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हमदर्द साथी - द्वितीय भाग
हमदर्द साथी - द्वितीय भाग
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© Varman Garhwal

Drama

89 Minutes   5.4K    15


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तीन दिन बाद चौदह मई, रविवार की सुबह छः बजे नारायण की दुकान के बाहर बैठे सुदर्शन, आलोक और नारायण के बीच बातचीत चल रही है।

आलोक ने सुदर्शन से कहा—“भाई, उस लड़की को तेरे से प्यार हो गया है। रोज सुबह घर से ऑफ़िस छोड़कर आती है। फिर रात को ऑफ़िस से घर छोड़कर जाती है। बिना मतलब वो ऐसे क्यों करेगी?”

सुदर्शन—“अरे, प्यार–व्यार कुछ नहीं है। उसके पास कोई बात करने वाला, कोई मिलने–जुलने वाला नहीं है। सारा दिन अकैली ही इधर-उधर घूमती रहती है और शराब पीती रहती है इसलिए सुबह-शाम आ जाती है।”

नारायण ने सर हिलाते हुए कहा—“ना भाई, जद सारो दिन निकळ जावः। फेर ए सुबह–शाम गा दो–चार घंटा काडणा म के दिक्कत है?”

आलोक—“हाँ, वही तो बात है।”

सुदर्शन ने मुस्कुराकर कहा—“नहीं यार… और वैसे भी मुझे उसमें बिलकुल भी दिलचस्पी नहीं है। एक तो वो झान की (बहुत ज्यादा) दारू पीती है। दूसरा ये गर्लफ्रैंड बनकर रिलेशन बनाने वाली लड़कियाँ मुझे बिलकुल पसन्द नहीं है। हाँ, रोज मिलती है, दुःखी है, इसलिए उससे थोड़ी हमदर्दी हो गई है।”

आलोक—“देख भाई, दारू तो छुड़ाई जा सकती है। और रही बात रिलेशन की। तो आज के टाइम में सती–सावित्री मिलना तो लगभग नामुमकिन है। कोई स्कूल में सैट होती है, कोई कॉलेज में सैट होती है। कोई जहाँ नौकरी करती है, वहाँ किसी के साथ सैट होती है और जो घर से बाहर नहीं आती, उसको कोई आस–पड़ोस वाला पटा लेता है। ये लड़के और आदमी चील और गिद्ध की तरह नजर रखते हैं, लड़कियों और औरतों पर। मौका मिलते ही, झपटकर दबोच लेते हैं। किसी को प्यार के नाम पर, किसी को कोई लालच देकर किसी की मजबूरी का फायदा उठाकर और जो गुंडे–मवाली या ताकतवर लोग हैं, वो अपनी ताकत के दम पर सब कर लेते हैं।”

सुदर्शन—“ये जबरदस्ती और मजबूरी वाले मामलों में लड़कियों और औरतों की गलती नहीं है लेकिन बाकी सब में तो देख, अगर मैं लालची हूँ, तो गलत लोग मेरे लालची होने का फायदा जरूर उठाएँगें। अगर मैं प्यार के नाम पर मूर्ख बनने वाला हूँ तो गलत लोग मेरी मूर्खता का फायदा जरूर उठाएँगें।”

नारायण ने सुदर्शन से पूछा—“मतलब, आ छोरी मूर्ख है?”

सुदर्शन—“मूर्ख ही है, और क्या है?”

आलोक ने सुदर्शन से पूछा—“फिर तू उसके लिए परेशान क्यों हो रहा है?”

सुदर्शन—“बता तो दिया, उसको रोते देखकर अच्छा नहीं लगता।”

नारायण ने सुदर्शन से कहा—“तो के दे उसको, मत आया कर। ना वो आवेगी, ना तू उसको रोता देखेगा।”

सुदर्शन ने मुस्कुराते हुए कहा—“अरे यार, ऐसे अच्छा नहीं लगता। बेचारी रोज आकर मुझे ऑफ़िस छोड़ती है। घर लेकर आती है। अब अचानक कहूँगा, मत आया करो। तो पहले से दुःखी है, और ज्यादा दुःखी हो जाएगी।”

आलोक ने हँसकर सुदर्शन से कहा—“ओ रेन दें, भाई। तुझे खुद उसकी गाड़ी में आने–जाने की आदत हो गई है।”

नारायण ने कहा—“और नहीं तो के ? दिन म एक टेम बा नई मिलः तो तेरो मुँह उतर जावः।”

सुदर्शन मुस्कुराकर बोला—“यार, अब वो खुद ही आती है, मैं तो कभी उसके पास गया नहीं और जिससे हर रोज मिलना हो, उसकी थोड़ी-बहुत चिन्ता तो होती ही है।”

नारायण और आलोक एक-दूसरे की ओर देखकर हँसने लगते हैं।

नारायण—“अच्छा–अच्छा, ठीक है।”

सुदर्शन ने गंभीरता से कहा—“लेकिन इस लड़की के लिए कुछ बताओ तो सही। उस लड़के के कारण बहुत रोती है। उस पर बेचारी की बात सुनने और समझने वाला भी कोई नहीं है।”

आलोक—“तू है तो सही।”

सुदर्शन—“इसलिए तो मैं बता रहा हूँ।”

नारायण ने मजाकियाँ लहज़े में सुदर्शन से कहा—“अबी तो तू बोल्यो, वो मूर्ख है। गलत लोग मूर्ख की मूर्खता का फायदा जरूर उठाएँगें।”

सुदर्शन ने तिलमिलाकर कठोरता से कहा—“मूर्ख तो है। लेकिन इसका मतलब ये थोड़े ही है, मूर्ख की मूर्खता का फायदा उठाने वाले लोग सही है। उस धोखेबाज़ के होश तो ठिकाने लगाने ही चाहिए।”

नारायण ने गंभीर होकर सुदर्शन से कहा—“यार, एक बात बता तन्ने बी छोरी म दिलचस्पी कोनी। तू बी छोरी न मूर्ख बी क्योवः। फेर बी छोरा ऊ इत्तो क्यों चिड़ः है?”

आलोक ने सुदर्शन से पूछा—“हाँ, भाई। उस लड़के का नाम आते ही तू भड़क क्यों जाता है। इसका क्या कारण है?”

सुदर्शन ने सामान्य होकर कहा—“है कोई कारण। फिर कभी बताऊँगा। अभी तो बस इतना समझ लो, मूर्ख बनकर धोखा खाने का दर्द, मूर्ख बनकर धोखा खा चुके लोग ही समझते हैं।”

आलोक—“मतलब तूने भी धोखा खाया है?”

सुदर्शन—हाँ! लेकिन अभी उस लड़के को सबक सिखाने का कोई तरीका है तो बताओ?”

आलोक—“उस लड़के ने इस लड़की से शादी करने से मना कर दिया इसलिए ये इतनी ज्यादा दुःखी है ना ?”

सुदर्शन—“हाँ, पहले प्यार–मोहब्बत और शादी के सपने दिखाकर रिलेशन बनाए फिर घटिया–घटिया, गन्दी–गन्दी बातें बोलकर छोड़ दिया।”

आलोक—“तो अगर वो लड़का इससे शादी कर ले फिर ये खुश हो जाएगी?”

सुदर्शन—“ये खुश हो या ना हो? इससे अपने को मतलब नहीं है। भाड़ में जाए इसकी खुशी। लेकिन मैं चाहता हूँ, उस लड़के को अफ़सोस हो कि उसने धोखा क्यों दिया? वो लड़का भी तड़प–तड़पकर रोए।”

आलोक—“अगर ऐसी ही बात हैं, तो मेरी गोविन्द बिशनोई से बहुत अच्छी बनती है। उस लड़के को तो दो मिनट में सीधा कर सकते है। गोविन्द बिशनोई को वैसे भी घटिया लोगों से चिढ़ है। बस खाली बताना ही है इस लड़के के बारे में।”

सुदर्शन—“जब वक्त आएगा तब इस बारे में भी सोचेगें। फिलहाल कुछ ऐसा करना है जिससे लोगों को उसकी धोखेबाजी के बारे में पता चलें। लोग उसे धोखेबाज़ बोले। जैसे चोर-लूटेरों को लोग चोर-लूटेरा बोलते हैं। वैसा कोई तरीका हैं, तो बता?”

आलोक—“ये तो बहुत आसान है।”

सुदर्शन—“बता फिर?”

आलोक—“इस लड़की की फेसबुक आईडी तो ज़रूर होगी?”

सुदर्शन—“हाँ, है। कृतिका बागड़ी नाम से और आठ सौ से ज्यादा फ्रैंड भी है लेकिन ब्रेकअप के बाद से वो फेसबुक ज्यादा यूज़ नहीं करती।”

आलोक—“हाँ, तो कोई बात नहीं। अब यूज़ कर लेगी। उसको बोल उस लड़के के बारे में फेसबुक पर पोस्ट करें। इससे उस लड़के के बारे में सबको पता चल जाएगा।”

नारायण—“फ्लॉप है तेरो तरीको।”

आलोक—“क्यों ? वो इतने बड़े आदमी सेठ साँवरमल जी की बेटी है। लोग उसके पोस्ट पर ध्यान तो ज़रूर देंगे।”

नारायण—“ध्यान देंगे, पर बदनामी ज्यादा छोरी गी ही होवःगी। सब नः ठा है, साँवरमल जी गी छोरी किसी क है? रात–रात भर बाहर घूमती है। दारू में टली रहती है। उल्टो असर होवःगो।”

सुदर्शन—“नारायण भाई की बात सही है। सबको पता हैं, ये एक नम्बर की बेवड़ी और बिगड़ैल है। इसके आस-पड़ोस वाले लोगों की बातें सुनोगे, तो इसका नाम लेने का मन नहीं करेगा। इतनी बेकार लड़की है ये। इससे कृतिका को ही प्रोब्लम होगी।”

आलोक ने सुदर्शन की ओर देखकर कहा—“तू एक बात बता, तेरे साथ उसने कोई गलत हरकत की?”

सुदर्शन—“नहीं।”

आलोक—“वो पहली बार तुझे रात को मिली थी, उस वक्त एक तो उसको कोई दूसरा नशा करवाया हुआ था। दूसरा उन लड़कों ने उसको बुरी तरह मारा था, नशे की हालत में चोट लगने से दिमाग पर असर पड़ जाता है। लेकिन उसके इलावा तेरे साथ कोई गाली-गलौच, कोई झगड़ा, कोई गन्दी बात, कभी कुछ ऐसा-वैसा किया उसने?"

सुदर्शन—“नहीं, उसके इलावा मुझे तो कभी कुछ उल्टा-सीधा नहीं कहा उसने।"

आलोक—“तो फिर शराब पीना गलत बात है। गाली-गलौच भी नहीं करनी चाहिए लेकिन बिगड़ैल कैसे हुई?”

सुदर्शन—“अरे, मैं महीने से उससे रोज मिलता हूँ, उसकी बातें सुन रहा हूँ इसलिए मुझे उसके बारे में सारी बातें मालूम है। मैनें तुम लोगों को बता दिया इसलिए तुम दोनों को पता है लेकिन उसके बारे में सबको सब कुछ थोड़े ही पता है?”

नारायण—“यही तो बात है। ये समझ नहीं रहा।”

आलोक—“अरे यार, जैसे उसने तुझे बताया। वैसे वो उस लड़के के बारे में सबको बताएगी, तभी तो सबको पता चलेगा। और भले ही लड़के को ज्यादा फ़र्क ना पड़े, लेकिन उसके माँ–बाप को तो फ़र्क पड़ेगा ना। जब लोग कहेंगे, तुम्हारा लड़का लड़कियों के साथ ऐसे करता है। तुम लोगों ने उसे यही सिखाया है।”

सुदर्शन ने आलोक से कहा—“क्या बात कर रहा है यार ! सब बोलेंगे, उस बेकार लड़की ने ही फँसाया होगा। जवाँन लड़का है, फिसल गया। अब जब लड़के को समझ आई तो कृतिका लड़की होने का फायदा उठाकर उस भोले–भाले मासूम लड़के को बदनाम कर रही है।”

नारायण—“हाँ, कृतिका को कोई शादी करने वाला मिल नहीं रहा इसलिए उसे मजबूर करके उससे शादी करना चाहती है। ये बोलेंगे सब।”

आलोक ने हँसकर सुदर्शन से कहा—“लेकिन तू तो बता रहा था, उस लड़के ने कृतिका से पहले भी चार लड़कियों को गर्लफ्रैंड बनाकर रिलेशन (शारीरिक संबंध) बनाने के बाद छोड़ दिया।”

सुदर्शन—“हाँ, तो?”

आलोक—“तो क्या ? भोले–भाले मासूम लड़के एक के बाद एक बार–बार फिसलते है क्या? ऐसी कौनसी उसमें स्पेशल जवाँनी आ गई ? हम भी तो जवाँन है। एक से एक खूबसूरत लड़कियाँ और औरतें हमें भी मिलती है। हम तो कभी नहीं फिसलें।”

नारायण—“हम नहीं फिसलते, पर ये कैसे पता चलेगा, वो फिसलता है ? सबके सामने तो वो भी खुद को अच्छा ही बताएगा।"

आलोक—“अरे, जब हम उन चार लड़कियों के बारे में बताएंगे तो सबको यकिन हो जाएगा। इसकी तो आदत है, लड़कियाँ फँसाना। ठीक है ना?”

सुदर्शन ने आलोक से कहा—“क्या खाक ठीक है ? मैं उस लड़के को सबक सिखाने का रास्ता पूछ रहा हूँ और तू तो कृतिका को जेल भिजवाने वाले रास्ते बता रहा है।”

आलोक ने आश्चर्य से कहा—“कृतिका जेल कैसे जाएगी?”

सुदर्शन—“जब कृतिका फेसबुक पर पोस्ट करेगी, दिव्यांश ने इन चार लड़कियों के साथ भी प्यार के नाम पर रिलेशन बनाए थे। तब वो चारों लड़कियाँ कहेंगी, नहीं, हमारे साथ तो कुछ नहीं हुआ। हम तो सती–सावित्री है। ये कृतिका अपने मतलब के लिए हमें बदनाम कर रही है। तब कृतिका पर चार लड़कियों को बदनाम करने का पुलिसकेस नहीं बनेगा क्या?”

आलोक—“तो उन लड़कियों का नाम लिखे बिना पोस्ट कर देगी।”नारायण—“फिर वो दिव्यांश कहेगा, बता कौनसी चार लड़कियों को धोखा दिया मैंने ?”

आलोक—“ओह…ये तो मेरे दिमाग में नहीं आया।”

नारायण ने आलोक से कहा—“तो ही तो मैं बोल्यो, फ्लॉप है, तेरो तरीको।”

सुदर्शन ने आलोक को समझाते हुए कहा—“अब देख, अपने तो सिर्फ कृतिका को जानते है। कृतिका के बारे में अपने को मालूम है, कृतिका प्यार के नाम पर बेवकूफ बनी है। लेकिन उन बाकी चार लड़कियों के बारे में तो अपने को कुछ नहीं पता ना। क्या पता उन लड़कियों ने सब कुछ जानते और समझते हुए सिर्फ इंजॉयमेन्ट के लिए रिलेशन बनाए हो?”

नारायण—“और बेवकूफ बनी हो, तब भी। उनमें सबके सामने आकर बताने की हिम्मत हो, ना हो?”

आलोक—“हाँ… लेकिन अगर कृतिका के पास कोई सबूत होता, तब शायद काम बन जाता।”

सुदर्शन—“तब भी शायद वो दूसरी लड़कियों के बारे में नहीं लिख सकती।”

नारायण ने झट से कहा—“नहीं, तब लिख सकती है। बस उन लड़कियों की पहचान नहीं बता सकती।”

सुदर्शन ने नारायण से पूछा—“दूसरी लड़कियों के बारे में वो कैसे लिख सकती है?”

नारायण—“अगर उसके पास इस बात का सबूत है, कि उस लड़के ने कृतिका समेत पाँच लड़कियों को प्यार के चक्कर में फँसाकर उनके साथ रिलेशन बनाए है। तब कृतिका उन लड़कियों की पहचान उजागर किये बिना लिख सकती है। ऐसी हालत में ये तो साफ़ हो जाएगा, उस लड़के ने कृतिका समेत पाँच लड़कियों के साथ रिलेशन बनाए है, लेकिन वो बाकी चार लड़कियाँ कौन है ? ये पता नहीं चलेगा। अब अगर वो लड़का कृतिका पर खुद को बदनाम करने का केस करता है तो कृतिका के पास उसके खिलाफ़ सबूत होने ज़रूरी है।”

सुदर्शन—“अब सबूत का तो कृतिका से पूछना पड़ेगा।”

आलोक—“हाँ, तो फिर उससे पूछ लें और उसको बोल फेसबुक पर पोस्ट करने के लिए। जैसे ही लोगों को पता चलेगा, साँवरमल जी की बेटी ने पोस्ट किये है, तो हर कोई इस मामले को जानने में दिलचस्पी लेगा। फिर उस लड़के और उसके घरवालों पर कुछ तो असर ज़रूर पड़ेगा।”

सुदर्शन ने आलोक से कहा—“चल मान लें, फेसबुक पर पोस्ट करने से उस लड़के और उसके घरवालों पर असर हो गया। लेकिन फिर भी उस लड़के को तकलीफ़ और परेशानी होगी, इसकी क्या गारन्टी है ?”

आलोक—“तुक्का (चान्स लेकर देखना) मारकर देख लेते है। कभी–कभी फिल्मी फंडे भी हिट हो जाते है।”

सुदर्शन—“ये भी सही है। मैं कृतिका से पूछता हूँ। अगर उसके पास कोई ऐसे सबूत है जिससे इस लड़के की धोखेबाजी साबित हो जाए तो कृतिका से पोस्ट ज़रूर करवाएँगें।”

नारायण—“हाँ, फिर आलोक की बात सच हो भी सकती है। क्योंकि थोड़ी बहुत बदनामी तो लड़के की भी होती है।”

आलोक ने नारायण ने पूछा—“अच्छा भाई जी, ये पहचान उजागर वाली बात में एक बात बताओ?”

नारायण—“पूछ।”

आलोक—“किसी लड़की या औरत के साथ ब्लात्कार हो जाए, तो उस लड़की या औरत की पहचान छुपाई जाती है। लेकिन उस लड़की या औरत के आस–पड़ोस वालों को, परिवार और रिश्तेदारी के लोगों को तो कैसे ना कैसे पता चल ही जाता है। फिर ये पहचान किससे छुपाई जाती है ? मान लो, दिल्ली में किसी के साथ ब्लात्कार हो गया। अब अपने को उसकी असली पहचान पता चल भी जाए, तो अपने कौनसा दिल्ली जाकर उसको परेशान करने वाले हैं ? परेशान तो आस–पास पड़ोस वाले और रिश्तेदार करते हैं और उनको सब पता चल ही जाता है।”

नारायण—“अरे, अब इत्तो किन ठा है ? टीवी पर खबरा म देखेड़ो बताऊँ म तो। और मेरी किसी वकालत करेड़ी है ?”

सुदर्शन ने मुस्कुराकर खड़े होते हुए कहा—“ये भी सही है। अच्छा, मैं तो चलता हूँ। फिर मिलेंगे।”

नारायण—“ठीक है, भाई।”

आलोक खड़ा होकर बोला—“चलो, मै भी चलता हूँ।”

नारायण—“ठीक है, भाई। तू भी कर कमाई।”

सुदर्शन अपनी बिल्डिंग की ओर चला गया और आलोक ऑटो में बैठकर ऑटो स्टार्ट करके आम्रपाली सर्किल की ओर चला जाता है।

सुबह के नौ बजे सुदर्शन बिल्डिंग के मुख्य दरवाज़े पर ताला लगाकर चलता हुआ आम्रपाली सर्किल पर आकर खड़ा होता है। कुछ देर बाद कृतिका की गाड़ी आकर रुकती है।

सुदर्शन गाड़ी में बैठकर मुस्कुराते हुए बोला—“गुड मॉर्निंग।"

कृतिका गाड़ी चित्रकूट की ओर ले जाती हुई मुस्कुराकर बोली—“वैरि गुड मॉर्निंग।"

सुदर्शन—“आज ऑफ़िस नहीं जाना।”

कृतिका—“क्यों, तुम तो संडे को भी ऑफ़िस जाते हो ना।”

सुदर्शन—“हाँ, लेकिन आज सेठ जी नहीं बुलाया।"

कृतिका खुशी से चहककर बोली—“अरे वाह, तो कल जब ऑफ़िस जाओ, तो मेरी तरफ़ से उन्हें थैंक्स ज़रूर बोलना।"

सुदर्शन ने आश्चर्य से मुस्कुराते हुए कहा—“थैंक्स ? मेरा नुकसान करने के लिए तुम्हारी तरफ़ से थैंक्स बोलूं ?।"

कृतिका ने आश्चर्यचकित होकर कहा—"नुकसान ?"

सुदर्शन—“आज ऑफ़िस जाता तो एक दिन के रुपये अलग से मिलते ना।"

कृतिका ने हँसकर कहा—“अरे यार! चलो, एक दिन के रुपये मैं तुम्हें दे दूँगी। फिर तो तुम्हारा नुकसान नहीं होगा ना?"

सुदर्शन ने हँसकर कहा—“अरे, मज़ाक कर रहा हूँ। सच पूछो, तो मुझे भी तुमसे मिलना अच्छा लगता है। इसलिए आजकल छुट्टी मिलने पर खुशी होती है।"

कृतिका ने मुस्कुराकर कहा—“पक्का?"

