अपनी अपनी किस्मत

अपनी अपनी किस्मत

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          आज अचानक रेल में सफर करते वक़्त  सीमा को देखकर सुरेश चौंक पड़ा। दोनों की सीटें बिल्कुल आमने-सामने होने के कारण वे दोनों अपलक एक दूसरे को कुछ इस तरह से देखते रहे जैसे कि वे एक दूसरे को पहचानने की कोशिश कर रहे हों।

      “कैसी हो सीमा...?” सुरेश ने शांत व धीमे स्वर में कहा।

      “ठीक हूँ। आप कैसे हैं, घर में सब ठीक हैं न…?”

   सुरेश सीमा के प्रश्न का अर्थ समझ चुका था। घर में सबसे सीमा का मतलब था बच्चे और पत्नी।

      “आपकी पत्नी कैसी है?” सीमा ने दुबारा प्रश्न किया।

      “ठीक है। बिल्कुल तुम्हारी जुड़वाँ बहिन की तरह लगती है।” मुस्कराते हुऐ  सुरेश ने कहा।

  सीमा की नज़रें झुक गई। सुरेश को अब वह किसी छुई-मुई पौधे की तरह लगने लगी थी। लेकिन पहले की अपेक्षा उसकी आँखों के नीचे स्याह धब्बे उभर आए थे।

   सुरेश ने सिगरेट सुलगाकर एक लम्बा कश खींचा और फिर अपने नाक व मुँह में से सिगरेट का धुआँ छोड़ते हुऐ  कहा, “महेश नहीं आया?”

      “नहीं...मैं अकेली ही हूँ।”

  सीमा के शब्दों को सुनकर सुरेश कुछ बेचैन हो उठा था। उसका साथ छोड़ने के बाद वह महेश के पास चली गई थी। फिर वह अकेली कैसे हो गई है? शायद सफर में अकेली होगी। सोचते हुऐ  उसने खिड़की खोल दी, ताकि डब्बे में फैला सिगरेट का धुआँ बाहर निकल सके।

  खिड़की खुलते ही हवा का एक तीब्र झोंका सीमा के शरीर से टकराकर उसके सिर के बालों को उड़ाने लगा था। रात के सन्नाटे को चीरती हुई पटरी पर दौड़ती हुई गाड़ी के पहियों की खट...खट...धड़...धड़ाक की आवाज कानों में गूँजने लगी थी।

  तभी गाड़ी के उसी डब्बे में शोर हो गया था। अपनी सीटों पर बैठै ताश खेलते हुऐ  वे चारों युवक आपस में झगड़ने लगे थे। उनका शोर सुनकर सुरेश उनको देखने चला गया था। लेकिन जब वह अपनी सीट पर वापस आया तो सीमा ने कहा, “आपको उस तरफ नहीं जाना चाहिए था। ऐसे लोग अपने साथ छुर्री-चाकू लेकर चलते हैं।”

      “मेरी पत्नी भी यही कहती है, जैसा तुम कह रही हो। लेकिन मेरे मरने से कौन सी जनसंख्या में कमी हो जाएगी, एक पत्नी है वह भी जी लेगी किसी तरह...!”

   सुरेश के शब्दों को सुनकर सीमा के मन में आया कि वह उसके गले में अपनी बाहें डालते हुऐ  कहे कि वह उसे अब भी बहुत प्यार करती है। लेकिन वह कहे भी तो कैसे…! यह अधिकार तो वह बरसों पहले खो चुकी है। उस वक़्त , जब उसके सिर पर महेश के प्यार का भूत सवार था।

   उसे वह दिन याद आया जब उसकी शादी सुरेश के साथ हुई थी। लेकिन शादी के पहले ही दिन उसने सुरेश से कह दिया कि, ‘वह महेश से प्यार करती है, और उसी के साथ अपना जीवन व्यतीत करेगी। अगर उसे रोकने की कोशिश की तो वह आत्महत्या कर लेगी या फिर किसी की हत्या कर देगी।’

  सीमा के शब्दों को सुनकर महेश सन्न रह गया। वह सिर से लेकर पैरों तक काँप उठा। उसने सोचा भी नहीं था कि शादी की पहली ही रात को सीमा उसके सामने किसी दूसरे पुरूष का बखान करने लगेगी। उस रात उसने सीमा को समाज, दुनिया, लोक-लाज व आस-पड़ोस के बारे में सबकुछ समझाया लेकिन उसने कुछ भी सुनने से इंकार कर दिया था।

