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उर बसी
उर बसी
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© Rani Ram Garhwali

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सुबह-सुबह का एक ताजा झोंका अचानक ही मेरे चेहरे से टकराया तो मैं अपनी आँखें मलते हुऐ

हड़बड़ा कर उठ बैठा था। अपनी आँखों को मिचमिचाते हुऐ  मैंने दरवाजे की तरफ देखा, दरवाजा पूरी तरह

से खुला हुआ था। जिसके कारण महकते फूलों की भीनी-भीनी सुगंध लिऐ , मन को तरोताजा करने वाली

हवा के मंद-मंद ठंडे झोंके अलसाए हुऐ  बदन के साथ-साथ घर के अन्दर आकर दीवारों से टकराते हुऐ

ख़ुशनुमा प्रातःकाल का एहसास करा रहे थे। बाहर होने वाला बच्चों का बढ़ता हुआ शोर लगातार मेरे कानों

से टकराने लगा था। दरवाजा खुला होने के कारण एक-दो पीले रंग के ततैये कमरे में आकर चक्कर काटते

हुऐ  बाहर निकल गऐ  थे। दरवाजे पर एक तरफ को खिसकाए गऐ  पर्दे हवा के टकराने के कारण कुछ इस

तरह से हिल रहे थे जैसे कि हवा की ताकत उन पर्दों के सामने फीकी पड़ गई हो।

रात को देर से सोने के कारण मेरी आँखों में अब भी जलन हो रही थी। कई दिनों से मैं अपनी नींद पूरी

नहीं कर पाया था। जिसके कारण आँखों की पुतलियाँ अब भी भारी लग रही थी। सिर में हल्का सा दर्द

रहने लगा था। मन में खयाल आया कि थोड़ा सा और सो लूँ। लेकिन मैं चाह कर भी ऐसा नहीं कर सका।

मैंने अपनी नजरें घुमाकर श्रुति की ओर देखा, तो वह अपनी चारपाई पर गुमसुम बैठी थी। मैं समझ चुका

था कि बालकनी का दरवाजा श्रुति ने ही खोला होगा। तभी तो बालकनी से आने वाली हवा के झोंके सीधे

मेरे बदन से टकराते हुऐ  मेरी गहरी नींद में खलल डाल गऐ  थे। श्रुति को सुबह -सुबह  उठकर दरवाजा

खोलने की आदत है। इसीलिऐ  वह रोज चार बजे के करीब बालकनी का दरवाजा खोलकर प्रातःकाल की

शुद्ध व ताजी हवा का आनन्द लेने के लिऐ  घूमने निकल जाती है। लेकिन वह इधर कई दिनों से बाहर

नहीं जा पायी है। बालकनी का दरवाजा खोलकर चुपचाप अपनी चारपाई पर बैठी रहती है। कभी मन हुआ

तो बालकनी में कुर्सी डालकर बैठ जाती है, या फिर छत में जाकर छत की दो-दो फुट ऊँची दीवार में बैठकर

अपने पैरों को लम्बा कर लेती है। लेकिन पहले की अपेक्षा वह बहुत कमज़ोर हो गई है। कभी-कभी उसे

सिरदर्द होने लगता है। कभी उसके पैरों में दर्द होने लगता है। यहा तक कि कभी-कभी उसके चेहरे पर कुछ

“तुमने दरवाजा क्यों खोला…? मुझे उठा देती। छत में चलोगी, थोड़ा घूम कर आते हैं, या किसी पार्क

में चलते हैं। दिल्ली में ठंडी-ठंडी हवा का मज़ा सुबह -2  सूर्य उदय होने से पहले जितना लेना चाहो ले

लो। अन्यथा उसके बाद तो साँसों में हवा में घुला जहर और प्रदूषण के अलवा कुछ नहीं जाता। जिसका

मतलब होता है कि शरीर में कई तरह की बीमारियों का जन्म लेना। मेरा मन भी घूमने को हो रहा है, चलो

थोड़ा टहलकर आते हैं।” उसका मन रखने के लिऐ  मैंने उससे झूठ कहा। जबकि मैं चाहता था कि अगर

बालकनी का दरवाजा बंद हो जाय तो मैं कुछ देर और सो लूँ।

मेरे शब्दों को सुनकर इन्द्रधनुष की पतली सी रेखा उसके पतले-पतले गुलाबी होंठों के बीच में खिंच