सुदर्शन—“हाँ, भई। पक्का। और ये बात सेठ जी और मैडम भी समझते हैं, इसलिए उन्होंने जानबूझकर छुट्टी दी है।"

कृतिका—“अच्छा! तुम अपने सेठ जी और मैडम को अपनी हर बात बताते हो ना?"

सुदर्शन—“हाँ, इसमें प्रोब्लम क्या है ? वो मुझे घर के सदस्य की तरह समझते हैं। मैं उन्हें अपनी बातें बताऊँगा, तो वो अच्छी सलाह ही देंगे। अगर कभी मुझसे कोई गलती हो, तो मुझे समझा सकते हैं।"

कृतिका—“हाँ, ये तो है। तो फिर आज कहाँ चलें?”

सुदर्शन ने मुस्कुराते हुए कहा—“जहाँ तुम ले जाना चाहो।”

कृतिका—“तो आज तुम्हें पूरा दिन शहर घूमाऊँ? अगर तुम्हें कोई प्रोब्लम ना हो तो?”

सुदर्शन—“हाँ, ज़रूर। वैसे भी इस शहर में साढ़े चार साल से ज्यादा टाइम हो गया, लेकिन कुछ देखा ही नहीं। बस चार–पाँच दोस्त है, आज की तरह जब छुट्टी मिलती है, तो कभी–कभी उनके घर चला जाता हूँ।”

कृतिका—“चलो फिर, आज तुम्हें पूरा गुलाबी नगर दिखाती हूँ।”

कृतिका ने गाड़ी में म्यूजिंक ऑन करके गाना चलाती है।

रिमझिम घिरे सावन,

उलझ–उलझ जाए मन,

भीगे आज इस मौसम में,

लगी कैसी ये अगन,

कृतिका सारा दिन जगह–जगह गाड़ी रोक-रोककर सुदर्शन को कुछ ना कुछ खिलाते–पिलाते हुए छोटी–चोपड़, बड़ी–चोपड़, आमेर, जलमहल, सांगानेर बहुत सारी जगह लेकर गई। सुदर्शन के जीवन में पहली बार किसी लड़की के साथ दोस्त बनकर हँसते-खिलखिलाते हुए घूम रहा है। आज कृतिका हँसती-खिलखिलाती सुदर्शन के साथ घूमती हुई शराब पीना भूल ही गई। कृतिका को छोटी बच्ची की तरह चहकती देखकर सुदर्शन आश्चर्यचकित हो रहा है। कृतिका की चंचलता देखकर सुदर्शन ने महसूस किया कि कृतिका 27 वर्ष की होकर भी दिल से अभी तक बहुत ही नटखट और शरारती मासूम सी बच्ची है।

शाम के आठ बजे विद्याधर नगर के पब्लिक पार्क की पार्किंग में आकर कृतिका और सुदर्शन गाड़ी में बैठते हैं। कृतिका एक सिगरेट निकालकर मुँह में रखकर लाइटर से सिगरेट जलाती है।

सुदर्शन ने कृतिका की ओर देखकर मन में कहा कि हत तेरे की। शाम होते-होते आ गई अपनी औकात पर। एक सिगरेट तो जला ही ली।

कृतिका ने सिगरेट का कश लेकर धुंआ गाड़ी से बाहर निकालकर सुदर्शन की ओर देखकर मुस्कुराते हुए कहा—“तुम भी सोचते होंगे। पता नहीं क्यों ये नशेड़ी लड़की मेरे पीछे पड़ गई?”

सुदर्शन—“नहीं तो, ऐसा मैनें कब कहा?”

कृतिका—“तुमने नहीं कहा, लेकिन मन में सोचते तो होंगे ना?”

सुदर्शन—“अब तुम खुद ही अपने दिमाग में उल्टा–सीधा सोचो, उसका तो कोई ईलाज नहीं है। मैनें पहले भी बताया है, मुझे किसी भी तरह का नशा बिलकुल पसन्द नहीं है, लेकिन दूसरों के नशा करने से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। क्योंकि सबको नशे से होने वाले नुकसान पता होते है। अब उनको जानबुझकर मरना है, तो मरे।”

कृतिका—“एम सॉरी, यार ! लेकिन मैं क्या करूँ ? दिव्यांश से धोखा खाने के बाद मेरी जीने की तमन्ना ही ख़त्म हो गई।”

सुदर्शन—“यहीं तो गलती है तुम्हारी। धोखा उसने दिया और जीने की तमन्ना तुम्हारी ख़त्म हो गई। सबक सिखाओ उसे। उसको भी वहीं तकलीफ़ दो, जो उसने तुम्हें दी है।”

कृतिका ने निराशा से कहा—“अब मैं क्या सबक सिखाऊँ उसे ? वो लड़का है, मैं लड़की हूँ। अगर मैनें उसे धोखा दिया होता, तब भी लोग मुझे बुरी बोलते। अब उसके धोखे के बारे में किसी को बताऊँ, तब भी बेकार मैं ही कहलाऊँगी। और मुझे तो पहले से ही सब बिगड़ैल बोलते हैं।”

सुदर्शन—“तुम मुझे अपना दोस्त मानती हो ?”

कृतिका—“तुम्हें शक है ?”

सुदर्शन—“शक नहीं है। लेकिन अगर दोस्त मानती हो, तो फिर एक प्रोमिस करो। तुम रोओगी नहीं। मैं जो पूछ रहा हूँ, रोये बिना बताओगी।”

कृतिका—“ऐसा क्या पूछ रहे हो ?”

सुदर्शन—“पहले प्रोमिस।”

कृतिका—“प्रोमिस। नहीं रोऊँगी। अब बताओ।"

सुदर्शन—“तुम्हारा बॉयफ्रैंड दिव्यांश, उसे तुमसे पैसे लेने की क्या जरूरत पड़ गई? तुम बता रही थी, तुम उसे पैसे की मदद भी करती थी।”

कृतिका—“वो अपने पापा के साथ ही उनके बिजनेस में हेल्प करता है। उसने कई बार हिसाब में गड़बड़ करके अपने पापा के पैसे चुराए है। तो कई बार उसके पापा ने उसका ऑफ़िस जाना और उसको पैसे देना बन्द कर दिया था। तब मैं उसे पैसे देती थी।”

सुदर्शन—“अच्छा, तुम्हारे पास उसके कोई मैसेज, कोई फोटो वगैरह है। जिससे ये पता चलता हो, वो तुम्हारा बॉयफ्रैंड था और उसने तुम्हारे साथ रिलेशन बनाए है।”

कृतिका—“फेसबुक पर बहुत मैसेज है, वॉट्सऐप पर भी बहुत मैसेज है। कुछ उसके साथ ली हुई सेल्फी है। बस और तो कुछ नहीं है।”

सुदर्शन—“और वो तुम्हारे साथ उस टाइप की बातें करता था ?”

कृतिका आँखें ऊपर करके मुस्कुराती हुई बोली—“किस टाइप की ?” सुदर्शन ने अटकते हुए कहा—“अरे, वो… तुम समझ जाओ ना।”

कृतिका—“हाँ, करता था। बॉयफ्रैंड बनने के बाद वो ज्यादातर वैसी ही बातें करता था।”

सुदर्शन—“और तुम?”

कृतिका—“मैं भी करती थी।”

कृतिका ने सिगरेट बाहर फेंककर अपना मोबाइल उठाते हुए कहा—“एक मिनट रुको।”

कृतिका फेसबुक लॉग–इन करके फेसबुक पर दिव्यांश के मैसेज निकालकर मोबाइल सुदर्शन को देती हुई बोली—“अब उसने मुझे ब्लॉक कर रखा है। ये उसके मैसेज है, तुम देख लो।”

सुदर्शन मोबाइल लेकर कृतिका और दिव्यांश के मैसेज पढ़ने लगता है।

कृतिका—“ये मैसेंजर में देख लो ना। बार–बार क्लिक नहीं करना पड़ेगा।”

सुदर्शन—“इसमें तो बहुत सारे मैसेज है। अगर तुम बुरा ना मानो तो दो–चार दिन के लिए तुम्हारा मोबाइल मुझे दे सकती हो?”

कृतिका—“हाँ, ले लो। बस एक सिम–कार्ड निकाल दो। वो मॉम–डेड कॉल करते हैं ना इसलिए।”

सुदर्शन ने मोबाइल कृतिका को देते हुए कहा—“लो तुम खुद निकाल लो।”

कृतिका ने मोबाइल लेकर खोला और उसमें से एक सिम निकालकर मोबाइल सुदर्शन को वापस दे देते हुए कहा—“अब जितने मर्ज़ी दिन रख लो।”

सुदर्शन मोबाइल लेकर मोबाइल को वापस जड़कर अपनी जेब में डाल लेता है।

कृतिका गाड़ी के ड्रोअर में से एक पुराना मोबाइल निकालकर सिम पुराने मोबाइल में डालकर पुराना मोबाइल ऑन करके सामने छोड़ देती है।

सुदर्शन ने कृतिका की ओर देखकर कहा—“अच्छा, एक बात बताओ? तुमने कोई सवाल–जवाब किये बिना अपना मोबाइल दे दिया। अगर मैनें मोबाइल में से तुम्हारा कोई सीक्रेट निकालकर तुम्हारे लिए कोई प्रोब्लम कर दी तो ?”

कृतिका ने हँसकर कहा—“कोई बात नहीं, यार ! पीने का एक और बहाना मिल जाएगा। मरूँगी तो शराब से ही, खुदखुशी तो नहीं करूँगी।”

सुदर्शन ने गंभीरता से कहा—“अरे, मजाक कर रहा हूँ। मैं कोई प्रोब्लम नहीं करूँगा। मुझे तुम्हारी ये मरने वाली बातें बहुत बुरी लगती है। ऐसे मत बोला करो।”

कृतिका ने मुस्कुराते हुए कहा—“लेकिन अभी तो तुमने कहा, जिनको जानबुझकर मरना है, मरे।”

सुदर्शन ने क्रोध से कहा—“ओहो। अब मैं चलता हूँ। तुम भी अपने घर जाओ।”

सुदर्शन गाड़ी से उतरने लगता है।

कृतिका ने सुदर्शन का बाजू पकड़कर कहा—“एम सॉरी, यार।”

सुदर्शन ने कृतिका का हाथ छिटककर कहा—“अब सॉरी क्यों बोल रही हो? तुम्हें मरना है ना ? मरो।”

कृतिका स्टीयरिंग पर हाथ रखकर बाहर की ओर देखने लगती है और देखते-देखते कृतिका की आँखें भीग जाती है।

सुदर्शन ने कृतिका के आँसू निकलते देखकर कहा—“अब रोने क्यों बैठ गई?”

कृतिका आँसू पोंछकर चुपचाप बाहर की ओर देखती रहती है।

सुदर्शन ने मन में कहा कि क्या है यार ये? जब देखो, रोने लग जाती है।

सुदर्शन ने कृतिका का बाजू पकड़कर कहा—“तुम एक बात बताओ। कोई दोस्त मरने की बात करे, तो बुरा नहीं लगता क्या? मैनें तो तुम्हारे साथ थोड़ा हँसने के लिए मजाक में कहा। तुम बोलती हो, शराब पीकर ही मरूँगी। उस रात की तरह ये भी तो बोल सकती थी, सर फोड़ूगी, फिर तेरा।”

कृतिका ने मुस्कुराकर कहा—“वो तुम्हें थोड़े ही कहा था। वो तो नशे में तुम्हें दिव्यांश समझकर बोल दिया। मुझे तो याद भी नहीं है, तुमने ही बताया।”

सुदर्शन—“मेरा मतलब तुम खुद के बारे में बुरा मत बोला करो। जैसे आज दिन में थी ना, हमेशा वैसे रहा करो।"

कृतिका सर झुकाकर मुस्कुराने लगती है।

सुदर्शन ने हँसकर कहा—“अब हँस क्यों रही हो?"

कृतिका—“यू ही। अब कहाँ चलें?"

सुदर्शन—“अब घर चलना चाहिए।"

कृतिका—“अभी? हाँ, एक जगह और है। चलो, वहाँ चलते हैं।"

कृतिका गाड़ी स्टार्ट करती है।

सुदर्शन—“कृतिका, कृतिका, कृतिका, कृतिका। मेरी बात सुनो। तुम रोज रात को बारह–एक बजे बाद घर जाती हो। आज तो हम सुबह नौ बजे से साथ घूम रहे हैं। आज तो जल्दी घर जाओ। प्लीज।”

कृतिका ने मुस्कुराकर कहा—“अच्छा, ठीक है। चलो, खाना खाते हैं। फिर मैं चली जाऊँगी।"

सुदर्शन ने मुस्कुराकर कहा—“ये भी सही है। ठीक है, चलो।"

कृतिका खुश होकर गाड़ी एक रेस्टोरेन्ट की ओर लेकर चली जाती है।

सत्ताईस दिन बाद दस जून, शनिवार को रात के सवा दस बजे कृतिका गाड़ी में सुदर्शन को ऑफ़िस से घर लेकर आ रही है।

आम्रपाली सर्किल नज़दीक आने पर सुदर्शन ने कहा—“आज गाड़ी वहाँ नारायण की दुकान पर ले चलो।”

कृतिका—“वहाँ क्यों?”

सुदर्शन—“तुम चलो तो। कोई प्रोब्लम हैं क्या वहाँ चलने में?”

कृतिका—“नहीं। मुझे कोई प्रोब्लम नहीं है, लेकिन उस रात जब तुम पहली बार मुझे बिल्डिंग में ले गए थे। तब सुबह तुमने ही तो कहा था, आप यहाँ से चली जाओ। अगर किसी ने देख लिया, तो गलत मतलब निकालेंगे। इसलिए तो मैं यहाँ बिल्डिंग से दूर सर्किल पर गाड़ी रोकती हूँ।”

सुदर्शन ने हँसकर कहा—“अरे, वो छः महीने पुरानी बात हो गई। अब तो लोगों ने गलत मतलब निकाल भी लिए।”

कृतिका ने आश्चर्य से कहा—“क्या गलत मतलब निकाल लिए?”

सुदर्शन—“वहीं मतलब। जो एक लड़के और एक लड़की को साथ देखकर अक्सर लोग निकालते हैं। कॉलोनी में मुझे जानने वाले आधे से ज्यादा लोगों को पता है, पिछले दो महिने से तुम मुझे सुबह घर से ऑफ़िस और शाम को ऑफ़िस से घर छोड़कर जाती हो। हम घंटों तक गाड़ी में बैठे बातें करते है।”

कृतिका—“ओह…लेकिन सबको पता कैसे चला ?”

सुदर्शन—“किसी ने देख लिया होगा। गाड़ी में बैठते या गाड़ी से उतरते। फिर एक ने दो को बताया होगा, दो ने चार को बताया होगा, चार ने दस को बताया होगा। बस ऐसे ही फैलती है बातें। अब सब यहीं सोचते हैं, इस बिल्डिंग में रहने वाले सुदर्शन का उस गाड़ी वाली लड़की के साथ चक्कर चल रहा है। चार–पाँच दिन पहले सुबह–सुबह पड़ोस का एक आदमी हँस–हँसकर मुझे बोल रहा था, कल रात गाड़ी में क्या हो रहा था? ग्यारह बजे से एक बजे तक गाड़ी जोर–जोर से हिल रही थी।”

कृतिका आश्चर्य से बोली—“गाड़ी कब हिल रही थी?”

सुदर्शन ने हँसकर कहा—“गाड़ी नहीं हिल रही थी। उसका दिमाग हिला हुआ है। गलत सोचने वाले तो गलत सोचते ही हैं।”

कृतिका—“तो अभी दुकान पर किसलिए जा रहे हैं ?”

सुदर्शन—“अरे, वो तो दुकानवाला नारायण और आलोक, जो तुम्हें ऑटो से फ्री में घर छोड़कर आया था। उन दोनों के पास चल रहे हैं। इन दोनों को तुम्हारे बारे में सब पता है। दोनों मेरे बहुत अच्छे दोस्त हैं और दिल के अच्छे हैं।”

कृतिका—“अच्छा।”

कृतिका गाड़ी नारायण की दुकान के सामने लाकर साइड में खड़ी करके बन्द कर देती है। सुदर्शन और कृतिका गाड़ी से उतरकर नारायण की दुकान पर आने लगते हैं। आलोक के साथ लम्बी बेंच पर बैठा नारायण खड़ा होकर दुकान के अन्दर चला गया। सुदर्शन आकर आलोक के पास बेंच पर बैठ जाता है।

नारायण दो कुर्सियाँ लेकर दुकान से बाहर आया और कुर्सियाँ रखकर मुस्कुराते हुए कृतिका से बोला—“ल्यो बैठो। मैडम जी।"

कृतिका ने मुस्कुराते हुए कहा—“प्लीज, किसी फॉर्मेलटी की ज़रूरत नहीं है। आप सब मुझे कृतिका कह सकते हैं।"

नारायण—“आप बड़े लोग हो, सीधा नाम कैसे लें आपका ?"

कृतिका हँसकर बोली—“देखिए, छोटे-बड़े के बारे में मैंने कभी नहीं सोचा। अगर आप लोग ऐसे विहेव करेंगे, तो मुझे यहाँ अनकम्फर्टेबल फील होगा। सॉ प्लीज, जैसे हमेशा आपस में बात करते हैं, वैसे करो।"

सुदर्शन—“अरे, बैठ जा। भाई। ये जैसी लगती है, वैसी है नहीं।"

कृतिका ने हँसकर कहा—"सुन लिया, आपने ? अब बैठो।"

कृतिका और नारायण अपनी-अपनी कुर्सी पर बैठ जाते हैं।

सुदर्शन ने जेब से कृतिका का मोबाइल निकालकर कहा—“मैनें पिछले बीस दिनों में कृतिका और दिव्यांश के बीच फेसबुक और वॉट्सऐप पर हुई बातों के सारे मैसेज पढ़कर देखे हैं और सभी मैसेज के स्क्रीन–शॉट निकालकर सारे स्क्रीन–शॉट मेरी आईडी से कृतिका की आईडी में मैसेज कर दिये है।”

आलोक—“बस फिर अब कृतिका जी को बोल दें, फेसबुक पर पोस्ट करने के लिए।”

नारायण—“पहले देख तो लो, कौनसे मैसेज करने हैं और कौनसे मैसेज नहीं करने?”

सुदर्शन—“सभी मैसेज पोस्ट किये जा सकते है। बस उन चार लड़कियों के नाम को मिटा देंगे। बाकी बहुत सारे मैसेज में वो लड़का अपनी करतूत खुद ही कृतिका को बता रहा है। और सबसे खास बात। कृतिका ने उसे कभी कोई गलत या गन्दी बात नहीं कहीं। कृतिका ने सिर्फ उसकी गन्दी बातों के जवाब दिये है। जैसे गर्लफ्रैंड आमतौर पर अपने बॉयफ्रैंड को जवाब देती है। इसके इलावा कृतिका ने उसको बहुत बार कहा, मुझे ऐसी बातें पसन्द नहीं है। वो ही हर बार गन्दी–गन्दी बातें करता था।”

कृतिका आश्चर्य से इधर–उधर देखती हुई सबकी बातें सुनकर बोली—“कोई मुझे भी बताएगा, क्या बात हो रही है?”

सुदर्शन, आलोक और नारायण तीनों हँसने लगते हैं।

सुदर्शन—“हाँ, सब कुछ करना तो तुम्हें ही है। हमने तो बस सोचा है।”

कृतिका—“क्या?”

सुदर्शन—“तुम उस लड़के दिव्यांश के बारे में सब कुछ, उसकी एक–एक घटिया बात फेसबुक पर पोस्ट करो। वो कैसे लड़कियों को पटाता है ? लड़कियों को पटाने के लिए क्या–क्या नाटकबाजी करता है ? किस-किस तरह की अच्छी-अच्छी और बड़ी-बड़ी बातें बोलता है। पटाने के बाद प्यार-मोहब्बत की बड़ी-बड़ी बातें बोलकर लड़की को बिस्तर तक लाने के लिए क्या–क्या करता है ? जब लड़की से उसका मन भर जाता हैं, फिर वो किस तरह दुत्कार कर घटिया–घटिया और गन्दी–गन्दी बातें बोलकर लड़की को छोड़ देता है ? और उसके घरवाले उसके बारे में सब कुछ जानने के बाद भी किस तरह हर बार उसको बचाते हैं ? ये सभी बातें पूरी डिटेल के साथ पोस्ट करो।”

कृतिका—“लेकिन इससे होगा क्या ?”