  मेहमानों के चले जाने के बाद जब सीमा ने उसका घर छोड़ने को कहा तो महेश ने उसे अपने पास बिठाते हुऐ  कहा, “अभी कुछ नहीं बिगड़ा है सीमा। देर आए दुरस्त आए…तुम अपना पिछला सब कुछ भूलकर अपनी नई ज़िंदगी  के बारे में सोचो! मैं तुम्हें किसी तरह की कोई कमी नहीं होने दूँगा।”

      “लेकिन मैं तुम्हारे साथ खुश नहीं रह सकती। क्योंकि मैं महेश को नहीं भुला सकती। लोग क्या कहेंगे, मुझे इसकी चिन्ता नहीं है। इसकी चिन्ता तुम करो। यहाँ रहना मेरे लिए सम्भव नहीं है। हम दोनों के रास्ते अलग-अलग हैं। इसी में हम दोनों की भलाई है।”

     “फिर तुमने मेरे साथ शादी क्यों की…?”

     “वह मेरी मजबूरी थी।”

     “कैसी मजबूरी...?”

      “मैं तुम्हारे साथ शादी करने के लिए तैयार नहीं थी। मुझे मजबूर किया गया। मेरे न कहने पर एक दिन जब मेरी माँ ने अपने हाथ की नस काटी तब न चाहते हुऐ  भी मुझे तुम्हारे साथ शादी करने के लिए हाँ कहना पड़ा।”

     “लेकिन अब तो कोई मजबूरी नहीं है न!”

     “है न...मजबूरी है...। मैं तुम्हें छोड़ सकती हूँ। लेकिन महेश को नहीं छोड़ सकती। क्योंकि महेश मेरी ज़िंदगी  का पहला प्यार है। उसके पास मेरे लिए सुख ही सुख है, और तुम्हारे पास दुःख के अलावा कुछ भी नहीं।

     “यह तुम इतने इत्मीनान से कैसे कह रही हो…?”

     “इंसान जब अपनी मर्जी से कच्चे फर्श पर सोता है तो उसे गहरी नींद आती है। लेकिन किसी को जबरदस्ती मखमली गदेले में सुलाना चाहो तो उसे नींद नहीं आती बल्कि सिरदर्द होने के कारण वह सारी रात अपना माथा पकड़े बैठा रहता है।”

  सीमा को हर तरह से समझाने के बाद भी वह अपनी हठ पर अड़ी रही। न चाहते हुऐ  भी जब सुरेश ने ये सारी बातें अपनी माँ को बताई तो सुनते ही उसकी माँ सन्न रह गई थी। उसे लगा कि वह अपनी जगह खड़े-खड़े पाताल लोक में समाती जा रही है। अचानक ही उसकी आँखों में गीलापन तैर आया था।

     “मै उसे समझाती हूँ।” उसकी माँ ने अपनी आँखों में आए गीलेपन को पोंछते हुऐ  कहा।

     “वह पत्थर की बनी है माँ…। मुझे नहीं लगता है कि वह तेरा कहना मानेंगी। अगर तू उसे समझाना ही चाहती तो समझा ले। क्या पता वह तेरा कहना ही मान ले।”

  सुरेश की माँ ने उसे समझाने की बहुत कोशिश की। लेकिन वह नहीं मानी। बल्कि उसने उसे भी साफ-साफ कह दिया था कि वह अब इस घर में नहीं रुकेगी, और कल सुबह होते ही महेश के पास चली जाएगी।

  उस रात सुरेश और उसकी माँ आपस में बैठे बातें करते रहे। उस वक़्त  उसकी माँ ने सुरेश को पुलिस व कोर्ट में जाने के लिए कहा तो सुरेश ने कहा, “हम कहीं भी जाएँगे लेकिन फैसला उसी के पक्ष में होगा माँ। अभी शादी हुऐ  एक हफ्ता भी नहीं बीता और अभी से पुलिस, थाना, कोर्ट, कचहरी, यह मैं नहीं झेल सकूँगा माँ। मैं लोगों की तरह-तरह की बातों को नहीं सुन सकूँगा। जीना बहुत मुश्किल हो जाएगा माँ।”

     “सुन बेटा...तू वही करना जिसमें तुझे अपनी भलाई नजर आती हो और तू सुखी रह सके। मैं तुझे किसी भी तरह से दुःखी नहीं देख सकती। वैसे भी मेरा क्या भरोषा, आज हूँ कल नहीं…!”