गई थी। किसी गिटार से निकलने वाले महीन खूबसूरत ध्वनि तरगों की तरह।

श्रुति ने कोई उत्तर नहीं दिया। बल्कि वह टकटकी लगाए मेरे चेहरे को देखने लगी थी। जब भी वह इस

तरह से मुझे देखती है, तो पता नहीं क्यों…उस वक़्त मुझे लगता है जैसे कि उसकी आँखों में एक

प्रश्नवाचक चिन्ह है। जो दिखाई नहीं देता। लेकिन एक अदृश्य शक्ति के रूप में, अपने होने का एहसास

कुछ इस तरह से करा देता है जैसे मंद-मंद बहती हवा का स्पर्श बदन से महसूस तो होता है लेकिन वह

दिखाई नहीं देती है। लाख चाहने पर भी उसका कहीं कोई आकार-प्रकार दिखाई नहीं देता।

मैंने अपना बिस्तर समेटा और फिर मैं वासबेसन पर जाकर हाथ-मुँह धोने लगा। पड़ोसी के घर से

कपड़ों पर चलने वाली हथी की आवाजें आने लगी थी। नीचे तल पर रहने वाले बच्चे के रोने की आवाजें

लगातार कानों से टकरा रही थी। वह जोर-जोर से रोता हुआ अपनी माँ से मेथी के पराठे माँग रहा था।

शायद उसे भूख लग गई थी, या फिर उसने अपने आपको सपने में मेथी के पराठे खाते देखा होगा। पता

नहीं उसकी मम्मी ने उसे क्या कहा होगा, कि वह गुस्से में रोते हुऐ  घर से निकल कर सड़क पर भागते हुऐ

मेथी के पराठे खाने की जिद्द करने लगा था। उसकी माँ उसे पकड़ने के लिऐ  आवाज देते हुऐ  उसके पीछे-

“तुम्हारे लिऐ  मेथी के पराठे बना दूँ?” मैंने कहा।

उसने ‘न’ में अपना सिर हिला दिया। पता नहीं क्यों?…शायद उसकी इच्छा नहीं थी या फिर वह नहीं

चाहती थी कि मैं उसके लिऐ  मैथी के पराठे बनाऊँ। मैंने गौर से उसके चेहरे की ओर देखा तो वह पहले की

अपेक्षा आज कुछ थकी-थकी सी दिखाई दे रही थी। पता नहीं क्यों...? मेरे पूछने पर भी उसने मुझे कुछ

नहीं बताया। …बोली कुछ नहीं...। उसके इस तरह गुमसुम रहने से मेरा मन उदास हो गया था। अंदर

तक भय की एक हल्की सी टीस अपनी जकड़न पैदा कर चुकी थी। दिमाग की नसें कुछ भारी सी लगने

मैंने उसके चेहरे पर छाई उदासी को देखकर इसलिऐ  कहा था, कि श्रुति को मेथी के परांठे बहुत पसंद

हैं। अगर एक तरफ खीर हो और दूसरी तरफ मेथी के पराठे हों तो वह खीर छोड़कर मेथी के पराठे खाने

लगेगी। जब भी हम दोनों शाम को बाजार में सब्जी लेने जाते हैं तो वह बाजार से मेथी जरूर लाती है। उसे

मेथी अच्छी लगती है, और मुझे सरसों का साग। सरसों का साग व चावल खाना मुझे बहुत पसंद हैं। ऐसा

नहीं है कि श्रुति चावल व सरसों का साग नहीं खाती। खाती है, लेकिन जिस तरह से वह मेथी की शब्जी व

मेथी के पराठे खाती है उस तरह से नहीं।

मुझे दूध पसंद है, लेकिन श्रुति को दूध जरा भी पसंद नहीं है। उसे मूँगफलियाँ बहुत पसंद हैं। बाजार में

जाते ही उसकी नजरें मूँगफली  पर टिक जाती है। ढूढंने लगती है कि मूँगफली की दुकान कहाँ है या फिर

मूँगफली  की रेहड़ी कहाँ पर लगी हुई है। मैं उसकी नजरों को देखकर मुस्कराने लगता हूँ। समझ जाता हूँ

कि उसे क्या चाहिए, और फिर उसके कहने से पहले ही मैं उसके लिऐ , मूँगफली  खरीद लेता हूँ।

कई बार वह मझसे कहती है कि, ‘उसने मूँगफली  लेने के लिऐ  तो कहा ही नहीं। मत लो, मेरा मन