सुदर्शन—“उसके बारे में सबको सब कुछ पता चल जाएगा। हो सकता हैं, वो घबराकर तुमसे शादी कर लें।”

कृतिका—“अरे, पता चलने से क्या होगा ? सब यहीं कहेंगे, मैंने उसे फँसाया होगा।”

सुदर्शन—“ये सब अनुमान हम पहले से ही लगा चुके हैं। पिछले एक–डेढ़ महीने से रोज सुबह एक–दो घंटे हम तीनों तुम्हारे बारे में ही बात करते हैं। उस लड़के को सबक सिखाने का सिर्फ एक यहीं तरीका है। क्योंकि उसने तुम्हारे साथ सब कुछ तुम्हारी मरजी से ही किया है। मैनें तुम्हारी उससे दोस्ती की शुरुआत से लेकर उसके ब्लॉक करने तक का एक–एक मैसेज पढ़ा है, पहले तुम्हें गर्लफ्रैंड बनाने के लिए भी वहीं हाथ धोकर तुम्हारे पीछे पड़ा था और गर्लफ्रैंड बनाने के बाद रिलेशन बनाने के लिए भी वहीं तुम्हारे पीछे पड़ा था। और मैसेज पढ़कर लगता है, जब उसने पहली बार तुम्हारे साथ रिलेशन बनाए, तब यकिनन उसने ड्रिंक में कुछ ऐसा मिलाया था, जिससे तुम्हें होश ना रहें या तुम उसे रोक ना सको। वरना ड्रिंक तो तुम रोज करती हो, लेकिन ऐसा एक बार भी नहीं हुआ, जब तुम्हारा खुद पर बिलकुल भी कंट्रोल ना हो। और हाँ, इस तरीके से तुम उसे शादी के लिए मजबुर भी कर सकती हो। उसने शादी के वादे भी तो किये थे, सबूत के तौर पर ये मैसेज है।”

कृतिका ने असमंजस से कहा—“तुम क्या कह रहे हो? मुझे तो कुछ समझ नहीं आया? जितने लोग मुझे जानते हैं, उन सबको पता है, मैं कैसी है?"

आलोक—“कृतिका जी, आप चाहें जैसी भी हो ? किसी को भी आपकी भावनाओं से खेलने का अधिकार नहीं है। ऐसे लोगों के खिलाफ़ कुछ करेंगे नहीं, तो ये लोग कभी नहीं सुधरेंगे।”

कृतिका—“लेकिन मैं तो खुद बिगड़ी हुई हूँ। मैं उसको क्या सुधारू?”

नारायण—“देखो, बाई(बहन)। हमें आपके बारे में सब पता है। हमें तो आप कहीं से भी बिगड़ी हुई नहीं लगती। हाँ, दारू पीना आपकी गलत आदत है। वो आप जल्दी से जल्दी छोड़ दो, तो बहुत अच्छी बात है।”

सुदर्शन—“और बिगड़ैल और बेकार वो होते हैं, जो दूसरों का बुरा करते हैं। जो बिना वजह दूसरों को दुःख देते हैं। तुमने गलत रास्ते पर चलकर भी सिर्फ खुद को नुकसान पहुँचाया है और अभी-भी पहुँचा रही हो। लेकिन तुमने कभी किसी का बुरा नहीं किया। उल्टे तुम तो ज़रूरत पड़ने पर दूसरों की मदद भी करती हो। लोग तुमसे दूर सिर्फ इसलिए है, क्योंकि तुम्हारे बारे में बातें सुनकर तुम्हें जाने बिना ही शराबी होने के कारण तुम्हें बेकार लड़की समझ लेते हैं।”

आलोक—“और रही बात रात को घर से बाहर घूमने की। तो ये भी कोई गलत या बुरी बात नहीं है। हाँ, दिनोंदिन बढ़ते क्राइम के हिसाब से बहुत खतरनाक जरूर है। और खतरा सभी को होता हैं। आदमी भी अगर रात को बाहर निकले, तो आदमी के साथ भी लुटपाट, किडनैपिंग जैसे क्राइम हो सकते हैं। इसलिए सबका सावधान रहना बहुत जरूरी है।”

कृतिका—“आप सबकी बातें सही है, लेकिन सभी लोग आपकी की तरह नहीं सोचते ना। मैं खुद भी उसे सबक सिखाना चाहती हूँ। उसके कारण बहुत दुःख झेले है मैंने। वो मेरे साथ था, तब भी और अब उसने मुझे छोड़ दिया, तब भी। लेकिन अगर मैं पोस्ट करूँगी, तो मेरे मॉम–डेड की भी बदनामी होगी। वो पहले से ही मेरे कारण बहुत दुःखी रहते हैं।”

सुदर्शन बीच में बोला—“एम सॉरी, कृतिका। लेकिन क्या अब तक तुम अपने मॉम–डेड का नाम रोशन कर रही थी ? जब उस लड़के के साथ तुम रिलेशन बना रही थी, तब क्या तुम्हारे मॉम–डेड की इज्ज़त बढ़ रही थी ? अब तुम्हें उस धोखेबाज का कमीनापन फेसबुक पर पोस्ट करने के लिए कह रहे है, तो तुम्हें अपने मॉम–डेड की बदनामी की चिन्ता हो रही है।”

कृतिका—“लेकिन जब मॉम–डेड को पता चलेगा।”

नारायण ने बीच में टोककर कहा—“बाई, लड़कियों के माँ–बाप ऐसे ही होते हैं और इसी बात का तो गलत लोग फायदा उठाते हैं। गलत लोगों को मालूम होता है, लड़की बदनामी के डर से कुछ नहीं बोलेगी और अगर बोलेगी भी तो बदनामी तो लड़की की ही होनी है। इसलिए वो निडर होकर अपनी मनमानी करते हैं।”

आलोक—“और शर्म–लिहाज़ के कारण लड़कियाँ और औरतें ऐसी बातें छुपाती है। लेकिन लड़के और आदमी गर्व से बताते हैं, मैनें इतनी लड़कियाँ पटाई हैं, मैनें इतनी औरतों के साथ रिलेशन बनाए हैं। ऐसा सिर्फ इसलिए होता है क्योंकि गलती हो या ना हो, लड़कियाँ और औरतें खुद शर्मिन्दगी महसुस करती है।”

सुदर्शन—“और मैनें तुम्हें बहुत बार अच्छी तरह समझाया है, तुमने धोखा दिया नहीं है, तुमने धोखा खाया है। अब तुम्हें सारी शर्म–लिहाज़ छोड़कर उस धोखेबाज के बारे में सबको बताना है। जब तुमने गलती करते वक्त शर्म नहीं की, फिर अब अपनी गलती मानकर, गलती क्यों और कैसे हुई ? ये बताने में शर्म, बदनामी की बातें क्यों कर रही हो ?”

कृतिका—“लेकिन जिस तरह पोस्ट करने के लिए तुम कह रहे हो ? उसके गन्दे–गन्दे मैसेज दिखाकर सबको बताना। ऐसे पोस्ट पढ़कर लोग मेरे बारे में भी गलत बातें करेंगे।”

सुदर्शन—“क्या गलत बातें करेगें ? यहीं ना, देखो कितनी बेशर्म लड़की है। लड़का इसको गन्दे–गन्दे मैसेज करता था और ये उसे जवाब देती थी। लड़का इसको हफ्ते में कितनी बार बुलाता था ? लड़का क्या–क्या करता था ? ऐसी बातें बता रही है।”

कृतिका—“हाँ।”

सुदर्शन—“हाँ, तो पोस्ट में अपनी इन गलतियों को मान लेना। पोस्ट में लिख देना, ऐसे मैसेज का जवाब देना मेरी गलती थी। वो मुझे बुलाता था, उसके पास जाना मेरी गलती थी। मैं प्यार में अंधी हो गई थी। मुझे हवस और प्यार का अन्तर मालूम नहीं था।”

कृतिका—“इससे बुरी तो सिर्फ मैं ही बनूँगी ना।”

आलोक—“आप अकैले कैसे बुरी बनेगी ? दोस्ती होने के बाद वो कैसे आपके पीछा पड़ा हुआ था, आपको गर्लफ्रैंड बनाने के लिए। गर्लफ्रैंड बनाने के बाद आपके साथ रिलेशन बनाने के लिए उसने क्या–क्या किया ? वो सब भी तो लिखना है।”

कृतिका—“ठीक है।”

सुदर्शन—“और हाँ, तुम इन गन्दे कॉमेन्ट करने वालों से बहस बिलकुल भी मत करना। ऐसे लोगों को इंग्नोर करके इनके लिए अलग से पोस्ट कर देना। बस।”

कृतिका—“हाँ, देखो ना। बिना सर–पैर के कॉमेन्ट करने लगे। लड़कियों के कपड़े ? रात को बाहर क्यों निकलती हो ?”

सुदर्शन ने हँसकर कहा—“अरे, ये घटिया और गन्दे लोग हैं। ये इस तरह ज्ञान देने वाले लोग खुद लड़कियों और महिलाओं के साथ घटिया और गन्दी हरकते करते रहते हैं। इसलिए जब कोई ऐसी बातें पोस्ट करता है या करती है, तो इनके तन–बदन में आग लग जाती है। अब ये तो बोल नहीं सकते, हम घटिया है, हमारे दिमाग में गन्दगी भरी हुई है। इसलिए दूसरों को गलत बोलने लगते है।”

कृतिका—“हम्म…लेकिन इनको बोलूँ क्या ? सबसे ज्यादा यहीं लोग कॉमेन्ट करते हैं।”

सुदर्शन—“ये फालतू बातें करने वाले, ये बिना वजह लड़कियों के साथ बहस करने वाले, ये सब हवस के भूखे जानवर होते हैं। तुम्हारे बॉयफ्रैंड की तरह। इनको जवाब देना है, तो साफ़-सुथरी भाषा में इनको बुरी तरह बैईज्जत करो। अगर इनको बैईज्जत नहीं कर सकती, तो इनके कॉमेन्ट का कोई रिप्लॉय मत करो। सिर्फ पोस्ट करो।”

कृतिका—“और पोस्ट में इनके लिए लिखूँ क्या ?”

सुदर्शन—“लिख दो, लड़कियों के कपड़ों से लड़के काबू में नहीं रहते, तो लड़कों को घर में बैठना चाहिए। घर से बाहर ही नहीं निकलना चाहिए। लड़कियाँ चाहें कुछ भी पहने। लड़कों को लड़कियों से छेड़छाड़ और बदतमीजी करने का अधिकार किसने दिया ? अगर कोई लड़का दाढ़ी–मूँछ रखता है और लड़कियाँ उनकी दाढ़ी–मूँछ का मजाक उड़ाए। जैसे लड़के लड़कियों को गन्दी–गन्दी बातें बोलते हैं, उसी तरह लड़कियाँ दाढ़ी–मूँछ के कारण लड़कों को जंगली या आदिमानव कहने लगे, तो लड़कों को कैसा लगेगा ? महिलाएँ अगर पजामें–चोले और धोती–कुर्ते के कारण पुरुषों को ओल्ड फैशन या ग्वार कहने लगे, तो पुरुषों को कैसा लगेगा ? लड़कियाँ अगर सिक्स पैक दिखाने और अजीब–अजीब हेयर–कटिंग करने वाले लड़कों को भिखारी, लंगूर, बन्दर या जोकर कहने लगे, तो लड़कों को कैसा लगेगा?”

कृतिका ने हँसकर कहा—“ये सब लिख दूँ ?”

सुदर्शन—“हाँ, बिलकुल।”

कृतिका—“लेकिन आलोक, नारायण जी और तुम्हारे जैसे लोगों को बुरा लगा तो?”

सुदर्शन—“अच्छे लोगों को क्यों बुरा लगेगा ? जो लोग कोई गलत काम नहीं करते, उनको गलत बातों के विरोध से क्यों प्रोब्लम होगी ? प्रोब्लम या परेशानी सिर्फ उन लोगों को होगी, जो गलत काम करते हैं। अब मैनें कभी किसी लड़की या किसी महिला के साथ कोई गलत हरकत नहीं की, तो मेरे बारे में कोई लड़की या कोई महिला कुछ गलत क्यों बोलेगी ?”

कृतिका—“हम्म, ये तो है।”

सुदर्शन—“हाँ, और तुम खुद ही सोच लिया करो। लड़कों और पुरुषों को अपने हिसाब से सजने–सँवरने और जीने का अधिकार है, तो फिर ये अधिकार लड़कियों और महिलाओं से क्यों छिना जाता है ? तुम इस टाइप के पोस्ट करके इन घटिया और गन्दे कॉमेन्ट करने वालों को जवाब दो, लेकिन कॉमेन्ट में बहसबाजी बिलकुल मत करना। तुम्हारा मकसद बहसबाजी करना नहीं है।”

कृतिका—“ठीक है, कल से एक पोस्ट इनके लिए भी किया करूँगी।”

सुदर्शन—“हम्म…और इस बात का ध्यान रखना। हमें लड़का–लड़की और नारी–पुरुष वाला कॉम्पीटिशन नहीं करना। जो गलत है, वो गलत है। चाहें कोई भी हो। तुम्हें सिर्फ एक धोखेबाज की धोखेबाजी सबके सामने लानी है।”

कृतिका—“हाँ, सभी लोग एक जैसे नहीं होते। कुछ लड़कियाँ और महिलाएँ भी गलत होती है।”

सुदर्शन ने हँसकर कहा—“यहीं तो बात है। इन घटिया लोगों के कारण अच्छे लोगों का जीना हराम होता है। अब सभी लड़के लड़कियाँ थोड़ी छेड़ते हैं, लेकिन इन घटिया लड़कों के कारण लोग अच्छे लड़कों को भी शक की नजर से देखते हैं।”

कृतिका गाड़ी स्टार्ट करके बोली—“हम्म…सही बात है।”

सुदर्शन की बातचीत करते हुए कृतिका गाड़ी लेकर चली जाती है।

पाँच दिन बाद सोलह जून, शुक्रवार की रात को साढ़े दस बजे गाड़ी में कृतिका ड्राइविंग करती हुई सुदर्शन के साथ बातें कर रही है। कृतिका के मोबाइल पर कॉल आता है। कृतिका मोबाइल देखती है। दिव्यांश का कॉल है।

सुदर्शन—“किसका कॉल है?”

कृतिका—“दिव्यांश का।”

सुदर्शन—“तो फिर रिसींव करके बात करो।”

कृतिका गाड़ी साइड में रोककर कॉल रिसीव करके मोबाइल कान से लगाती है।

आयु में तीस (30) वर्ष का दिव्यांश कॉल रिसींव होते ही अश्लील और आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग करते हुए गन्दी–गन्दी गालियाँ निकालकर बोला—“साली, ये क्या नाटक शुरू किया है तूने?”

कृतिका अत्यधिक क्रोध से चिल्लाती हुई बोली—“ओए, मुँह संभालकर बात कर। समझा ना।”

दिव्यांश—“अरे, तू इसी लायक है। ***गन्दी-गन्दी गालियाँ*** ये फेसबुक पर मेरे बारे में क्या लिख रही है ? हमारे बीच जो भी हुआ, सब कुछ दोनों की मर्ज़ी से हुआ, समझी। मैनें कोई रेप नहीं किया तेरा।”

कृतिका—“हाँ, सब मर्ज़ी से हुआ। और मैनें लिखा भी यहीं है, सब कुछ दोनों की मर्ज़ी से हुआ। लेकिन तूने प्यार और शादी के वादे किये थे, इसलिए मैं तेरे साथ सब कुछ करने के लिए तैयार हुई। वरना मुझे कोई शौक नहीं चढ़ा था, तेरे साथ सब कुछ करने का।”

दिव्यांश—“तू तैयार तो हुई थी ना। फिर अब क्यों तिलमिला रही है ? उस वक्त तो तू भी लव यू–लव यू बोलकर मुझसे लिपटती थी। तेरे भी ***गन्दी-गन्दी बातें*** होती थी। अब सारी गलती मेरी बता रही है।”

कृतिका चीखती हुई बोली—“मैं तेरी खुशी के लिए तुझसे लिपटती थी, हरामखोर। मैं।”

सुदर्शन मोबाइल छीनकर अपने कान पर लगाता है।

दिव्यांश—“हाँ, मेरी खुशी के लिए। जैसे तूने तो मज़े लिए ही नहीं। अब कान खोलकर मेरी बात सुन। ये सारे के सारे पोस्ट अभी के अभी डिलीट कर और दूबारा तेरे किसी पोस्ट में मेरा नाम नहीं आना चाहिए। वरना उस रात तो तुझे जिन्दा छोड़ दिया था। इस बार बचेगी नहीं।”

सुदर्शन—“उस रात मुझे भी मालूम नहीं था, तू इतना घटिया और कमीना इन्सान है। वरना आज तेरी उस करतूत का वीडियो भी देख रहे होते लोग। और कान खोलकर तू सुन। ना तो कोई पोस्ट डिलीट होगा और ना पोस्ट में तेरा नाम आना बन्द होगा।”

दिव्यांश—“तू कौन है?”

सुदर्शन—“मैं कोई भी हूँ, उससे तुझे मतलब नहीं है।”

दिव्यांश—“समझ गया... तो कृतिका नया यार बना कर, नये यार के दम पर उछल रही है। साली ने गजब का नशीला बदन पाया है, किसी को भी पागल कर सकती है। लेकिन ये समझ लें, उसके ख़ूबसूरत बदन में मस्त होकर तू अपनी मौत से पंगा ले रहा है।”

सुदर्शन बीच में बोला—“मुझे पता था, गन्दा इन्सान, गन्दी बात ही सोचेगा। वैसे तू इतना घबरा क्यों रहा है ? कृतिका के साथ फेसबुक और वॉट्सऐप पर हुई बातों के मैसेज तो तेरे पास भी होंगे। अगर कृतिका के पोस्ट में कोई बात झूठ है, तो पुलिस के पास चला जा। मुझे या कृतिका को धमकाने का कोई फायदा किया है।”

दिव्यांश ने चार–पाँच गन्दी–गन्दी गालियाँ निकालकर कहा—“तू रूक जा। तुझे तो मैं फुर्सत से बताता हूँ, मेरे पास क्या-क्या है और मैं कहाँ–कहाँ जा सकता हूँ ?”

दिव्यांश ने अंत में एक और गन्दी गाली निकालकर कॉल काट दिया। सुदर्शन मोबाइल वापस कृतिका को देता है।

कृतिका ने मोबाइल लेकर सामने रखते हुए सुदर्शन से कहा—“क्या बोल रहा था?”

सुदर्शन—“क्या बोलेगा ? जिनके पास कुछ बोलने के लिए नहीं होता, वो लोग गाली निकालते हैं। वहीं निकाल रहा था।”

कृतिका—“तुम्हें उसके साथ बात नहीं करनी थी। उसके साथ उसके जैसे और भी बहुत लड़के हैं। सब के सब मारपीट करने वाले, गुंडे टाइप।”

सुदर्शन—“तुम चिन्ता मत करो। अभी नारायण की दुकान पर चलकर इसका ईलाज करते हैं।”

कृतिका गाड़ी आगे बढ़ाती हुई आम्रपाली सर्किल पर आकर नारायण की दुकान की ओर मोड़कर नारायण की दुकान के सामने लाकर बन्द करती है। नारायण की दुकान के बाहर नारायण और आलोक बैठकर बातें कर रहे है। सुदर्शन और कृतिका गाड़ी से उतरकर आलोक और नारायण के पास आकर बैठते हैं।

सुदर्शन ने आलोक से कहा—“यार, आज इसके मोबाइल पर अभी कुछ देर पहले उस लड़के का कॉल आया था।”

नारायण—“ले भाई, आलोक। अब पड़ गी तेरी ज़रूरत।”

आलोक—“कोई बात नहीं। क्या बोल रहा था ?”

सुदर्शन—“बोलना क्या हैं ? बस गालियाँ निकालकर धमकी दे रहा था।”

कृतिका—“तुम सब उससे मत उलझो। उसके बहुत कॉन्टेक्ट है।”

नारायण ने मुस्कुराकर कहा—“देख लेते हैं, उसके कॉन्टेक्ट।”

आलोक—“कृतिका जी, आप डरो मत। आप तो बस उसका नम्बर बताओ ?”

कृतिका—“लेकिन?"

सुदर्शन—“तुम नम्बर तो बताओ ?"

कृतिका ने आलोक को अपना मोबाइल देते हुए कहा—“लास्ट कॉल उसी का है।”

आलोक कृतिका से मोबाइल लेकर अपनी जेब से खुद का मोबाइल निकालकर फोनबुक में से गोविन्द बिशनोई को कॉल लगाता है।

आयु में छत्तीस (36) वर्ष के गोविन्द बिशनोई ने कॉल रिसींव करके कहा—“हाँ, आलोक बेटा?”

आलोक—“राम–राम काका(चाचा) जी।”

गोविन्द बिशनोई—“राम–राम।”

आलोक—“वो मैनें आपको मेरे दोस्त सुदर्शन और कृतिका के बारे में बताया था ना।”

गोविन्द बिशनोई—“हाँ।”

आलोक—“तो आज वो लड़का, जिसने कृतिका को गर्लफ्रैंड बना रखा था और एक रात अपने दो दोस्तों के साथ कृतिका की पिटाई करके कृतिका को सड़क पर छोड़कर भाग गया था। वो लड़का अभी थोड़ी देर पहले कृतिका के मोबाइल पर कॉल करके सुदर्शन और कृतिका को गालियाँ निकालकर धमकी दे रहा था।”

गोविन्द बिशनोई—“अच्छा बेटा, तू उसका मोबाइल नम्बर और उसका कोई फोटो है, तो मुझे वॉट्सऐप पर मैसेज कर। और सुदर्शन और उस लड़की को बोल दें, डरने या घबराने की कोई ज़रूरत नहीं है। सुदर्शन के पास तो मेरा नम्बर है ही। उस लड़की को भी मेरा नम्बर दे दें और बोल, दूबारा कभी उस लड़के का कोई फोन, कोई रास्ता रोकना, कोई भी ऐसी–वैसी बात हो, तो मुझे कॉल कर दें। फिर मैं सब देख लूँगा।”

आलोक—“ठीक है, काका।”

गोविन्द बिशनोई—“और कोई समस्या ?”