  दूसरे दिन सुबह होते ही वह सीमा को उसके मायके छोड़ आया था। लेकिन लौटने से पहले उसने सारी बातें विस्तार से सीमा के पिता को बता बता दी थी।

  वापस आकर उसने अपनी माँ से कहा, “माँ…अगर कोई सीमा के बारे में पूछे तो कहना कि सीमा अपने मायके चली गई और वह वहीं से अपनी नौकरी पर जाएगी। यहाँ से उसको नौकरी करना आसान नहीं है।”   

    सुरेश की बातें सुनकर उसकी माँ रोने लगी थी। अपनी इज्जत बचाने के लिए उनके सामने झूठ के अलावा कोई उपाय ही नहीं था।

  उस दिन के बाद उसे फिर सीमा कभी नहीं मिली। और आज अचानक मिले भी तो एक दूसरे के बेहद करीब और पास-पास।

  मुरादाबाद में गाड़ी रुकने के साथ ही प्लेटफार्म पर होने वाले शोर-शराबे व चाय-चाय की आवाजें सुनकर सुरेश ने कहा, “आप चाय पिऐंगी?”

     “हाँ...।”

     “और क्या लेंगी आप…?”

     “पराठे लाई हूँ। वही चाय के साथ ले लेंगे।”

     “अरे वाह! फिर तो अचार भी होगा…? मेरी पत्नी को भी अचार के साथ पराठे खाने का बहुत शौक है। लेकिन इस वक़्त  वह मायके गई हुई है।” कहते हुऐ  सुरेश ने चाय वाले से दो कप चाय लिए, और फिर वे दोनों पराठे खाने लेगे।

     “आप इस वक़्त  कहाँ जा रहे हैं?”

     “रामनगर, अपनी पत्नी को लेने के लिए जा रहा हूँ।” कहकर उसने सिगरेट सुलगा ली थी।”

     “मैं भी तो वहीं जा रही हूँ।”

     “महेश रामनगर में रहता है क्या...?”

     “नहीं...मैं तो अतिथि से मिलने जा रही हूँ। अतिथि के बारे में तो तुम जानते ही हो।”   

  “अरे हाँ...याद आया। वही अतिथि न...! जिसने हम दोनों के फेरे होते वक़्त  मेरे जूते छिपा लिए थे। उसे कहना कि हम मिले थे।”

     “ठंड लग रही है। खिड़की बंद कर दीजिए।” सीमा ने अपना शाल  अपने बदन पर लपेटते हुऐ  कहा।

  सुरेश ने मुस्कराते हुऐ  खिड़की को बन्द कर दिया था। कुछ ही देर बाद गाड़ी अपनी तेज रफ्तार से भागने लगी थी। करीब एक घंटे बाद ही गाड़ी जब रुकी तो काशीपुर आ चुका था। डब्बे के अन्दर चुपचाप बैठे हुऐ  व सोऐ हुऐ  लोग तेजी से उतरने लगे थे।

     “कौन सा स्टेशन आया…?”

     “काशीपुर...। यहाँ पर गाड़ी आधे घण्टे तक रुकती है। चलो बाहर चलकर चाय पीते हैं।”

     “ठंड भी तो बहुत ज्यादा है।”

     “हाँ...। पहाड़ों से बहकर आने वाली हवा बदन को कंपकंपा देने वाली जरूर है। चाय पीने से बदन कुछ गरम हो जाएगा।”

     “आप कह रहे हैं तो चल देती हूँ। अन्यथा अपनी जगह से उठने का तो मन ही नहीं करता। पहाड़ों की तरफ आना गरमियों में ही अच्छा लगता है। लेकिन जब इधर-उधर जाना हो तो फिर ठंड या गरमी को क्या देखना।”

  कहते हुऐ  वह सुरेश के साथ गाड़ी से बाहर निकल आई थी। नीली साड़ी व नीले ब्लाउज व सफेद व काले रंग के स्वेटर के ऊपर पड़ती प्लेटफार्म की रोशनी में उसका चेहरा दमक उठा था। अचानक ही सुरेश के मन में खयाल आया कि वह एक बार सीमा के गालों को छू कर देखे कि उसके चेहरे पर कितना बदलाव आया है, तभी हवा के एक तेज झोंके के साथ उसके बाल उसके चेहरे पर बिखर आए थे। उसने अपने दाएँ हाथ की उँगलियों से अपने बालों को ठीक किया तो उसकी गोरी-गोरी पतली उँगलियों को देखकर वह तड़प उठा था।

  एकाएक उसके मन में खयाल आया कि जब प्रेयसी रात के सन्नाटे में अगर साथ में हो तो प्लेटफार्म पर घूमने का मज़ा कुछ और ही होता है। उस वक़्त  दुनिया बहुत छोटी और रात बहुत बड़ी व अपनी लगती है।

     “रामनगर कितने दिनों तक रहोगी?” चाय के स्टाल की ओर अपने कदम बढ़ाते हुऐ  सुरेश ने कहा।

     “यही कोई दो या तीन दिन।”

     “इतनी जल्दी...?”