मूँगफली  खाने का नहीं हो रहा है।’ फिर भी मैं मूँगफली  लेकर जब उसे पकड़ाता हूँ तो वह उसी समय से

मूँगफली  खाना सुरू कर देती है। मूँगफली  खाते हुऐ  वह मेरी ओर देखते हुऐ  मुस्कराने लगती है तो उसका

चेहरा किसी गुलाब के फूल की तरह सुन्दर दिखाई देता है। उस वक़्त  उसके पतले-पतले खूबसूरत होंठ

ओंस में नहाए गुलाब की पंखुड़ियों की तरह दिखाई देने लगते हैं। यक़ीन मानो या न मानो, लेकिन राह

चलते हुऐ  जब मुझे कोई नहीं दिखाई देता तो मैं उसके होंठों को चूम लेता हूँ।

मेरे इस ब्यव्हार से वह सकपकाने लगती है। मुँह बना देती है। हिचकिचाने लगती है। उसे रास्ते में यह

अच्छा नहीं लगता। लेकिन मुझे यह अच्छा लगता है पता नहीं क्यों...? मैं कोई भी मौका नहीं छोड़ना

चाहता। मैं उसकी तरफ इस तरह से खिंचा चला जाता हूँ जैसे काँटे में फँसी मछली डोर के साथ खिंची

चली जाती है। मैं अपने आप को सम्भालने की बहुत कोशिश करता हूँ। लेकिन मैं अपने आपको नहीं रोक

श्रुति मेरे लिऐ  कभी कुछ भी नहीं कहती। हाँ...कभी-कभी मुस्कराते हुऐ  वह इतना जरूर कहती है कि,

‘बलात्कार के केस में अंदर करवा दूँगी। ज्यादा परेशान किया तो 100 न0 पर फोन करके पुलिस को बुला

लूँगी। फिर बजाते रहना बाजा। फिर किसे छेड़ोगे?...किसे परेशान करोगे?’

मैं उसकी बातों को सुनकर मुस्करा देता हूँ। वह मेरे लिऐ  कहती तो है, लेकिन कभी गुस्सा नहीं होती।

मुझे इतना जरूर समझाती है कि यह अच्छा नहीं है। रास्ते में अच्छे-बुरे का ध्यान रखो। किसी को भी

बदनाम होने में कोई समय नहीं लगता।

“तुम इतना क्यों डरती हो श्रुति, अरे...कोई अपनी पत्नी से प्यार करे या लड़े-झगड़े किसी को क्या

“रास्ते में इतने लोग चल रहे हैं। जैसे चंदा के साथ तारे चलते हैं। उन्हें क्या पता कि उसके साथ

उसकी पत्नी चल रही है या कोई और, कोई यह भी तो सोच सकता है कि तुम राह चलती औरत को छेड़

रहे हो। सम्भल कर रहो, आजकल औरत की तरफ देखना भी आपको जेल की हवा खिला सकता है। चाहे

पत्नी हो या कोई और, चलते हुऐ  अपनी नजरें नीची रखो। जब कोई औरत या लड़की पास आए तो

आकाश की ओर देखते हुऐ  चलो। समझे कि नहीं...? कानून का उल्लंघन करना हँसी-खेल नहीं है। अपनी

“नौटंकी...क्या कहा? श्रीमती जी हमारी छत में तो केवल एक ही टंकी है। नौ टंकी कहाँ हैं, रोज देखती

हो न, बंदर हमारी छत में आते हैं और टंकी में दे घप्पा घप...दे घप्पा...घप नहाकर चले जाते हैं।”

“तुमसे जीतना तो मेरे बस की बात नहीं है। जितना समझाती हूँ उतना ही तुम मुझे परेशान करने

लगते हो। ठीक है तुम्हारे मन में जो आए करो। लेकिन मुझे बख्शो...?” उसने अपने हाथ जोड़ते हुऐ  कहा।

मैंने उसका चेहरा अपने हाथों में लेकर चूम लिया था जिसके कारण उसकी पलकें बंद हो गई थी।

मुस्कराते हुऐ  वह बोली, “बड़े वो हो तुम...!”