आलोक—“नहीं, काका। और तो सब आपकी दया है।”

गोविन्द बिशनोई—“दया तो सब मालिक की है। अच्छा, रखता हूँ।”

आलोक—“ठीक है, काकाजी । राम–राम।”

गोविन्द बिशनोई—“राम–राम, बेटा। खुश रहो।”

गोविन्द बिशनोई का कॉल कटने के बाद आलोक ने कृतिका के मोबाइल में से दिव्यांश का नम्बर और फोटो निकालकर गोविन्द बिशनोई को मैसेज करके कृतिका को मोबाइल वापस देते हुए कहा—“लो, कृतिका जी। अब दूबारा कभी उस लड़के का कोई कॉल या मैसेज आ जाए, तो मेरा नाम बदल देना।”

कृतिका ने मुस्कुराकर पूछा—“कौन है… तुम्हारे काकाजी ?”

नारायण ने हँसकर कहा—“इसके काकाजी , शहर के सारे भाई लोगों के दादाजी है।”

कृतिका हैरान होते हुए बोली—“भाई लोगों के दादाजी, मतलब ?”

सुदर्शन ने मुस्कुराकर कहा—“भाई लोग मतलब, जो गुंडे–बदमाश होते है ना।”

कृतिका—“मतलब इसके काकाजी  भी गुंडे–बदमाश है ?”

सुदर्शन—“नहीं–नहीं, गोविन्द जी बहुत अच्छे आदमी है।”

नारायण—“बाई… सीधी और साफ़ बात। गलत और बेकार लोगों के लिए गोविन्द जी गुंडे–बदमाश है। आपके–हमारे जैसे लोगों के लिए मददगार। अब देखो, किसी लड़की को कोई लड़का परेशान करता हो और वो लड़की अगर पुलिस के पास मदद माँगने जाती है, तो पुलिस उस लड़के को वॉर्निंग देकर छोड़ देती है। फिर वो लड़का अपने साथ पाँच–सात लड़कों को लेकर लड़की के घर आता है और लड़की और लड़की के घरवालों की बुरी तरह पिटाई करके चला जाता है। लेकिन अगर लड़की गोविन्द जी से मदद माँगें, तो गोविन्द जी उस लड़के को ऐसा सबक सिखाते हैं फिर वो लड़का अपनी घरवाली को छेड़ने से भी डरता है।”

कृतिका आश्चर्य से बोली—“अच्छा।”

आलोक—“हाँ, एक बार शहर के बाहर एक गाँव में गरीब लोगों के घरों पर कब्जा करने के लिए सत्तर–अस्सी गुंडे गए। उन गुंडों ने सारे गाँववालों को लाठी–डंडों से बुरी तरह पीटा। औरतों को, बच्चों को, बुढ़ों को, किसी को भी नहीं छोड़ा। तीन–चार दिन तक सारे गाँव में मातम सा छाया रहा। लोगों को समझ नहीं आ रहा था, कि अब क्या करें ? बड़े नेताओं का दवाब था, इसलिए पुलिस भी कुछ नहीं कर रही थी। फिर गाँव के किसी आदमी ने यहाँ रहने वाले अपने रिश्तेदार को सारी बात बताई। उस रिश्तेदार ने गोविन्द काका से कहा। फिर बस। सात–आठ दिन के अन्दर–अन्दर गाँव के जितने घर तोड़े थे, सारे घर उन तोड़ने वालों से ही दूबारा बनवाए। वो भी पहले से बढ़िया।”

कृतिका—“हम्म…फिर तो सच में बहुत अच्छे आदमी है। गरीब और मजबूर लोगों की मदद करते हैं।”

नारायण—“नहीं–नहीं, अमीर–गरीब, जाँत–पाँत से उनको मतलब नहीं है। वो बैकसूर और मासूम लोगों की मदद करते हैं।”

आलोक—“हाँ, मैनें आपके बारे में सब कुछ उनको बताया था। उन्होंने कहा, जो हो गया, उसको तो छोड़. अब दूबारा कोई ऐसी–वैसी बात हो, तो बस मिसकॉल कर देना।”

कृतिका ने मुस्कुराकर कहा—“ओह, थैंक्यू सॉ मच, आलोक।”

आलोक—“इसमें थैंक्यू की क्या बात है ? जब सोच लिया, उस लड़के को सबक सिखाना है, तो अब सीखाकर ही छोड़ेंगे।"

कृतिका—“बट, फिर भी। बी केयरफूल। हा।"

सुदर्शन—“तुम चिन्ता मत करो। कुछ नहीं होगा। अब घर जाओ। तुम्हें देर हो रही है।”

कृतिका खड़ी होकर बोली—“हाँ, ठीक है।”

सुदर्शन—“ध्यान से जाना और गाड़ी धीरे चलाना।”

कृतिका ने जाते हुए मुड़कर कहा—“हाँ, यार। रोज जाती हूँ ना।”

कृतिका मुस्कुराते हुए गाड़ी में जाकर गाड़ी स्टार्ट करके चली जाती है।

छः दिन बाद बाईस जून, गुरुवार की रात को पौने दस बजे न्यूज़ देखते हुए फर्श पर बिछाए कालीन पर बैठकर जयसिंह, सुजाता, आयु में तैईस(23) वर्ष की सृष्टि, आयु में बीस (20) वर्ष का अंकुश, आयु में सोलह (16) वर्ष का संयम और सुदर्शन खाना खा रहे हैं।

दीवार पर लगी टीवी में न्यूज़ एंकर—“राजस्थान के जाने–माने कारोबारी सेठ साँवरमल बागड़ी की बेटी कृतिका बागड़ी ने पिछले कुछ दिनों से फेसबुक पर एक के बाद एक बहुत से पोस्ट करके अपने धोखेबाज़ बॉयफ्रैंड दिव्यांश के बारे में कई खुलासे किये हैं। अपनी बातों की सच्चाई साबित करने के लिए कृतिका ने बाक़ायदा दिव्यांश के फेसबुक और वॉट्सऐप पर किये गए बहुत से मैसेज के स्क्रीन–शॉट पोस्ट किये हैं। सभी स्क्रीन–शॉट में दिव्यांश खुद बड़ी बेशर्मी से अपनी करतूतें कबूल कर रहा है।

तीस साल का दिव्यांश राजस्थान के ही बड़े कारोबारी किशन गंगवानी का छोटा बेटा है। दिव्यांश ने कृतिका से पहले भी कई लड़कियों को अपने प्यार के जाल में फँसाकर उन लड़कियों के साथ शारीरिक संबंध बनाए और मन भर जाने के बाद गन्दी–गन्दी बातें, जो हम यहाँ आपको बता भी नहीं सकते। ऐसी बातें बोलकर उन लड़कियों को छोड़ दिया। कृतिका के फेसबुक पोस्ट से प्रेरित होकर उनमें से एक लड़की ने भी हिम्मत दिखाई और उसने भी दिव्यांश के बारे में सोशल साइट्स पर पोस्ट करके कई खुलासे किये हैं।

आप यकिन नहीं करेंगे, जब लड़की को अपने प्यार के जाल में फँसाना हो, तब दिव्यांश इतनी अच्छी–अच्छी और मिठ्ठी–मिठ्ठी बातें करता है, जैसे ये दुनिया का सबसे अच्छा इन्सान है। अगर कृतिका के पोस्ट में आप दिव्यांश की नोटंकी भरी बातें पढ़ेगें, तो हैरान रह जाएँगे। कभी वो बिलकुल आदर्शवादी बन जाता है। कभी ऐसे दिखाता है, जैसे दुनिया का सबसे परेशान और दुःखी आदमी है। लड़कियाँ दिव्यांश की इसी नोटंकी से प्रभावित होकर आसानी से दिव्यांश के प्रेमजाल में फँस जाती है।

कृतिका ने न सिर्फ दिव्यांश के बारे में लिखा है। बल्कि ये भी बताया, कि दिव्यांश के घरवालें दिव्यांश के बारे में सब कुछ जानते हुए भी किस तरह हर बार दिव्यांश को बचाते हैं और दिव्यांश को भोला–भाला और मासूम बताकर दिव्यांश की शिकार बन चुकी लड़कियों और महिलाओं को ही चरित्रहीन साबित कर देते हैं।

इसके इलावा कृतिका ने कई ऐसे सवालों के जवाब भी दिये हैं। जो अक्सर लड़कियों पर उठाए जाते हैं।

कृतिका खुद शराब पीने और रात–रातभर घर से बाहर घूमने के लिए बदनाम है। कृतिका ने अपने कुछ पोस्ट में स्वीकार किया, शराब पीना बहुत गलत बात है। वो खुद अब धीरे–धीरे शराब पीना छोड़ रही है। शराब के आदी हो चुके लोगों को शराब छोड़ने के लिए कहना या शराब पीने से रोकना बहुत अच्छी बात है, लेकिन अगर कोई शराब पीने वाला या शराब पीने वाली किसी दूसरे के साथ कुछ बुरा नहीं करें तो उस शराब पीने वाले के साथ कुछ गलत करना सही नहीं है।

रात को बाहर घूमने के बारे में कृतिका ने लिखा, रात को घर से बाहर निकलना गलत नहीं है, लेकिन बढ़ते अपराध को देखते हुए खतरे से भरा है और खतरा सिर्फ लड़कियों और महिलाओं के लिए ही नहीं, बल्कि पुरुषों के लिए भी है। बहुत से पुरुषों के साथ लूटपाट और गुंडे–मवालियों के साथ मारपीट की घटनाएँ होती रहती है। ऐसा सिर्फ रात में ही नहीं, सुनसान जगहों पर दिन में भी होता है। इसलिए लड़का हो या लड़की, नारी हो या पुरुष, हम सबको इन संभावित खतरों से सावधान रहना चाहिए। कुछ लोग रात में नौकरी करते हैं, तो उनको रात के समय ही घर से बाहर निकलना पड़ेगा। कभी घर में अचानक रात के समय किसी की तबीयत खराब हो जाए, तो वो डॉक्टर के पास जाने के लिए सुबह होने का इंतजार नहीं कर सकते। ऐसे में अगर उनके साथ कुछ गलत लोग कुछ बुरा कर देते हैं गलत बुरा करने वाले होते हैं। जिनके साथ बुरा हुआ है, वो गलत नहीं है।

लड़कियों के कपड़ों, लड़कियों के नौकरी करने पर सवाल उठाने वालों को भी कृतिका तो बहुत सटीक जवाब देकर उनसे पूछा है कि लड़की अगर सलवार–सूट या साड़ी पहनती है तो लड़कियों को बहन जी या आन्टी जी बोलकर चिढ़ाया जाता है। उनका मजाक उड़ाया जाता है। लड़कियों और महिलाओं को बोला जाता कि लड़कियों और महिलाओं को क्या पता? पैसे कैसे कमाए जाते हैं? और अगर लड़कियाँ और महिलाएँ फैशन के हिसाब से कपड़े पहने, नौकरी करें तो उनको बेशर्म बोलते हैं। आखिर लड़कियाँ और महिलाएँ अपनी मर्ज़ी से क्यों नहीं जी सकती?

कृतिका ने अपने कुछ पोस्ट में शादी के वादे पर भरोसा करके प्यार के नाम पर शारीरिक संबंध बनाने के लिए राजी होने वाली लड़कियों को भी सलाह देते हुए लिखा, जिस लड़के को शादी करनी है, वो शादी से पहले शारीरिक संबंध बनाने की जिद क्यों करेगा? शादी के बाद शारीरिक संबंध तो बनाने ही है, शादी के बाद बच्चे भी होंगे। जो लड़के कहते हैं, मैं अभी शादी नहीं कर सकता लेकिन प्यार के बिना नहीं रह सकता। ऐसे लड़के असल में हवस के भूखे जानवर होते हैं, वो अपनी हवस को प्यार का नाम देते हैं। ऐसी बातें करने वाले लड़के भरोसे के लायक नहीं होते, इनको जहाँ कोई खूबसूरत लड़की या कोई खूबसूरत महिला दिखती है, ये वहीं फिसल जाते हैं। इसलिए लड़कियों को अगर खुशहाल जिन्दगी जीनी है, तो ऐसे लड़कों से दूर रहना चाहिए।

अब कृतिका की ये सलाह कितनी लड़कियाँ मानती है? ये तो लड़कियों पर ही निर्भर करता है। बहरहाल, कृतिका ने दिव्यांश के खिलाफ़ कोई पुलिसकेस नहीं किया है।

कृतिका ने अपने फेसबुक पोस्ट में कहा है, कि हमें किसी भी मामले में लड़का-लड़की या नारी-पुरुष नहीं करना चाहिए। मैंने सिर्फ इस लड़के की सच्चाई सबको बताने के लिए ये पोस्ट किये हैं। अब मेरा इस धोखेबाज़ दिव्यांश से शादी करने का भी कोई इरादा नहीं है।

हमारे सूत्रों से पता चला है, कृतिका ने अपने साथ हुए धोखे के बारे में फेसबुक पर पोस्ट करने का फैसला वैशाली नगर के आम्रपाली इलाके में रहने वाले कुछ लड़कों की सलाह पर किया। उनमें से एक लड़के का नाम सुदर्शन है, जो शहर के बड़े व्यवसायी जयसिंह के ऑफ़िस में स्टोन असोरटर की नौकरी करता है। दूसरे लड़के का नाम आलोक है, जो ऑटो चलाता है और तीसरे शख्स का नाम नारायण है, जो अपने घर पर एक किरयाना की दुकान चलाता है। कृतिका सुदर्शन को जनवरी की शुरुआत में एक रात नशे की हालत में सड़क पर पड़ी मिली थी, जहाँ कृतिका का बॉयफ्रैंड अपने कुछ दोस्तों के साथ कृतिका को पीटने के बाद छोड़कर भाग गया था। सुदर्शन ने पुलिस के चक्कर में पड़ने से बचने के लिए पुलिस को तो कुछ नहीं बताया, लेकिन कृतिका को अपने घर ले जाकर कृतिका का उपचार किया। उसके बाद कृतिका की इन सबसे दोस्ती हो गई

जयसिंह ने मुस्कुराकर कहा—“क्या बात है,  सुदर्शन। तुम तो छा गए।”

सुदर्शन खाना खाते हुए मुस्कुराने लगता है।

सुजाता ने हँसकर कहा—“और इसके साथ आपका नाम भी टीवी पर आ गया।”

सृष्टी—“लेकिन पापा, अगर इस लड़के को सज़ा मिलती तो और भी अच्छा होता। फेसबुक पर पोस्ट करने से इसे क्या फर्क पड़ेगा?”

जयसिंह—“सज़ा मिलनी तो चाहिए, लेकिन कृतिका ने इतना कर दिया वहीं बहुत है। वरना लड़कियाँ और महिलाएँ ऐसी बातें बोलती कहाँ हैं? अब कम से कम इसकी सच्चाई तो सबके सामने उजागर हो गई। इससे लोगों को ये भी समझ आएगा, कोई लड़की गलत रास्ते पर चल रही हो, तो इसका मतलब ये नहीं है, हमें उसके साथ कुछ भी करने का लाइसेंस मिल गया।”

सुदर्शन खाना खाकर उठा और हाथ–मुँह धोकर कहा—“अच्छा सेठ जी। मैं चलता हूँ।”

जयसिंह—“हाँ, ठीक है।”

अँकुश ने दरवाजे की ओर मुड़ते सुदर्शन से कहा—“भैया, अब कृतिका के साथ सुबह–शाम आना–जाना छोड़ दो।”

सुदर्शन ने रुककर कहा—“क्यों? क्या हुआ?”

अँकुश—“मेरा मतलब, कृतिका से शादी करके हमेशा कृतिका के साथ ही रहो ना।”

सुदर्शन ने मुस्कुराकर कहा—“बेवकूफ, ऐसा कुछ नहीं है। मैं सिर्फ उसे दोस्त मानता हूँ।”

सृष्टी—“बस–बस, ज्यादा बनो मत। हमें सब पता है।”

सुजाता—“अरे…क्यों छेड़ रहे हो, भैया को? सुदर्शन, तुम जाओ। इन दोनों के तो कान खींचने पड़ेंगे मुझे।”

सुदर्शन मुस्कुराते हुए मुड़कर चलता हुआ घर से बाहर आया और अपने जूते पहनकर मुख्य दरवाजे से बाहर आकर कुर्सी पर बैठे बहादुर से बोला—“कैसे हो, बहादुर जी?”

बहादुर—“अच्छा हूँ। खाना खा लिया सबने?”

सुदर्शन—“हाँ, मैनें तो खा लिया। बाकी सब अभी खा रहे है। ठीक है फिर, चलते है।”

बहादुर—“ठीक है।

सुदर्शन चलता हुआ आकर कृतिका की गाड़ी में बैठकर बोला—“कॉन्ग्राचुलेशन्स, अभी सेठ जी के घर टीवी में तुम्हारे फेसबुक पोस्ट की न्यूज़ देखकर आ रहा हूँ। अब न्यूज़ देखने वाले सभी लोग उस लड़के के कमीनेपन के बारे में जान जाएंगें।”

कृतिका—“हम्म…चलो, आलोक और नारायण को भी बताते हैं।”

सुदर्शन—“हाँ, चलो।”

कृतिका गाड़ी स्टार्ट करके चल पड़ती है और नारायण की दुकान के सामने आकर गाड़ी रोककर बन्द कर देती है। सुदर्शन और कृतिका गाड़ी से उतरकर नारायण की दुकान पर आते हैं। आलोक के साथ बैंच पर बैठा नारायण उठकर दुकान के अन्दर जाकर दो कुर्सियाँ लाकर बाहर रख देता है। सुदर्शन और कृतिका कुर्सियों पर बैठते हैं। नारायण वापस आलोक के पास बैठ जाता है।

सुदर्शन—“आज तो कृतिका के पोस्ट न्यूज़ में भी आ गए। न्यूज में उसका नाम सुना धोखेबाज बॉयफ्रैंड दिव्यांश।”

नारायण—“हम तो सुबह से ही देख रहे हैं।”

आलोक—“ये अब देखकर आया होगा।”

सुदर्शन ने कृतिका से कहा—“तुम चुप क्यों हो ”

कृतिका—“मुझे तुमसे एक बात पूछनी थी।”

सुदर्शन—“हाँ, तो पूछ लो। सोच क्या रही हो ”

कृतिका—“मुझे दिव्यांश पर गुस्सा आता है, मुझे उससे चिढ़ होती है। क्योंकि उसने मुझे धोखा दिया। लेकिन तुम उससे इतनी नफ़रत क्यों करते हो ? उसको बुरा तो नारायण और आलोक भी बोलते हैं। लेकिन उसके लिए तुम्हारा गुस्सा? दिव्यांश के लिए तुम्हारा गुस्सा देखकर कभी–कभी बहुत हैरानी होती है।”

सुदर्शन ने हँसकर कहा—“मुझे दिव्यांश से नहीं, दिव्यांश के धोखे से नफ़रत है। और हर धोखेबाज से नफ़रत है। अगर उसने तुम्हारे साथ रिलेशन बनाने के लिए तुम्हें बेवकूफ़ ना बनाया होता, तो मुझे उससे कोई शिकायत नहीं होती। धोखा चाहे प्यार के नाम पर दिया हो या रुपये–पैसे के लिए? बस चिढ़ है मुझे धोखेबाजों से।”

कृतिका—“लेकिन इतनी चिढ़? इतनी चिढ़ तो उसी को होती है जिसके साथ कोई ना कोई बड़ा धोखा हुआ हो।”

सुदर्शन ने मुस्कुराकर कहा—“ये बात आलोक और नारायण भी मुझसे कई बार पूछ चुके हैं। चलो, आज तुम तीनों को बता ही देता हूँ।”

आलोक—“हाँ, बता भाई। मैं भी जानना चाहता हूँ।”

सुदर्शन—“हाँ, तो अखबारों और टीवी में कुछ ऐड(विज्ञापन) तो तुम सबने पढ़े और देखे ही होंगे। पाँच दिन में काले से गोरे हो जाओ, दस दिन में मोटे से पतले हो जाओ, पन्द्रह दिन में दुबले–पतले से बॉडी–बिल्डर बन जाओ। इसके इलावा ये यंत्र रखने या पहनने से कष्ट दूर हो जाएँगे। वो यंत्र रखने से लक्ष्मी माता प्रसन्न हो जाएँगी। हमारी मालाएँ पहनने से भगवान खुश हो जाएँगे, हमारे ताबिज पहनने से अल्लाह खुश हो जाएगा। इस तरीके से औरत वश में आ जाती है, उस तरीके से संतान–सुख मिलेगा। प्रेम–समस्या, गृह–क्लेश, सौतन से छुटकारा वगैरह–वगैरह। इस तरह के बहुत सारे ऐड अखबारों में और आजकल तो कई टीवी चैनलों में भी आते रहते हैं।”

नारायण—“हाँ, भाई, भोत (बहुत) आवे।”

आलोक—“और बहुत सारे लोग ये ऐड और विज्ञापन पढ़कर लूट भी जाते हैं।”

सुदर्शन—“हम्म… अब से लगभग पाँच साल पहले मैनें भी अखबार में ऐसे ही एेड पढ़ें। घर बैठे बीस हजार कमाओ, घर बैठे तीस हजार कमाओ, घर बैठे पचास हजार कमाओ। उनमें से एक ऐड पढ़कर एक दिन मैंने एक जगह कॉल किया। उन लोगों ने बहुत प्यार और अपनेपन से बहुत इज्ज़त देकर बात की और कहा, आप आ जाओ। आपको बहुत बढ़िया सी नौकरी दे देंगे, ये कर देंगे, वो कर देंगे, वगैरह–वगैरह। बड़ी-बड़ी मिठ्ठी–मिठ्ठी बातें की।”

कृतिका—“फिर?”