     “हाँ...। जब मन बहुत बेचैन हो जाता है तो अतिथि के पास चली आती हूँ।...पर आज ऐसा लगता है कि मुझे सबकुछ मिल गया है। मैं अकेली नहीं...बल्कि तुम मेरे साथ हो। पलभर का यह तुम्हारा साथ कितना अच्छा लग रहा है, मैं इसे कभी नहीं भुला पाऊँगी। मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि तुम इस तरह से मुझे फिर कभी मिलोगे।”

  सीमा की बातें सुनकर सुरेश कुछ पल के लिए उदास हो गया था। सीमा के साथ कदम बढ़ाते हुऐ  वह सोचने लगा कि अगर आज सीमा उसे छोड़कर न जाती तो इस समय इतनी बातें न होती। मन में हचचल सी हुई कि फूल अपने आप को कितना भी छिपाने की कोशिश करे लेकिन उसकी शोभा तो तभी है जब कोई तितली अपने पंख इठलाती हुई अपने मन का श्रृगांर करने के लिए उस पर बैठती है। भवँरों का गुनगुनाना भी क्या…? अगर वह फूल की खूबसूरती पर अपने आप को न्योछावर न कर दे। वह प्यार भी कोई प्यार होता है जिसमें ज़िंदगी  की कोई तड़प, कोई दर्द, व कोई छटपटाहट न हो।

     “एक बात कहूँ?”

     “कहो...।”

     “अगर इस वक़्त  अचानक मेरी पत्नी हम दोनों को देख ले तो वह क्या कहेगी?”

  वह खिलखिलाकर हँसने लगी। उसे हँसते हुऐ  देखकर वह उसे टकटकी लगाऐ देखता रहा। एकाएक बरसों पहले शादी का दृश्य उसकी आँखों में तैर गया था। वही हँसी, वही खिलखिलाना, कहीं दिल के अन्दर बैठते हुऐ  एक गहरी उन्मुक्तता पैदा कर गया था।

  उसके सामने तो वह कभी हँसी नहीं थी। लेकिन शादी के बाद जब एक दिन आस-पड़ोस की औरतों ने उसे घेरा था। उस वक़्त  वह इसी तरह से हँसी थी। खिलखिलाकर...किसी फूल की तरह, एक बार सिर्फ एक बार...और उसी हँसी को सुनने के लिए जैसे बरसों से उसके कान तरस गए थे। कुछ पल के लिए...जैसे कि बसन्त ऋतु में बहती पुरवाई ताज़े फूलों की ख़ुशबू को अपने बदन में समेटे किसी ख़ूबसूरत तरुणाई के बदन को तरोताज़ा कर देती है। मन में आया कि वह इसी तरह से हँसती रहे, और वह इसी तरह से ज़िंदगी  के एक लम्बे सफर के लिए निकल पड़े। दूर...बहुत दूर...जहाँ वे दोनों हों। फूलों की ख़ुश्बू हो। तितलियों का इठलाना व भँवरों का गुनगुनाना हो। बहती नदियों का मन मोहने वाला स्वच्छ जल व शांत वातावरण के साथ-साथ ऊँचे-ऊँचे हरे-भरे पहाड़ों के बीच घसियारियों के मीठे-मीठे गीत हों।

  अब तक चाय वाले ने दो कप चाय बनाकर उन्हें पकड़ा दिए थे। सीमा ने एक-दो बार चाय में फूक मारी और फिर वह चाय सुड़कने लगी थी। चाय सुड़कते हुऐ  उसके मुँह से सुड़...सुड़ की आवाज़  आने लगी थी।

     “मेरी पत्नी भी इसी तरह से तुम्हारी तरह सुड़...सुड़ करते हुऐ  चाय पीती है।”

     “अच्छा...इसका मतलब है कि तुम्हारी पत्नी बहुत ही ख़ूबसूरत  होगी?”