उसके शब्दों को सुनकर मुस्करा दिया था मैं।

एक दिन मैं श्रुति को साथ लेकर अपने बड़े भाईसाहब के घर जा रहा था। छुट्टी का दिन था। इतवार था

शायद। हाँ...इतवार ही था। एक इतवार का ही दिन ऐसा होता है कि कभी-कभार अपनों से मिलने का

समय मिल पाता है। आसमान में बादल छाए हुऐ  थे। फरवरी का आखिरी हफ्ता था। एक-दो दिन से

बारिश हो रही थी। जाती हुई ठंड ने एक बार फिर अपना जोर पकड़ लिया था। जिन लोगों ने अपने गरम

कपड़े उतार लिऐ  थे उन्होंने फिर से गरम कपड़े पहनने सुरू कर दिए थे। बस में ज्यादा भीड़ नहीं थी। वैसे

दिल्ली में बसों में सफर करते हुऐ  अमूनन इतनी ज्यादा भीड़ होती है कि लोगों के मुँह से निकलने वाली

सांसे एक-दूसरे के चेहरे से टकराती हुई अंदर फेफड़ों में जाकर नाचने लगती हैं। जिसके कारण पलक

झपकते ही एक ही बीमारी कई लोगों को लग जाती है। शराब और बीड़ी पीने वालों के मुँह से आने वाली

बदबू बस की बंद खिड़कियों के अंदर जहर घोलने का काम कर देती हैं। कई औरतें तो बस में उल्टी कर

देती हैं। उस वक़्त अगर किसी ने महँगा से महँगा अमरीकी या लंदन से मँगाया हुआ सेंट भी अपने कपड़ों

पर छिड़का हो तो उस सेंट की ख़ुश्बु बस के अंदर होने वाली उल्टी की बदबू के कारण पलक झपकते ही

लेकिन लगातार दो दिनों से होने वाली बारिश और आसमान में बादल छाए होने के कारण उस दिन

बस में गिनती के तीन-चार ही लोग बैठे हुऐ  थे। वे सभी बस खाली होने के बाद भी महिला सीटों पर बैठे

हुऐ  थे। उनमें से एक महिला थी जो ड्राइबर की फिछली सीट पर बैठी हुई थी। मैंने कंडक्टर से दो टिकटें ली

तो मुझे टिकटें देने के बाद कंडक्टर ड्राइबर के पास जाकर खड़े होकर बातें करने लगा था। बातें करते हुऐ

वह कई बार पीछे बैठी महिला की ओर भी देख लेता था। हम दोनों कंडक्टर की पिछली वाली सीट पर

जाकर बैठ गऐ  थे। पीछे बैठे होने के कारण हम सबको देख रहे थे। लेकिन हमें कोई नहीं देख रहा था।

अगर किसी ने हमको देखना था तो वह अपनी सीट में से अपने सिर को पीछे की ओर घुमाने के बाद ही

हमें देख सकता था लेकिन चेहरे के अलावा कुछ भी नहीं।

मैंने श्रुति का चेहरा अपने हाथों में लिया और उसके चेहरे के प्यारे-प्यारे तीन-चार चुम्बन ले लिऐ  थे।

चुम्बन लेने के कारण मेरा शरीर पूरी तरह से झनझना गया था। उसने आगे की तरफ इशारा कर अपनी

आँखें तरेरते हुऐ  चेहरा बना लिया था।

मैं उसके इशारे का मतलब समझ गया था। उसका कहने का मतलब था कि आगे लोग बैठे हुऐ  हैं। कुछ

तो शरम करो। मैं उसके कान के पास अपना मुँह ले जाकर बोला, “कोई नहीं देख रहा।”

“सड़क पर बहुत भीड़ है। साथ-साथ बसें चल रही हैं।” उसने पहले की ही तरह इशारे से कहा।

“डरो नहीं...। सभी एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ में हैं। कोई किसी से पीछे नहीं रहना चाहता।

जब एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ लगी हो तो फिर किसी को इधर-उधर देखने की फुर्सत ही कहाँ है?

दिल्ली की सड़कों पर वाहन ऐसे भागते हैं। जैसे चोर किसी का सामान लेकर भाग रहे हों। भागते

रहो...भागते रहो...पीछे मत देखो...पीछे मत देखो...। ये दिल्ली है मेरी जान। मेरी जान ऐ हुस्न

कहते हुऐ  मैंने उसकी जाँघ पर अपना हाथ रख लिया था। वह मुस्करा दी थी। उसके गुलाबी होंठ

अमावश्य के बाद पहली बार दिखाई देने वाले चन्द्रमा की तरह मुड़ गऐ  थे। मुझे लगा जैसे कि आकाश से

उतर कर चन्द्रमा मेरे सामने आकर बैठ गया हो। मैंने गौर से मुस्कराते हुऐ  उसकी तरफ देखा, तो उसका

मुस्कराता हुआ चेहरा इतना खूबसूरत लग रहा था कि अगर स्वर्ग से इन्द्र की अप्सरा उर्वशी भी मेरे

सामने सजधज कर आती तो उसका चेहरा भी फीका पड़ जाता।

तभी श्रुति के शब्द मेरे कानों से टकराए, “अब सुबह -सुबह  क्या सोचने लगे?”