सुदर्शन—“फिर मैनें सोचा इतने बढ़िया तरीके से प्यार और अपनेपन से बात कर रहे हैं। ये लोग तो बहुत अच्छे हैं। मुझे ज़रूर कोई बढ़िया सी नौकरी दिला देंगे।”

नारायण—“फेर तू अठः आ ग्यो।”

सुदर्शन—“हाँ, फिर मैं खुशी–खुशी यहाँ आने के लिए तैयार हो गया। मेरे घरवालों ने मुझे बहुत मना किया, लेकिन मैंने उनकी एक नहीं सुनी। मैंने सोचा, ये तो ऐसे ही जाहिल लोग है। इनको क्या पता, नौकरी के बारे में ?” अखबार के ऐड झूठे तो हो नहीं सकते।”

कृतिका—“फिर तुमने क्या किया?”

सुदर्शन—“फिर मेरे घरवालों ने मुझे पैसे देने से मना कर दिया और मेरे खुद के पैसे भी मुझसे छीन लिए। मैंने अपने पाँच दोस्तों से एक–एक हजार करके पाँच हजार रुपये उधार लिए और अपने मम्मी–पापा और भाई–भाभी को बहुत भला–बुरा बोलकर, बहुत बातें सुनाकर घर से निकल आया।”

नारायण—“आ तो गलत करी तू, तेरा घर आळा तेरा भला गी बात कृः हा।”

सुदर्शन—“हाँ, ये बात मुझे बाद में समझ आई।”

आलोक—“फिर यहाँ आने के बाद क्या हुआ?”

सुदर्शन—“यहाँ आने के बाद मैंने उन नौकरी देने वालों को कॉल किया। उन लोगों ने पता–ढिकाना बता दिया। ये गुलाब गैस एेजेन्सी के पास उनका ऑफ़िस था। मैं यहाँ उनके ऑफ़िस आया, ऑफ़िस में साड़ी और सूट पहने हुए चार–पाँच लड़कियाँ और महिलाएँ थी। कोट–पेन्ट पहने हुए चार–पाँच लड़के और आदमी थे। सबसे पहले तो उन लोगों ने पाँच सौ रुपये कोई रजिस्ट्रेशन करने के माँग लिए।”

कृतिका—“फिर तुमने दे दिये?”

सुदर्शन—“पहले मैंने उन लोगों से कहा, आपने तो कहा था, कोई पैसे नहीं लगेंगे। उन लोगों ने कहा, लेकिन फार्म भरने और रजिस्ट्रेशन के पैसे तो लगते ही है। मैंने पाँच सौ रुपये रजिस्ट्रेशन के और पन्द्रह सौ रुपये कोई फार्म भरने के दे दिये। उन लोगों ने कौनसा रजिस्ट्रेशन किया और कौनसा फार्म भरा, मुझे आज तक नहीं पता। मैनें सोचा, चलो दस–बीस हजार की नौकरी के लिए दो हजार खर्च करने में क्या बुराई है?”

आलोक—“फिर।”

सुदर्शन—“फिर उन लोगों कहा, पाँच हजार और जमा करवा दो और तुम भिवाड़ी चले जाओ। वहाँ तुम्हें दस हजार की नौकरी मिल जाएगी।”

नारायण—“हाँ, ये लोग फ्रोड होवे। फेर के होयो?”

सुदर्शन—“फिर मैंने कहा, कौनसी नौकरी मिलेंगी? मुझे करना क्या होगा? इसके बारे में तो कुछ बताओ? तो उन्होंने कहा, ये सब वो भिवाड़ी वाले ही बताएंगे। मैनें कहा, ये तो सरासर धोखा है। पहले बोलते हो, कोई पैसा नहीं लगेगा। अब बात–बात पर रुपये माँग रहे हो और नौकरी के बारे में भिवाड़ी वाले बताएंगे।”

कृतिका—“फिर क्या कहा, उन लोगों ने?”

सुदर्शन—“वो लोग बोले, पैसे है, तो भिवाड़ी चले जाओ। वरना भागो यहाँ से।”

आलोक—“तुझे जूता निकालकर मारना था उन सबको।”

सुदर्शन—“मैं पहली बार घर से बाहर आया था, यार। वो भी घरवालों को गालियाँ निकालकर।”

नारायण—“हाँ, समझ गया। पूरी बात बता, फेर आगे के होयो?”

सुदर्शन—“फिर मैंने कहा, लाओ मेरे दो हजार वापस करो। मुझे नहीं करनी नौकरी। उन लोगों ने कहा, ये अब नहीं मिलेंगे।”

आलोक—“फिर?”

सुदर्शन—“फिर मैं उनसे झगड़ा करने लगा, तो मुझे धक्के मारकर बाहर निकाल दिया। मैंने मन में सोचा, घरवालों को इतना भला–बुरा बोलकर आया हूँ। अब वो लोग तो मुझे घर में भी नहीं घूसने देंगे। दोस्त लोग भी अपने पैसे मांगेंगे। इस तरह की बातें सोचकर मैंने उन लोगों के पास जाकर हाथ जोड़कर कहा, मैं कोई पैसे वाला नहीं हूँ। मेरा बड़ा भाई घर पर एक छोटी सी दुकान करके सारा घर चलाता है। मेरे पास पैसे नहीं है। मेरे ऊपर दया करो।”

आलोक—“फिर?”

सुदर्शन—“फिर वो सब गालियाँ निकालकर बोले, पैसे नहीं है तो भाग जा। जा पुलिस में रिपोर्ट लिखा दें हमारे खिलाफ़।”

कृतिका—“ओह…फिर?”

सुदर्शन—“फिर मैंने हजार रुपये अपने पास रख लिए और उनको दो हजार देकर कहा, मेरे पास इतने ही है। उन लोगों ने कहा, इतने में तो पाँच हजार वाली नौकरी मिलेंगी।”

कृतिका—“फिर दिलवाई उन लोगों ने नौकरी?”

नारायण—“कौनसी नौकरी? बाई… चार हजार डकार लिए होंगे।”

सुदर्शन—“फिर मैंने कहा, ये भी सही है। पाँच हजार वाली नौकरी ही दिला दो। मैंने सोचा, चार हजार रुपये देकर पाँच हजार रुपये महीने की नौकरी मिल रही है। दो महीने नौकरी करके दस हजार लेकर घर चले जाएंगे। पैसे देखकर शायद घरवालें घर में घूसा लें।”

आलोक—“फिर आगे क्या हुआ?”

सुदर्शन—“फिर ये सोचकर मैं भिवाड़ी चला गया। शाम को वहाँ दो पच्चीस–तीस (25–30) साल के बिलकुल नशेड़ी लड़के मुझे रिसींव करने आए। पता नहीं कौनसा नशा करते थे? एक दम नशेड़ी थे, काले–पीले रंग के। वो दोनों मुझे एक मौहल्ले में ले गए। उस मौहल्ले में सब उन लड़कों की तरह नशेड़ी, सब के सब नशे में दिखाई दे रहे थे। उस मौहल्ले में एक खण्डर जैसा घर, फर्श टूटा–फूटा कंकर बिखरे हुए। दीवारें पुरानी सी, दीवारों को देखकर लग रहा था, जैसे अभी गिर जाएगी। छत टूटी हुई सी। उस घर में ले जाकर उन लड़कों ने मुझे कहा “ये तेरे रात को रहने की जगह है।”

कृतिका आश्चर्य से कहा—“ओह…बहुत ही कमीने लोग निकले वो।”

सुदर्शन—“अभी आगे तो सुनो, मेरी हालत क्या हुई?”

कृतिका—“हाँ, बताओ?”

सुदर्शन—“मैंने वो घर देखकर कहा, मैं इन्सान हूँ, भूत नहीं हूँ। मैं यहाँ नहीं रह सकता। उन लड़कों ने मुझे धक्का देकर कहा, रहना तो यहीं पड़ेगा। एक महीने से पहले तू कहीं नहीं जा सकता।”

आलोक ने आश्चर्यचकित होकर कहा—“फिर?”

सुदर्शन—“फिर मैं डरकर बूरी तरह घबरा गया और चुपचाप बैठ गया। रात को एक लड़का खाना लेकर आया। एक दम बेकार खाना, दो–तीन दिन की सुखी रोटियाँ और सड़ी–गली बासी हुई सब्जी। मैनें कहा, ये मैं नहीं खा सकता। वो लड़का बोला, यहाँ तो यहीं मिलता है। खाना है, तो खा। वरना भाड़ में जा। मैं बिना खाना खाए ही सो गया।”

कृतिका—“फिर?”

कृतिका—“फिर रात को मेरे सोने के बाद उन लोगों ने मेरे पैसे भी निकाल लिए। वो तो अच्छा हुआ मैनें पाँच सौ रुपये अलग से छुपाकर रखे हुए थे, इसलिए वहाँ से वापस आ सका। दूसरे दिन मुझसे एक फैक्टरी में कचरा और गन्दगी साफ़ करवाई, जो कचरा जम जाता है, काले रंग का वो।”

नारायण—“ओ”

सुदर्शन—“फिर रात को दो–तीन बजे मैं चोरी–छुपे अपना बैग उठाकर चलते–चलते बहुत दूर एक ऑटो स्टैण्ड पर आकर छुपकर बैठ गया। सुबह होने के बाद एक ऑटो में बैठकर वहाँ से दूसरी जगह आया। फिर वहाँ से बस पकड़कर रेवाड़ी आया। फिर रेवाड़ी से वापस यहाँ आकर उनके ऑफ़िस जाकर देखा, तो उनके ऑफ़िस पर ताला लगा हुआ था। आस–पास के लोगों से उनके बारे में पूछा, तो पता चला। उन लोगों एक महीने के लिए वो ऑफ़िस किराये पर लिया था और सात–आठ दिन बाद ही गायब हो गए।”

नारायण—"आंगा तो एई काम है। सीधा–साधा, भोळा–भाळा लोगाः न लालच दे ग ठगणो।”

सुदर्शन—“हाँ, उस दिन मैं इतने गुस्से में था। अगर वो लोग मिल जाते, तो या मैं उन लोगों को मार डालता या फिर वो लोग मुझे मार डालते। लेकिन मेरे वापस आने से पहले ही वो सब भाग गए।”

कृतिका—“फिर तुमने क्या किया ?”

सुदर्शन—“मैं क्या करता ? घरवालों को इतना ज्यादा भला–बुरा बोलकर आया था, जिसके कारण घर वापस जाने की और घरवालों को अपना हाल बताने की हिम्मत नहीं थी। वहाँ भिवाड़ी में गन्दा काला कचरा साफ़ करने के कारण मेरे कपड़े पूरी तरह खराब थे और सिर्फ पचास रुपये बचे थे। उन पचास रुपयों से मैंने पहले दिन तो खाना खा लिया। फिर अगले तीन दिन तक भूख से बूरी तरह तड़पा। चौथे दिन एक सब्जीमंडी में खड़ा था। मेरी हालत इतनी ज्यादा खराब थी, कोई मुझे अपने पास खड़ा भी नहीं होने दे रहा था। सब दुत्कार कर दूर भगा रहे थे। चल हट, हूड़, भाग यहाँ से। रात के ग्यारह बजे बाद सब्जीमंडी के सारे सब्जी वाले अपनी सड़ी–गली बची हुई फल–सब्जियाँ नीचे कचरे में फेंककर चले गए। सबके जाने के बाद जब वहाँ कोई नहीं था, तब भूख से तड़पते हुए मैंने रोते–रोते कचरे में से चीकू, आम, केले, संतरे वगैरह उठाए और एक मन्दिर के आगे लगे पानी के नल से धोकर वो सड़े–गले फलों से अपनी भूख मिटाई। अगले तीन दिन में मैंने दो बार उस सब्जीमंडी के कचरे में से फल उठाकर धोकर खाए थे।”

आलोक—“अरे, यार…”

कृतिका—"ओह गॉड, बहुत बुरा हुआ तुम्हारे साथ?”

सुदर्शन—"हाँ, जैसे तुम खुद को कोस–कोस कर गाड़ी में रोती थी, उस वक्त मैं भी उसी तरह रोते हुए खुद को कोसता रहता था। आठवें दिन सुबह–सुबह मैं एक दुकान की सीढ़ियों पर बैठा रोते हुए सोच रहा था, ये घर बैठे बीस–तीस, पचास हजार कमाने वाले ऐड पढ़कर बीस–तीस, पचास हजार की नौकरी के चक्कर में मम्मी–पापा और भाई–भाभी सबको बैईज्जत करके आया और यहाँ आकर क्या हालत हो गई ? उसी वक्त सुजाता मैडम की गाड़ी वहाँ से गुजरी। उनकी नजर मुझ पर पड़ गई। मुझे रोते देखकर उन्होंने गाड़ी रोकी और गाड़ी से उतरकर मेरे पास आकर मेरे रोने कारण पूछा। उनको लगा, कोई भिखारी भूख से तड़पकर रो रहा है। मैंने रोते हुए अपनी आपबीती उनको सुनाई। मेरी पूरी बात सुनने के बाद सुजाता मैडम ने मेरे आँसू पोंछकर कहा, रोना बन्द करो। चलो उठो, गाड़ी में बैठो और मेरे साथ चलो। वो मुझे गाड़ी बिठाकर अपने घर ले आई और सेठ जी के कपड़े देकर नहाने के लिए बोली। नहाने के बाद मैडम ने मुझे खाना खिलाया और नीचे सेठ जी के पास ले जाकर सेठ जी को सारी बात बताई। सेठ ने मुझसे मेरे बारे में पूछा और कहा, नौकरी तो तुम हमारे पास कर लो। मैं दो–चार दिन में कोई किराये का कमरा दिलवा दूँगा। तब तक एक बार दो–चार दिन के लिए हमारे घर रह लो। मैं तो सुजाता मैडम और सेठ जी के पैर पकड़कर रोने लगा। शाम को मैडम और सेठ जी मुझे बाजार से दो जोड़ी कपड़े दिलवा लाए और मेरे घर पर फोन करके मेरे घरवालों को सारी बात बताकर कहा, अब सुदर्शन हमारे पास है। आप बिलकुल भी चिन्ता मत करो। तब से मैं सेठ जी के पास ही जॉब कर रहा हूँ। हौली–दिवाली–रक्षाबन्धन और कोई काम हो, तो बस दो–चार दिन के लिए घर जाता हूँ। बाकी टाइम यहीं काम करता हूँ।”

कृतिका—“हम्म… तुम्हारे सेठ जी और सुजाता मैडम तो सच में बहुत भले लोग हैं।”

आलोक—“हाँ, यार। ऐसे लोग तो आजकल मिलते ही नहीं है।”

नारायण—“बिलकुल सही बात है।”

सुदर्शन—“हाँ, जब सब लोग मुझे दुत्कार कर दूर भगा रहे थे। कोई मुझे अपने आस-पास खड़ा भी नहीं होने दे रहा था। यहाँ तक कि दिन में लोग मुझे पानी तक नहीं पीने देते थे। पानी भी रात को छुपकर पीना पड़ता था। उस वक्त सुजाता मैडम मेरे आँसू पोंछकर मुझे अपने घर ले आई और सेठ जी ने अपने पास नौकरी दे दी। सुजाता मैडम और सेठ जी के बारे में क्या कहूँ ?”

कृतिका—“सही बात है। उनके लिए कुछ भी कहना कम है।”

सुदर्शन—“हाँ, लेकिन वो धोखेबाज लोग आज भी मुझे खटकते हैं, जिनके कारण मेरी वो हालत हुई थी। मैं उन लोगों का तो कुछ नहीं बिगाड़ पाया, लेकिन मुझे हर धोखेबाज में वहीं लोग नजर आते हैं। जब भी किसी धोखे के बारे में सुनता हूँ, तो मेरा खून खोलने लगता है। मुझे यहाँ बुलाकर मेरी वो हालत करने वालों में लड़कियाँ और महिलाएँ भी थी। इसलिए मैनें तुमसे कहा था, अपने को लड़का–लड़की या नारी–पुरुष का कॉम्पीटिशन नहीं करना। अपने को एक धोखेबाज की धोखेबाजी सबको बतानी है।”

कृतिका—“धोखेबाज तो कोई भी हो सकता है। इसमें लड़का–लड़की और नारी–पुरुष क्या करना?”

आलोक—“तो इसलिए तुझे कृतिका से हमदर्दी और उस लड़के से नफ़रत हो गई।”

सुदर्शन—“हाँ, धोखें अलग–अलग है, लेकिन हम दोनों का दर्द एक जैसा ही था। मैं जब भी कृतिका को रोते हुए देखता था, तो मुझे अपनी हालत याद आ जाती थी। मैं पैसे के लालच में खुद मूर्ख बनने यहाँ आया था और कृतिका प्यार के लालच में उसकी बातों में फँस गई।”

नारायण—“सब ऐसे ही फँसते हैं। फर्क सिर्फ इतना है, जिसने खुद दुःख–दर्द देखें हैं, वो दूसरों के दुःख–दर्द समझता है। बाकी लोग बस मजाक उड़ाते हैं, बातें करते हैं।”

सुदर्शन—“मेरा तो ये मानना है, जब तक अपराधी के मन में डर नहीं होगा, तब तक वो अपराध करता रहेगा। इसलिए हर अपराधी को बुरी से बुरी सजा मिलना बहुत जरूरी है। अपराधी दो तरह के होते हैं, एक तो अन्जाने में या मजबुरी में अपराध करने वाले। दूसरे सोच–समझकर जान–बुझकर अपराध करने वाले। ये लड़की छेड़ने वाले, महिलाओं से बदतमीजी करने वाले, प्यार के चक्कर में फँसाने वाले, ऐसे घटिया लोगों की कोई मजबुरी नहीं होती। इन लोगों को अच्छी तरह पता होता है, ये गलत कर रहे हैं। इनको तो किसी भी हालत में नहीं छोड़ना चाहिए। अब इसके बॉयफ्रैंड को सज़ा दिलाने का तो कोई रास्ता नजर आया नहीं। क्योंकि कृतिका ने सब कुछ अपनी मर्ज़ी से किया था। इसलिए मैनें सोचा, सज़ा नहीं तो कम से कम उसकी धोखेबाजी तो सबके सामने आए।”

आलोक—“चलो, ये काम तो हो गया। उस लड़के के बारे में इतना सब जानने के बाद। अब शायद ही कोई लड़की उससे शादी करेंगी।”

नारायण—“नहीं, शादी तो उसकी हो जाएगी। अब नहीं, तो कुछ साल बाद हो जाएगी।”

आलोक—“उसके बारे में सब कुछ जानने के बाद भी कौनसी लड़की उससे शादी करना चाहेंगी?”

नारायण—“दुनिया में लालची, मूर्ख और महान लड़कियाँ बहुत है। वो बहुत पैसे वाला है, इसलिए कोई पैसे की लालची लड़की उससे शादी कर सकती है। कुछ मूर्ख लड़कियों को लड़के के गलत करमों के बारे में सब कुछ मालूम होता है, फिर भी वो मूर्ख लड़कियाँ सोचती हैं, अब आगे भविष्य में लड़का कोई गलत काम नहीं करेगा और कुछ महान लड़कियाँ होती है, जो गलत, बेकार, घटिया और गन्दे लड़कों को प्यार और अपनेपन से सुधारने के नाम पर किसी घटिया लड़के से शादी कर लेती है। इस लड़के को भी देर–सवेर कोई ना कोई ऐसी लालची, मूर्ख या महान लड़की मिल जाएगी।”

सुदर्शन ने क्रोध से कहा—“बस इसीलिए तो दुनिया में गलत लोगों का बोलबाला है। और सबसे ज्यादा गुस्सा तो इन महान लोगों पर आता है। क्योंकि लालची और मूर्ख लड़कियाँ तो एक से बचेगी, तो दूसरे का शिकार बन जाएगी। दूसरे से बचेगी, तो तीसरे या चौथे का शिकार बन जाएगी। लेकिन ये महान लड़कियाँ सब कुछ जानते हुए भी अच्छे लोगों को ठोकर मारकर घटिया लोगों को प्यार और अपनापन देती है।”

कृतिका ने हँसकर कहा—“इनमें से मैं कौनसी कैटेगरी में आती हूँ?”