     “हाँ...ठीक तुम्हारी जैसी।”

     “अगर तुम्हारी पत्नी को पता चलेगा कि हम दोनों यहाँ चाय पीते हुऐ  हँस-हँस कर बातें कर रहे थे तो वह क्या करेगी?”

     “वह हँस देगी। तुम्हारी ही तरह, चाय पी लेगी। सुड़...सुड़ करते हुऐ ।”

     “मैं समझ गई हूँ कि तुम अपनी पत्नी से बहुत ज्यादा प्यार करते हो।”

  कहते हुऐ  उसके चेहरे पर उदासी की आड़ी-तिरछी रेखाएँ झलकने लगी थी। जैसे किसी बच्चे ने काग़ज पर या घर की दीवारों पर आड़ी-तिरछी रेखाएँ खींच ली हों।

     “मैं उसे बहुत प्यार करता हूँ। तुम कभी मेरी पहली पत्नी थी और वह दूसरी है। लेकिन ऐसा लगता है जैसे कि वह तुम्हारी ही जुड़वाँ बहन हो। तुम उसे देखोगी तो  अचम्भे में पड़ जाआगी, तुम्हारी आँखें फटी की फटी ही रह जाऐंगी। तुम्हारी ही तरह वह नीली साड़ी व नीले ब्लाउज में बहुत सुन्दर लगती है। ऐसा लगता है…जैसे कि कहकशाँ उतरकर मेरे घर में आ गई हो। तुम्हारी हर कमी को वह पूरा करने की कोशिश करती है। कई बार तो, मैं उसे तुम्हारे नाम से ही बुलाने लगता हूँ। वह कुछ नहीं कहती, हँसने लगती है खिलखिलाकर…ऐसा लगता है, जैसे कि बसन्तऋतु में फूल झर रहें हों।”

     “बहुत भाग्यशाली हो तुम, जो कि तुम्हें इतनी सुन्दर पत्नी मिली।” शब्द बोझिल हो चुके थे। जिनसे हवा के टकराते ही वातावरण शांत व अजनवी सा हो गया था। अचानक ही पहाड़ों से बहती हवा का एक तेज झोंका आया और रात की रानी के फूलों की ख़ुश्बू उनके चारों ओर बिखराकर वापस लौट गया था।

  तभी उसके कंधे से उसका शाल सरक गया था। सुरेश के हाथ उसे लपकने के लिए उठे। लेकिन वह चाह कर भी ऐसा नहीं कर सका। वह चाहता था कि वह इसी बहाने उसके बदन का स्पर्श करे। लेकिन उँगलियाँ हिलकर ही रह गई, कभी मुट्ठी के रुप में तो कभी सीधे रुप में…! तभी सीमा का पैर फिसला और वह सुरेश की बाहों में झूल गई थी। कड़ाके की ठंड में भी उसका शरीर बहुम गरम था।

     “पता नहीं क्यों आज तुम्हारा साथ बहुत अच्छा लग रहा है। मन करता है कि यह रात कभी खत्म न हो, और यह गाड़ी यहीं पर खड़ी रहे।”

  कुछ देर बाद गाड़ी ने सींटी दी। अन्य यात्रियों की तरह वे दोनों भी अपनी-अपनी सीटों पर आकर बैठ गए थे। गाड़ी के आगे सरकते ही सुरेश ने कहा, “तुम कभी रामनगर से आगे भी गई हो?”

     “जिम कार्बेट पार्क तक गई हूँ।”

     “कभी रामनगर से आगे जाकर पहाड़ों की खूबसूरती अपने मन व आँखों में बसाने का खयाल नहीं आया?”

     “ख़याल तो बहुत आता था। लेकिन साथ कोई नहीं था।” वह रुआँसी हो गई थी।

     “कभी महेश के साथ निकल आती।”

     “मैं अकेली हूँ…।”

     “लेकिन आज तुम अकेली नहीं हो।”

  उसके शब्दों को सुनकर वह ज़ोर -ज़ोर  से हँसने लगी थी। ऐसा लगा जैसे वातावरण में भीनी-भीनी सुगंध फैल गई हो। उसकी हँसी सुनकर गाड़ी में बैठे सभी लोगों की नजरें उस पर टिक गई थी।  

  अब तक गाड़ी स्टेशन से काफी दूर निकल गई थी। बाहर सन्नाटा पसरा हुआ था। घुप्प अँधेरे में पता नहीं चल पा रहा था कि बाहर कहाँ क्या है। लेकिन दूर-दूर से टिमटिमाती हुई रोशनी ऐसी दिखाई दे रही थी जैसे कि गाड़ी के साथ-साथ वे रौशनियाँ भी तेजी से भाग रही हों।

  सुरेश ने सिगरेट सुलगा ली थी। सिगरेट के लम्बे-लम्बे कश लेते हुऐ  उसने कहा, “सफ़र का यह पलभर का साथ तुम्हें कैसा लगा, नहीं जानता…। लेकिन मेरे लिए यह एक अवस्मरणीय पल है। पता नहीं क्यों कभी-कभी जीवन में कुछ ऐसा हो जाता है कि जो हमें पता नहीं होता है और वह अचानक ही घट जाता है, किसी भूकम्प की तरह!”

