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बिड़ला विद्या मंदिर नैनीताल ४
बिड़ला विद्या मंदिर नैनीताल ४
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© Atul Agarwal

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“सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,

मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,

हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।”

दुष्यंत कुमार द्वारा

बिड़ला में ६ साल रहे, उस दौरान जून - जुलाई की छुट्टियों में कई बार अपने माता पिता व् परिवार के साथ तल्लीताल प्रशांत होटल में १५ दिनों के लिए रहे। बिड़ला छोड़ने के बाद भी कई बार नैनीताल गए, लेकिन कभी भी कोई शव, शव यात्रा (राम नाम सत्य है) या शमशान नहीं देखा। यहाँ तक की नैनीताल में किसी के निकल लेने (शरीर छोड़ने) का समाचार भी कभी सुनने को नहीं मिला। वहां ठंडे (अच्छे) मौसम की वजह से सबको अमरत्व प्राप्त था, अब ए.सी. लग गये हैं, अब शायद यह सब देखने और सुनने में आता हो।

रोज़ डिस्पैन्सरी में डाक्टर श्री सी.सी. पाण्डे आते थे, उनकी नैनीताल में बहुत इज़्ज़त थी। डिस्पैन्सरी में एक सिस्टर मिसेज थॉमस और एक कम्पाउंडर श्री पाण्डे जी हर वक़्त रहते थे। सन १९४७ में जब अंग्रेजों से यह विद्यालय श्री जी.डी. बिड़ला (श्री घनश्याम दास बिड़ला) जी ने लिया, उस समय विरासत में वह डिस्पैन्सरी भी मिली, जिसका टॉयलेट शायद अंग्रेजों ने अंडमान निकोबार की जेलों की तरह बनवाया था, जो की १९७३ में मेरे बिड़ला छोड़ने तक ज्यों का त्यों लोहा लाट द्वारा ; अतुल कुमार अग्रवाल (अतुल गर्ग – मुज़फ्फरनगर – ऊ.प )

क्रमशः

शमशान डॉक्टर अँगरेज़

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