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ब्रह्मपिचाश
ब्रह्मपिचाश
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© Unknown Writer

Drama

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"क्या हुआ बेटा, आज तुम इतने उदास क्यों हो ?" राधा ने ऋषभ के सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए पूछा।

"माँ, मेरा काॅलेज में सब लोग मजाक उड़ाते हैं। कहते हैं कि ये साला एक नम्बर का कंगाल हैं। माँ, आपके पास धन-दौलत नहीं थीं तो आपने मुझे पैदा हीं क्यों किया ?" ऋषभ की परेशानी और सवाल सुनकर राधा काफी बेचैन हो गई।

"बोलो न माँ, तुम्हारे पास औरों की तरह धन-दौलत नहीं थीं तो तुमने मुझे जन्म हीं क्यों दिया ?" ऋषभ के मुँह दुबारा वही सवाल सुनकर राधा का धैर्य जवाब दे गया।

वह भावुक स्वर में बोल उठी- "मैंने तुम्हें जन्म नहीं दिया हैं और जिन्होंने तुम्हें जन्म दिया हैं, वे कंगाल थे। दरअसल तुम्हारा जन्म एक बहुत हीं सम्पन्न परिवार में हुआ था और मैं उस परिवार की सिर्फ एक नौकरानी थीं। ये बात अलग हैं कि वह परिवार मुझे नौकरानी नहीं, बल्कि अपने परिवार की एक सदस्या समझते थे। आज से करीब बीस-बाइस पहले तुम्हारा परिवार यहाँ से पचास किलोमीटर दूर स्थित राघोपुर गाँव का सबसे अमीर परिवार था। घर में तुम्हारे माता-पिता, दादा-दादी और चाचा मिल-जुलकर हँसी-खुशी रहा करते थे और फिर तुम्हारा जन्म हुआ तो जैसे स्वर्ग की रौनक उस घर में उतर आयी। पर ये रौनक क्षणिक थीं। तुम्हारे जन्म के कुछ दिनों बाद तुम्हारे परिवार के सारे सदस्य एक-एक करके मौत के मुँह में चले गए। उस घर में सिर्फ मैं और तुम बचे थे और फिर एक रात उस घर में तुम्हारी भी मौत का एक परवाना आ गया।उसके बड़े-बड़े दाँत, कोयले की तरह दहकती आँखें, बड़े-बड़े बाल, भीमकाय शरीर और बड़े-बड़े नाखून थे। वो कौन था, ये मुझे नहीं पता लेकिन वो इंसान हर्गिज नहीं था क्योंकि भरपूर रोशनी में उसकी परछाई नजर नहीं आ रही थीं।

उसे देखते हीं मैं बहुत ज्यादा डर गई। मैंने तुम्हें अपनी गोद में छिपा लिया। ये देखकर उसने बहुत भयानक गर्जना की और क्रूर स्वर में बोला- 'मैं इस घर के सामने वाले पीपल के पेड़ में रहने वाला ब्रह्मपिशाच हूँ। मैंने ही इसके माता-पिता, दादा-दादी और चाचा को मारा हैं। ये इस घर में रहा तो मैं इसे भी मार डालूँगा। तू इसे बचाना चाहती हैं तो इसे लेकर यहाँ से कहीं दूर चली जा और इसे यहाँ कभी मत आने देना।'

मैंने उसकी बात सुनकर राहत की साँस ली और तुम्हें लेकर ऐस शहर में आ गई। बेटा, मैं जैसे आज तक तुम्हें मेहनत-मजदूरी करके पालती आ रही हूँ वैसे ही थोड़े दिन और पाल लूँगी। उसके बाद तुम कोई अच्छी सी नौकरी करके किसी अच्छी लड़की से शादी कर लेना और मजे से जिंदगी गुजारना। लेकिन बेटा, भूलकर राघोपुर जाने का नाम मत लेना वरना वो ब्रह्मपिचाश तुम्हें मार डालेगा।"

"डोंट वरी माँ, मैं राघोपुर कभी नहीं जाऊँगा। पर मुझे कल काॅलेज की ओर से पंद्रह-बीस दिनों के लिए एक ट्रिप पर जाना हैं, तुम उसके लिए सुबह जरूरी पैकिंग कर देना।"

"ठीक हैं बेटा। अभी तुम खाना खाकर सो जाओ। मैं सुबह तुम्हारी ट्रिप के लिए जरूरी पैकिंग कर दूँगी। तुम हाथ-मुँह धोकर खाना खाने आ जाओं, मैं तुम्हारे लिए खाना लगा रहीं हूँ।" कहकर राधा किचन में चली गई।

.........