  कुछ ही देर बाद गाड़ी सरपट भागती हुई गौशाला व पीरूमदारा के साथ-साथ अन्य स्टेशनों को छोड़ते हुऐ  रामनगर रेलवे स्टेशन पर रुकी तो हल्की बूँदा-बाँदी सुरू हो गई थी।

  स्टेशन से बाहर निकलते ही उन्होंने ऑटो किया और फिर वे गढ़वाल मोटर यूजर्स कार्यालय के पास के होटल में जाकर बैठै तो सुरेश ने दो कप काफी का आर्डर दे दिया था।

  अब तक बारिश तेज हो गई थी। फिर भी बस के दरवाजों पर खड़े कन्डक्टर आवाजें देते हुऐ  यात्रियों को बुला रहे थे। बैजरौ...बैजरौ। थली सैण...थली सैण। भिक्या सैण...भिक्या सैण। नैनीताल...नैनीताल। लेकिन उन दोनों को उन आवाजों से कोई लेना-देना नहीं था। ठंड के मारे वे दोनों काफी सुड़कते हुऐ  अपने-अपने शरीर में गर्माहट लाने की कोशिश कर रहे थे।

     “वापस कब लौटोगे?” सीमा ने कप खाली करते हुऐ  कहा।

     “अभी सोचा नहीं…। रामनगर आया हूँ तो इस बार उमटा देवी अर्थात गर्जिया देवी के दर्शन करना चाहता हूँ। कभी तुम्हें मौका मिले तो तुम भी जाना। कहते हैं कि वहाँ मन्नत माँगने से मन की मुराद पूरी होती है। नदी के बीचों बीच में यह मन्दिर बडा ही सुन्दर दिखाई देता है। बरसात के मौसम में भयंकर बाढ़ आने के बाद भी यह मन्दिर अपनी जगह सुरक्षित रहता है।”

     “तुम क्या माँगोगे…?”

     “अपने लिए तो कुछ भी नहीं। लेकिन पत्नी के लिए कुछ अवश्य माँगूँगा कि वह जहाँ रहे, जैसी रहे, हमेशा खुश रहे।”

  सुरेश के शब्दों को सुनकर वह बगले झांकने लगी थी। उस वक़्त  उसकी आँखों में एक अजीब सा सन्नाटा पसर गया था। आँखों की पुतलियाँ जैसे कुछ लम्बी होकर गमगीन आँखों को ढाँपने का प्रयास करने लगी थी। होंठ कुछ हिले, शायद कुछ कहने के लिए…चेहरे पर एकाएक उदासी छा गई थी। हरे खेत में सूखे धान के पराल की तरह।

  बारिश बंद होते ही जब बादल छंटे तो सुबह का उजाला तैरने लगा था। अपना सामान उठाते हुऐ  उसने कहा, “चलती हूँ।”

  वह कुछ नहीं बोला। होटल के बाहर निकल कर वह सीमा को तब तक देखता रहा। जब तक वह उसकी आँखों से ओझल नहीं हो गई थी।

  उसके जाते ही सुरेश सोचने लगा कि बिछोह की जो पीड़ा सीमा के चेहरे पर है, वह उसे छिपा नहीं सकी। कितनी बार समझाया था कि शादी होने के बाद पति ही पत्नी के सुख-दुःख का साथी होता है। अगर तुम महेश से प्यार करती हो तो वह तुम्हारा अतीत था। तुम्हारा वर्तमान या भविष्य नहीं। तुम्हारा वर्तमान तो आज है जहाँ हम दोनों खड़े हैं।

  लेकिन वह नहीं मानी।…और महेश के पास चली गई थी। लेकिन आज सीमा को अचानक अपने सामने देखकर उसे अपना अतीत याद आ गया था। वह अतीत जिसे वह हमेशा-हमेशा के लिए भूल जाना चाहता था। लेकिन मरहम लगे घाव अचानक ही एक बार फिर बहने लगे थे।

  उसने अपनी अटैची खोली और उसमें से सीमा की तस्वीर को निकाल कर उसे गौर से देखने लगा। मन में खयाल आया कि वह उसकी तस्वीर के टुकड़े-टुकड़े कर हवा में उड़ा दे। लेकिन वह चाह कर भी ऐसा नहीं कर सका।

  जबकि सीमा आधा घण्टा पैदल चलने के बाद अतिथि के घर पहुँची तो उसे देखकर अतिथि उसके गले से लिपटते हुऐ  बोली, “कैसी है तू...?”