सुदर्शन ने मुस्कुराकर कहा—“तुम मूर्ख लड़कियों वाली कैटेगरी में आती हो और मैं लालची लोगों वाली कैटेगरी में आता हूँ। क्योंकि मैं भी पौने पाँच साल पहले पैसे के लालच में धोखा खाने के लिए खुद चलकर गलत लोगों के पास आया था।”

आलोक—“कोई बात नहीं, भाई। अब भूल जाओ, सारी पुरानी बात।”

सुदर्शन—“हाँ, अब तो भूल ही गए हैं।”

नारायण—“अब भूलने में भी फायदा है।”

सुदर्शन ने कृतिका से कहा—“हाँ, तुम भी सब कुछ भूल जाओ और इसके बारे में और जितनी बातें रह गई है। वो सब पोस्ट कर दो। फिर अपने फ्यूचर(भविष्य) के बारे में सोचो।”

कृतिका—“अब कैसा फ्यूचर ? मेरे मॉम–डेड के बारे में तो तुम्हें बताया ही है। घर में मॉम–डेड, बाहर ये दिव्यांश जैसे लोग। अच्छा, अब मैं चलती हूँ। जब से मैनें फेसबुक पर पोस्ट करने शुरू किये हैं, मॉम–डेड दोनों बहुत नाराज है।”

सुदर्शन—“तुम चिन्ता मत करो। मैं सेठ जी और मैडम से इस बारे में बात करूँगा। वो तुम्हारे मम्मी–पापा को जानते भी हैं, वो जरूर तुम्हारी मदद करेंगे।”

कृतिका कुर्सी से खड़ी होकर बोली—“चलो, बाद में सोचेंगे इस बारे। अभी मैं चलती हूँ।”

सुदर्शन—“हाँ, ठीक है।”

कृतिका—“ बाए नारायण, बाए आलोक।”

कृतिका गाड़ी की ओर जाने लगती है।

नारायण—“ध्यान से जाना, गाड़ी धीरे चलाकर।”

कृतिका ने गाड़ी का दरवाजा खोलकर कहा—“अरे, क्यों इतनी चिन्ता करते हो ? अब तो मैनें ड्रिंक करके गाड़ी चलाना भी छोड़ दिया।”

नारायण—“ये तो बहुत अच्छी बात है। धीरे-धीरे शराब बिलकुल बन्द कर दो।”

कृतिका गाड़ी में बैठकर गाड़ी का दरवाजा बन्द करके गाड़ी स्टार्ट करते हुए बोली—“जल्दी ही आपको ये न्यूज भी सुना दूँगी।”

नारायण—“हम इंतजार करेंगे।”

कृतिका—“अच्छा, अब चलती हूँ। कल मिलते हैं।”

कृतिका गाड़ी लेकर चली जाती है।

अगले दिन तैईस जून, शुक्रवार की सुबह के सात बजे घर के हॉल में सोफे पर आयु में उनसठ (59) वर्ष के सेठ साँवरमल बागड़ी और आयु में सत्तावन(57) वर्ष की राजलक्ष्मी दोनों चिन्ताग्रस्त होकर बैठे आपस में बातें कर रहे हैं।

सेठ साँवरमल बागड़ी—“अब पाणी सिर उ ऊपर चल ग्यो। छोरी है–छोरी है, बोल ग घणो ही सहन कृयो, पर आ छोरी तो नई माने।”

राजलक्ष्मी—“सई क्यो हो थे। बेरो नी कुणसा इसा करम कृआ हा, झक्को आ टिंगरी (लड़की) पल्लः पड़ी। चयार लोगा म बैठण जोगी कोनी छोडी।”

सेठ साँवरमल बागड़ी—“हाँ, की समझ म कोनी आवे, कढ़े गलती होई ? जित्ती इने सीधा रस्ता पर घालणा गी कोशिश करी, आ तो बित्ता ही ज्यादा उल्टा रस्ता पकड़या।”

राजलक्ष्मी—“म तो क्योउ हूँ, अब ईंगो घर उ बारे आणो–जाणो पूरी तरिया बन्द कर द्यो। नई तो फेर आपा न मरनो पड़ःगो।” (हिन्दी अनुवाद : मैं तो कहती हूँ, अब इसका घर से बाहर आना–जाना पूरी तरह बन्द कर दो। वरना फिर हमें मरना पड़ेगा।)

ऊपर कमरे का दरवाजा खोलकर कृतिका बाहर आकर सीढ़िया उतरकर बाहर की ओर जाने लगती है।

सेठ साँवरमल बागड़ी ने अत्यधिक क्रोध से घूरते हुए खड़े होकर गरजते हुए कहा—“ऐ छोरी, इन्ने आ।”

कृतिका के पैर जहाँ है, वहीं जम जाते हैं।

राजलक्ष्मी खड़ी होती है।

कृतिका मुड़कर अपने माता–पिता के सामने आकर खड़ी हुई।

सेठ साँवरमल बागड़ी ने ऊँगली दिखाते हुए अत्यंत कठोरता से कहा—“अब तू सीदो–सीदो ओ बता, तू के चावः है ? म्हाने मारनो है, तो बिय्या ही मार–मूर दें।”

कृतिका ने आँखें मिलाकर कहा—“अब म के कृओ है?”

सेठ साँवरमल बागड़ी ने कृतिका के गाल पर जोरदार चांटा मारते हुए कहा—“बताउ, तने के कृओ है ? अबी भी बूझे है। जाऊँ बढ़े, लोग हांस–हांस ग देखें। के ओ है, बी कुलछणी गो बाप हर ओजू मने ही बूझे, म के कृओ है ?” (हिन्दी अनुवाद- बताऊँ, तुझे क्या किया है ? अभी भी पूछ रही है। जहाँ जाता हूँ, लोग हँस–हँसकर देखते हैं। कि ये है, उस कुलक्षणी का बाप और अभी मुझसे ही पूछ रही है, मैंने क्या किया है ?)

कृतिका लड़खड़ाकर संभलती हुई गंभीरता से कड़क आवाज़ में बोली—“ईया थाप मारना उ म कोनी मरूँ। इती ही खारी लागू, तो गळो घोंट द्यो मेरो।”

सेठ साँवरमल बागड़ी—“म सोचू, अब जुआन छोरी पर हाथ उठाणो ठीक कोनी। पर तू ईया कोनी माने।”

सेठ साँवरमल बागड़ी कृतिका का बाजू पकड़कर कृतिका को लेकर सीढ़िया चढ़कर कृतिका के कमरे की ओर चल पड़ते हैं। राजलक्ष्मी भी उनके पीछे–पीछे चल आती है। सेठ साँवरमल बागड़ी ने चलते–चलते दीवार के पास पड़ा एक डंडा उठा लिया। कमरे में आकर सेठ साँवरमल बागड़ी कृतिका को धक्का देकर डंडे से बुरी तरह पीटने लगते हैं। कृतिका पत्थर की मूरत बनी चुपचाप आंख बन्द करके डंडे की चोट सहती हुई मार खाती है।

राजलक्ष्मी ने सेठ साँवरमल बागड़ी को पकड़कर कृतिका से दूर करते हुए कहा—“के कृरो हो ? जमा यी पागल होग्या के ?”

सेठ साँवरमल बागड़ी ने डंडा फेंक कर क्रोध से चिल्लाते हुए कहा—“पागल नई होवा तो और के कृरा ? दिखः कोनी, किया सामू जवाब देव्वः ? इत्तो की कर दियो, फेर ही मुंडा पर शर्म नाम गी चीज़ ही कोनी। ऊपर उ आपगा कारनामा सोशल साईटा पर बतावे और है।”

राजलक्ष्मी—“थे चालो, बारे चालो। आज उ ईगो ई कमरा उ बारे आणो बन्द। पड़ी रेण द्यो अठेई।”

राजलक्ष्मी जैसे-तैसे सेठ साँवरमल बागड़ी को समझा–बुझाकर कमरे से बाहर भेजकर कृतिका से मोबाइल छीनकर बोली—“तेरो डोळ देखःर, तेरः खातर कोई छोरो बी कोनी मिलः। नई तो सासरे घाल अर गेल छुटा लेता।” (हिन्दी अनुवाद- तेरी हरकतों के कारण तेरे लिए कोई लड़का भी नहीं मिलता। वरना ससुराल भेजकर पीछा छुड़ा लेते।)

राजलक्ष्मी बाहर जाकर कमरे का दरवाजा बाहर से बन्द करके कृतिका को अन्दर बन्द कर देती है। कृतिका चुपचाप गंभीर मुद्रा में हाथ की कोहनी पर डंडे की चोट सहलाते हुए पत्थर की मूरत बनकर खड़ी है। कुछ देर बाद कृतिका पीछे हटते हुए दीवार से पीठ लगाकर धीरे-धीरे नीचे बैठकर अपने घुटनों पर सर रख लेती है।

सुबह के नौ बजे आम्रपाली सर्किल पर खड़ा सुदर्शन मोबाइल में टाइम देखकर बोला—“नौ बज गए, आज कृतिका क्यों नहीं आई ? कॉल करके देखता हूँ।”

सुदर्शन कृतिका का नम्बर लगाकर मोबाइल कान से लगाता है। कृतिका का मोबाइल स्वीच–ऑफ है।

सुदर्शन ने मोबाइल जेब में रखते हुए मन में बोला कि ये आज कहाँ रह गई ?

साढ़े नौ बजे तक इंतजार करने के बाद सुदर्शन ने मन में कहा कि साढ़े नौ बज गए। अब ऑफ़िस चलते हैं। शाम को आकर देखेंगे।

सुदर्शन पैदल ही कृतिका के बारे में सोचते हुए धीरे–धीरे चलने लगता है।

सवा घंटे बाद पौने ग्यारह बजे सुदर्शन घर का मुख्य दरवाजा खोलकर अन्दर आकर जूते निकालता है और घर का दरवाजा खोलकर सीढ़िया उतरते हुए नीचे बेसमेंट में आकर अपने टेबल की कुर्सी पर बैठ जाता है। स्टाफ के सभी लोग आज सुदर्शन से पहले आकर अपने–अपने टेबल की कुर्सी पर बैठे हैं।

जयसिंह केबिन के शीशे से सुदर्शन को देखकर अपनी चेयर से उठकर दरवाजा खोलकर बोले—“सुदर्शन।”

सुदर्शन ने जयसिंह की ओर देखकर कहा—“हाँ, सेठ जी।”

जयसिंह अन्दर आने के संकेत देकर वापस आकर अपनी चेयर पर बैठ गए। सुदर्शन खड़ा होकर केबिन में आकर जयसिंह के सामने खड़ा हुआ।

जयसिंह—“क्या बात है ? आज लेट कैसे हो गये ? तुम तो हमेशा टाइम से पहले आते हो।”

सुदर्शन—“आज कृतिका नहीं आई, इसलिए पैदल आया हूँ। उसके साथ गाड़ी में आने की आदत पड़ गई। इसलिए पहले पैंतालिस-पचास मिनट में पहुँचता था। आज टाइम ज्यादा लग गया।”

जयसिंह ने मुस्कुराकर कहा—“कोई बात नहीं, तुम आज पहली बार लेट हुए, इसलिए पूछा। वो ब्रेसलेट के लॉक चैक करने है। वो ले जाओ।”

सुदर्शन कालीन जड़े फर्श पर नीचे रखे ब्रेसलेट उठाकर केबिन से बाहर आकर अपने टेबल पर बैठकर ब्रेसलेट के लॉक चैक करने लगता है। आज सुदर्शन उदास मन से काम कर रहा है। सारा दिन आस–पास बैठे स्टाफ के अन्य लोगों से भी बात नहीं करता है।

शाम के साढ़े छः बजे केबिन में अपनी–अपनी चेयर पर बैठे जयसिंह और सुजाता अपना–अपना काम कर रहे हैं। सुदर्शन के अलावा स्टाफ के सभी लोग जा चुके हैं।

सुदर्शन ने खड़े होकर अपने टेबल से सामान उठाकर केबिन में लाकर रखा और मुड़कर कहा—“सेठ जी, आज मैं जल्दी चला जाऊँ ?”

जयसिंह ने सुदर्शन की ओर देखकर कहा—“कृतिका नहीं आई, इसलिए परेशान हो क्या ? अरे यार, कोई तबीयत वगैरह खराब हो गई होगी। कॉल करके पूछ लेता।”

सुदर्शन—“उसका मोबाइल ही बन्द बता रहा है। सुबह से कई बार कर लिया।”

सुजाता—“ओह…घर में कोई काम हो गया होगा और मोबाइल में प्रोब्लम हो गई होगी। तुम परेशान मत हो। कल आए जब पूछ लेना, आज क्यों नहीं आई ?”

सुदर्शन—“वो तो ठीक है, मैडम। लेकिन आज मन भी नहीं लग रहा काम में।”

जयसिंह—“चलो, कोई बात नहीं। आज जल्दी चले जाओ।”

सुदर्शन—“थैक्यू, सेठ जी।”

जयसिंह—“कल सुबह आ जाना, टाइम पर।”

सुदर्शन—“ठीक है, सेठ जी।”

सुजाता ने निराश मुद्रा में मुड़ते हुए सुदर्शन से कहा—“खाना खा लेना, टाइम से। आज दिन में भी तुमने सिर्फ दो ही रोटी खाई थी।”

सुदर्शन—“हाँ, मैडम ! खा लूँगा।”

सुजाता—“ठीक है, जाओ।”

सुदर्शन केबिन से बाहर आकर सीढिया चढ़ते हुए ऊपर आया और घर से बाहर आकर अपने जूते पहनकर कृतिका से मिलने की जगह आता है।

शाम के आठ बजे सुदर्शन चिन्तित होकर ठहलते हुए कृतिका का इंतजार करते–करते मन में सोचने लगा कि डेढ़ घंटे से उसका इंतजार कर रहा हूँ। कृतिका हर रोज शाम को कभी छः बजे, कभी सात बजे, कभी आठ बजे यहाँ आकर गाड़ी लगाती है। वो हर रोज इतनी देर कैसे इंतजार कर लेती है ? मैं तो समझता था, उसका क्या है ? गाड़ी में चाहें जितनी मरजी देर तक बैठे रहो। लेकिन आज पता चल रहा है, इंतजार करना कितना मुश्किल है ? और हैरानी की बात ये है, उसने तो कभी शिकायत भी नहीं की।

रात के नौ बजे कृतिका के कमरे का दरवाजा खुला और राजलक्ष्मी थाली में खाना लेकर कमरे में आई। कृतिका घूटनों पर सर रखें बैड पर उदास बैठी थी।

राजलक्ष्मी ने बैड पर थाली रखकर कहा—“ल, रोट गिट ल।”

कृतिका ने क्रोध से मुँह फेरकर कहा—“पाछो ले जा। मन कोनी खाणो।”

राजलक्ष्मी ने रीस में आकर कहा—“तू क्यू कृह है ईय्या ? इसो म्हे के बिगाड़ दियो तेरो? क्यागो बदलो काडन लाग री है म्हारा उ…?”

कृतिका ने राजलक्ष्मी की ओर देखकर कहा—“म कोई बदलो ल्योउ नी। थे मन कमरा म बन्द कर दियो। म कि केयो के ? अब मन ऐकली छोड़ द्यो।”

राजलक्ष्मी ने कृतिका के गाल पर चांटा मारकर कहा—“चुल्ला म पड़। गिटणी है तो गिट ल, नई तो मर जा कढई जार। पतो नी कद गेल छोडःगी ?”

राजलक्ष्मी खाने की थाली छोड़कर कमरे से बाहर जाकर कमरे का दरवाजा वापस बाहर से बन्द कर देती है।

कृतिका ने खाने की थाली की ओर देखकर मुस्कुराते हुए मन में कहा कि मैं तो खुद ही जीना नहीं चाहती। बस खुदखुशी करने की हिम्मत नहीं हुई। वरना बहुत पहले पीछा छोड़ देती।

रात के दस बजे सुदर्शन ने परेशान होते हुए मन में खुद से कहा कि लगता है, आज नहीं आएगी। चल चलते हैं। कल सुबह मिलते ही गुस्से से बरस पड़ेंगे। कम से कम बता तो देती, क्यों नहीं आई ?

सुदर्शन अपने रास्ते पर चलने लगता है और साढ़े ग्यारह बजे नारायण की दुकान के पास पहुंचता है। नारायण की दुकान भी बन्द हो चुकी है।

सुदर्शन ने मन में कहा कि आज ये भी दुकान मंगल कर गया। चल कोई बात नहीं। कल देखेंगे सबको।

सुदर्शन अपनी बिल्डिंग की ओर चल पड़ता है।

रात के दो बजे सुदर्शन बैड पर पीठ के बल सीधा लेटा हुआ है। आज कृतिका के बारे में सोच–सोचकर सुदर्शन को भूख का तो एहसास भी नहीं हुआ। सुदर्शन थोड़ी–थोड़ी देर बाद करवट बदलते हुए सोने की कोशिश करता है, लेकिन कृतिका की यादें उसे सोने नहीं दे रही है।

रात के तीन बजे कृतिका बैड पर पत्थर की मूरत बनी बैठी है। खाने की थाली अभी तक ज्यों की त्यों पड़ी है।

कृतिका के दिमाग में विचार चल रहे हैं कि ना तो मैं अपने मम्मी-पापा से खुश हूँ, ना मम्मी–पापा मुझसे खुश है। समझ में नहीं आता, मैं क्या करूँ ? लेकिन कुछ भी हो, अब मम्मी–पापा और मेरे बीच इतनी दूरियाँ आ गई है, जो कभी ख़त्म नहीं हो सकती। मम्मी ठीक कह रही थी, अब मुझे यहाँ से चले जाना चाहिए।

कृतिका बैड से उतरकर इधर–उधर कुछ ढूंढने लगती है। अलमारी के ऊपर उसे एक हथोड़ा मिलता है। कृतिका ने हथोड़ा उठाया और अपनी सैंडल पहनकर खिड़की की ओर आकर हथोड़े से खिड़की की जाली तोड़ने लगती है।

हथोड़े की आवाज सुनकर सेठ साँवरमल बागड़ी और राजलक्ष्मी जाग गए। दोनों उठकर अपने कमरे से बाहर आकर कृतिका के कमरे की ओर दौड़ते हैं।

कृतिका ने खिड़की की जाली पूरी तरह तोड़कर हथोड़ा फेंका और खिड़की से बाहर कूद गई। सेठ साँवरमल बागड़ी और राजलक्ष्मी कमरे का दरवाजा खोलकर अन्दर आते हैं। कृतिका दो मंजिल से नीचे आकर गिरती है। सेठ साँवरमल बागड़ी और राजलक्ष्मी खिड़की से नीचे देखते हैं। कृतिका को हाथ–पैर और सर में चोट लग जाती है, लेकिन फिर भी अपनी चोटों की परवाह ना करके कृतिका खड़ी होकर भाग जाती है।

राजलक्ष्मी चीखती हुई बोली—“कीर्ति, ऐ छोरी किन्ने जावः तू?"

राजलक्ष्मी वहीं बैठकर बुरी तरह रोने लगती है। सेठ साँवरमल बागड़ी राजलक्ष्मी को संभालकर बैड पर बिठाकर कमरे से बाहर आकर घर के नौकरों और चौकीदारों को आवाज़ देते हुए सीढ़िया उतरकर नीचे आए और घर के दो नौकरों और दो चौकीदारों के साथ घर से बाहर आकर कृतिका को ढूंढने लगते हैं।

कृतिका भागते–भागते अपने घर से चौथी गली में एक घर के सामने आकर रुककर हाँफने लगती है। कृतिका ने इधर–उधर देखकर अपनी सैंडल निकालकर हाथों में ली और धीरे से आवाज़ किये बिना घर की दीवार कूद कर घर के अन्दर दीवार के पास छूपकर बैठ जाती है।

सेठ साँवरमल बागड़ी आस–पास किसी को कृतिका के घर से भागने के बारे मालूम ना चल जाए, इस डर के कारण किसी से कुछ पूछताछ किये बिना नौकरों और चौकीदारों के साथ कृतिका को ढूंढते हैं, लेकिन कृतिका के नहीं मिलने पर निराश होकर सुबह के साढ़े चार बजे घर वापस आ जाते हैं।

सुबह के पाँच बजे कृतिका घर की दीवार के पास बैठी–बैठी सोचती है कि यार…मोबाइल मम्मी ने लिया और क्रेडिट कार्ड, पैसे वगैरह सब गाड़ी में पड़े हैं। पैसे के नाम पर एक रुपया नहीं है। अब कहाँ जाऊँगी और कैसे जाऊँगी? और तो और तुझे पैसे देने वाला भी कोई नहीं है। घर वापस गई तो दूबारा घर से निकलने का मौका कभी नहीं मिलेगा… चल, अब सुबह होने वाली है। यहाँ से निकल पहले।

कृतिका खड़ी होकर दीवार कूदकर घर से बाहर आ गई और अपनी सैंडल पहनकर पैदल ही चल पड़ती है।

सुबह के सात बजे बिस्तर पर लेटा सुदर्शन आज सारी रात सोया नहीं है। सुदर्शन बिस्तर से उठकर नहाकर तैयार होकर बिल्डिंग लॉक करके आम्रपाली सर्किल पर आकर कृतिका के इंतजार में टहलने लगता है।

सुबह के दस बजे सुदर्शन अपनी जेब से मोबाइल निकालकर जयसिंह को कॉल करता है।

केबिन में बैठे जयसिंह कॉल रिसींव करके मोबाइल कान पर लगाकर बोले—“हाँ, सुदर्शन।”

सुदर्शन—“सेठ जी, मैं आज बारह बजे बाद आऊँगा।”

जयसिंह—“क्यों? क्या हुआ?”

सुदर्शन—“आज फिर कृतिका नहीं आई और उसका मोबाइल अभी तक बन्द है। मैं उसके घर जा रहा हूँ।”

जयसिंह—“अरे, ऐसे अचानक घर जाएगा ? कृतिका के घरवाले क्या सोचेंगे ? कृतिका तुझे जानती है, उसके माँ–बाप थोड़े ही जानते हैं।”

सुदर्शन—“तो क्या हुआ, सेठ जी ? मैं कौनसा उसे घर से भगाने के लिए जा रहा हूँ? मैं तो बस उसका हाल–चाल पूछने जा रहा हूँ।”

जयसिंह—“अरे लेकिन…”

सुदर्शन ने बीच में बोलकर कहा—“नहीं, सेठ जी। एक बार उससे मिलकर तो जरूर आऊँगा। मेरा मन नहीं मान रहा।”

जयसिंह—“अच्छा, ठीक है जाओ। और सुन, कोई प्रोब्लम हो तो मुझे कॉल कर देना।”

सुदर्शन—“ठीक है, सेठ जी।”

जयसिंह—“ठीक है।”

जयसिंह ने कॉल काटकर कहा—“गधा।"

सामने बैठी सुजाता ने कहा—“क्या हुआ?"