रात के लगभग बारह बज चुके थे, लेकिन जीर्ण-शीर्ण मकान में टूटी-फूटी चारपाई पर लेटे ऋषभ की आँखों से नींद कोसो दूर थीं। अचानक 'भड़' की आवाज के साथ दरवाजा खुला और ठीक वैसा ही भीमकाय और भयानक शख्स घर में दाखिल हुआ, जिसके बारे में राधा ने एक दिन पहले ऋषभ को बताया था। उस शख्स के बड़े-बड़े दाँत, कोयले की तरह दहकती आँखें, बड़े-बड़े बाल, भीमकाय शरीर और बड़े-बड़े नाखून थे। कमरे में पर्याप्त रोशनी होने के बावजूद उसकी परछाई कहीं नजर नहीं आ रही थीं।

किसी अनहोनी की आशंका से ऋषभ का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा, लेकिन उसने हिम्मत जुटाकर आगंतुक शख्स से सवाल किया- "क्या तुम सामने वाले पीपल के पेड़ में रहने वाले ब्रम्हपिशाच हो ?"

"हाँ, लेकिन तुम कौन हो जो मेरी अनुमति के बिना इस घर में आराम फरमा रहे हो ?" भीमकाय शख्स ने क्रोधित स्वर में प्रतिक्रिया व्यक्त की।

"मैं ऋषभ हूँ इस घर का एकमात्र जीवित सदस्य।"

"यानि, तुम अपने परिवार के पास जाना चाहते हो।"

"नहीं, मैं आपकी सेवा करके आपसे कुछ दिव्य शक्तियाँ हासिल करने आया हूँ।"

"बड़े बहादुर हो। हम तुम्हारी बहादुरी से प्रभावित हुए, लेकिन तुम्हें हमसे दिव्य शक्तियाँ तभी मिलेगी, जब हमारी सेवा करके हमें प्रसन्न कर दोगे।"

"मुझे मंजूर हैं। बताइए कि मुझे आपको प्रसन्न करने के लिए क्या करना होगा ?"

"रोज एक बोतल शराब पिलानी होगी।"

"ठीक हैं, मैं आज के लिए पहले से हीं अपने साथ लेकर आया हूँ।" कहकर ऋषभ चारपाई से उठा और कमरे में रखे अपने बैग से एक विदेशी शराब की बोतल निकाली और उस भीमकाय शख्स को दे दीं।

पूरी बोतल एक हीं साँस में हलक से नीचे उतारने के बाद वह शख्स ऋषभ से बोला- "हम तुम्हारी आज की सेवा से प्रसन्न हुए। आज हम तुम्हारी एक इच्छा पूरी करेंगे। अपनी एक इच्छा बोलो।"

"मेरी उम्र कितनी हैं, ये बता दो।" जवाब में ऋषभ ने कहा।

"छियास्सी वर्ष, नौ माह, तेरह दिन, बाइस घंटे, दो मिनट और अड़तालीस सेकंड।"

"बाबा, इतना कौन याद रखेगा ? आप ऐसा कीजिए, या तो मेरी उम्र पूरी-पूरी सत्तास्सी साल करवा दीजिए या घटाकर छियास्सी साल करवा दीजिए।"

"बेटा, ऊपर वाले ने जिस प्राणी को जितने समय का जीवन दिया हैं उसमें न कोई एक पल जोड़ सकता हैं और न एक पल घटा सकता हैं।"

"पर आपने तो मेरे पूरे परिवार को असमय मौत के मुँह पहुँचा दिया था।"

"असमय नहीं, उनकी मृत्यु का समय आ गया था, इसलिए मौत के मुँह पहुँचाया।"

"और मेरी मृत्यु का समय नहीं आया था, इसलिए मुझे छोड़ दिया ?"

"हाँ।" उसका जवाब सुनते हीं ऋषभ ने कमरे में पड़ा एक डंडा उठाकर उस भीमकाय शख्स की पिटाई शुरू कर दीं।

"ये क्या कर रहा हैं बे, मैं तुझे मार डालूँगा।" डंडे से मार खाते हुए वह शख्स चिल्लाया।

"तू मुझे नहीं मार सकता हैं क्योंकि मेरी मृत्यु का समय आने में अभी काफी वक्त बाकी हैं।" कहकर ऋषभ ने उस भीमकाय शख्स की पिटाई जारी रखी।

"तू चाहता क्या हैं ?" डंडे की मार से आहत होकर भीमकाय शख्स ने सवाल किया।

"तू ये गाँव छोड़कर कहीं दूर जंगल में भाग जा और लौटकर कभी मत आना।"

"हाँ मेरे बाप, जा रहा हूँ।" कहकर वह भीमकाय शख्स जिस द्वार से आया था, उसी द्वार से भाग गया।

जीवन मृत्यु विधाता भय साहस

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