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एक्सीडेंट
एक्सीडेंट
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© Varman Garhwal

Drama Tragedy

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जनवरी, १९९७(1997) में एक प्राइमरी स्कूल की बात हैं, जिसमें पहली क्लास से लेकर पाँचवीं क्लास तक के बच्चों को पढ़ाया जाता था। सर्दियों का मौसम होने के कारण स्कूल टाइम सुबह साढ़े दस से शाम साढ़े चार बजे तक निर्धारित किया गया था। उस समय अब की तरह स्कूल में खाना नहीं बनता था। बच्चे घर से टिफिन लेकर आते थे या घर का कोई सदस्य स्कूल में ही टिफिन दे जाता था। वरना बच्चे आधी छुट्टी होने पर खाना खाने घर जाते थे।

रोज की तरह स्कूल में आधी छुट्टी(हाफ-टाइम) का समय हुआ। मैडम ने एक बच्चे को आधी छुट्टी की घंटी बजाने के लिए कहा और सब टीचर स्टाफ रूम में खाना खाने चले गए।

आधी छुटटी के बाद जो बच्चे टिफिन साथ लाए थे, वो सब अपना-अपना टिफिन लेकर खाना खाने लगे। जिन बच्चों के घर से कोई टिफिन लेकर आने वाला था, वो सब बच्चे इन्तज़ार करने लगे। अन्य बच्चे खाना खाने के लिए घर की तरफ जाने लगते हैं। सब बच्चे हँसते हुए, एक-दूसरे से मजाक करते हुए, एक-दूसरे को छेड़ते या चिढ़ाते हुए, कोई इधर-उधर की बात करते हुए स्कूल से बाहर निकल रहे थे। उसी समय वहाँ से एक मिट्टी से भरी ट्रॉली वाला ट्रेक्टर आया। चार-पाँच बच्चे भाग कर ट्रॉली के पीछे लटक गए।

ट्रेक्टर वाले ने ट्रेक्टर रोक कर उन बच्चों को डॉन्टा- "ओए, छितर पैणगे, थल्लै उतर जो( थप्पड़ पड़ैगे, नीचे उतर जाओ)।"

एक बार तो बच्चे उतर गए, लेकिन जब ट्रेक्टर वाला जाने लगा तो फिर से भाग कर ट्रॉली से लटक गए।

ट्रेक्टर वाले ने फिर से ट्रेक्टर रोक कर बच्चों को डान्टा- "खड़जो, तुसी समझाण नाण मान्दै क्यौं नी ? कि रौळा हैगा तुहाडै ? फैर तुहाडै माँ-प्यौ कैण गे, साडे बच्चैया नू मारया(रूको, तुम लोग समझाने से मानते क्यों नहीं ? क्या परोब्लम हैं तुमको ? फिर तुम्हारे माँ-बाप कहैगें कि हमारे बच्चों को पीटता हैं)।"

ऐसा चार-पाँच बार हुआ, बच्चे बार-बार ट्रॉली के पीछे लटक जाते हैं और ट्रेक्टर वाला ट्रेक्टर रोक कर उनको डॉन्ट कर दूर भगाता हैं।

आखिर में एक बच्चा ट्रॉली के पीछे लटक कर थोड़ा नीचे हो गया ताकि ट्रेक्टर वाला उसे देख ना सकें। अब ट्रेक्टर वाले को मालूम ही नहीं था कि एक बच्चा फिर से ट्रॉली से लटका हुआ हैं।

ट्रेक्टर चल रहा था और वो बच्चा ट्रॉली के पीछे ही लटका हुआ था। कुछ बच्चे आपस में बातें करके ट्रेक्टर वाले का मजाक बना रहे थे कि ट्रेक्टर वाले को मालूम ही नहीं कि एक बच्चा अभी-भी आराम से लटका हुआ हैं।

इतने में बच्चे का संतुलन बिगड़ गया और बच्चे ने ट्रॉली से नीचे उतरने की कोशिश की, लेकिन पहले उसकी शर्ट अटक गई और शर्ट निकालने की कोशिश में उसका पैर ट्रॉली के टायर में फँस गया और बच्चा उस मिट्टी से भरी ट्रॉली के टायर के नीचे गिर गया और ट्रॉली का टायर उस बच्चे के पैरों से लेकर पूरे शरीर पर होते हुए उसके सर के ऊपर से निकल गया। जैसे अन्तिम संस्कार में जलाते समय इन्सान के दिमाग में ब्लास्ट होता हैं। उस बच्चे के सर पर टायर चढ़ते ही उसके दिमाग में ब्लास्ट हुआ और उसका सर फट गया। जमींन पर खून ही खून बिखर गया। देखते ही देखते मजाक-मजाक में एक बच्चे की दर्दनाक मौत हो गई।

सर फटने की आवाज सुनते ही ट्रेक्टर वाले ने नीचे उतर कर देखा कि क्या फटा हैं ? तो वो भी हक्का-बक्का रह गया। बच्चे की हालत देखकर ट्रेक्टर वाला बिल्कुल सून्ना हो गया। ट्रेक्टर वाला बच्चे की तरफ से नजरें हटा कर जमींन पर घुटने टेक कर बैठा और अफसोस में डूब गया।

आस-पास स्कूल के अन्य बच्चे जिनकी आँखों के सामने ये सब हुआ, वो सब बच्चे भी सहम गए। कुछ बच्चे डर से थर-थर काँपने लगे, कुछ बच्चे अपने घर भाग गए, कुछ बच्चे स्कूल के अन्दर भाग गए, कुछ बच्चे वहीं खड़े देख रहे थे।

सर फटने की आवाज स्कूल के सभी टीचर और आप-पास रहने वाले लोगों को भी सुनाई दे गई। स्कूल के आस-पास ज्यादा घर नहीं थे। सिर्फ चार-पाँच घर ही थे।

कुछ देर में स्कूल के टीचर और आस-पास रहने वाली महिलाए वहाँ जमा हो गई। बच्चे के घरवालों तक भी बात पहुँच गई।

जैसे ही बच्चे की माँ और बहन को ये खबर मिली, वो दोनों दौड़ी-दौड़ी वहाँ पहुँच गई और ट्रैक्टर वाले को गालियाँ और बददुआयें देने लगी। घर के पुरुष उस समय घर पर नहीं थे, वे अपने काम पर गए हुए थे।

स्कूल के टीचर ने सभी बच्चों को अपने-अपने घर जाने का बोल कर छुट्टी कर दी। कुछ देर में पुलिस भी आ गई। इस घटना के चश्मदीद गवाह सिर्फ स्कूल के पाँच से दस-बारह साल तक के बच्चे ही थे।

इस घटना के बारे में जिसने भी सुना, उसने ट्रेक्टर वाले को ही दोषी ठहराया। सबको ट्रेक्टर वाला एक बच्चे का हत्यारा नजर आ रहा था। सबकी जुबाँ पर यहीं वाक्य था कि एक लापरवाह ड्राइवर ने बड़ी बेरहमी से एक बच्चे को कुचलकर मार दिया।

Accident Life Death

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