“अरे कुछ नहीं...। बालकनी से आती हुई ठंडी-ठंडी हवा का मजा ले रहा था…”

“क्या हवा भी कभी मजा देती है?” कहते हुऐ  वह हँसने लगी थी। पता नहीं कैसे आदमी हो तुम, जो कि

तुम हर चीज में मजा ढूँढने लगते हो?”

“बिना मजे के तो कोई जिन्दगी ही नहीं है श्रुति। मज़ा नहीं, ज़िन्दगी नहीं...क्यों...? अचानक ही वो

बस वाली घटना याद आ गई थी।”

“हे राम...और कुछ याद करने लायक नहीं है क्या?” और फिर वह लेट गई थी।

“लगता है तुम्हारी तबियत ठीक नहीं है, क्या खाओगी तुम?” मैंने उसके पास जाकर उसके चेहरे पर

आए बालों को हटाते हुऐ  कहा। उस वक़्त  उसके चेहरे पर आए बालों को देखकर ऐसा लग रहा था जैसे

पूर्णिमा की रात को काले, घने, डरावने, बादलों के बीच में चांद निकल आया हो।

एक फीकी सी मुस्कराहट उसके होंठों पर तैर गई थी। उसकी मुस्कराहट को देखकर मुझे ऐसा लगा

जैसे कि उसे मुस्कराने के लिऐ  उस पर इस तरह से दबाव डाला जा रहा हो कि अगर वह नहीं मुस्कराऐगी

तो उसकी हत्या कर दी जाएगी। मैं उसके होंठों पर फीकी मुस्कराहट देखकर डर गया था। उसकी उस

मुस्कराहट में न कोई अपनापन था। न कोई आर्कषण, और न ही कोई कशिश थी। जिस मुस्कराहट के

कारण मैं बाजार जाते हुऐ , बस में सफर करते हुऐ , किचन में खाना बनाते हुऐ , उसे छेड़ा करता था। वह

मुस्कराहट अचानक ही कहाँ गायब हुई? मैं यह सोचने के लिऐ  मजबूर हो गया था।

श्रुति किचन में जाकर आटा गूँथने लगी थी। मैं टकटकी लगाऐ आटे पर चलते हुऐ  उसके ख़ूबसूरत

हाथों को देखने लगा। सब्जी काटते हुऐ , आटा गूँथते हुऐ , कपड़े धोते हुऐ , उसके हाथ की कलाइयों को

ख़ूबसूरती प्रदान करने वाली कोका-कोला रंग की चूड़ियाँ बजने लगती, खनक...खनक, छनक...छनक।

किचन में खाना बनाते हुऐ  व कपड़े धोते हुऐ , जब वह पसीने से तर-ब-तर हो जाती तो वह ग्लूकोज का

पानी पीने लगती थी। पानी पीते हुऐ  उसके गले में से आवाज आती, गट...गटाक...गट...गट। उस वक़्त

गले की पतली नसों का उभार स्पष्ट दिखाई देता। ऐसा लगता जैसे किसी झीने-झीने परदे में से कोई

अदृश्य बारीक डोर में से पानी की बूँदें सरक रही हों।

आटा गूँथते हुऐ  उसे अचानक ही चक्कर आ गया था। इससे पहले कि वह गिर पड़ती मैंने उसे अपनी

बाहों का सहारा देते हुऐ  उसे झकझोरा, श्रुति...श्रुति...श्रुति क्या हुआ? कुछ बोलो श्रुति...क्या हुआ…? तुम

ठीक तो हो न..? लेकिन उसकी पलकें खुलने की बजाय धीरे-धीरे इस तरह से बंद होने लगी थी। जैसे

आकाश में छाए हुऐ  काले बादल चाँद को अपनी आगोश में ले लेते हैं।

उसे चारपाई पर लिटाते हुऐ , उसके चेहरे पर पानी की छींटें मारते हुऐ , मैं उसे पानी पिलाने की कोशिश

