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यादों का झोंका
यादों का झोंका
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© Vijayanand Singh

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पहाड़ों की रानी मसूरी वाकई खूबसूरती का स्वर्ग है। सुबह की गुनगुनी धूप में बालकनी में चाय की चुस्कियां लेते हुए मनमोहक दृश्यावलियों को देखते - देखते उसकी नजर नीचे ढलान वाली सड़क पर बाहों-में-बाहें डाले आते - जाते प्रेमी युगलों को देखकर ठहर जाती है। अनायास उसका मन यादों की गलियों में विचरने लगा - कालेज से लौटते वक्त साइकिल जैसे अपने आप उसके घर की ओर मुड़ जाती। गली में, उसके दरवाजे की बगल वाली दीवार से साइकिल टिका, वह दरवाजे की सांकल खटकाता, तो अक्सर वही दरवाजा खोलती। वह अंदर आता। किताब - कापियां टेबुल पर रख देता। वो उसकी कापियां पलटती, पूछती - आज क्या पढ़ाई हुई। वह बताने लगता। आर्ट्स की स्टूडेंट होते हुए भी वह केमिस्ट्री, फीजि़क्स समझने का प्रयास करती। वह उसकी कापी पर कुछ लिख देता, वो उसकी कापियों पर कुछ चित्र उकेरती। नजरें मिलतीं। न स्पर्श, न आलिंगन।


उस दिन अचानक पिताजी ने घर आते ही कहा- "गाड़ी निकालो, वमाॅजी के यहां जाना है। उन्हें हार्ट अटैक आया है।" आनन-फानन में वह पिताजी के साथ उसके घर पहुंचा। पिताजी तेजी से अंदर कमरे की ओर बढ़ गये।  वो उसे देखते ही दौड़कर आकर उससे लिपट गई- 'पापा! पापा!' उसका कातर स्वर उसे अंदर तक हिला देता है। अचानक निःशब्द भाव अभिव्यक्त हो उठते हैं। संवेदना एहसास में तब्दील हो जाती है।


फिर, उस दिन तातलोई झरने पर पिकनिक में साथ - साथ चलना,और पहाड़ियों पर चुपके से उसका नाम उकेरना भी उसे याद है। अंतहीन यादों के झोंकों से शरीर में स्पंदन-सा महसूस हुआ उसे। रोम - रोम अहसास से भर उठा,जी उठा।


"कबसे किस ख़्याल में डूबे हो!" सहसा पत्नी की आवाज से जैसे तंद्रा टूटी। "कुछ नहीं। ठंडी हवा का झोंका था। अंदर तक छू गया। लगता है ठंड बढ़ गई है।" उसने ठंडी सांसें भरते हुए कहा।

यादों का झोंका

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