     “अच्छी...बहुत अच्छी हूँ।”

     “अच्छा है जो तू आ गई। सोच ही रही थी कि पता नहीं तू कैसी होगी, मेरा पत्र मिला था न…?”

     “हाँ...।”

     “लेकिन एक बात बता, तू इतनी तेज बारिश में कहाँ रुकी थी?”

     “अरे…वो गढ़वाल यूर्जस का टिकट घर है न! उसी के साथ वाले होटल में रुक गई थी।”

     “अच्छा किया तूने। तू सफर से थक कर आई है फटाफट नहा ले। जब तक तू नहा कर आती है तब तक मैं गरमागरम चाय बनाकर लाती हूँ। फिर दोनों ढेर सारी बातें करेंगे।”

  सीमा बाथरुम में नहाने के लिए गई और अतिथि ने किचन में जाकर चूल्हे पर चाय का पानी चढ़ाते हुऐ  पकोड़े बनाने लगी थी। जबतक सीमा नहा कर आई। तब तक चाय और पकोड़े तैयार हो चुके थे।

  अतिथि ने चाय व पकोड़े सीमा के सामने रखते हुऐ  कहा, “सफर से थक कर आई है। तुझे भूख लगी होगी। नाश्ता बनने में थोड़ी देर लगेगी। इसलिए फटाफट गरम-गरम पकोड़े खा ले।”

     “मुझे बिल्कुल भी भूख नहीं है। रात को सफर करते वक़्त  मैंने बहुत खाया है।”

     “अरे वाह! तू तो सफर में चाय तक नहीं पीती है। फिर यह खाने का बिचार अचानक कहाँ से आ गया था। इतनी भूख कैसे लगी…? साथ में कोई था क्या…?”

  वह कुछ पल ख़ामोश रहने के बाद बोली, “हाँ साथ में कोई था। कभी सोचा भी नहीं था कि वह अचानक ही मुझे इस तरह से मिलेगा। शादी के बाद मैं उसे छोड़कर महेश के पास आई। लेकिन महेश ने मुझसे यह कहते हुऐ  शादी करने से मना कर दिया था कि जो औरत पराए मर्द के साथ एक हफ्ते तक उसके घर में रही हो वह उसके साथ शादी नहीं कर सकता। पता नहीं कैसा भाग्य था मेरा, जो मुझे रखना चाहता था उसके साथ रही नहीं। और जिसके साथ रहना चाहती थी उसने रखा नहीं।”

  कहते हुऐ  सीमा ने अतिथि को सफर की सारी बातें बिस्तार से बता दी थी।

  सीमा की बातें सुनकर अतिथि का मुँह खुला का खुला ही रह गया। वह टकटकी लगाए सीमा के चेहरे पर छाई पीड़ा को देखने लगी थी।

     “उसका तुम्हारे पास होना तुम्हें कैसा लग रहा था सीमा?”

     “बहुत...बहुत ही अच्छा लग रहा था। मन कर रहा था कि रेल में सफर करते हुऐ  काशीपुर की रात कभी ख़तम ही न हो। लेकिन गाड़ी के पहियों ने हमारा सफर बहुत छोटा कर दिया।”

     “लगता है तू उसे अभी तक नहीं भूल पाई है?”

     “उसे तो मैं कभी भी नहीं भूल सकती। मेरे लिए जो प्यार उसके दिल में था। उस प्यार में अभी तक कोई कमी नहीं आई है।”

     “वह तुम्हें आखिरी दम तक प्यार करता रहेगा सीमा।”

     “नहीं अतिथि ऐसा नहीं हो सकता। क्योंकि सुरेश अपनी पत्नी से बहुत ज्यादा प्यार करता है। वह उसे पलकों में बिठाऐ रखता है। सफर में वह हरपल अपनी पत्नी की तारीफ करता रहा। सच...बहुत भाग्यशाली होगी उसकी पत्नी। जिसे सुरेश अपनी जान से भी ज्यादा प्यार करता है। वह अपने बारे में कुछ भी नहीं सोचता। सोचता है तो सिर्फ अपनी पत्नी के बारे में…!”

