों यह परम्परा प्रारम्भ हुई कि वे जो भी कपङे पहनेंगे वे बहू के मायके से आयेंगे।

इस समय आभूषण देने की बाध्यता भी क्यों प्रारम्भ हुई।

विभा के पास इन सब बातों का कोई जवाब नहीं था। अनायास आए इस तूफान के थपेङों से उसके पापा भी तो नहीं बच पाए थे। उनकी जेब पर गरीब मार हुई थी। अचानक से आए इस इतने बङे आयोजन के लिए तो उन्होंने कोई बचत ही नहीं की थी। समाज में अपनी ईज्जत बचाने के लिए उन्हें भी सब कुछ अच्छी तरह करना था क्योंकि शादी-ब्याह में कुछ कम हो जाए तो लोग इतना ध्यान नहीं देते किंतु ऐसे दुखद अवसरों पर कुछ भी ऊँच-नीच हो जाए तो रिश्तेदार कहने में देर नहीं करते-

“आज के दिन भी जेब पर नजर है, शर्म करो थोङी, उन्होंने तो आदमी खो दिया अपने घर का। आप उस घर में बेटी देकर भी जेब संभाल रहे हो।”

सोफे पर घूंघट में बैठी विभा यही सब सोच रही थी। कलमेश भी तो अभी बच्चा ही था। आधुनिक समाज ने छोटी उम्र में हुई मौत का हवाला देकर मृत्युभोज का भार उसके कमजोर कंधो से उठा लिया था किंतु दूर-करीब के आए उसकी बुआ-बहनों को लिफाफे में राशि एवं साङी देने का भार तो उसके कंधों पर इन शब्दों के साथ आ गया था-

“अब तो मोसर (मृत्युभोज) भी नहीं कर रहे, सामान भी नहीं बाँट रहे, साङी अच्छी देना और पैसे भी ज्यादा देना, सब इतना खर्च करके आई है।”

कमलेश कहना चाहता था-

“न आती तो न आती। मैंने तो बुलाया नहीं था। मैंने तो अभी अपनी जिंदगी शुरु की है। मेरी जिम्मेदारी मम्मी के लिए अब पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है, मैं उन पर खर्च करना चाहता हूँ।”

किंतु यह सब बातें मानव मन में केवल सोच ही सकता है, कह नहीं सकता।

बस, कमलेश और विभा पंडितजी द्वारा पढ़े जाने मंत्रों के बीच रिश्तेदारों और गाँववालों की भीङ में विशिष्ट आसन पर बैठे पगङी पहनने की औपचारिकता निभा रहे थे।

मन में दोनों (विभा का ससुराल एवं मायका) परिवारों पर खर्चे की आई मार का हिसाब चल रहा था। पापा के जाने का दुःख मनाने का भी उन्हें समय नहीं मिला था क्योंकि जिस दिन से पापा गए थे मम्मी को एक ही चिंता खाए जा रही थी कि कैसे भी हो यह आयोजन अच्छी तरह निपट जाए।

किसी के जाने के बाद दुःख को तेरह से पंद्रह दिन के लिए स्थानांतरित कर दिया जाता है। रिश्तेदार संवेदनाएँ व्यक्त करन के लिए आते हैं, दुख में सहभागिता दिखाने आते हैं किंतु उनकी विदाई के समय दिये जाने वाले लिफाफे एवं कपड़ों का भार इतना अधिक हो जाता है कि उसके तले दबे अपने परिजन को खोने वाले घरवाले दुःख मनाने का अधिकार भी खो देते हैं !

विदाई जिम्मेदारी दुख

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