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ज़िंदगी ना मिलेगी दोबारा
ज़िंदगी ना मिलेगी दोबारा
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© ANIL BHATIA

Others Tragedy

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सन डे का दिन था बेल बजी तो देखा रवि था। मेरा मित्र कई बार मुझसे कोई ना कोई मदद माँगने आ चुका था। उसके चेहरे से लगता था की वो कुछ परेशान है मैने सोचा

अगर पूछ लिया तो, तो फिर कुछ ना कुछ मदद के लिए देना पड़ जाएगा। इधर-उधर की बातों में आधा घंटा बीत चुका तो रवि बोला "मैं चलता हूँ।" मैने भी कहा "अच्छा ठीक है मैने भी सोचा चलो आज बच गये।"

सुबह आफिस पहुँचा तो पता चला की रवि नहीं आया उसकी पत्नी रात से हॉस्पिटल में अड्मिट थी।

शाम को घर पहुँचा तो पता चला कि अभी-अभी उसकी पत्नी का देहांत हो गया है।सुबह संस्कार है। मैं उसी समय हॉस्पिटल पहुँचा वो एक सरकारी हॉस्पिटल था।

वहाँ पता चला की आर्थिक तंगी की वजह से वे प्राइवेट हॉस्पिटल में नहीं ले जा पाए।

सरकारी अस्पतालों का हाल किसी से छुपा नहीं है। मैं समझ गया कि कल रवि मेरे घर

क्यों आया था और मदद माँगने में संकोच कर रहा था। अब मुझे अपने आप पर लज्जा

आ रही थी कि अगर मैं कुछ मदद कर देता तो शायद वो सही इलाज़ करवा पाता और शायद वो जिंदा होती...!

मदद संकोच ज़िन्दगी

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