करने लगा। लेकिन न तो पानी के छींटों से उस पर कोई फर्क पड़ा और न ही उसने अपनी आँखें ही खोली।

मैं उसे उसी वक़्त  पास के नर्सिगं होम में ले गया। डाक्टर ने उसकी हालात देखकर उसे आई. सी. यू. में

रखते हुऐ  मुझे अन्दर आने के लिऐ  मना कर दिया था।

श्रुति को आई. सी. यू में ले जाते देखकर मैं सन्न रह गया। मेरी आँखें नम हो आई। मस्तिष्क की नसें

किसी बिजली के तार की तरह झटके देने लगी। दिल डर के मारे किसी गुब्बारे की तरह फूलने व सिकुड़ने

लगा था। कान बजने लगे थे। दोनों कानों से सायं-सांय की आवाजें आने लगी थी। हाथ-पैर सुन्न होने लगे

थे। मैंने अपने हाथों की चमड़ी पर अपने नाखून गड़ाऐ लेकिन मुझे कुछ भी एहसास नहीं हुआ। न दर्द ही

हुआ और न ही यह महसूस हुआ कि मेरे नाखून चमड़ी के अंदर तक घुस चुके हैं। मैं दोनों हाथों से अपने

चेहरे को मलने लगा। डर गया था कि मुझे अचानक ही यह क्या हो गया है जो कि मुझे अपने शरीर का

दर्द ही महसूस नहीं हो रहा है, अपने डर व अपने हृदय की धड़कनों को कम करने के लिऐ  मैं गैलरी में

लगातार चक्कर काटने लगा। करीब आधे घंटे बाद डा0 ने मुझे अपने

कमरे में बुलाकर कुर्सी की तरफ बैठने का इशारा करते हुऐ  कहा, “अच्छा हुआ, तुम वक़्त  रहते इसे

अस्पताल ले आए। अगर पाँच मिनट की भी देरी होती, तो इसका बचना मुश्किल था। हम अभी कुछ भी

कहने की स्थिति में नहीं हैं। इन्हें होश में लाने के लिऐ  हमें सबसे पहले इनका बी. पी. को काबू में लाना

है, और हम ऐसा कर लेंगे। बी. पी. ज्यादा होने के कारण आपकी पत्नी कोमा में चली गई है। ये क्या

दवाईयाँ ले रही थी? कहाँ से इनका इलाज चल रहा था? इनके पिछले काग़ज अगर आप लाऐ है तो मैं उन्हें

देखना चाहूँगा। वैसे इन्हें यह बीमारी कब से है?”

“कौन सी बीमारी सर...?” मैंने घबराते हुऐ  कहा।

“आपकी पत्नी को बी. पी. की बीमारी है। और यह बहुत पहले से है। बी. पी. हाई होने के कारण ही यह

“सर. मैंने तो कभी इस बारे में सोचा ही नहीं। मैं सुबह  सात बजे अपनी ड्यूटी के लिऐ  घर से निकलता

हूँ और रात आठ बजे के करीब घर पहुँचता हूँ। श्रुति के साथ जो हुआ है वह पहली बार हुआ है।”

“देखिए मि0 सक्सैना, इन्हें बहुत पहले से ही उच्च रक्तचाप की बीमारी है। तुमने और तुम्हारी पत्नी

ने कभी भी इस ओर कोई खास ध्यान नहीं दिया। अगर ध्यान दिया होता तो आज इनकी यह हालात नहीं

होती। कैसे आदमी हो तुम, जो कि तुम अपनी पत्नी का ध्यान नहीं रख सके। लोग इसे एक छोटी सी

बीमारी समझकर नजरअंदाज करके अपने लिऐ  खतरा मोल लेते हैं। समय रहते हुऐ  अगर इन छोटी-छोटी

बीमारियों का इलाज नहीं किया गया तो वे इतना भयंकर रुप ले लेती हैं कि इंसान की मौत तक हो जाती

डा0 की बातों को सुनकर मेरे माथे पर पसीने की बूँदें चुहचुहा आई थी। मेरे पास डा0 को जवाब देने के

लिऐ  शब्द ही नहीं थे। अपनी उंगलियों में पेपर वेट को घुमाते हुऐ  डा0 ने कहा, “आजकल यह बीमारी बड़े-

बूढ़ों को ही नहीं बल्कि हर किसी उम्र के लोगों को है। इसका मुख्य कारण हमारे खान-पान में एक

