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खूनी दरिंदा  भाग 7
खूनी दरिंदा भाग 7
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© Mahesh Dube

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अगले दिन खन्ना बिलकुल सामान्य से प्रयोगशाला में आये और कार्यरत हो गए। रविकांत उनसे निगाह बचाने की कोशिश करता रहा पर चुपके चुपके उनका सर्वांग निरीक्षण करता रहा। उसने पाया कि खन्ना के नाखून थोड़े से बढ़े हुए जरूर थे परन्तु सामान्य मनुष्यों जैसे ही थे। इन नाखूनों से पशु जैसी खरोंच नहीं मारी जा सकती थी। अलबत्ता उनकी आँखों में कुछ अजीब सी चमक जरूर थी। दोपहर को लंच के समय रवि ने अपनी साथी सिल्विया को धीमे-धीमे शब्दों में सब कुछ बता दिया। सिल्विया परेरा गेंहुए रंग की गोवानी लड़की थी जिसके माता पिता गोवा में ही रहते थे और वो यहाँ वैज्ञानिक अनुसंधान केंद्र में कार्यरत थी। उसके घर वालों की नजर में वो भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर की रिसेप्शनिस्ट थी पर असल में वो एक वैज्ञानिक थी और एक गुप्त जैविक प्रयोग का हिस्सा थी। रविकांत उसका कालेज से मित्र था और दोनों की गाढ़ी छनती थी। 

रवि की बातें सुनकर पहले तो उसे विश्वास ही नहीं हुआ पर जब रवि ने सबकी आँख बचाकर अपना सफेद कोट कंधे से सरकाकर उसे खरोंचें दिखाईं तो उसकी आँखें आश्चर्य से फटी की फटी रह गयीं। वो साफ-साफ भयभीत दिखाई पड़ने लगी और बार-बार घबराकर खन्ना की ओर देखने लगी। वो अपने मनोभाव छुपा सकने में उतनी कुशल नहीं थी। रवि ने दबे शब्दों में उसे शांत रहने को कहा पर खन्ना जैसे जहीन आदमी ने सिल्विया की बेचैनी को भांप लिया। थोड़ी देर बाद सिल्विया ने तबीयत खराब होने का बहाना करके छुट्टी ले ली और अपने घर चली गई। वैसे उसे सचमुच बेचैनी जैसी हो रही थी और उसका मन घबराने लगा था। सिल्विया जा रही थी तब खन्ना तीर जैसी नजरों से उसे देख रहे थे और यह बात रविकांत की निगाह से भी बची न रह सकी।

उस दिन खन्ना ने ठीक समय पर प्रयोगशाला को बंद करने का आदेश दिया और घर चले गए। रविकांत ने भी अपने प्रयोग बंद किये और कुछ देर कॉपी में कुछ जोड़ घटाना करता रहा। उसके सभी साथी हाय-बाय करके चलते बने। बाहर साँझ का झुटपुटा हो रहा था। रविकांत विशाल प्रयोगशाला में अकेला बैठा अपने लेखन में मशगूल था। अचानक उसने अपने कंधे पर किसी का हाथ पाया तो उसकी विचार श्रृंखला टूट गई और वो चौंक कर पीछे मुड़ा तो उसने पाया कि प्रयोगशाला का नया चौकीदार रफीक खान उसे घर जाने को कह रहा था। वो अब प्रयोगशाला में ताला लगाना चाहता था। रविकांत ने सहमति में सिर हिलाया और अपनी चीजें समेटकर रवाना हो गया।

उधर सिल्विया घर पहुंची तो बेहद घबराई हुई थी। वह खन्ना की कल्पना दरिंदे के रूप में नहीं कर पा रही थी पर रवि उसका पुराना और अच्छा मित्र था। उसकी बातों पर अविश्वास भी कैसे करती। पर रवि के पास भी अभी कोई पुख्ता सबूत नहीं था। वह केवल खरोंच के आधार पर अटकलबाजी कर रहा था और वैज्ञानिक होने के नाते सिल्विया जानती थी कि अटकलबाजी का कोई अर्थ नहीं था, जब तक अकाट्य साक्ष्य न हो। वैसे जिस जैविक प्रयोग में इनका दल लगा हुआ था उसके मद्देनजर किसी भी तरह की घटना या दुर्घटना से इनकार नहीं किया जा सकता था। सिल्विया ने अपना डेस्कटॉप कंप्यूटर ऑन किया और गूगल पर इस तरह की घटनाओं का ब्यौरा खंगालने लगी। उसने द्वितीय विश्वयुद्ध के समय नाजी वैज्ञानिकों द्वारा किये गए कारनामों के बारे में  पढ़ा जिसमें हिटलर के आदेश से कई जैविक प्रयोग किये गए थे। कई यहूदियों को काट-पीट कर हिटलर ने कई तरह के प्रयोग करके सुपर मानव जैसी कोई चीज बनवाने की कोशिश की थी पर असफल रहा था। आधा मानव आधा पशु जैसा कोई चित्र भी सिल्विया ने देखा तो उसकी रीढ़ की हड्डी में सिहरन फैल गई। सिल्विया जब बहुत तनाव में होती थी तो उसके मन के सारे भाव और उसके उद्गार खुद ब खुद उसके मुंह से निकलने लगते थे। उसे पता भी नहीं चलता था और वो बड़बड़ करती रहती थी। आज भी अनजाने में वो खुद से बातें करती रही। क्या खन्ना की खूनी दरिंदे हैं? क्या वक्त पर सैनिक टुकड़ी न पहुँच जाती तो कल रात रविकांत भी उनका शिकार हो सकता था? इतना सोचते और बोलते हुए उसके बदन के सारे रोंगटे खड़े हो गए। उसे अकेले में भय लगने लगा। बुरी तरह कांपते और जीसस का नाम रटते हुए उसने कम्प्यूटर बंद किया और अपना मोबाइल उठा कर रविकांत का नंबर पंच किया और घूमी कि भय से जड़ हो गयी। उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया मानो बदन का सारा रक्त निचुड़ गया हो। उसके हाथ से मोबाइल छूट कर गिर गया और वो बेहोश सी होने लगी। सामने कुर्सी पर बैठे खन्ना ठंडी निगाहों से उसे घूर रहे थे।

 

क्या हुआ आगे?

क्या सिल्विया बच सकी?

पढ़िए भाग 8 ...

साइंस फिक्शन

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