  कहते हुऐ  सीमा की आँखों में गीलापन तैरने लगा था। नजरें स्वतः ही इस कदर झुक गई थी कि जैसे किसी ने उसकी चोरी पकड़ ली हो। अपने दाँतों से वह अपना निचला होंठ कुतरने लगी थी।

  अतिथि कुछ पल तक उसके चेहरे को देखती रही। और फिर वह ज़ोर -ज़ोर  से हँसने लगी थी। उसे इस तरह से अचानक हँसते हुऐ  देखकर सीमा की बेचैनी बढ़ गई थी।  काफी देर तक हँसने के बाद जब उसकी हँसी रुकी तो सीमा ने घबराए हुऐ  स्वर में कहा, “क...क्या बात है अतिथि... तू इतनी ज़ोर -ज़ोर  से क्यों हँस रही है?”

     “मैं तो इसलिए हँस रही हूँ कि उसकी कोई पत्नी ही नहीं है।

     “ये क्या...क्या कह रही हो तुम…?”

     “मैं सच कह रही हूँ…।”

  सुनते ही सीमा को लगा कि जैसे अचानक ही उसका सारा शरीर ठंडा पड़ने लगा है। बस्स...कुछ ही देर बाद वह एकदम ठंडी हो जाएगी। किसी बर्फ की सिल्ली की तरह।

  उसे लगा जैसे कि अचानक ही उसकी आवाज कहीं गुम हो गई है। उसकी जीभ व उसका गला लगातार सूखता जा रहा है। शरीर की पूरी ताकत जैसे किसी ने अपनी सख्त मुट्ठियों से निचोड़ कर रख दी है। उसकी हालात को देखकर अतिथि ने उसे पानी पिलाकर झकझोरते हुऐ  कहा, “सीमा...सीमा...क्या हुआ तुझे…?”

  कुछ देर बाद अपने आप को संयत करते हुऐ  सीमा ने कहा, “तू सच कह रही है अतिथि...?”

  उसने सीमा के गले में अपनी बाहें डालते हुऐ  कहा, “मैं सच कह रही हूँ सीमा। तेरे चले जाने के बाद उसने फिर कभी शादी नहीं की। उसने अपने दफ्तर में लोगों को बता रखा है कि उसकी पत्नी बाहर नौकरी करती है। इसीलिए वह हर साल छुट्टियाँ लेकर इधर-उधर घूमता रहता है। बल्कि मैंने तेरी तस्वीर के साथ उसे बातें करते देखा है।”

     “कैसी बातें... बता न कैसी बातें करता है वो...!” सीमा ने अतिथि को झकझोरते हुऐ  कहा।

     “यही कि आज तुमने खाने में क्या-क्या बनाया है। अरे हाँ...मेरे लिए नाश्ते में पराठों के साथ अचार जरूर रख देना। सुनो...तुम जल्दी से तैयार हो जाओ, फिर घूमने चलते हैं। अरे हाँ...मैंने देहरादून की दो टिकटें बुक करवा दी हैं। तुम चलोगी न मेरे साथ…? तुम नीले रंग की साड़ी व नीले ब्लाउज में बहुत ख़ूबसूरत  लगती हो। तुम्हें किसी की नजर न लगे। इसलिए बाहर निकलते हुऐ  एक काला टीका तो लगा दिया करो। तुम अपने मायके जाने के लिए कह रही थी न…तो चले जाना, लेकिन अँधेरा होने से पहले ही लौट आना। मैं पल भर भी तुम्हारे बिना नहीं रह पाऊँगा। यही नहीं बल्कि वह हर रोज तुम्हारी राह देखता रहा कि शायद तुम लौट आओगी। लेकिन तुम कभी लौटी ही नहीं। वह आज भी तुम्हें बहुत प्यार करता है सीमा।”

     “ओ...ओ...इतना चाहता है मुझे। और मैं...मैं...मै...।” कहते हुऐ  सीमा बेहोश होकर लुढक पड़ी। उसे होश में लाने के लिए अतिथि ने बहुत कोशिश की। लेकिन जब वह होश मे नहीं आई तो उसने फोन का चोगा उठाया और फिर वह अपने फैमिली डा0 का न0 डायल करने लगी थी। लेकिन नम्बर था कि लग ही नहीं रहा था।

 


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