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राजू जिन्दा है
राजू जिन्दा है
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© Atul Agarwal

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राजू आगरा के भीमसैनी बिंदी उद्योग (फैक्ट्री) में नौकरी करता था. रहने वाला मेरठ का, शायद वहां का तड़ी पार बदमाश. इसी नाम से सब लोग जानते थे. यह उसके घर का नाम है. उसका असली नाम सिर्फ उद्योग के नौकरी दस्तावेज़ों में दर्ज है.

किसी की सिफारिश से यहाँ नौकरी पर लग गया था, मालिकों को भी ऐसे एक दो कारिंदों की ज़रुरत रहती है.

भीमसैनी बिंदी उद्योग में लगभग १२० लोग काम करते हैं, राजू का दबदबा है. शरीर थुल थुल है, फैक्ट्री में ही रोज़ उसके दारु पीने, मुर्गा बनवा कर खाने, मेरठ में अपनी क्राइम हिस्ट्री की पुरानी कहानियाँ बढ़ा चढ़ा कर सुनाने और दारु व् मुर्गे के पैसों की उघाई के लिए गाली गलौज से हड़काने की वजह से फैक्ट्री के अन्य कर्मचारी उसे बदमाश समझते.

एक रात सिक्योरिटी गार्ड रमेश से उलझ गया, मारपीट हुई, दूसरे सिक्योरिटी गार्ड ने १०० नंबर फ़ोन कर के पुलिस बुला ली. राजू को थाने ले जाकर हवालात में बंद कर दिया गया. FIR दर्ज हो गयी. उद्योग में ही काम करने वाले उसके दो चाटुकारों ने कोर्ट जाकर उसकी जमानत ली.

राजू के रोज़ के शौक की वजह से उस पर शहर के कुछ सूदखोरों की उधारी बढती गयी. उन सूदखोरों के असली हट्टे कट्टे कारिंदों ने फैक्ट्री में ही एक दिन कर्ज वसूली के लिए राजू की खूब छिछालेदर की व् पांच दिन का अल्टीमेटम दे गए, राजू शहर छोड़ कर भाग गया.

अब दोनों जमानतदारों को कोर्ट में हर तारीख पर जाना पड़ता. दसियों साल में सौइयों तारीख लगी, वादी रमेश व् दोनों जमानतदार फैक्ट्री से शौर्ट लीव लेकर एक साथ ही कोर्ट जाते.

एक दिन दोनों जमानतदारों ने कोर्ट में एक डाक्टरी सर्टिफिकेट पेश किया जिसमें राजू को मृत घोषित किया गया था, अभियुक्त की मृत्यु का संज्ञान लेते हुए, केस दाखिल दफ्तर कर दिया गया यानी बंद कर दिया गया.

सिक्योरिटी गार्ड रमेश ने भी संतोष की सांस ली कि अब कोर्ट नहीं जाना पड़ेगा.

तीन साल और गुजर गए. सिक्योरिटी गार्ड रमेश रिश्तेदारी में शादी के लिए बस से गाजिआबाद गया. गाजिआबाद बस अड्डे पर राजू दिख गया, पहले तो भ्रम हुआ कि राजू तो मर चुका है. लेकिन फिर पास जा कर बातचीत की, बहुत झटक गया था. राजू ने बताया की मेरठ अपनी माँ से मिलकर आ रहा है. राजू रमेश को अपने घर ले गया और चाय पिलाई. अब राजू सुधर चुका था व् छोटी सी नौकरी कर के अपने परिवार के साथ रह रहा था.

रमेश ने राजू को उसके मरने के कोर्ट में जमानतदारों द्वारा दिए गए सर्टिफिकेट की बात नहीं बतायी.

रमेश नें राजू के साथ मोबाइल पर सेल्फी भी खिची.

रमेश को उसकी दयनीय स्थिति पर दया आई और उसने यह भी सोचा की अगर उसने कोर्ट में राजू जिन्दा है की अर्जी लगाईं, तो फिर कोर्ट के चक्कर शुरू हो जायेंगे.

रमेश ने लौटकर फैक्ट्री में जब उन दोनों जमानतदारों को वह सेल्फी दिखाई तो उनकी पैरों तले ज़मीन खिसक गयी, लेकिन रमेश ने कहा की जाओ ऐश करो और यही समझो की ‘एक था राजू' फिल्मों में यह क्रम बदल गया, पहले ‘एक था टाइगर’ और फिर ‘टाइगर ज़िंदा है’.

उद्योग क़र्ज़ कोर्ट

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