जबरदस्त बदलाव का आना। हमारी दिनचर्या इतनी बदल गई है कि हम अपनी नींद पूरी नहीं कर पाते।

दिमागी परेशानी से हर कोई जूझ रहा है। अगर आपने ध्यान दिया होता आज यह नौबत नहीं आती। इसे

सिर दर्द होता रहा होगा। ज्यादा पसीना आता रहा होगा। थकान ज्यादा लगती रही होगी। हाथ व पैरों की

पिंडलियों में दर्द होता रहा होगा। चेहरे पर सूजन दिखाई दी होगी। ये सब उच्च रक्तचाप की निशानयाँ

हैं।” कहते हुऐ  डा0 श्रुति को देखने चला गया।

डा0 की बातें सुनकर मैं बुरी तरह से काँप गया था। बाहर गैलरी में आकर मैं सोचने लगा, कि कितनी

बड़ी भूल कर दी मैंने। उसके सिर में होने वाले दर्द को, उसमें आऐ चिड़चिड़ेपन को, व कभी-कभी उसके

चेहरे पर आए सूजन को अगर मैने गम्भीरता से लिया होता तो आज श्रुति कोमा में न होती। उसके अंदर

आए चिड़चिड़ेपन को देखकर मैं सोचता कि शायद घर के कामों में परेशान होने के कारण उसे गुस्सा आ

रहा होगा। क्योंकि श्रुति सुबह रोज चार बजे उठ कर घर के कामों में लग जाती है। और रात को ग्यारह

बजे के बाद ही सोती है। कई बार रात को सोने से पहले उसे सिरदर्द होने लगता है। उस समय वह दर्द

निवारक गोली लेकर अपने सिर पर तेल व पानी मिलकर मालिश करवाती है। जब तक उसका दर्द शांत

नहीं होता और उसे नींद नहीं आ जाती तब तक हम सभी बैठे रहते हैं।

श्रुति के सिर में होने वाले दर्द को देखते हुऐ  मैंने कई बार श्रुति से कहा कि, ‘घर का काम करने के लिऐ

एक आया रख देते हैं। आया रखने से तुम्हें काम से छुटकारा मिल जाएगा। लेकिन मेरी बातों को सुनते ही

श्रुति हर बार मना करते हुऐ  कहती कि, ‘पैसा मुसीबत में काम आता है। अगर आया इस घर में आ जाएगी

तो मेरा शरीर थोड़ा बहुत जो चल रहा है वह भी कुछ ही दिनों में लुंज हो जाऐगा। अभी तो सिरदर्द ही है।

फिर न जाने कितनी बीमारियाँ  लगेंगी, कुछ पता नहीं। मैं घर में निठल्ली नहीं बैठना चाहती। तुम्हारे चले

जाने के बाद मैं काम में उलझी रहती हूँ तो मेरा मन लगा रहता है। आया का क्या, वह आएगी और अपना

काम करके चल देगी, लेकिन मेरे तो हाथ-पैर बँध गऐ  न…! तुम रहने दो अपनी आया-वाया। मेरे पास

फालतू का पैसा नहीं है। घर में बैठी-बैठी अगर मोटी हो गई तो फिर हमेशा यही कहते रहोगे कि मोटी इधर

आ, मोटी ये काम कर दे, मोटी चाय बना दे। मैं मोटी नहीं बनना चाहती। अगर मोटी हो गई तो फिर तुम

उसकी बातें सुनकर बच्चे हँसते हुऐ  कहते, “अरे...मम्मी तो पापा की उर्वशी है।”

“नहीं भाई नहीं...। उर्वशी तो इन्द्र की अप्सरा थी। मम्मी तो पापा की उर बसी है। उर का मतलब

होता है मन, हृदय, दिल, ओर बसी का मतलब होता है जो बस गया। मम्मी पापा के दिल में बसी है।”

“पापा मम्मी को बहुत प्यार करते हैं न…!”

“पापा ही पापा, मम्मी को प्यार नहीं करते। मम्मी भी पापा को बहुत प्यार करती है। देखते नहीं जब

पापा थोड़ा भी लेट हो जाते हैं तो मम्मी कितनी बार फोन करते हुऐ  पूछती है। जानू कहाँ हो, कब तक

आओगे, भूख लग गई होगी। चाय के साथ क्या बनाऊँ?...बिस्कुट से काम चलेगा या कुछ पकोड़े बना दूँ?”