जयसिंह—“ये सुदर्शन कृतिका के घर जा रहा है। मैं समझाने लगा, तो कहता है, एक बार उससे मिलकर तो जरूर आऊँगा। मेरा मन नहीं मान रहा।”

सुजाता ने मुस्कुराकर कहा—“इस वक्त वो किसी की नहीं सुनेगा। भूल गए, तुम भी तो इसी तरह हमारे घर आए थे।"

जयसिंह—“अरे, लेकिन?"

सुजाता—“तुम उसकी बात का बुरा मत मानो। मैं उसे समझा दूँगी।"

जयसिंह—“मुझे उसकी बात का बुरा नहीं लगा। उसे वहाँ प्रोब्लम हो सकती है।"

सुजाता—“डॉन्ट वैरि, कुछ नहीं होगा। अगर ज़रूरत पड़ी, तो हम वहाँ चले जाएंगे।"

जयसिंह—“ठीक है।"

जयसिंह और सुजाता अपने-अपने काम में लग जाते हैं।

मानसरोवर के बस स्टॉप पर बस आकर रुकती है। सुदर्शन बस से उतरकर कृतिका के घर की ओर जाने लगता है।

सुदर्शन ने चलते-चलते सोचा कि सेठ जी ठीक कह रहे थे। कृतिका के माँ–बाप मुझे नहीं जानते। कृतिका के मम्मी-पापा पहले ही कृतिका से नाराज़ है। मेरे कृतिका के घर जाने के कारण कृतिका को प्रोब्लम भी हो सकती है। घर जाने से पहले उस दुकानवाले से कृतिका के बारे में पूछकर देखते हैं।

सुदर्शन ने कृतिका के घर के पास वाली दुकान पर आकर पाँच सेन्टर फ्रैश च्यूंगम खरीदकर चार जेब में डाली और एक च्यूंगम का रेपर उतारकर मुँह में रखकर दुकानदार से पूछा—“अंकल, आपने साँवरमल जी की लड़की को आते–जाते देखा है?”

दुकानदार—“नहीं, कल से नहीं देखा। वरना तो रोज सुबह सात बजे के आस–पास गाड़ी लेकर यहीं से निकलती है। मुझे तो लगता है, वो घर छोड़कर चली गई या फिर साँवरमल जी ने उसे घर से निकाल दिया।”

सुदर्शन—“क्यों, आपको ऐसा क्यों लगता है ? हो सकता है, उसकी तबीयत खराब हो। आजकल शराब पीना बहुत कम कर दिया ना उसने।”

दुकानदार—“अब क्या कम करेंगी ? सब कुछ तो कर लिया उसने। कल–परसो टीवी पर भी उसके किस्से बता रहे थे। आजकल बिगड़ैल लड़कियाँ तो बहुत हैं, लेकिन इसके जैसी बेशर्म, घटिया, बेकार और गन्दी लड़की नहीं देखी। खुद ही फेसबुक पर पोस्ट करके अपने और उस लड़के के बारे में सब कुछ बता रही है।”

सुदर्शन को दुकानदार की बात सुनकर बहुत गुस्सा आता है, लेकिन सुदर्शन ने अपने गुस्से को दबाकर कर कहा—“अंकल जी, एक बात बताओ। मैं ढ़ाई–तीन महीने पहले जब आपकी दुकान पर आया था। तब आपने बताया, कि कुछ लोग दो–चार महीने तक नगद में सामान खरीदते हैं। फिर दस–बीस रुपये की उधार से उधार का सिलसिला शुरू करते हैं और धीरे-धीरे सौ–पचास से होते हुए हजार–पाँच सौ रुपये तक पहुँच जाते हैं। फिर आखिर में एक–डेढ़ साल बाद या दो साल बाद पाँच हजार या दस हजार का चूना लगाकर चले जाते हैं। कुछ लोग तो बीस हजार–तीस हजार तक खाकर मुकर जाते हैं। फिर आप उनसे अपने उधार दिये हुए सामान के पैसे माँगते हो, तो गालियाँ देते हैं, लड़ाई–झगड़े करने पर उतर जाते हैं।”

दुकानकार—“हाँ, आपको बताया तो था, कई लोग मेरे एक–डेढ़ लाख रुपये खा गए इस तरीके से।”

सुदर्शन—“अब अगर मैं कहूँ, आप घटिया हो, आपने उन लोगों को उधार सामान क्यों दिया ? आपके रुपये तो खाने ही चाहिए। आप उधार देते हो, इसलिए सारी गलती आपकी ही हैं। वो आपके पैसे खाने वाले तो सीधे–साधे, शरीफ लोग है। उनको बदनाम मत करो। तो मेरी ये बात सुनकर आपको कैसा लगेगा ?”

दुकानदार ने सुदर्शन की ओर देखकर कहा—“ये तो आप भी अच्छी तरह जानते हो, कैसा लगेगा?”

सुदर्शन—“बिलकुल मैं जानता भी हूँ और समझता भी हूँ। उन धोखेबाजों ने पहले अच्छा व्यवहार करके आपका विश्वास जीत लिया और विश्वास जीतकर आपके पैसे लूट लिए। अब मैं उन धोखा देने वालों को घटिया कहने की जगह आपको बुरा बताऊँ, तो यकिनन आपको बुरा लगेगा। आप कहेंगे, एक तो मेरे साथ धोखा हुआ, उस पर मुझे ही घटिया बोला जा रहा है।”

दुकानदार—“हाँ, अब कोई जानबुझकर तो धोखा खाता नहीं है।”

सुदर्शन—“तो क्या इस लड़की ने जानबुझकर धोखा खाया है ? यहीं सब इस कृतिका के साथ हुआ। पहले उस दिव्यांश नाम के लड़के ने प्यार और अपनापन दिखाकर कृतिका का विश्वास जीता। फिर प्यार और शादी के वादे किये। फिर जिस तरह आप अपनी मर्ज़ी से उधार सामान दे रहे थे, बिलकुल उसी तरह कृतिका ने भी अपनी मर्ज़ी से उस लड़के के साथ वो रिश्ते बना लिए, जो शादी के बाद बनाने चाहिए। और मतलब पूरा होने के बाद उस लड़के ने बिलकुल उसी तरह लड़की को अपनी जिन्दगी से निकालकर फेंक दिया, जैसे आपकी उधार देने की लिमिट ख़त्म होने के बाद धोखेबाज ग्राहकों ने आपकी दुकान छोड़ दी। कृतिका जब उस लड़के से शादी की बात करती, तो वो लड़का उसी तरह कृतिका को गालियाँ निकालकर कृतिका के साथ मारपीट करने लगा, जैसे आपके पैसे खाने वाले पैसे माँगने पर आपको गालियाँ निकालकर आपसे लड़ाई–झगड़ा करने पर उतारू हो जातेहैंं।”

दुकानदार सोच में पड़ जाता है।

सुदर्शन—“क्या हुआ ? आपने धोखेबाजों को अपनी दुकान से सामान अपनी मर्ज़ी से खुशी–खुशी दिया और कृतिका ने एक धोखेबाज के सामने खुद को पेश कर दिया। पैसे तो दुबारा कमाए जा सकते है, फिर भी आप उन धोखेबाज ग्राहकों को कई सालों बाद भी कोस रहे हो और उनकी धोखेबाजी के बारे में सबको बताते भी रहते हो। लेकिन इज्ज़त दूबारा वापस नहीं मिलती, फिर भी कृतिका का उस धोखेबाज की धोखेबाजी के बारे में सबको बताना गन्दी बात है। कई तरह के धोखें अलग–अलग तरीके से बहुत सारे लोगों के साथ होते रहते हैं। अब कोई धोखेबाज अपने गलत इरादों में कामयाब हो जाए, तो क्या करें ? धोखेबाज को सज़ा देने की जगह धोखा खाने वाले को बेशर्म, घटिया, बेकार और गन्दा बताएं?”

दुकानदार—“हम्म…ये तो गलत है।”

सुदर्शन—“चलिए, कोई बात नहीं। उम्मीद है, आप आगे से घटिया लोगों को ही घटिया कहेंगे। घटिया लोगों के शिकार हो चुके लोगों को घटिया नहीं कहेंगे।”

दुकानदार—“हाँ, भाई। अब बात समझ में आ गई।”

सुदर्शन—“वैसे कृतिका सच में घर छोड़कर चली गई ?”

दुकानदार—“हाँ, कल से देखा तो नहीं। अगर घर में होती, तो बाहर जरूर आती।”

सुदर्शन—“लेकिन अगर वो घर छोड़कर जाती, तो उसके माँ–बाप उसे ढूंढने की कोशिश तो करते?”

दुकानदार—“अब पूरी बात तो पता नहीं। साँवरमल जी और उनकी पत्नी कृतिका के बारे में घर से बाहर कोई बात नहीं करते। लेकिन घर में होते हुए, वो घर में टिकने वाली लड़की नहीं है।”

सुदर्शन ने मन में सोचा कि कृतिका अचानक घर छोड़कर क्यों जाएगी ? और अगर साँवरमल जी ने उसे घर से निकाला होता, तो वो मेरे पास आ जाती। अब वो घर पर है ही नहीं, तो उसके घर जाकर क्या करूँगा ?

सुदर्शन दुकान से चलकर बस स्टॉप पर आया और जेब से मोबाइल निकालकर आलोक को कॉल लगाता है।

आलोक ने कॉल रिसींव करके कहा—“हाँ, भाई।”

सुदर्शन—“यार, कल से कृतिका घर पर नहीं है। कुछ समझ नहीं आ रहा, ऐसे अचानक कहाँ जा सकती हैं ?”

आलोक—“तू टेन्शन मत ले, तू कहाँ है ? मैं अभी आता हूँ, फिर देखते हैं।”

सुदर्शन—“मैं कृतिका के घर के पास वाले बस स्टॉप पर बैठा हूँ।”

आलोक—“तू वहीं रुक। मैं आधे घंटे में पहुँचता हूँ।”

सुदर्शन कॉल काटकर बस स्टॉप पर टहलते हुए आलोक का इंतजार करने लगता है।

पौने घंटे बाद सुदर्शन के सामने आलोक का ऑटो आकर रुकता है। सुदर्शन ऑटो में पीछे बैठ जाता है।

आलोक ने ऑटो साइड में खड़ा करके पीछे मुड़कर कहा—“अब बता, क्या बात है?”

सुदर्शन—“मैनें कृतिका के घर के पास वाली दुकान पर पूछा था। उसने बताया, कल से कृतिका घर से निकली ही नहीं। मतलब परसो रात वो अपने पास से घर के लिए चली थी, उसके बाद से उसका कुछ पता नहीं है।”

आलोक—“कल और परसो टीवी पर कृतिका की न्यूज़ भी चल रही थी। कहीं उस लड़के ने तो कोई गड़बड़ नहीं की ?”

सुदर्शन—“हो भी सकता है।”

आलोक—“रुक फिर, इसकी तो आज अच्छी तरह खबर लेते हैं।”

आलोक गोविन्द बिशनोई को कॉल लगाकर मोबाइल कान से लगाता है।

गोविन्द बिशनोई ने कॉल रिसींव करके कहा—“हाँ, बेटा।”

आलोक—“काका, कल से वो लड़की कृतिका घर से गायब है। हमें लगता है, टीवी में न्यूज़ आने के बाद उस लड़के ने ही कोई पंगा किया है। परसो रात तो वो सही–सलामत हमारे पास से घर के लिए निकली थी।”

गोविन्द बिशनोई—“तू चिन्ता मत कर। मैं अभी उस लड़के के घर जाता हूँ। अगर उस लड़के ने कुछ किया है, तो तोते की तरह उगल देगा।”

आलोक—“ठीक है, काकाजी । मैं भी पहुँचता हूँ।”

आलोक कॉल काटकर ऑटो दिव्यांश के घर की ओर लेकर चल पड़ता है।

सुदर्शन—“क्या हुआ?”

आलोक—“उस लड़के के घर चल रहे है। गोविन्द काका भी वहीं आ रहा है। अगर उसने कुछ किया है, तो सब उगलवा लेंगे।”

आलोक ऑटो दिव्यांश के घर के पास लाकर रोककर बन्द करता है। सुदर्शन और आलोक ऑटो से उतरकर दिव्यांश के घर की ओर आने लगते हैं।

दिव्यांश के घर के आगे खड़ी गाड़ी के अन्दर ड्राईवर के पास वाली सीट पर बैठे गोविन्द बिशनोई पहले से ही आए हुए है। गाड़ी के सामने गोविन्द बिशनोई के पाँच आदमी दिव्यांश को बुरी तरह पीट रहे है। दिव्यांश के घर के आगे वाले कमरे में बन्द दिव्यांश की माँ, छोटी बहन और बड़ा भाई कमरे की खिड़की में से रो–रोकर दिव्यांश को छोड़ने के लिए कह रहे हैं।

आलोक और सुदर्शन चलते हुए गोविन्द बिशनोई के पास आते हैं।

आलोक ने गोविन्द बिशनोई के पैर छूकर कहा—“राम–राम, काकाजी । कुछ बताया इसने, कृतिका के बारे में ?”

गोविन्द बिशनोई ने मुस्कुराकर कहा—“अभी तक पूछा ही नहीं मैंने। पहले अच्छी तरह खातिरदारी तो कर दें। फिर आराम से पूछेंगे।”

गोविन्द बिशनोई के आदमी दिव्यांश को पीट–पीटकर अधमरा करने के बाद छोड़कर दूर होते हैं। गोविन्द बिशनोई गाड़ी से उतरकर जमींन पर पड़े दिव्यांश के पास आने लगते हैं। सुदर्शन और आलोक भी गोविन्द बिशनोई के पीछे–पीछे आते हैं।

गोविन्द बिशनोई दिव्यांश के पास नीचे बैठकर बोले—“सुना है, बहुत कॉन्टेक्ट है तेरे। बड़े–बड़े पॉवरफूल लोगों में उठना–बैठना है, जिनके दम पर एक बार जो लड़की या जो औरत तुझे पसन्द आ गई, उसे किसी भी तरह से हासिल करके छोड़ता है। न्यूज में तेरी सिर्फ पाँच गर्लफ्रैंड के बारे में बताया है। लेकिन असल में तू अब तक छब्बीस(26) लड़कियों और औरतों को अपनी शिकार बना चुका हैं। उनमें से आठ लड़कियाँ और औरतें तो बेकार है। उनके तेरे अलावा भी कई लोगों से चक्कर है। लेकिन बाकी अठारह में से पाँच को तूने प्यार के नाम पर बेवकूफ बनाया, जिनके बारे में अब सबको पता है। चार शादीशुदा औरतों को तूने ब्लैकमेल करके अपना शिकार बनाया। नौ लड़कियों को डरा–धमकाकर और जोर–जबरदस्ती से तूने अपना शिकार बनाया। इन अठारह बेकसूर और मासूम लड़कियों और औरतों को शिकार बनाने के कारण ही मैंने तेरी ये हालत की है।”

दिव्यांश ने गोविन्द बिशनोई के पैर पकड़कर लड़खड़ाती आवाज़ में कहा—“मुझे माफ़ कर दो।”

गोविन्द बिशनोई ने दिव्यांश को थप्पड़ मारकर कहा—“माफ़, महान लोग करते हैं, जिनको नीच लोगों से प्यार होता है। मैं तो नीच लोगों को ऐसी दर्दनाक सज़ा देता हूँ जिससे दूबारा कोई नीच काम करने के बारे में सोचते ही उनकी रूह काँप जाए। महीनेभर पहले तेरी शिकायत आई थी। मैनें तेरी जन्मकुंडली निकालकर सोचा, पहले बच्चे अपना हिसाब कर लें, फिर मैं तो कभी भी तुमसे मिल सकता हूँ। लेकिन मेरे फोन पर समझाने के बाद भी तू नहीं समझा और मुझे आना पड़ा। चल बता, कृतिका कहाँ है ?”

दिव्यांश—“मुझे नहीं पता।”

गोविन्द बिशनोई ने चार–पाँच थप्पड़ मारकर कहा—“देख मुझे गुस्सा मत दिला, सीधे–सीधे बता दें।”

दिव्यांश फूट–फूटकर रोते हुए कहने लगा—“मुझे सच में नहीं पता, अब आप चाहें मेरी जान ले लो। जब मुझे मालूम ही नहीं, तो कैसे बताऊँ ? हाँ, मैनें उसे मारने का सोचा था। लेकिन फिर मुझे लगा, अगर मैंने अभी उसे मार दिया, तो सीधा शक मेरे ऊपर ही आएगा। मैंने बस अपने दोस्तों से इस बारे में बात ही की थी। कुछ किया नहीं।”

सुदर्शन दिव्यांश की बात सुनकर अत्यंत क्रोधित होकर दिव्यांश को लात मारते हुए बोला—“कृतिका को मारेगा तू। अब ये सोच कि तू जिन्दा कैसे बचेगा ? बहुत शौक है, तुझे लड़कियों और औरतों को धोखा से बिस्तर पर सुलाने का।”

सुदर्शन ने दिव्यांश का हाथ मरोड़कर लातें मारते हुए कहा—“हरामखोर, अपनी हवस के लिए तू लड़कियों और औरतों के दुःखी और परेशान होने का फायदा उठाता है?”

दिव्यांश की दर्द के मारे जान निकलने लगती है। सुदर्शन चीख-चीखकर "बता, कृतिका कहाँ है?" पूछ-पूछकर दिव्यांश को मारने लगता है।

गोविन्द बिशनोई ने सुदर्शन को पकड़कर दिव्यांश को छुड़ाकर कहा—“इसको सच में नहीं पता। मैं बोलने वाले की आवाज़ सुनकर बता देता हूँ, कौनसी बात सच है? और कौनसी बात झूठ ? आलोक, ले जा इसको।”

आलोक सुदर्शन को पकड़कर दिव्यांश से दूर ले आता है।

गोविन्द बिशनोई ने सुदर्शन से कहा—“तुम चिन्ता मत करो। कृतिका को आज नहीं तो कल मैं ढूंढ दूँगा। इसे सच में नहीं पता, कृतिका के बारे में।”

गोविन्द बिशनोई ने अपने एक आदमी से कहा—“जा, उनको खोल दें।”

गोविन्द बिशनोई का आदमी दिव्यांश के घर के अन्दर जाकर दिव्यांश के घरवाले जिस कमरे में बन्द हैं, उस कमरे का दरवाजा खोल देता है। दिव्यांश के घरवाले रोते–बिलखते दौड़कर सड़क पर अधमरी हालत में पड़े दिव्यांश के पास आए और दिव्यांश को उठाकर अन्दर ले जाने लगते हैं।

गोविन्द बिशनोई ने कहा—“सुनो, हालत तो तुम सबकी भी यहीं करनी चाहिए। तुम लोगों को इसकी हर करतूत अच्छी तरह पता थी, लेकिन फिर भी दूसरों पर इल्ज़ाम लगाकर हर बार इसे बचाते हो। वो लड़की ही बेकार है, वो औरत ही चरित्रहीन है। उसी ने फँसाया हैं, हमारे भोले–भाले, मासूम बच्चे को।”

दिव्यांश के घरवालें हाथ जोड़कर रोते हुए माफ़ी माँगने लगते हैं।

गोविन्द बिशनोई ने अपने आदमियों से कहा—“चलो।”

सुदर्शन और आलोक ऑटो की ओर चल पड़ते हैं।

गोविन्द बिशनोई की गाड़ी में सभी अपनी-अपनी जगह बैठ जाते हैं। गोविन्द बिशनोई का ड्राईवर गाड़ी स्टार्ट करता है।

गोविन्द बिशनोई ने दिव्यांश को लेकर घर के अन्दर दाखिल होते दिव्यांश के घरवालों से कहा—“और सुनो, पुलिस के पास जाकर मेरे खिलाफ़ रिपोर्ट भले ही लिखवाओ। लेकिन इतना ध्यान रखना, इस लड़के के बाकी पच्चीस लड़कियों और औरतों के साथ किये कारनामें और तुम बाकी घरवालों के अब तक छुपे हुए सारे काले कारनामें भी सबके सामने आ जाएँगें। अगर पुलिस मेरे पास आई तो।”

गोविन्द बिशनोई ने ड्राईवर से कहा—“अब चलो।”

गोविन्द बिशनोई का ड्राईवर गाड़ी ले जाता है।

ऑटो में आलोक ड्राईविंग सीट पर और सुदर्शन पीछे बैठ जाता है। आलोक ऑटो स्टार्ट करके चल पड़ता है।

आलोक—“तू टेन्शन मत ले, यार। मिल जाएगी, कृतिका। आजकल में ढूंढ लेंगे।”

सुदर्शन—“लेकिन कहाँ ढूंढे, यार? कहाँ गई होगी?”

आलोक—“सोचते है। चल पहले कुछ खा लेते हैं। भूख लग गई।”

सुदर्शन—“मेरी तो कल से भूख ही मर गई। कल दोपहर को सुजाता मैडम ने खाने के लिए कहा था, बस उस वक्त दो रोटी खाई थी।”

आलोक—“अरे, यार… से थोड़ी चलता है। चल पहले घर चलते हैं।”

सुदर्शन चुपचाप कृतिका के बारे में सोचने लगता है।

आलोक—“वैसे एक बात बता, तुझे तो इस लड़की में कोई दिलचस्पी ही नहीं थी। तू तो उस धोखेबाज़ लड़के की धोखेबाज़ी सबके सामने लाना चाहता था। वो तो अब सबके सामने आ गई। सब कुछ न्यूज़ में भी आ गया। और आज उसको छः–आठ महीने के लिए हॉस्पीटल भी भेज दिया। फिर अब इस लड़की के लिए इतना परेशान क्यों हो रहा है?”