“पापा मम्मी...!” बिटिया सोफे पर खड़ी होकर अपना एक हाथ हवा में हिलाते हुऐ  कहती।

“ज़िंदाबाद ...ज़िंदाबाद ...!” दोनों बच्चे कहते।

हम दोनों, बच्चों की बातें सुनकर मुस्कराते। तीनों बच्चे कभी मुझे उठाते तो कभी अपनी मम्मी को।

खुशियों से भरा घर। जहाँ हँसी, ठिठोली, और प्यार ही प्यार था।

कुछ पल के लिऐ  मैं बीती बातों में उलझ गया था। तभी नर्स ने मुझे दवाईयों का पर्चा पकड़ाते हुऐ  कहा,

“जल्दी से जल्दी ये दवाईययाँ लेकर आओ।”

मैं तुरन्त ही दवाईयाँ ले आया। करीब एक हफ्ते बाद श्रुति को अस्पताल से छुट्टी मिल गई। डा0 ने

मुझे दवाईयों का पर्चा पकड़ाते हुऐ  कहा, एक हफ्ते तक इन दवाईयों को इन्हें खिलाइए। और एक दवाई

इन्हें रोज खानी है। यही बी. पी. को कन्ट्रोल में करने के लिऐ  है। डा0 की सलाह लिऐ  बिना यह दवाई

आपको बंद नहीं करनी हैं। समय-समय पर इनका बी. पी. जाँच करवाते रहें। इसके साथ ही मैंने कुछ बातें

इसमें लिख दी हैं। अगर आप इन बातों को हमेशा ध्यान में रखेंगे तो आपको कोई परेशानी नहीं होगी।

नमक का सेवन कम करें। रोज-सुबह  शाम जितना ज्यादा हो पैदल घूमें। फिलहाल चाय-काफी अभी बंद

करदें। ऐसी चीजों से दूर रहें, जिनके कारण शरीर को अतिरिक्त नमक मिलता हो। जैसे अचार, नमकीन,

बिस्कुट, और भी कई चीजें हैं। बाजार का खाना व तली हुई चीजें न खाऐं । बी. पी. सुनने में एक छोटी सी

बीमारी लगती है, लेकिन अगर समय पर रहते हुऐ  इसका इलाज नहीं किया गया तो इसके कारण इंसान

के साथ कभी भी, और किसी भी समय कुछ भी हो सकता है। जैसे ब्रेन हेम्बरेज हो सकता है, किडनी

खराब हो सकती है, लकवा हो सकता है, नाक से ख़ून निकल सकता है, मरीज कोमा में जा सकता है, यहां

तक कि उसकी मौत भी हो सकती है।”

मैं श्रुति को घर ले आया था। बच्चे उसके आपस-पास बैठ गऐ  थे। उसकी आँखों में हल्का सा गीलापन

दिखाई देने लगा था। उसके गालों को सहलाते हुऐ  मैं सोचने लगा कि कितनी बड़ी भूल कर दी थी मैंने, जो

कि उसकी बातों पर कभी विश्वास ही नहीं किया, उसे कभी डा0 को दिखाने के बारे में सोचा ही नहीं, अगर

कभी मैं उसे तसल्ली से किसी डा0 को दिखाता तो आज यह नौबत न आती। लेकिन अब पछताने से क्या

फायदा, जो होना था वह तो हो चुका। लेकिन आज के बाद अब ऐसा नहीं होगा। मैं उसे हमेशा अपनी

आँखों में अपनी पलकों में बिठाए रखना चाहता हूँ। वह मेरी उर्वशी है, मेरी मेनका है, मेरी नजरों में श्रुति

जैसी ख़ूबसूरत और कोई दूसरी औरत नहीं है, वह है तो मैं हूँ, वह नहीं तो मैं कुछ भी नहीं। मेरा अस्तित्व

सोचते हुऐ  मैंने उसके होंठों पर अपने होंठों को रख दिया। भूल गया था कि बच्चे पास ही है। मेरी

हरकत देखते हुऐ  बच्चे तालियाँ बजाते हुऐ  चिल्लाने लगे थे। ये पापा की उर बसी।

बच्चों को तालियाँ बजाते हुऐ  व उनका शोर सुनकर उसके चेहरे पर मुस्कराहट तैर गई थी। पता नहीं

क्यों मेरी आँखों में गीलापन तैर आया था।

 

उर बसी

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