सुदर्शन—“इन्सानियत के नाते। पिछले ढ़ाई–तीन महीने से रोज मिलती है। अब कल से अचानक गायब। परेशान तो होना ही था।”

आलोक—“नहीं, भाई। तूने जिस तरह कृतिका को मारने की बात सुनते ही उस लड़के को मारा। उससे साफ़ पता चलता है। अब बात कुछ और है। अगर गोविन्द काका तुझे नहीं पकड़ता, तो तू उसे मार ही डालता।”

सुदर्शन—“तू यू ही सोच रहा है। ऐसी कोई बात नहीं है।”

आलोक—“चल ठीक है।”

आलोक ऑटो चलाते हुए सिंधी केम्प बस स्टैण्ड के सामने से गुजरने लगता है। सुदर्शन की नज़र बस स्टैण्ड के वैटिंग रूम पर पड़ती है। वैटिंग रूम में किसी को देखकर सुदर्शन को कृतिका के बैठी होने का आभास होता है।

सुदर्शन—“अरे, रोक–रोक।”

आलोक—“क्या हुआ?”

सुदर्शन—“मुझे बस स्टैण्ड के अन्दर वाले वैटिंग रूम में कृतिका दिखी।”

आलोक ने ऑटो साइड में रोककर कहा—“वो यहाँ कहाँ होगी ?”

सुदर्शन ने ऑटो से उतरकर जाते हुए कहा—“चलकर देखेंगे, तभी तो पता चलेगा।”

आलोक ऑटो बन्द करके सुदर्शन के पीछे–पीछे आता है। दोनों दौड़कर वैटिंग रूम की ओर आने लगते हैं।

आलोक—“हाँ, यार। कृतिका ही है।”

वैटिंग रूम में दोनों हाथों से चेहरा ढ़ककर कृतिका एक कुर्सी पर बैठी है। सुदर्शन और आलोक वैटिंग रूम के अन्दर आकर कृतिका के पास आते हैं।

सुदर्शन—“कृतिका ! यहाँ क्या कर रही हो?”

कृतिका अपने चेहरे से हाथ हटाकर सामने सुदर्शन और आलोक को देखकर खड़ी होती हुई बोली—“तुम दोनों?”

सुदर्शन—“हम तो तुम्हें ही ढूंढ रहे हैं। कल से तुम्हारा मोबाइल भी बन्द है। आज सुबह तुम्हारे घर पास जाकर उस दुकानवाले से पूछा, उसने बताया, कल से तुम घर से बाहर नहीं निकली। या तो तुम छोड़कर भाग गई हो या फिर तुम्हारे पापा ने तुम्हें घर से निकाल दिया है।”

कृतिका—“किसी ने घर से निकाला नहीं है। मैं खुद ही घर छोड़कर आ गई। मॉम–डेड को बहुत परेशान कर लिया, यार। सोचा, अब उन्हें चैन से रहने दूँ।”

सुदर्शन—“ऐसे क्यों सोच रही हो ? अचानक ऐसा क्या हो गया और सर पर ये चोट कैसे लगी?”

कृतिका—“कुछ नहीं, यार। तुम मुझे चार–पाँच हजार रुपये दे सकते हो ? मैं यहाँ से दूर जाना चाहती हूँ।”

सुदर्शन—“कहाँ जाना चाहती हो?”

कृतिका—“कहीं भी, लेकिन यहाँ से दूर।”

सुदर्शन—“तुम मेरे साथ चलो। घर बैठकर बात करते हैं।”

कृतिका—“नहीं यार, मुझे अब कहीं नहीं जाना। चार–पाँच हजार नहीं दे सकते तो, हजार–दो हजार ही दे दो। मैं बाद में वापस दे दूँगी।”

सुदर्शन—“ओहो…पैसे की बात नहीं है, चाहें दस हजार ले लेना। लेकिन अभी मेरे साथ चलो। मैं तुम्हारा दोस्त हूँ ना, तो मेरी बात नहीं मान सकती क्या?”

कृतिका वापस कुर्सी पर बैठ जाती है। कृतिका की आंखें भीगने लगती है। सुदर्शन और आलोक एक-दूसरे की ओर देखते हैं।

सुदर्शन ने कृतिका के बाजू पकड़कर कृतिका को खड़ी करके कहा—“प्लीज, चलो। रास्ते में आराम से बताना, क्या हुआ?"

आलोक ने आत्मीयता से कहा—“प्लीज, दीदी। हमारे साथ चलो।"

कृतिका नम आंखों से आलोक की ओर देखती है।

सुदर्शन ने कृतिका के आँसू पोंछकर कहा—“मत रोओ। सब ठीक हो जाएगा। चलो चलते हैं।"

सुदर्शन कृतिका को बाजू से पकड़कर कृतिका को साथ लेकर चलने लगता है। आलोक उनके पीछे–पीछे आता है। आलोक आकर ड्राईविंग सीट पर और सुदर्शन कृतिका को पीछे बिठाकर कृतिका के पास बैठ जाता है। आलोक जेब से मोबाइल निकालकर गोविन्द बिशनोई को कॉल लगाता है।

गोविन्द बिशनोई ने कॉल रिसींव करके कहा—“हाँ, बेटा?”

आलोक—“काका, वो कृतिका मिल गई। आप अब मत ढूंढना उसको।”

गोविन्द बिशनोई—“कहाँ मिली ? सब ठीक तो है ना ?”

आलोक—“हाँ, सब ठीक है। यहीं सिंधी केम्प बस स्टैण्ड पर बैठी थी। कृतिका के फेसबुक पोस्ट न्यूज़ में आने के कारण घरवालों ने डांट दिया, इसलिए नाराज होकर आ गई थी।”

गोविन्द बिशनोई—“उफ्फ…ये लड़कियों के घरवाले भी अजीब होते हैं। जो लड़की घटिया लोगों के खिलाफ बोलना चाहती है, उसको बोलने नहीं देते। चल, लड़की मिल गई, ये अच्छी बात है। समझा–बुझाकर घर भेज देना।”

आलोक—“हाँ, काकाजी।”

आलोक ने कॉल कटने पर मोबाइल जेब में डालकर सुदर्शन से कहा—“पहले इनको डॉक्टर के पास लेकर चले क्या ? सर में सूजन आई हुई है। हाथ की कोहनी भी छिली हुई है।”

कृतिका—“अरे नहीं, अपने आप ठीक हो जाएगी।”

सुदर्शन—“तुम चुप रहो अभी। तू चल यार, वो डॉ. सुशीला सहारण के क्लीनिक चल। वो सुजाता मैडम की सहैली है।”

आलोक ऑटो स्टार्ट करके चलाने लगता है। सुदर्शन कृतिका से पूरी बात पूछता है। कृतिका अपनी पीठ और हाथ पर डंडे की चोट के निशान दिखाकर सुदर्शन को सारी बातें बताती है। आलोक ऑटो लाकर डॉ. सुशीला सहारण के क्लीनिक के सामने साइड में खड़ा करके बन्द करता है। सुदर्शन और आलोक कृतिका को साथ लेकर क्लीनिक में आकर डॉ. सुशीला सहारण के पास आते हैं और कृतिका की चोट पर मरहम पट्टी करवाकर कृतिका के लिए दवाई लेकर वापस कृतिका के साथ ऑटो में आकर बैठते हैं। आलोक ऑटो स्टार्ट करके ऑटो सुदर्शन की बिल्डिंग के सामने लाकर रोकता है। कृतिका और सुदर्शन ऑटो से उतरते हैं।

आलोक—“ठीक है, भाई। चलता हूँ।"

सुदर्शन—“हाँ, ठीक है।”

आलोक ऑटो चलाते हुए चला जाता है।

सुदर्शन बिल्डिंग के दरवाजे का ताला खोलकर सीढ़िया चढ़ने लगता है। कृतिका सुदर्शन के पीछे-पीछे आती है।

सुदर्शन ने ऊपर आकर फ्लेट का ताला खोलकर कह।—“आओ, तुम कमरे में आराम कर लो। मैं कुछ खाने के लिए लेकर आता हूँ।”

कृतिका—“नहीं, रहने दो। मुझे भूख नहीं है।”

सुदर्शन—“मुझे तो है। मैंने कल दोपहर बाद से कुछ नहीं खाया।”

कृतिका ने आश्चर्य से कहा—“लेकिन क्यों ?”

सुदर्शन—“अब ये भी बताना पड़ेगा ?”

कृतिका—“हाँ।”

सुदर्शन—“मतलब खाना ना खाऊँ, पहले तुम्हें बताऊँ ?”

कृतिका—“ओह…सॉरी। ठीक जाओ, पहले खाना खाओ।”

सुदर्शन ने कमरे में आकर छत के पंखे का बटन दबाकर कहा—“हम्म…तुम आराम करो। मैं बस कुछ ही देर में आया।”

कृतिका सैंडल उतारकर कमरे में आकर बैड पर लेट जाती है। सुदर्शन बाहर आकर आम्रपाली सर्किल की ओर आने लगता है।

नारायण ने सुदर्शन को सामने से जाते देखकर कहा—“सुदर्शन, के होयो ? आज काम पर कोनी ग्यो के?"

सुदर्शन ने दुकान पर आकर नारायण को सारी बात बताकर कहा—“बिन बिल्डिंग म सुआ ग आयो हूँ। अब कोई होटल पर उ खाणो ले ग आऊँ। मैं भी खा ल्यूगा, बा बी खा लगी।”

नारायण ने कहा—“खाणो म मणूवा द्यू, यार। तू बैठ। तेरी भाभी न क्योउ, रोटी मणाण बई।”

सुदर्शन—“तू क्यू परेशान होवः?”

नारायण—“किसी बावळी बात कृ यार। इमे परेशानी के है ? रोटी मणना म के टेम लागे, बार रोटी मणी।”

नारायण दुकान के पिछले दरवाजे से घर के अन्दर आकर आयु में उनतीस(29) वर्ष की पत्नी को सुदर्शन और कृतिका के लिए खाना बनाने का बोलकर दुकान में वापस आकर सुदर्शन के साथ बातें करने लगता है। कुछ देर बाद सुदर्शन का मोबाइल पर कॉल आता है। सुदर्शन मोबाइल निकालकर देखता है। सुजाता का कॉल है।

सुदर्शन ने कॉल रिसींव करके मोबाइल कान पर रखकर कहा—“हैलो, मैडम।”

सुजाता—“हाँ, अभी मेरी वो डॉक्टर फ्रैंड सुशीला का कॉल आया था। उसने बताया, तुम कृतिका को लेकर गए थे।”

सुदर्शन एक–एक करके सारी बातें सुजाता को बताता है।

सुजाता ने कहा—“उफ्फ ! समझ में नहीं आता, कुछ लोग इतनी सी बात क्यों नहीं समझते, बुरे लोगों के खिलाफ़ चुप रहने से बुराई को बढ़ावा मिलता है ?”

सुदर्शन—“हाँ, मैडम। लेकिन अब नहीं समझते तो क्या कर सकते हैं ?”

सुजाता—“हम्म…अच्छा तुमने खाना खा लिया ?”

सुदर्शन—“नहीं, मैं नारायण की दुकान पर बैठा हूँ। ये बनवा रहा है खाना।”

सुजाता—“अच्छा, ठीक है। और कोई प्रोब्लम हो, तो मुझे या तुम्हारे सेठ जी को कॉल कर लेना।”

सुदर्शन—“हाँ, मैडम।”

सुजाता—“कल ऑफ़िस आ जाना। मैं इनको बता दूँगी।”

सुदर्शन—“ठीक है, मैडम।”

सुजाता का कॉल कटने पर सुदर्शन मोबाइल जेब में डालकर नारायण के साथ बातों में लग जाता है।

कुछ देर बाद नारायण की पत्नी एक बरतन में सब्जी और एक बरतन में रोटी डालकर घर के दरवाजे से बाहर आकर सुदर्शन को देती है।

सुदर्शन ने खाना लेते हुए कहा—“धन्यवाद, भाभी। माफ़ करियो, आज थाने परेशान करवायो ई खातर।”

नारायण की पत्नी—“इमे परेशानी गी के बात है ? थे भी तो म्हाने कोई काम वास्ते कदी नटो कोनी। फेर पड़ोसी ही पड़ोसी ग काम आवः।”

सुदर्शन—“हाँ, वो तो है। ठीक है। ये बरतन–भांडा म काल दे जाऊँगा।”

नारायण—“कोई दिक्कत कोनी।”

सुदर्शन खाना लेकर चलने लगता है।

नारायण ने खड़े होकर कहा—“अरे सुण, खावःगो क्या म ? तेर खन तो बरतन–भांडा ही कोनी।”

सुदर्शन रुका और मुड़कर नारायण की ओर देखकर मुस्कुराने लगता है।

नारायण ने हँसकर अपनी पत्नी से कहा—“टाबरिया न थाळी–कौली देर भेज दे, सागः।”

नारायण की पत्नी ने घर के अन्दर जाकर अपने आयु में चार(4) साल के बेटे को दो थाली, दो कटोरी, दो चम्मच देकर कहा—“जा, सुदर्शन काका ग सागः चल जा।”

नारायण का लड़का हाथों में बरतन लिए घर से बाहर आकर सुदर्शन के साथ चल पड़ता है। सुदर्शन बच्चे के साथ बिल्डिंग में आकर सीढ़िया चढ़ते हुए फ्लेट में आया और किचन में आकर खाना रखकर बच्चे से बरतन लेकर रख लेता है।

बच्चे ने कहा—“अब म जाऊँ, काका ?”

सुदर्शन—“हाँ, जा।”

बच्चा चला जाता है और सुदर्शन ने कमरे में आता है। कृतिका सो रही है।

सुदर्शन ने सोचा कि लगता है, दवाई और इंजेक्शन के कारण नींद आ गई। मैं भी खाना बाद में इसके साथ ही खा लूँगा।

सुदर्शन बिल्डिंग की छत पर चला जाता है।

कृतिका शाम को आठ बजे नींद से जागकर बिस्तर से उठकर कमरे से बाहर आती है।

कृतिका ने मन में कहा कि ये सुदर्शन कहाँ रह गया ? अभी तक आया नहीं। मुझे इसके साथ नहीं आना था, बेकार में ही मेरे कारण ये परेशान होगा।

कृतिका सैंडल पहनकर फ्लेट से बाहर आई तो देखा कि ऊपर छत का दरवाजा खुला हुआ है। कृतिका छत पर आती है। सुदर्शन शहर को देख रहा है।

कृतिका—“तुम खाना खाकर आ गए ?”

सुदर्शन ने मुड़कर कहा—“उठ गई तुम ? बस तुम्हारे जागने का ही इंतजार कर रहा था। खाना तो नारायण ने बनवा दिया था। मैनें सोचा, तुम हॉस्पीटल से दवाईयाँ लेकर और इंजेक्शन लगवाकर आई हो। तुम्हें थोड़ी देर सोने देना चाहिए।”

कृतिका—“चलो, फिर अब तो खाना खालो।”

सुदर्शन—“हाँ, चलो।”

सुदर्शन और कृतिका छत से नीचे आने लगते हैं। सुदर्शन छत का दरवाजा बन्द करके ताला लगाता है और फ्लेट में आकर सुदर्शन अपने जूते और कृतिका अपनी सैंडल निकालकर दोनों हाथ–मुँह धोने के बाद किचन में आते हैं।

सुदर्शन ने रोटी और सब्जी वाले बरतन उठाकर कहा—“तुम ये थाली और कटोरी उठा लो। कमरे में बैठकर खाते है।”

सुदर्शन कमरे में जाने लगता है। कृतिका बरतन उठाकर सुदर्शन के पीछे–पीछे कमरे में आती है। सुदर्शन और कृतिका खाना बैड पर रखकर बैड पर आमने–सामने बैठते हैं। सुदर्शन एक थाली और एक कटोरी कृतिका के सामने रखकर एक थाली और एक कटोरी खुद के सामने रखता है।

सुदर्शन ने दोनों की कटोरी में सब्जी डालकर रोटियाँ रखने के बाद कहा—“अब शुरू करें?”

कृतिका—“हम्म…”

सुदर्शन—“अरे…पानी तो रह ही गया। मैं लेकर आता हूँ।”

सुदर्शन उठकर किचन में जाकर एक जग में पानी भरकर लाता है।

सुदर्शन वापस बैड पर बैठकर बोला—“अब शुरू करो।”

कृतिका और सुदर्शन खाना खाने लगते हैं।

कृतिका पहला निवाला मुँह में लेकर सुदर्शन की ओर देखकर सोचने लगी कि काश सुदर्शन पहले मिल गया होता, तो शायद मैं इतनी नहीं बिगड़ती।

कृतिका की आँखें भीगने लगती है।

सुदर्शन कृतिका की आँखों में आँसू देखकर बोला—“अरे, क्या हुआ ? तुम रोने क्यों लगी ? अब देखो, गरीब लोग तो ऐसा ही खाना बनाते हैं। थोड़ा–बहुत एडजस्ट तो करना पड़ेगा।”

कृतिका आँखें पोंछकर बोली—“अरे नहीं, खाना तो बहुत अच्छा है। ये आँसू तो मेरे कारण तुम्हें परेशान देखकर निकल आए।”

सुदर्शन—“ओहो…मैं कोई परेशान नहीं हूँ। अब रोये बिना चुपचाप खाना खाओ।”

कृतिका अपनी आँखे पोंछकर खाना खाने लगती है।

रात को ग्यारह बजे सुदर्शन और कृतिका बैड पर बैठे बातें कर रहे हैं।

सुदर्शन—“अच्छा, तो अब सोया जाए ?”

कृतिका—“हाँ ठीक है।”

सुदर्शन—“फिर सो जाओ, तुमने दवाई भी ली है।”

कृतिका बैड पर लेट जाती है।

सुदर्शन बैड से उठकर किचन में से एक चटाई लाकर फर्श पर बिछाता है और बैड से एक तकिया उठाकर चटाई पर लेटने लगता है

कृतिका बैठकर बोली—“तुम वहाँ क्यों सो रहे हो?”

सुदर्शन ने मुस्कुराकर कहा—“अब तुम्हारे साथ एक बिस्तर पर तो नहीं सो सकता ना।”

कृतिका—“क्यों ?”

सुदर्शन—“अब ये भी बताना पड़ेगा।”

कृतिका—“हाँ, पहले

भी तो सोये थे। फिर आज क्या प्रोब्लम है?”

सुदर्शन—“उस वक्त सर्दी थी, इसलिए मजबुरी में सोया। अब तो गर्मी है, अगर यहाँ चोरों का खतरा ना हो, तो छत पर भी सो सकता हूँ।”

कृतिका—“कोई जरूरत नहीं है। तुम यहाँ बैड पर सो जाओ।”

सुदर्शन—“लेकिन…”

कृतिका—“लेकिन क्या ? जिनको गलत सोचना है, वो तो तुम नीचे सोओगे, तब भी गलत ही सोचेंगे। दिखावे के लिए अलग–अलग बिस्तर लगाए है, रात को एक साथ सो जाते होंगे। और रही बात हमारे एक बिस्तर पर सोने से हमारे बीच कुछ हो ना जाए ? तो जब उस सर्दी की रात में नशे की हालत में कुछ नहीं हुआ, तो अब तो मैं होश में हूँ। और फिर दिल और दिमाग साफ़ होना चाहिए। जिनके दिमाग में गन्दगी भरी हो, वो तो अलग–अलग कमरों में सो कर भी मौका देखकर एक कमरे में आ जाते हैं।”

सुदर्शन आश्चर्यचकित होकर कृतिका को देखने लगता है।

कृतिका ने आश्चर्य से कहा—“क्या हुआ?"

सुदर्शन—“ये बातें कहीं सुनी-सुनी सी लग रही है।”

कृतिका—“तुमने ही तो कहीं थी। भूल गए क्या?”

सुदर्शन—मैंने ही बताया था क्या?”

कृतिका बैड से उतरते हुए बोली—“अच्छा, ठीक है। अगर तुम्हें प्रोब्लम है, तो मैं नीचे सो जाती हूँ। तुम यहाँ आ जाओ।”

सुदर्शन—“अरे, रुको–रुको। मैं भी वहीं सो जाता हूँ।”

सुदर्शन खड़ा होकर तकिया बैड पर रखता है और चढ़ाई समेटकर बैड पर आकर पीठ के बल सीधा होकर लेट जाता है।

सुदर्शन—“अब ठीक है।”

कृतिका मुस्कुराकर सुदर्शन की ओर मुँह करके बैड पर लेटती हुई बोली—“हाँ, ठीक है।”

सुदर्शन ने मज़ाकिया लहजे में कहा—“अब रात को कुछ हो जाए, तो ब्लात्कार का इल्ज़ाम मत लगा देना। आजकल की लड़कियाँ भी धोखा देने में कम नहीं है।”

कृतिका ने हँसकर कहा—“नहीं लगाऊँगी।”

सुदर्शन—“वैसे घबराना मत। कुछ नहीं होगा।”

कृतिका—“पता है।”

सुदर्शन और कृतिका मुस्कुराते हुए अपने बीच सीमित दूरी रखकर सो जाते हैं।।

धोका हमदर्दी सजा

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